Sunday, 19 August 2012

क्या समाजवादी पार्टी ने फूलनदेवी का राजनैतिक इस्तेमाल कर भुला दिया

विद्या भूषण रावत

फूलन देवी की हत्या हुए लगभग ११-१२ वर्ष होगये हैं. उनके हत्या के कारणों की जांच चल रही है और वोह कहाँ तक पहुँची उसकी न किसी को जानकारी है और न ही चिंता. दुखद बात तो यह के न ही फूलन को राजनीती में लेन वाले लोगो ने उनके परिवार वालो के बारे में जानने की कोई कोशिश की . यह साबित करता है हमारी राजनीती का क्या स्वरूप है और यहाँ चढ़ते सूरज को सलाम है और जब आपके सितारे गर्दीश में हो या डूब गए तो फिर आशा न करें के कोई राजनेता उसकी जानकारी भी लेगा. यह भी सत्य की जिन लोगो को राजनीती की सही जानकारी नहीं या जिनका मन उस प्रकार की तिकड़मो में नहीं है वोह राजनीती नहीं कर सकते हैं और फूलन की सहजता और राजनीतिक असमझ के कारण की आज उनकी पार्टी के ही लोगो ने उनको पूर्णतया भुला दिया है.

फूलन के पैत्रिक गाँव शेखपुरागुद्धा गाँव में आज भी उनका परिवार अपमान और नारकीय जिंदगी जी रहा है. जालौन जिले के कालपी शहर से लगभग १०-१२ किलोमीटर दूर बीहड़ो  के बीच बसा शेखपुरा गाँव यमुना के किनारे पे बसा है. फूलन की छोटी बहिन रामकली अपनी माँ और बेटे के साथ यहाँ रहा रही हैं. यह घर फूलन के पिता ने बनवाया था और थोडा इंदिरा आवास योजना की मदद लेकर एक छोटा सा बाथरूम और एक कमरा बना है. यहाँ आकर यह नहीं लगता के एक  सेलेब्रिटी सांसद के परिवार के सदस्य आज खाने को मोहताज हैं. 

फूलन की माँ और बहिन के पास कुच्छ नहीं है. हद तो यह है के उनके पास अपने इलाज करवाने के लिए पैसे नहीं है. यदि एक दिन मजदूरी नहीं करेंगे तो घर में चूल्हा नहीं जलता. माँ इलाज़ न हो पाने की वज़ह से अपने बेटे शिव नरियन के पास  ग्वालियर चली गयी वोह पुलिस में काम करता है. फूलन के ताऊ और उनके चचरे भाई मैयादीन ने पत्रिक सम्पति को हड़प लिया फलस्वरूप उनके पिता के पास कोई सम्पति नहीं आये. फूलन को पहली बार जेल उनके चचरे भाई मैयादीन ने ही भिजवाया जब उसने अपने पिता का हको की मांग की.

जब मैं रामकली से मिला तो मेरी आँखों में सन्नाटा था. क्या मैं उस परिवार के सदस्य को देख रहा हूँ जिसकी दो बार सदस्य दो बार सांसद बनी. फूलन ने आत्मसमर्पण के बाद ८ वर्ष जेल में बिताये और फिर रिहाई के बाद समाजवादी पार्टी ने उनका इस्तेमाल करना शुरू किया. फूलन के नाम पर मल्लाह बिरादरी को इकठ्ठा किया गया और उनको मिर्ज़ापुर क्षेत्र से चुनाव लड़ाया गया. उनकी बहिन और गाँव के अन्य सदस्यों का साफ़ मानना था के फूलन गाँव के लिए बहुत कुच्छ करना चाहती थी लेकिन उम्मेद सिंह ने उनकी उम्मीदों को ख़त्म कर दिया. वोह ये मानते हैं के जहाँ समाजवादी पार्टी ने उनको राजनैतिक तौर पर इस्तेमाल किया वहीँ उम्मेद ने उनके पैसे पर नज़र रखी और आज फूलन के न रहने पर उनकी पूरी सम्पति पर कब्ज़ा कर बैठा है जबकि उनकी माँ और छोटी बहिन आज दर दर को मोहताज हैं.

रामकली का दर्द बयां नहीं किया जा सकता. उसने सपने देखे अच्छी जिंदगी के. फूलन एक जिंदादिल इंसान थी लेकिन थी बहुत भोली. उसका सपना अपने गाँव में दुर्गा माँ एक विशाल मंदिर बनवाने का. वोह चाहती थी बहुत कुच्छ करना लेकिन राजनैतिक अपरिपक्वता के चलते ऐसा संभव नहीं था. फूलन एक राजनेता नहीं थे. वो एक विद्रोही थी जिन्होंने अपने साथ हुए अन्याय को सहन नहीं किया. उन्होंने शर्म से सर छुपा कर जीना स्वीकार नहीं किया और सर उठा कर बदला लिया. समाज ने उनको कई नाम दिया. क्रूर, दस्यु सुंदरी और न जाने क्या क्या लेकिन फूलन वाकई में अपने इर्द गिर्द रह रही घटनाओं का शिकार होती चली गयी.

उनका व्यक्तिगत जीवन एक कहानी था जिससे हमारे समाज की लडकिया सीख सकती हैं के जिनके साथ दुर्व्यवहार होता है उनको शर्म से जिंदगी नहीं अपितु इज्जत से जीना सीखना पड़ेगा आखिर कोई भी महिला अपने पे तो हिंसा नहीं करती. जो उन पर हिंसा करता है उसके विरुद्ध कार्यवाही हो. फूलन उन मध्य वर्ग की महिलाहो की तरह नहीं रही जो  उन पर हिंसा होने के बाद घुट घुट कर जिंदगी  जीती, न ही उन्होंने मरने की सोची. उन्होंने जिंदगी जीने की सोची और ये उनकी सबसे बड़ी ताकत थी. एक आज़ाद भारत में ऐसे जज्बे वाली महिलाये कम है  और इसीलिये फूलन को अंतरास्ट्रीय मीडिया ने हाथो हाथ लिया क्योंकि उनके जीवन की कहानी में एक जज्बाती और सर उठाकर जीने वाली महिला की कहानी है.
लेकिन फूलन को क्या पता के उनके अपने ही लोग उनको 'दुधारू गया' की तरह इस्तेमाल करेंगे. रिहाई के बात फूलन मार्केट के प्रोडक्ट हो चुकी थी अतः पैसे भी काफी आये लेकिन राजनैतिक सोच के आभाव में फूलन यथास्थ्तिवादी ताकतों के हाथ में ही चली गए और फिर वही हुआ जिसका खतरा था. फूलन केवल निषाद समुदाय की महिला बनाकर रह गयी और उनकी मौत के बाद तो उनको उनके की लोगो ने पूरी तरह से भूला दिया.

फूलन दलित बहुजन महिला आन्दोलन के वास्ते बहुत कुच्छ कर सकती थी. उत्तर प्रदेश के अन्दर दलित अति पिच्च्दे समाज को इकठ्ठा करने और उसको नयी दिशा देने में वो निर्णायक भूमिका कर सकती थी लेकिन ऐसा तब संभव होता जब फूलन को दलित बहुजन आन्दोलन की जानकारी होती और उसके महापुरुषों के बारे में बताया जाता. उनके समाज में आज भी ब्राह्मणवादी परम्पराओं का बोलबाला है. अन्धविश्वाश आज भी बदस्तूर जारी है. दुखद बात यह है के फूलन उत्तर प्रदेश में बसपा विरोधी प्रोपगंडा का शिकार हुई. मैं यहाँ पर पार्टी की बात नहीं करना चाहता लेकिन केवल उसके सन्दर्भ ढूँढा रहा हूँ के फूलन एक सामाजिक आन्दोलन को मजबूत बना सकती थी लेक्किन सत्ता के गलियारों तक और सत्ता के चकाचौंध ने उत्तर प्रदेश में एक बहुत बड़ी क्रांति को रोक दिया.

