Friday, 12 October 2012

An answered question of 'uncommon' people



अनाम जनता के प्रश्न 

विद्या भूषण रावत 


राबर्ट वद्र के डी एल एफ के रिश्तो को उजागर करने पर कई महारथी अरविन्द केजरीवाल का शुक्रिया अदा कर रहे हैं और कह रहे हैं के अब राजीनति में कोई भी पवित्र गाय  नहीं रही क्योंकि जब गाँधी परिवार पर हमले शुरू हो गए हैं तो किसी को भी क्यों छोड़ा जाये। लेकिन हकीकत यह है के वद्र एक बहुत छूती आइटम हैं इस पूरे दर्शन में। क्या वाकई में हमने पवित्र गायों पर हमला किया है या हम चालबाज़ हैं और बुइल्दारो के इस खेल को नैताकता का लबादा ओढा के भ्रस्थाचार के विरुद्ध जंग का नाम दे रहे हैं। 

राजीनति में भ्रस्थ्चार कब से बढा इसके लिए नरसिम्हा राव के बाद के परिस्थितियों को समझना पड़ेगा जब देश में निवेश के लिए सरकारों ने जमीनों और प्राकृतिक संशाधनो पे हमला करना शुरू किया। नेताओ, अधिकारीयों और लालाओ की लूटखोर और घूश्खोर जमातो का गठबंधन हो गया और मिलजुल के खाने का एक नया दौर चला। जहाँ उद्योगपतियों को राजनीती भने लगी वही नेताओ ने उद्योग लगाने शुरू किया। दोनों तब तक अच्छे थे जब तक एक दुसरे के क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं कर रहे थे। लेकिन जब नेताओ ने उद्योगपतियों पर ही डाका डालना शुरू किया तो उन्होंने भी कमर कास ली और 'विकल्प' देना शुरू कर दिया। असल में अन्ना-केजरीवाल उसी विकल्प का हिस्सा हैं। हलानिक इन सबके पीछे संघ के योध्द्य दिन रत लगे रहे। लेकिन महत्वाकांक्षाओ का टकराव होना लाजमी है। जैसे अन्ना और अरविन्द का टकराव पैसे का तो रहा होगा लेकिन मह्त्वकअंक्षा का भी था। अरविन्द और उनकी टीम अन्ना को मुखौटा बना कर खुद निर्णय लेना चाहती थे और अन्ना पहले मुखौटा बने रहे लेकिन बाद में उन्हें लगने लगा के सब उनके कारण ही चल रहे हैं तो उन्हें यह दिखने की जरुरत पडी की अन्दोनल उनकी उपज था और वोह राजनीती से घृणा करते हैं। अन्ना को पता है राजनीती में महारास्त्र के अन्दर ही उनकी दुर्गति हो जाएगी। लेकिन केजरीवाल के इरादे दुसरे थे। वह जानते हैं के दिल्ली के मध्यवर्ग में गाँधी परिवार के प्रति बहुत घृणा है और यह अब जातिगत स्वरुप में भी दिखाई देती हैं। मूलतः यह माध्यावार्ग, आरक्षण विरोधी, सांप्रदायिक और जातिवादी है लेकिन मीडिया के लगातार समर्थन से इसको स्वीकार्यता मिल गयी है। दिल्ली में चुनाव में अरविन्द वोट कटुआ तो बन सकते हैं और वोह किसका काटेंगे ये जानने के जरुरत नहीं है। खैर, मीडिया मैनज करने के बाद केजरीवाल को लग रहा है के वह कुच्छ भी कहें तो  मीडिया  उसका संग्यान लेगा सरकार के लिए मुसीबते पैदा करता रहेगा और वोह इस प्रकार से समाचारों में बने रहेंगे।

मीडिया के माफिया लिंकों का सबको पता होना चाहिए। उनके व्यावसायिक हितो के बारे में भी जानकारी होनी चाहिए तभी हम ऐसे शातिर खेलो को समझ सकते हैं। 1990 में दूरदर्शन पर जब वर्ल्ड दिस  वीक का कार्यक्रम आया तो भास्कर घोष सुचना प्रसारण मंत्रालय के सचिव थे। आरोप लगे थे की एनडीटीवी पर उनकी विशेष कृपा थी क्योंकि राजदीप उसके एक प्रमुख स्तम्भ बने थे। जब स्टार न्यूज़ और एनडीटीवी का मिलन हुआ तो भास्कर घोष के प्रभाव चला। आज सी  एन एन आई बी एन पर अम्बानी का 500 करोड़ से ऊपर का निवेश है। इंडिया टुडे में भी रि ला येंस की बड़ी भागीदारी है। आज बिल्डर और प्रोपर्टी डीलर देश में अख़बार और चैनल चला रहे हैं और अभी तो खबर चल रही है के कैसे बड़े संपादक और पत्रकार सबसे बड़े ब्लाच्क्मैलेर बन रहे हैं। सरकार को यह सब पता है। और राजनीती में सबको ऐसी बाते पता होती हैं।

अगर जांच हो तो पता करे के धीरुभाई अम्बानी भारत में उद्योगों के शंहाँशाह कैसे बने। उन्होंने तो खुद कई बार कहा के बगैर घुश देकर यह संभव् नहीं था। रामदेव के पास इतनी बड़ी सम्पति कैसे आये। और रामदेव तो बेचार शुद्र है इसलिए बहुत आसान टार्गेट हैं जैसे रोबेर्ट वद्र। हिआरे में पुछा म्मत है तो किसी शंकराचार्य पर केस करके दिखाएँ। हिम्मत है तो आर्ट ऑफ़ लिविंग की जांच कराएँ और बताये के यह सब महान आत्माएं कैसे अरबो रुपैया के मालिक बन गए। अरविन्द केजरीवाल करोल्बह के बनियों के बताएं के वे हेर खरीद पर बिल दे तो देश का काला धन ख़त्म हो जाएगा . भारत का महान' व्यापारी बिल मांगने वाले को गाली देता और उसको बताता है बिल मांगोगे तो ज्यादा देना पड़ेगा। कितने लाले अपनी इन्कोमे टैक्स सही भरते और सही दिखाते हैं। 

कभी केजरीवाल और उनके इंडिया अगेंस्ट कोर्रुप्तिओन को मुकेश अम्बानी का 5000 करोड़ रुपैये के आलिशान शहंशाही बंगले के आगे प्रदर्शन करने की जरुरत है या नहीं। यह 5000 करोर क्या मुकेश के पिताजी के हैं,. क्या मुकेश ने इन्वेस्टर्स से इसके  बारे में पुछा। क्या कभी अमिताभ बच्चन के व्यावसायिक रिश्तो को देखा। उनपर कुच्छ लिखा आज अमिताभ महात्मा है जो प्रवचन देते हैं और मीडिया के भाड उनको नतमस्तक सुनते हैं। क्या सचिन तेंदुलकर को कभी पुछा तेरे इतने पैसे का क्या हुआ। लेकिन वोह सब 'मेहनत ' की कमाई है।