आज फूलन अपने गाँव के लिए कुच्छ नहीं कर पाई. उसकी माँ और बहिन दो जून की रोटी के लिए मोहताज हैं और उनके नाम से वोट बटोरने वाली पार्टी और उनके राजनेताओ को यह पता भी नहीं के उनका परिवार किस हालत में रह रहा होगा. क्या यह फूलन के भोलेपन और ईमानदारी का सबूत नहीं के उन्होंने अपने लिए कुच्छ किया नहीं. लेकिन दुसरी तरफ यह भी सच है के उनके पास पैसे थे लेकिन उनके असमय मौत से उनकी सम्पति उनके परिवार तक नहीं पहुँच पाई. लोग बार बार यह सवाल पूछते हैं के फूलन की हत्या क्यों हुई? क्योंकि जो उनका हत्यारा माना जा रहा है वोह उनके घर पे आता जाता रहा है और ऐसे पहुँच कैसे हुई.

फूलन की बहिन रामकली ने मुलायम सिंह यादव को पिता कहा. फूलन भी मुलायम सिंह जी को पिता कहते थी. वोह आज भी उनके अहसानमंद है लेकिन दुखी भी के आज दो बार की संसद फूलन की माँ के पास सर छुपाने की जगह नहीं. एक छोटा सा टूटा फूटा सा घर है और खाने के लिए अब उनकी माँ काम नहीं कर सकती और न उनको कोई विधवा पेंसिओं है न ही गरीबे रेखा  का कार्ड. क्या ये शर्मनाक नहीं की आज हम समाजवादी पार्टी और उनकी सरकार से फूलन के परिवार के लिए तीन सौ रुपैया पेंसन और गरीबी रेखा कार्ड की बात कहें. रामकली भी बीमार है और उसका बेटा मानसिक रोक से ग्रस्त है. कुच्छ वर्ष पूर ट्रेन की छत पर यात्रा करते वक़्त उसका सर किसी वस्तु से टकरा गया और तब से उसकी स्थिथि ठीक नहीं लेकिन त्रासदी है के उसके ठीक से इलाज़ के लिए पैसे भी नहीं है. मुलायम सिंह जी यादव और उनकी समाजवादी पार्टी से अनुरोध है के वे फूलन के परिवार को ससम्मान जीवन जीने के लिए कुच्छ करे और अपनी उस सांसद को थोडा याद कर ले जिसके भरोशे उन्होंने एक ज़माने में मल्लाह-निषाद समुदाय में पैठ बनाने का प्रयास किया. 

Friday, 10 August 2012

Goron ka dhandha gore kamayee

ये काली नहीं गोरी कमाई है गोरे लोगो की बाबा रामदेव

विद्या भूषण रावत

बाबा राम देव बार बार अवैध धन के लिए काले धन का इस्तेमाल कर ब्राह्मणवादी रंगभेदी शब्दावली को ही आगे बढ़ा रहे हैं. ब्राह्मणों ने हर गलत चीज की व्याख्या को ऐसे विश्लेषणों से जोड़ा जिनको वोह मानसिक सामाजिक और सांस्कृतिक तरीके से खत्म करना चाहते थे. आज के युग में जब दुनिया इतनी बड़ी है के हम दुनिया में हर जगह संघर्षो के साथ जुड़ते हैं और उनको अपना समर्थन देते हैं, हमें अपनी जुबान को देखना पड़ेगा के ये दबंगई की भाषा ज्यादा न चले और इन भाषा के अतातैयों को अब शीशा दिखने की जरुरत है. आज अभी रामदेव के शुध्ध भाषा में प्रवचन सुन रहा था के कैसे वोह कहते हैं ' जर जोरू और जमीन' झगड़े की जड़ हैं. महिलाओ को जो गली तुलसी ने दी उसको रामदेव भी दे रहे हैं और महिलाओ के बीच में रहकर. एक महिला भी उस पर सवाल नहीं करती क्योंकि यह महिलाएं कोई महिलावाद का झंडा लिए तो वह पे नहीं आ रही. 
रामदेव के ब्रह्मण बनिया समर्थक उनको मिसगाइड कर रहे हैं. रामदेव इतने बेहूदा और झूठ सपने दिखा रहे हैं गाँव के भोली भली जनता को. क्या वो नहीं जानते के पाकिस्तान और अफगानिस्तान क्यों तुम्हारे साथ आयेंगे. जिन विश्श्ग्यो को लेकर वो मंच पर गर्वोंवाक्ति कहते हैं उनके ब्राह्मणवादी खेलो को सब जानते हैं.

पहली बात ये के अवैध धन को काला धन की क्यों कहा जाए.. क्योंकि काला तो सुंदर होता है, मेहनतकाश है. सफ़ेद कबूतर कोई काम नहीं करता लेकिन कला कौवा तो बहुत मेहनत करता है. भारत के अधिकांश मजदूर, श्रमिक, कामकाजी लोग सुबह से शाम तक काम कर अपने शरीर को धुप में काला कर देते हैं. काला रंग तो विद्रोह और सम्मान का प्रतीक है इसलिए इसको अवैध धन या अवैध काम से क्यों जोड़े. 

आश्चर्य की बात यह है के रामदेव के आगे पीछे लगे हिन्दुओ की ऊंची जात ऊंची क्लास के लोग कितना वैध धन रखते हैं यह तो इन्काम टैक्स को पता होगा लेकिन दुनिया भर में ज्यादा अवैध धन और अवैध काम के मालिक हमारी गोरी चमड़ी और उनके हिनुद्स्तानी  भाई और बहिनों की है. वैसे भी हम कब कालो के साथ थे.. हमारे पूज्य पिता महात्मा गाँधी तो कभी कालो के साथ रहे ही नहीं और न ही उन्होंने अफ्रीका में कालो के लिए कोई संघर्ष किया हाँ आज उनके गुजरात के लोग अफ्रीका में कालो का खूफ शोषण कर रहे हैं और अपनी 'गोरी' कमाई विदेशी बैंको  में रख रहे हैं. इसलिए हे राम देव, अवैध धन को आप गोरी कमाई क्यों नहीं कहते ? कब तक आप  भारत के मेहनत काश कालो का और दुनिया में अपनी आज़ादी और आत्मसम्मान के लिए संघर्षरत लोगो का अपमान करता रहोगे . अपने ब्रह्मिन चेलो से बाहर  निकलकर थोडा बहुजन समाज की तरफ देखो  बाबा, ज्ञान मिलेगा.

सदियों से ऐसे सामंती सोच ने लोगो के रंग, रूप और जाती पर आधारित शब्दावलियों को बनाकर हमारा सम्मान खत्म किया है. आज भी जब मैं कई स्थानों पर जाता हूँ तो लोगो को कहता हूँ अपने बच्चो के नाम स्वयं रखो, किसी ब्रह्मिन को न बुलाओ.. क्यों.. क्योंकि जयादातर मुशाहारो के नाम जो ब्राह्मणों दिए वो इस प्रकार से हैं : फेंकू, शानिस्चारी, कलंकि, टमाटर, कलपती, सितामी, अकाल, भुख्लाल, कालिया, भैंसु, गोबरी, विदेशी, रुदल, लंगड़,  इत्यादि. यह तो एक इलाके की कहानी है. ऐसी स्थिति  बहुत से जगहों पर है. क्योंकि हम अपने समाज को उनके नाम से ही घृणा करना सिखाते हैं. हम जानते हैं के हमारे अतीत बहुत खूबसूरत नहीं है लेकिन हमको वर्तमान में तो सुख से जीने का हक़ है. हम अपने अतीत से सीख सकते हैं लेकिन उसमे रह नहीं सकते. इसलिए जब भी हमारे वर्तमान को खत्म करने की कोशिश हुई वो अतीत की स्मृतियों और सामंती घृणा को हमारे नामो में जोड़ा गया. 

आखिर काला दुनियाभर में क्यों ख़राब, गलत और अवैध का प्रतीक बना गया और हम सब उस शब्दावली में बहते चले गए. जब २६ जनवरी मनाये या कोई ' महान' काम हो तो 'सफ़ेद कबूतर' आकाश में छोड़े जाते हैं.. क्यों. कहते हैं के शांति के प्रतीक है. लेकिन सफ़ेद शांति का प्रतीक कैसे होगया. दुनिया भर को लूटा गोरे रंग भेद ने और उसके ऊपर से वर्ण व्यवस्था को लागु करने वाले और उसपर चलने वाले हमारे मथ्मंदिरो के महान क्रन्तिकारी पाने, सभी तो गोरे रंग के प्रतीक हैं ..दुनिया में सबसे ज्यादा अवैध धन इनके मंदिरों, चर्चो, गुरुद्वारों इत्यादि में होगा. लेकिन जब उस धन को अवैध करने की बात कहेंगे तो 'काला धन कह देते हैं. उसको गोरी कमाई कहना चाहिए. कालो पर हमला हो, उनकी संस्कृति को खत्म करने के प्रयास हों, तुम बम गिराओ और फिर अपने पण्डे पादरियों को सफ़ेद झंडा हाथ में लेकर शांति के लिए भेजदो.. वाह वाह, क्या कला है / वाकई  कमाल  है. 

भारत में तो रंगरूप के आधार पर हँसाना और उनका मज़ाक उड़ना एक आम बात है. शादी के विज्ञापनों में लड़की और लड़के की गोराई देखि जाती है. सुन्दरता को गोरे रंग से जोड़कर देखने वाले इस रंग भेदी  स्वरूप को हमारी विज्ञापन कम्पनिया खूब भुना रही है और सबको गोरा दिखने की होड़ है. सुन्दरता का सीधा मतलब पीला दिखना हो गया. और इसमें अब कंपनियों को करोडो की कमाई हो रही है.. हाँ मैं इसको काली कमी तो कटाई नहीं कहूँगा.. ये तो गोरी कमाई है और ऐसी गोरी कमाई पर अब प्रतिबन्ध लगने  चाहिए  क्योंकि ये रंगभेद को बढाती है. क्या हमारे सांसद  इस बात पर कभी विचार करेंगे के भारत के काले रंग के लोगो के साथ कितना दुर्व्यवहार किया है और उसको लेकर वर्णवादी ताकते पुनः शक्रिया हो रही हैं 

हम सभी अपनी भाषा में सुपरलेटिव और एडजेक्टिव ( विश्लेषण) लगाने के आदि हो गए हैं और हमें अपनी भाषा पर ताली पिटवाने के लिए दुसरो का मज़ाक सा उड़ने की आदत सी हो गयी है और इसमें न केवल रंग और जाति का सहारा लिया जाता है अपितु विकलांगता का तो सबसे बड़ा मज़ाक है. अब बार बार निकम्मी और न सुनने वाली सरकार को आप लंगड़ी और गूंगी या बाहरी सरकार क्यों कह रहे हो भाई. किसी की विकलांगता का मज़ाक उड़ना तो कोई हम से सीखे. ऐसे ऐसे शब्द और व्यवहार लायेंगे के ईमानदारी से इज्जत से जीने वाले व्यकी के लिए हमारा समाज जिंदगी नामुनकिन कर देता है और वो तो ऐसे वर्णभेदी  रंगभेदी समाज से भागना पसंद करेगा. क्या रविन्द्र जैन  ने जब इतने सुंदर गाने लिए और संगीत दिया तो कोई कहता है के उनके अन्दर की विकलांगता क्या है. जॉन मिल्टन ४५ वर्ष में अपनी आंखे खो बठे लेकिन उनकी कविताओ में दम इसी उम्र की बाद आया. अमेरिकी रास्त्रपति रूजवेल्ट ने विश्वयुद्ध के समय अपने देश का नेतृत्व किया और अंतरास्ट्रीय मानवाधिकारो के बनाने में उनकी पत्नी की अहम् भूमिका थी लेकिन कोई उनको विकलांग कह के तो कुच्छ नहीं प्राप्त कर सकता. अभी लन्दन ओलिम्पिक्स में दक्षिणी अफ्रीका के तेज धावक ओस्कार पिस्तोरस ने साबित कर दिया के जहाँ छह है वह रह है. और विकलांगता को यदि निक्कमेपन या कमीनेपन से जोड़ेंगे तो इससे बड़ा कमीनापन नहीं हो सकता और ये काम हमरे वर्णवादी संस्कृति ने किये और इसके उदहारण हमारी फिल्मो में बहुत मिलेंगे जहाँ पर एक खलनायक या तो काले रंग का होगा या विकलांग होगा.  हरेक काले या विकलांग चरित्र को इतना नकारात्मक दिखाया जाता है और उन पूर्वाग्रह से युक्ता बातो को पुनः दोहराया जाता है जो अभिशाप हैं लेकिन जिहे हम भुला देना चाहते हैं.दोनों चरित्रों को अपने पे इतना गिरा दिया जाता है या उसका इतना मज़ाक बनाया जाता है के अगर हमारी न्याय प्रणाली सही है तो ऐसे सभी उल्लेखो पर मुक़दमा चलना चाहिए और उन्हें विश्लेषण करके बच्चो को समाज में बताया जाना चाहिए के अभी भी हम सामंती सोच और भाषा शैली के शिकार हैं . 

ब्र्हम्न्वादी या वर्चस्वादी व्यवस्था में गरीबो, मजदूरों, दलितों आदिवासियों, विकलांगो का मज़ाक उड़कर एक स्टीरिओटाइप बनाया जाता है और जिनको शक हो तो आजकल टीवी चैनलों के फूहड़ हंसी मज़ाक के शो देख सकते हैं के किन जोक्स पर ज्यादा तालियाँ पड़ती है.

अब समय आ गया है जब हम अपनी भाषा शैली बदले और दुसरो की जाति, रंग, लिंग और विकलांगता से अपना मनोरंजन न करे और अवैध धने वाले गोरे लोगो की अवैध कमाई को काली कमाई न कहे.. बेहतर है इनकी गोरी कमाई की जांच हो और रामदेव को यह काम खुद से करना चाहिए के उनकी गोरी कमाई  में भारत के किन किन गोरे लोगो की हिस्सेदारी है. चलो आज से ही अपनी जुबान सभालते हैं और यह शुभ काम करते हैं..