भारत के मंदिरों और माथो में सबसे बड़ा भ्रस्ताच्चार है और हम सरअकार से मांग करते हैं इनका नियंत्रण करे और इनकी कमाई पे टैक्स लगाये क्या अरविन्द और उनके नतमस्तक  अनुयायी कभी इन मुद्दों को उठाएंगे अभी एकता परिषद् का इतना बड़ा मार्च था लेकिन हमारे देशी जातिवादी मीडिया की नज़र उस पर नहीं पडी क्योंकि वोह गरीबो का प्रश्न था। वोह लोग 'आम नहीं थे'. भैया अरविन्द मैं भी आम आदमी नहीं हूँ। तुम्हारे जैसे पैसा हमारे पास नहीं है। हम तो सुबह के इन्तेजाम के लिए शाम को सोचते हैं। जिन लोगो के साथ हम लड़ रहे हैं वोह तो आम की गुठली भी नहीं है क्योंकि वोह भी खाने को नहीं मिलती। यह आम आदमी का धंदा बंद करो यार। यह उद्योगों के बादशाह जो आज नैतित्कत के घूँट अपने पालतू लोगो से हमको पिला रहे है उनको बंद करो भाई। बहुत हो गया अब कम पर लौटने की जरुरत है। आम लोगो के लिए तो पूरा देश खड़ा है।। सअर्कार भी उनके साथ है लेकिन जो आम भी नहीं हैं उकी बात कौन कर रहा . वे इश देश की जाती वर्ना रंग, साम्प्रदायिकता सभी का तो शिकार हैं। उनकी जमीनों पर मंदिर, मैथ, गुरूद्वारे, मस्जिद सब बनते हैं और उनकी ही कब्र पर हमारे उद्योग फल फूल रहे हैं। भारत के सभी आम लोगो की जिन्दगी इन्ही लोगो की बदौलत चलती है। आम, लोगो की शान में हमारे अनाम लोग दिन रात लगे होते हैं उनको तुम्हारे   और प्रोपर्टी से कोई सरोकार नहीं वे केवल ये चाहते हैं उनके प्रश्नों को दरकिनार कर देश में हल्ला मचने के राजनीती जो ऐसे लोग कर रहे हैं, जिनके लिये यह अनाम केवल एक तमाशा हैं। आज जरुरत ऐसे अनामं लोगो के प्रश्नों को आगे लाने की है और उसके लिए जो जिम्मेवार हैं उन पर हमला करने की है। माफ़ कीजियेगा मैं केवल राजनीतिज्ञों को गाली देने वालो में और उनको भ्रस्ताचार कहने वालो में नहीं हूँ।मैं जानता हूँ के सफ़ेद कपड़ो के यह बादशाह जो हमारे ऊपर सफलता के रूप में प्रस्तुत किये जाते हैं उनके हाथ हमारे संशाधनो और उन अनाम लोगो के खून में रंगे हैं और हमारे लड़ाई को ऐसे बैमानो से किनारे कर तथाकथित नेताओ की और सरका देना एक चालाकी और धूर्तता का  कदम है।अपने राजनेताओ से हम निपटते हैं लेकिन इन बादशाहों से भी बी निपटना जरुरी  हैं जिन्हें हम चुनाव के जरिये नहीं हटा पाते।

राजनीती की दुधारू गाया केवल नेताओ के काम नहीं आती वोह इन पाखंडियों के ज्यादा काम आती है जिन्हें हम अंगरेजी हिंदी अखबारों के पेज थ्री में देखते हैं।आज जिन्हें हम रोल मॉडल बनाकर और जिनके जीवन चरित्रों और सफलताओ का व्याख्यान करके बच्चो को सुबह शाम दिखा रहे हैं दरअसल वोही हमारी पवित्र गे हैं और मीडिया की बदमाशियों के चलते और उनकी धुर्त्तात के चलते मुद्दों को बदलने में माहिर लोगो ने लोगो को लूटने वालो को सबसे इमानदार बना दिया। जरुर जनता अपने राजनितिक प्रतिनिधियों से परेशां है क्योंकि इन भ्रस्थ जातिवादी उद्योगों के स्वामियों ने उन्हें ख़रीदा है। आज ऐसे घरानों की ताकत बहुत मज़बूत है और इसलिए जरुरी है के उन पर लगाम लगे और उनकी करनियों और उनके सौदों पर सरकार की नज़र हो। और जो अपने को सामाजिक संघठन और सिविल सोसाइटी कहते हैं उनको भी इन धन्देबजो के धंदे को समझने की जरुरत है। आज भारत को अनाम लोगो के प्रश्नों को देखने की जरुरत है जो इस विकास ने नए मॉडल का शिकार हुए हैं और जिनकी जल जंगल और जमीन पर इन आम लोगो के परम पूज्य लोगो का कब्ज़ा हो चूका है। देश की अनाम जनता इतने वर्षो से संघर्ष कर रही है और यह आम लोग उनके साथ कोई सहानुभूति भी नहीं रखते ऐसे आम लोगो के खास मुद्दे से अनाम लोगो को कोई मतलब नहीं है। और हम सब देख रहे हैं शातिर लोगो के कारनामे जो अनाम लोगो को ख़त्म करने के लिए खास लोगो के साथ मिलकर नए मुद्दों का जाल बुन रहे हैं ताकि देश उन मूलबूत प्रश्नों से अपना ध्यान हटा दे जिसके कारण अनाम लोगो का जीना दूभर हो गया है और जिसके कारण वो इतने वर्षो से अपने जंगलो में, खेतो खलिहानों और पानी के अन्दर संघर्ष कर रहे हैं। अनाम लोगो की एक संघर्षगाथा को जारी रखना है ताकि आम जनता के नाम पर खास लोगो के अजेंडे का मुकाबला किया जा सके 