Tuesday, 17 July 2012


उत्तर प्रदेश के अनुत्तरित प्रश्न

विद्या भूषण रावत

कल एक टी वी प्रोग्राम में बाबाओ के बाबा पप्पू बाबा के साक्षात् दर्शन हुए. जनाब फैजाबाद के सहादतगंज में अब से कुच्छ साल पहले तक रिक्शा चलाते थे और फिर अंडे बेचते थे. राज कुमार प्रजापति के पास एक दो गाये और भैंसे भी थी लेकिन एक बार उनकी तबीअत इतनी ख़राब हुई के डॉक्टरों ने हाथ पांव छोड़ दिए और प्रजापति बहुत से भगवानो के शरण में गए लेकिन कहीं उनकी नहीं सुनी गयी और तब किसी ने उन्हें प्रभु यीशु मसीह की शरण में जाने को कहा और फिर क्या प्रभु ने राज कुमार प्रजापति को दिव्या दर्शन दिए और उनको चंगे मिल गयी. लेकिन प्रभु का आशीर्वाद उनको यहीं तक नहीं था, अब प्रजापति का काया पलट हो गया और वोह प्रजापति से पपू बाबा बन गए. भक्तो की भारी भीड़ उनके दरबार में आने लगी और वो सबको चंगा करने लगे. कैंसर, भूत प्रेत, हड्डी, मानसिक रोग सभी के इलाज करने लगे. लोग उनके दरबार में जोर जोर से रोते और पपू बाबा उनको चंगे देते. वे कहते हैं के यह मेरी नहीं यीशु मसीह की ताकत है. प्रभु सबका ख्याल रखते हैं और जो उनके दरबार में आएगा वो चंगा हो जायेगा. मैंने उनको कहा के मैंने भी आज से १५ वर्ष पूर्व दक्षिण के मदारी पाल दिनाकरण के दरबार में एक शो देखा जो जवाहर लाल नेहरु स्तादियम में आयोजित किया गया और वोह शो देखकर मुझे पता चला के पल दिनाकरण टीवी का जादूगर है और मदारियों का मदारी. पप्पू बाबा के शो को देख कर लगा के यह पल दिनाकरण का ग्रामीण स्वरुप है. उसके अन्दर दिनाकरण जैसी भाषाई मनमोहिनी नहीं है. हाँ, पप्पू बाबा के दरबार में भीड़ बढाती जा रही है और यह निर्मल बाबा से जयादा कृपा बरसा रही है. 

मैंने पप्पू के देखकर कहाँ के क्या भारत में अस्पतालों को बंद कर देना चाहिए क्योंकि भारत सरकार और यहाँ के वैज्ञानिक बिना बात के इतनी म्हणत कर रहे हैं यदि प्रभु या भगवान के इतनी कृपा बरस जाए तो लोग भूखे क्यों मरे, उनको बीमार होने की नौबत क्यों आये और बच्चे अनाथ क्यों बने. कहाँ वो दयालु भगवान् जो इतनी निर्दयता बरसा रहा है. पूरे शो में एक बात साफ़ दिखी, के राज कुमार प्रजापति के पास सबसे ज्यादा आने वालो में महिलाएं हैं. बेचारी आपने बाल खोल कर रोटी हैं और जमीन पे लोटती हैं और पप्पू उनके दुखड़े सुनकर प्रभु का आशीर्वाद उनको देता है. हाले लुइया. 

इसका दुखद पहलू यह भी है के धर्म के झंडे को आगे बढ़ने के लिए धर्मान्धता का सहारा लिया जा रहा है. ऐसे अवध में जहाँ सामंती परम्पराए रही हो और हर मजार पर भूत भागने का इंतज़ाम हो, पप्पू ने राम लीला के मुकाबले में यीसुं महिमा को खड़ा कर दिया. लोगो को बरगलाने में धर्म के बाजीगरो का अतुलनीय योगदान है. पप्पू या निर्मल जैसे बाबा जब देश के लोगो का ध्यान आकर्षित करते हैं तो येही पता चलता है के देश किस जगह पर है. क्या अब समय नहीं आ गया के धर्म के धंधे बाजो का न केवल पर्दाफास किया जाये बल्कि कानून के शिकंजे में उनको डाला जाए. पप्पू, निर्मल या किसी और बाबा की जगह टी वी स्टूडियो में नहीं अपितु तिहर जेल में होनी चाहिए और चमत्कारों के इस धंधे को अब धर्म के स्वतंत्रता के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता. भारत सरकार को अन्धविश्वास निर्मूलन कानून बनाकर ऐसे सभी कार्यक्रमों पर तुरंत प्रतिबन्ध लगाना चाहिए और अपने देश में चिकित्सा प्रणाली को मज़बूत करना पड़ेगा ताकि सस्ती चिकिस्ता लोगो को मिल सके और वो इन टोने टोटके करने वाले ठगों के पास ना जाएँ.

बड़े आश्चर्य की बात है,की बात है के पप्पू के भक्तो में कुच्छ नागालैंड और अन्य स्थानों के लोग भी दिखाई दिया. भक्त लोग हाथ ऊपर करके प्रभु की जय जेकर करते हैं. पप्पू को जब बताया गया के यह कार्य गलत है तो उनका कहना था के वो तो केवल लोगो के सेवा कर रहे हैं और उनके अन्दर कुच्छ शक्ति नहीं है, सारा खेला तो प्रभु का है. लेकिन, पूरे कार्यक्रम को देख कर नज़र आ गया के पप्पू किसी अच्छे खेल के खिलाडी हैं. हिंदुत्व के बाबाओ की तरह, इसाई बाबाओ ने कोई कमी नहीं की है जनता को ठगने और लूटने में. ऐसे सवालो को सांप्रदायिक नहीं वैज्ञानिक नज़रिए से देखने की जरुरत है और इन ठगों को सीधे सीधे हवालात में भेजने की जरुरत है क्योंकि ईष्वर का आशीर्वाद के दावा करने वाले ऐसे बाबा दुखी लोगो की रब को पकड़ लेते हैं और उनको मानसिक, शारीरिक और अनेक प्रकार से शोषित भी करते हैं. इसलिए जरुरी है समाज में वैज्ञानिक चिंतन को लेन के और धर्म के मत्थाधीशो से सीधे टक्कर लेने की.  ठग बाबाओ की करनी से हजारो महिलाओ को मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ा है. उनपर डायन होने के आरोप लगते हैं और यह बाबा ऐसी घटनाओ का पूरा लाभ लेते हैं. गरीब आदमी से पैसे नहीं मांगे जाते लेकिन लोग डर से अपना सब कुच्छ दे देते हैं और इस प्रकार मानसिक भय से ग्रस्त होकर उनकी जिंदगी हमेशा के लिए तबाह हो जाती है.

बाबा का दावा है के उनकी कृपा से लोग ठीक हो रहे हैं. एक महिला ने कहा के उनको बच्चा नहीं हो रहा था और वोह बाबा के पास आयी और बच्चा हो गया. बाबा ने यह भी कहा के एक व्यक्ति को गले का कैंसर था और उन्होंने टेलीफोन पर दुआ की और वोह बिलकुल ठीक हो गया. अब ऐसे कहानी कहने वालो की कमी देश में नहीं हैं. मैं तो अयोध्या और फैजाबाद की दरगाहो में खूब घूमा हूँ और ऐसे दावा करने वाले बहुत हैं जो दरगाह में आ कर 'ठीक' हो गए. एक दरगाह में तो मैंने लोगो के बाकायदा लिखित अर्जियां भी देखि जो बाबा के नाम पर थी के उनके काम बन जायेंगे तो वोह चढ़ाव चढाने आयेंगे. 

यह सब हमारे समाज की और देश की असलियत बताते हैं के कैसे धर्म के धंधे बाजो ने वैज्ञानिक उपलब्धियों का सहारा लेकर गरीब जनता को मूर्ख बना शुरू किया है. ऐसे घटनाओ को रोकना होगा और धर्म की आड़ में ऐसे कामो को बढ़ने वालो के विरुध्ध कार्यवाही करनी पड़ेगी. उत्तर-प्रदेश के महान नेताओ को अभी बहुत से सवालो के उत्तर ढूँढने पड़ेंगे के क्यों लोग ऐसे बाबाओ के शरण में जा रहे हैं.. एक बात तो साफ़ है के यदि डॉक्टर की जगह पर सफाई कर्मचारी आपका इलाज़ करेगा तो लोग अस्पताल क्यों जाएँ, वोह तो बाबा के पास ही जायेंगे. उम्मीद है अखिलेश जी कुच्छ सुन रहे होंगे और कार्यवाही करेंगे.


Monday, 9 July 2012

हरियाणा का मनुवादी सत्य


विद्या भूषण रावत

हरियाणा के हिसार जिले के भगाना गाँव के लगभग १२० परिवार दिल्ली के जंतर मंतर पर एक जुलाय से धरने पे बैठे हैं. २७ जून को हिसार से चलकर यह लोग १ जुलाय को दिल्ल्ली पहुंचे. तपतपाती धुप में शारीर में बिना कोई कपड़ा पहने, यह लोग हरियाणा राज्य की मनुवादी हकीकत को बयां कर रहे हैं. हिसार के कुख्यात खाप पंचायत ने गाँव के सभी दलितों का सामाजिक और आर्थिक बहिस्कार शुरू कर दिया. 

इस बहिष्कार की शुरुआत कुच्छ नाटकीय तरीके से हुई जब जाटों ने दबंगई दिखाते हुए दलितों को धमकी दी के वोह गाँव छोड़ दे ताकि चमार चौक पर चारो और से ईंट की एक दीवार बना दी जाए.  चमार चौक पर सुरेश, सत्यवान और हिम्मत सिंह के घर हैं जो चमार जाति के हैं. पूरे मोहल्ले के लोग जानते हैं के चमार चौक चमार समाज के सामूहिक जमीन है और जाटों या उनके गाँव समाज का उस पर कोई कानूनी अधिकार नहीं है. लेकिन फर्जी तरीके से मुक़दमा बनाकर उस जमीन को कोर्ट से गाँव समाज के कहलवाकर तथाकथित तौर पर कानून का पालन करने के कोशिश हुई. ८ अप्रेल २०१२ को दिवार का निर्माण हुआ और सभी लोगो को लगभग घर से बहार निकलना बंद हो गया. पूरे मोहल्ले के लोगो को गाँव छोड़ना पड़ा. गाँव के खप पंचायत ने निर्णय दे दिया के दलितों को बहार जाना होगा. लिहाजा सभी भूमिहीन दलितों ने कलेक्टर के यहाँ धरना देना शुरू कर दिया जिसमे महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं.

लेकिन अभी तक कुच्छ कार्यवाही नहीं हुई. हरियाणा के जातिवादी सरकार के निर्लज्जता सामने आ गयी क्योंकि उसमे दम नहीं के वो अपने बिरादरी के लोगो के खिलाफ कानूनी कार्यवाई करे. दलित युवाओ ने फैसला किया के दिल्ली कूच किया जाये और केंद्र की सरकार को इसकी जानकारी दी जाये. लेकिन नेता मंडली को मतलब नहीं, राजनैतिक दलों को कोई मतलब नहीं इसलिए १२० से अधिक लोग भूखे रहकर भी अपनी आज़ादी के लड़ाई लड़ रहे हैं. उनके जज्बे के सराहना करनी चाहिए हालाँकि जंतर मंतर पर व्यवसायिक नेताओ और सामाजिक कार्यकर्ताओ का जमावड़ा लगा रहता है लेकिन इनके साथ कोई नहीं है इसलिए यह लोग अपने कार्य स्वयं कर रहे हैं . इन्होने राहुल गाँधी से मुलाकात की है और हरियाणा के मुख्यमंत्री से भी मुलाकात के लिए सन्देश आ चूका था. आज ही अनुसूचित आयोग के एक सदस्य यहाँ आ रहे थे.

इन बातो को छोड़ दे तो सवाल ये के जाटों ने इन दलितों को  गाँव से क्यों भगाया. भागना गाँव में करीब २५० एकड़ जमीन है जो गाँव समाज की है और उसकी प्लोटिंग कर भुमीहीनो में बांटा जाना चाहिए था. गाँव पंचायत की और से हर एक भूमिहीन  परिवार से एक हज़ार रुपैया लिया गया ताकि भूमि दी जा सके. लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं. असल में २५० की लूट गाँव की खाप पंचायत ने पहले जमीन को गाँव के सामंतो में बाँट दिया और यदि ये भूमिहीन दलित वहीँ रहते तो उनकी रह में रोड़ा होता.

भगाना गाँव के दलितों को लगातार मुश्किलों का सामना है. करीब ४ महीने से उनके पास कोई काम नहीं है. वोह किसान के खेत पर काम नहीं कर सकते. अपने गाँव और अपने घर बंद हैं. बच्चे कलेक्टर के ऑफिस पे हैं. महिलाएं और बुजुर्ग भेई वहीँ हैं जबकि युवा और बुजुर्ग पुरुष दिल्ली आ गए हैं. वोह बिना न्याय मिले जाने को तैयार नहीं हैं, और यह जरुरी भी है. हरियाणा में कानून और व्यवस्था खापो के हाथ मैं आ गया है जिसका साफ़ मतलब है के वहां की सरकार भारत के संविधान के मापदंडो के हिसाब से नहीं चल रही है. केंद्र सरकार को चाहिए के हरियाणा के मुख्यमंत्री को एक सख्त चेतावनी दे विशेषकर गृह मंत्रालय को ऐसी चेतावनी देनी चाहिए. अगर न्याय पाने के सारे राजनैतिक हथियार ख़तम हो गए तो फिर असली हथियार ही उठाना पड़ता है. सरकार लोगो को माओवादी बनने के लिए मजबूर न करे और हरियाणा में संवेधानिक अधिकारों को लागु करवाए.

हिसार के दलितों के इस ऐतिहासिक संघर्ष में हम सभी का सहयोग होना चाहिए और सभी को हरियाणा सरकार की कड़ी भर्त्सना करनी चाहिए  जो उनको न्याय नहीं दिला प़ा रही. सभी भूमिहीन दलितों को गाँव समाज की २०० एकड़ जमीन से जमीन दी जाए ताकि वे सम्मान सहित जीवन जी  सके. सभी पीड़ित परिवारों को ६ महीने का मुआवजा दिया जाए ताके वो अपना जीवन फिर से बना सके. भगाना के खाप अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही होनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओ की पुनर्वृति न हो.


भारत में  जाति और रंग का सच
विद्या भूषण रावत





आमिर खान ने आज अपने कार्यक्रम में जातिवाद और छुआछूत के बारे में बात की जो शायद भारत के इतिहास में टीवी पर पहली बार हुआ होगा के इतने विस्तार से जाति के बारे में चर्चा हुई. वैसे, अगर कुच्छ दलित साहित्यकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को और शामिल किया जाता तो शायद कार्यक्रम और बेहतरीन हो सकता था. कार्यक्रम एक दो व्यक्तित्वों के इर्द गिर्द की घूम के रह गया. लेकिन फिर भी उनकी सराहना की जानी चाहिए हालाँकि हम जानते हैं अम्बानी का वरद हस्त आमिर के ऊपर है और वोह अपनी जाति को कभी ख़त्म नहीं करेंगे. 