Monday, 10 September 2012

Violence in Kudankulam


कुदंकुलन पर तमिलनाडु सरकार का शर्मनाक रवैया

विद्या भूषण रावत


आज कुदंकुलन परमाणु संयत्र का विरोध कर रहे लोगो पर तमिलनाडु सरकार ने अपनी गुंडई दिखा दी. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का दावा करने वाली सरकार ने दिखाया के लोगो के भय और आक्रोश के उसे कोई परवाह नहीं है. कुदंकुलन सयंत्र के विरोध में भरी संक्या में ग्रामीण मच्चुअरो के प्रतिरोध के चलते पहले सरकार ने झूठे वायदे किये. क्या आप जान सकते है के ७००० लोगो पर रस्त्रद्रोह का मुक़दमा लगाया गया है और लगभग ४०,००० पर अन्य मुक़दमे लगाये गए हैं. शर्मनाक बात यह है के एक सयंत्र के लगने पर भी सरकार ने कोई भी प्रयास नहीं किया के लोगो की बात सुनी जाए.

हमें पता है के भारत को बिजली की जरुरत है. सबको पता है. लेकिन हमें यह भी देखना है के देश के निर्माण के नाम पर जो लोगो का बलिदान किया जाता है उस पर सवाल करने की जरुरत है. चाहे कुडनकुलम हो या ओम्कारेश्वर, देश के विकास के नाम पर लोगो की बलि दी गयी है. आज़ादी के बाद से भारत में ६-८ करोड़ लोग विस्थापित हुए है. इसका ४०-५०% यानि लगभग ३-४ करोड़ लोग आदिवासी समाज के लोग है जिन्हें दुबारा नहीं बसाया जा सका. शेष लोग दलित और पिच्च्दी जातियों से हैं. 

ओंकारेश्वर में सरकार ने किसी को भी एक इंच जमीन नहीं दी. सरकार ने कोर्ट में साफ़ कहा के उसके पास जमीन नहीं है. यह मध्य प्रदेश सरकार उद्योगों के लिए २० हज़ार हेक्टारे जमीन १५ सितम्बर तक देने को तैयार है. कोयले घोटाले में उद्योगपतियों की बदमाशियों के राज तो अभी पूरे तरीके से खुले नहीं है. सवाल यह है के जब सरकार ने संविधान में किये गए अपने वायदों को पूरा नहीं किया तो उसको लोगो को बेदखल करने का क्या कोई अधिकार है.

५० वर्ष के बाद भी देश में लोग भूख से मरते है. जब उसे कोई बताये के भारत ने श्रीहरिकोटा से कोई यान छोड़ा है तो भूखे मजदूर को उससे क्या लेना. क्या उस भूख में रहते हुए उसे देश के प्रगति पर कोई गर्व हो सकता है. यह कैसी प्रगति जहाँ लोग भूख से मर रहे हैं. 