सवाल केवल जाति का नहीं है. हमारा समाज घनघोर तरीके से नस्लवादी भी है. पंजाब में बुरुंडी नमक एक अफ्रीकी देश के २५ वर्षीया छात्र यानिक को वहां के लोगो ने पथ्थरो से पीट पीट कर इतना घायल किया के वोह गंभीर रूप से घायल है ओर जीवन से संघर्ष कर रहा है. २२ अप्रैल को हुई इस घटना पर पंजाब सरकार चुप है और जब एन दी टी वी पर खबर दिखाई गयी तो सरकार ने ५ लाख रुपैये दे दिए लेकिन अपराधी नहीं पकडे गए.

आखिर पंजाब और हरयाणा ऐसे घटिया राज्य क्यों बन रहे हैं जहाँ इंसानियत मर रही है. वैसे तो इस देश के सभी जगाओ पर जाहिलता ही दिक्खाई दे रही है और सभी नेता ऐश कर रहे है और जनता ट्रस्ट है. हमें ये मान लेना चाहिए के हमएक जाहिल समाज हैं और जो महानता की कहानिया हमारे किताबो में हैं वो कोरी बकवास और झूट हैं. हमारे बच्चे पैदा होते ही अपनी जाती और धर्म के खूंटे में बांध दिए जाते हैं और बाकि का काम हमारी क्षेत्रीयता ने ले लिया है जहाँ अच्छे और बुरे को आपके जाति और क्षेत्र के नज़रिए से देखा जा रहा है. उत्तर के इन दोनों राज्यों में दलितों की हालत क्या हैं यह जग जाहिर है और जिस तरीके से यह सरकारे उनके हितो और हकों को नकार रही हैं उनसे विरुद्ध हमको बोलना पड़ेगा. हरयाणा ने तो बेशर्मी की सारे हदे पार कर दी हैं. राहुल और उनकी कांग्रेस उत्तर प्रदेश में दलितों के घरो के चक्कर लगते थे लेकिन यहं दिल्ली में उनको फुरशत भी नहीं मिल रही लोगो के घाव पर मलहम लगाने के लिए.

दिल्ली में हरयाणा के हिसार से लगभग १२० परिवार धरने पर हैं लेकिन मजाल क्या के हमारे नेता उनको सुन सके. हरयाणा और पंजाब की कद्दावर जातियों ने तो कसम खाई है के भारत का संविधान वहां चलने नहीं देना. क्या चाह्य्ते हैं हमारे नेता के लोग ऐसे ही धरने पे बैठे रहे और अपने परिवारों को खो दे. मुद्दा जमीन का और जो लोग किसानो की बात करते वोह उन किसानो द्वारा दलितों की हथियाई गयी जमीनों का हिसाब भी मांगे. भारत का किसान भी जाती मानता है और उस पर चलता है. डंडा वही चलता है जहाँ आपकी और कोई और पहचान नहीं केवल घटिया जाती के श्रेष्ठ्थ्ता का घमंड सर पर बोलता है. ऐसे दकियानूसी समाज का क्या इलाज किया जाए.

आमिर ने कहाँ के जाति वाद तब ख़त्म होगा जब हम जाति से बहार शादी करेंगे और उसके लिए केवल एक शर्त है वो के हम अपने बच्चो को उनका जीवन साथी चुनने की आज़ादी दे.. वोह हमको छेनानी पड़ेगी क्योंकि प्लेट पर रख कर वोह भी नही मिलने वाली. अगर हमारे बच्चे अपनी जीवन शैली का निर्धारण खुद करें तो हमारे यह समाज अपने आप टूटेगा और इसके टूटने की ही बुनियाद पर एक नए युग का निर्माण होगा. दोस्तों, समाज टूटने से डरो मत बल्कि कसम खाओ के जब तक हम अपनी मर्जी की जिंदगी ना जिए यह समाज और उसका ब्राह्मणवादी रूप हमारे ऊपर राज करेगा. कोई माँ बाप खुद से अपने बच्चे के लिए अन्तेर्जातिया या अंतर्धर्मी विवाह नाहीए कर पाएंगे. और दुसरे यह, के यह जातीय तब ख़त्म होंगी जब हम व्यक्ति की आज़ादी को अपना मुख्या हतियार बनायेंगे.

ब्राह्मणवादी परमपराओ में हम जकड़े रहे और उसने हमको नचाया.. मौलानाओ और पादरियों ने भी वोह ही किया इसलिए अब जरुरी हैं के आधुनिक भारतीय संविधान को साक्षी मान कर अपना विवाह करो और मज़े की जिंदगी जियोगे. धर्म कर्म टोना टोटका जितना करोगे उस पुराथान पंथी समाज के कब्जे में रहोगे. और इन गाँव से बहार निकलो ताकि वहां यह खापी रह सके.. जिनको केवल अपनी खाप की इज्जात का हुक्का पीना हो वोह वहां रहे बाकि लोग अपने को मनु के उस अन्धकार से बहार निकालो तो अच्चा रहेगा. हमारी आज़ादी हमारे पास है वोह कोई नहीं देगा उसको लेना पड़ेगा. जाति और छुअछोत को ख़त्म करने ले लिए संविधानिक प्रावधानों को सख्ती से लागू करना और उसके लिए सरकारी कर्मचारियों की जबरदस्त ट्रेनिंग ताकि उनका नजरिया बदले. मनुवादी होकर सरकार में रहकर एक आधुनिक संविधान को ध्वस्त करने वालो को समझाना होगा और इसलिए सरकारे के पूरे तंत्र को संवेदनशील बनाना पड़ेगा. इसकी ताकत सेकुलरवाद है और उसको लागू कर देश में धार्मिक कठ्मुल्लाओ और खापों के सरगनाओ के खिलाफ सख्त कार्यवाही करनी पड़ेगी तभी यह देश एक और आधुनिक बन पायेगा नहीं तो हम कोई उम्मीद नहीं कर सकते. जाति वादी ताकतों का खात्मा ही हमारा उदेश्य होना चाहिए और उसके लिए संस्कृति और धर्म की भी बलि दानी पड़े तो कोई बात नहीं.. असल में नयी संस्कृति के लिए पुराने को खत्म करना जरुरी है. जाति के विनाश से मनुवाद का विनाश होगा और तभी एक नयी संस्कृति आ पायेगी जो लोकतान्त्रिक, मानववादी और आधुनिक हो.

Friday, 13 April 2012


बाबा साहेब के जन्मदिवस पर अभिनन्दन 

विद्या भूषण  रावत

सभी साथियों को बाबा साहेब आंबेडकर के जन्मदिवस पर शुभकामनायें. यह हमारा नव वर्ष है क्योंकि दुनिया के करोडो उत्पीडित समाज को नयी दिशा और आशा देने वाले व्यक्तित्व का आगमन. आज इस नव वर्ष पर आप सभी का अभिनन्दन और उम्मीद करते हैं के देश और समाज में जो दकियानूसी परम्परावादी तकते हावी हो रही हैं उन्हें खत्म करने के लिए हम लोग बाबा साहेब के बताये मार्ग पर चलेंगे.

 बाबा साहेब आंबेडकर भारत के दलित बहुजन आन्दोलन के केंद्र बिंदु हैं जिसमे फुले, पेरियार, शाजुजी महाराज, नारायन्गुरु और अन्य अनेक महापुरुषों का अविश्मरणीय योगदान हैं. लेकिन उनके दर्शन को या उनके कार्यों को  केवल दलित वर्ग तक सीमित करना  उनका अपमान करना है.

बाबा साहेब ने दलितों के उठान के लिए काम किया और वोह उनके सबे बड़े मसीहा मने जाते रहेंगे लेकिन शूद्रों को कौन मन करता है उन्हें अपना नेता मानाने से. क्या बाबा साहेब ने भारत का संविधान केवल दलितों के लिखा. क्या जो क्रन्तिकारी लेखन बाबा साहेब ने किया वोह दलितों के लिए मात्र था. क्या उनकी विभिन्न पुस्तके, जैसे रुपैये की समस्या, जातियों का उन्मूलन कैसे हो, महिलाओं के प्रश्न, सांप्रदायिक समस्या केवल दलितों के प्रश्न हैं. 

मेरा यह साफ़ मानना है के आंबेडकर के चिन्तन दुनिया के सभी लोगो के लिए एक मानववादी चिंतन है. यह इंसान को धर्म और जाती के चंगुल से मुक्त करने का मूल मंत्र है. यह इंसान की क्रन्तिकारी ताकत को पहचानता है और इस चिंतन में भगवान के लिए कोई स्थान नहीं है. इसमें पुरोहितो और पाखंडियों के खाने की कोई गुंजाइश नहीं है. यह चिंतन हमें आधुनिक विश्व का नागरिक बनता है और हमें धर्म और ग्रंथो को चुनौती देने को कहता है. 

बाबा साहेब आंबेडकर ने पूरे जीवन को मानव कल्याण के समर्पित किया. उन्होंने यह जाता दिया के मैरिट किसी के बपौती नहीं है और किसी भी व्यक्ति को अवसर प्रदान करने पर वह मैरिट बना सकता है. उन्होंने बता दिया की हमारी चुनौतिया अपने सामाज से हैं और उसके लिए मनुवादी की केवल आलोचना नहीं करनी है अपितु एक नया विकल्प भी देना होगा. समस्या गाली गलौज के नहीं है क्योंकि वोह तो हम सब जानते हैं.. मुश्किल विकल्प देने में होती है. 


बाबा साहेब ने बुद्धिवादी बनाकर हमें एक नया रास्ता दिया. बुद्ध के मानववादी तर्कवादी विचार में ही हमारी नयी दुनिया है. जब हम बुद्ध और बुद्धि में मार्ग में चलते हैं तो हमारे पास मनुवादियों के लिए समय नहीं है. शुद्रो का संकट उनकी सांस्कृतिक पहचान से जुदा है. वोह न पेरियार के रस्ते पे चले, न फुले के और बाबा साहेब को एक खांचे में ढलने की कोशिश करने से कुच्छ नहीं मिलने वाला. अम्बेडकरवाद में हमारे जीवन का मूल्य छिपा है. मैं जानता हूँ के अब समय है अपने रस्ते में चानले का जो बाबा साहेब ने बताया. जो लोग ब्राह्मणवाद को सुबह शाम गालियाँ देकर शाम को उधर ही स्नान करते हैं, उसी संस्कृति का हिस्सा है, उनके साथ समय ख़राब करके क्या करें. बदलाव की ताकते सबसे पहला कार्य उस संकृति से दूर हो जाती हैं जो उनकी ख़राब हालात के लिए जिम्मेदार हैं. 

यह बहुत बड़ी बात है के बाबा साहेब ने वर्णवाद के न केवल विस्तृत व्याख्या की अपितु उसका एक मानववादी विकल्प दिया. हमारा काम है बाबा साहेब के बताये रास्ते पे चलकर इस देश को बुद्धामय बनाना और देश को प्रबुद्ध भारत के और ले जाना जहाँ समता हो, करुना हो, तर्क हो और अंधविशवास की संकरी गली में हमारा शोषण न हो रहा हो. जाति और धर्म की बदबूदार गली में रहकर मनुवाद के नाश की उम्मीद करना बेईमानी है. उसके लिए तो बाबा साहेब आंबेडकर के सिद्धांतो और उनके विकल्प को स्वीकार करना होगा अन्यथा स्वयं को अम्बेडकरवादी न कहें.

मुझे नहीं लगता के समता, और तर्क के उस मार्ग पर चलकर शुद्रो या किसी और का कोई नुक्स्सान होगा. बाबा साहेब का संविधान एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक भारत के होने की गारंटी है और यह केवल दलितों के लिए नहीं है शुद्रो और उन सभी के लिए हैं जो भारत को मनुवाद, ब्राह्मणवाद या जातिवाद के चंगुल से मुक्त रखना चाहते हैं. हम सभी के मुक्ति का रास्ता आंबेडकर के दर्शन में हैं आइये इस पर चले और इसे अपनानाये, ब्राह्मणवाद अपने आप समाप्त हो जायेगा. लेकिन ब्राह्मणवाद या मनुवाद आज जाति के दरवाजो से आ रहा है. ब्राह्मणों के स्थान पर एक दो नव ब्राह्मणों को रखकर और उनका महिमंदन कर सभी जातियों को दुबारा से मनुवादी के चंगुल में फंसने की कोशिश की जा रही है उसको समझना जरुरी है. यह रामदेव, या उमा भारती, कल्याण सिंह या शिव राज सिंग इस नए दौर में ब्राह्मणवाद ने अपने चोला बदल लिया है इसलिए उस चाल को जातीयता के खांचे से निकलकर सोचना होगा और मनुवादी की और धकेलने वाले किसी भी बिरदिअरी और जाति के नेता को समझना होगा. आंबेडकर वाद और मनुवाद साथ साथ नहीं चल सकते. जातिवादी राजनीती को ख़त्म कर नए ज़माने के सामाजिक लोकतंत्र को कायम करना अम्बेडकरवादी विचारधारा की सबसे बड़ी जीत होगी जहाँ हम एक दुसरे को शक से न देखें और अपने बच्चो को तर्क और मानवीयता से नए रस्ते के और ले जाएँ. दो विचारधारों के संगर्ष में एक को जीतना है. मनुवादी साम दाम दंड भेद का इस्तेमाल कर भारत में पुरोहितवाद के पुनर्स्थापना करना चाहते हैं और उसके लिए नए तरीके इजाद कर रहे हैं. अम्बेडकरवाद को उन लोगो से रफ्ता कायम करना होगा जो भारत को प्रगतिशील, लोकतान्त्रिक, धर्मनिरपेक्ष, समतावादी देखना चाहते हैं और उसके लिए अम्बेद्कर्वादियों को मनुवादियों से दूर दूर कोई रिश्ता नहीं रखना होगा और उसके खात्मे के लिए जो प्रयास किये जान उसमे अपना योगदान करना होगा. याद रहे, मनुवाद एक विचार है जो हम सबके अन्दर है और इसलिए वोह अभी जीवित है और वोह आंबेडकर के नवयान को अपनाकर ही समाप्त हो सकती है और तभी भारत के प्रबुद्ध भारत कहलायेगा और यहाँ लोग प्रेम विवाह करके मारे नहीं जायेंगे और हमारी पुलिस महिलों पे हो रही हिंशा को सही नहीं ठहरायेगी और न ही हमारे टीवी चैनलों पे ढोंगी पाखंडी बाबाओ के लिए कोई जरुरत होगी. ऐसा भारत जहाँ हर एक बच्चा स्कूल में होगा और कोई भर भूखा नहीं होगा, किसी को चाय पीने के लिए अलग से कप नहीं लाना होगा क्योंकि तब यहाँ पर हमारे धर्मनिरपेक्ष संविधान को मानाने वाले लोग होंगे और उसको अपने दिल से लगाकर उसके खिलाफ षड्यंत्रकारी लोगो का पर्दाफास कर चुके होंगे. आंबेडकर ने आधुनिक भारत की नीव रखी जिस के फलस्वरूप हम आज इस लोकतंत्र को बचा पाए. आज उनके सपनो को ईमानदारी से धरती पे उतरने का वक़्त आ गया है. 
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Thursday, 12 April 2012

एक नए क़ानून के जरुरत जो देश में अन्धविश्वाश बढ़ने वालो पर रोक लगाए

विद्या भूषण रावत

क्या हमारे न्यूज़ चैनलों को इस बात की जांच पड़ताल नहीं करनी चाहिए के कौन से स्पोंसर कार्यक्रम दिखने चाहिए और कौन से नहीं. जब भी कोई न्यूज़ आइटम प्रायोजित होता है तो उसमे लिखा रहता है के यह कार्यक्रम प्रायोजित है और इस में किये जा रहे दावो से चैनल का कोई लेना देना नहीं है और यह दावे अभी तक सिद्ध नहीं हो पाए हैं. दुखद बात यह  है के नैतिकता का लबादा ओढ़े यह चैनल आज भारत में सबसे बड़े भ्रस्ताच्चार को बाधा रहे हैं. भ्रस्थाचार के यह दुकान नैतिकता और भारतीय संस्कृति के नाम पर चलती है और करोडो लोगो को चुना लगाकर उन्हें अदृश्य शक्तियों तक पहुँचाने का दावा करने वालो की कलई अब खुलनी चाहिए. लेकिन वोह लोग जो इन खतरनाक खिलाडियों की काली कमी से अपने चैनल चला रहे हैं और लोगो को अंधविश्वासों के ऐसी गलियों में धकेल रहे हैं जहाँ से सुरक्षित निकलने का कोई रास्ता नहीं है, उनके विरुध्ध कार्य वही होनी चाहिए. 

आज देश में तर्क और मानवता को बढ़ने वालो के खिलाफ कार्यवही हो रही है. धर्मनिरपेक्षता के जिस भोंडे स्वरुप को देश में बढाया जा रहा है वोह भारत रास्त्र की नीव को खोखला कर देगा. धर्म के नाम पर हर पाप और पाखंड को संस्कृति और परंपरा का नाम देकर हमारे राजनेता आज हमारे सेकुलर संविधान की धज्जियाँ उखाड़ रहे हैं. भारत में इस वक़्त दकियानूसी, परम्परावादी ताकते इकठ्ठा हो कर हिंदुत्व के राजनैतिक और सांकृतिक अजेंडे पे काम कर रही है और उसका मुकाबला करना है तो आजम खान और इमाम बुखारी जैसे लोगो को गले लगाकर नहीं अपितु हमारे सेकुलर समाज को बना के हो सकता है. संघ की तरह, मुसलमानों को धर्म में डूबकर उनके आर्थिक सामाजिक हालातो से दूर रखने वाली ताकते काम कर रही हैं और हमने दुनिय्भर में ऐसी ताकतों को देखा है जो इस्लाम खतरे मैं है का नारा देखर मुसलमानों को उनके अपने हालात सुधरने में कोई मदद नहीं करती.

हम सरकार से मांग करते हैं के वोह एक ऐसा कानून बनाये जिसमे अन्धविश्वास फ़ैलाने वाले और अवैज्ञानिकता का प्रचार करने वाले ध्होंगी पाखंडी बाबाओ के खिलाफ कार्यवाई करे. हम भारत के लोगो से उम्मीद करते हैं के वोह इन खतरनाक बाबाओ और धर्म गुरुओ के चक्कर में न पड़े. इतने सर्वशक्तिमान यह बाबा जब बीमार होते हैं तो इनका इलाज दुनिया के सबसे बेहतरीन अस्पतालों में होता है. क्या यह बाबा बता सकते हैं यह कब तक जियेंगे और जनता का खून चूसते रहेंगे. क्या यह बता सकते हैं के भारत का संविधान कब से लागू होगा ताकि यह जेल के सींखचो के पीछे हों. आज कोई व्यक्ति अगर लोगो को आधुनिक दवाइयां खाने से रोकता है तो उस पर आरोप लग सकते हैं लेकिन यह लोग जनता को धोखे में रखकर अपनी चमत्कारी शक्तियों को प्रदर्शित कर रहे है जिसमे हमारे न्यूज़ मीडिया की पूरी भूमिका है.

हम इस भूमिका की कड़ी निंदा करते हैं. इसका मतलब साफ़ है के देश को अंधरे में धकेल कर यह लोग अपनी टी आर पी बढ़ाना चाहते हैं. अब समय है प्रेस कौंसिल इस बात का धयान रखे के यह चैनल क्या कुतर्क और अवैज्ञानिकता को बढ़ावा नहीं दे रहे. यदि ऐसा है तो अब समय आ गया है की न्यूज़ का दानदा करने वालो के विरुध्ध सख्त कार्यवाही हो. पत्रकारिता अब एक मिशन के तहत हो रही है जो हिंदुत्व के अजेंडे को देश में लागु कर सके और दलित विरोधी और बदलाव विरोधी सारी उर्जा को खत्म कर सके. देश को अँधेरे की और लेजाने वाली शक्तियों के खिलाफ इकठ्ठा होने की जरुरत है. हिंदुत्व के इस खेल को समझने की जरुरत है और उसको बेनकाब करने की जरुरत है. हमारी राजनैतिक भाषा आज हमारी सांस्कृतिक भाषा निर्धारित कर रही है और इसी कारन हमारे तथाकथित लोग भी भी भारतीय संस्कृति को बेचना शुरू किये हैं. राजनेताओ की छोटी महत्वाकांक्षाओ के चलते ऐसे बाबाओ को बहुत महत्व मिल चूका है और उन्हें पता है की उन पर कोई हाथ नहीं लगा सकता. लेकिन आज सभ्य समाज का हर नागरिक अपने आप में तलवार है और अपने मीडिया पैदा कर रहा है इसलिए उसकी ताकत को समझाना पड़ेगा. पत्रकारों को पत्रकारिता करनी पड़ेगी और ऐसे ढोंगी पाखंडी बाबाओ के खिलाफ जंग छेदनी पड़ेगी. हम लोग तो लड़ेंगे और लड़के जीतेंगे भी क्योंकि यह जनता है सब जानती है.. संविधान की धारा ५१ का सम्मान करते हुए हमारी संसद को अपनी प्रतिबद्धता देश में वैज्ञानिक चिंतन के बढाने की और करनी होगी और ऐसा एक सख्त क़ानून बनाना होगा की देश में आध्यात्म के नाम पे खुल रही दुकानों पे रोक लग सके. उनके पीछे की ताकतों को समझना होगा और ऐसे चमत्कारों और दैविक शक्तियों का दावा करने वालो को एक वैज्ञानिको के टीम से प्रमाणपत्र लेना होगा अन्यथा उनके दावो को धोखा और फ्राड माना जाना चाहिए और उनके खिलाफ जालसाजी और धोखाधड़ी  का मुक़दमा चलाना चाहिए.