कुदंकुलन के लोगो की अपनी चिंताएं है. २००४ में मैंने वहां का दौरा किया था और मेरे मित्र उदयकुमार ने मुझे पूरे क्षेत्र दिखाए जो भारत के विकास ने नाम पर समाप्त होने जा रहा था. अपने जीवन में कुच्छ इलाको में जाकर मुझे हमेशा अपनापन और खूबसूरती दिखाई दी और उसमे तमिलनाडु राज्य और कन्याकुमारी का क्षत्र है. समुद्र का इतना खूबसूरत नज़ारा बहुत कम दिक्खाई देता है लेकिन आज उस क्षेत्र की ख़ूबसूरती को विकास ने डंक मार दिया है. वोह खूबसूरती नहीं दिखाई देती जो थी. उस वक़्त जब मैं और उदय समुद्र में बालू माफिया के पास गुजरे और मैं कुच्छ तस्वीरे खींच रहा था तो हमें धमकी दी गयी के चुप चाप चले जाओ. मैं मछुआ समाज के नेताओ से मिला जो इस प्लांट का विरोध कर रहे थे. उनके विरोध बिजले से नहीं अपितु अपनी जिन्दगी से है. मैं मान सकता हूँ लोग परमाणु सयंत्रो का विरोध कर रहे हैं वो उसके विश्श्ग्य हैं मैं नहीं लेकिन चेर्नोब्य्ल, भोपाल, फुकिशामा और अन्य स्थानों पर हुई दुर्घटनाओ को अच्छे से जानता हूँ और मुझे विश्वास है के कुदंकुलन के लोग, बच्चे सब इसी बात से चिंतित है. यह चिंता श्रीलंका की भी है क्योंकि किसी भी दुर्घटना की स्थिथि में उनके यहाँ भी गंभीर संकट पैदा हो सकता है.

बहस बिजली या विकास की नहीं है. भारत का नागरिक होने के नाते अगर सरकार किसी की गरीबी नहीं दूर कर सकती है तो न करे लेकिन लोगो की बनी बनाई जिंदगी को खत्म करने का अधिकार उसे नहीं है. अंतरास्ट्रीय कानूनों के अनुसार सरकार को कोई भी  परियोजना शुरू करने से पहले लोगो को उसकी पूरी जानकारी देनी पड़ते है और फिर यदि लोग चाहे तभी कोई योजना लागू की जा सकती है. क्या भारत सरकार या राज्य सरकारों ने कभी भी ऐसा किया के लोगो को किसी योजना की जानकारी दी हो अन्यथा कोई क्या अपने के बर्बाद करने के लिए किसी परियोजना का समर्थन करता है क्या. भारत की स्थिथि जापान और जर्मनी जैसी नहीं है जो गंभीरता से विकल्पों की तलाश कर रहे हैं. 

बिना किसी विकल्प दिए लोगो को उनकी जमीन से बेदखल करना क्या रास्त्र द्रोह नहीं है. ७००० लोगो पर रस्त्रद्रोह  का आरोप लगाना क्या मज़ाक नहीं है. बाबरी मस्जिद के विध्वंश और दिल्ली में १९८४ के सिख विरोधी दंगो के बाद या गुजरात में २००२ के खून खराबे पर तो एक भी व्यक्ति पर देशद्रोह का आरोप नहीं लगाया गया. और तो और, अभी तक सामान्य कानून के तेहत भी कोई सजा  नहीं हो पायी है लेकिन अपनी जमीन के लिए अहिंसात्मक आन्दोलन करना देशद्रोह कैसे हो सकता है ? क्या सरकार को हमारी आज़ादी और हमारे जीवन को लेने का अधिकार है ? आज समय आ गया है जब हमें ऐसे कानूनों का विरोध करना चाहिए जो देश के लोकतंत्र को कमज़ोर करते हैं और लोकतंत्र के नाम पर राज कर रही ताकतों को फासीवादी अधिनायकवाद की तरफ ले जाते हैं.

कुदंकुलन के संघरशील साथियो को हमारा सलाम और हम उम्मीद करते हैं के सरकार उनकी बातो को सुनेगी और उन्हें अपराधी नहीं बनाएगी. ऐसे अधिकारीयों के खिलाफ कार्यवाही की जाए जिन्होंने निहत्थे लोगो पर गोलियां चलायी और लाठिया बरसाई. 



Friday, 7 September 2012



विकास का मनुवाद
विद्या भूषण रावत 

इस देश में बड़ी बहस है और कभी कभी हमारे दलित साथी भी वो भाषा बोलते हैं जो नरेन्द्र मोदी की है, चिदंबरम की है और मनमोहन की है. हम सुब्को विकास चाहिए लेकिन उसके मायने क्या हैं. विकास किसका और कैसा. अक्सर हमारे साथी आदिवासियों का मजाक उड़ाते हैं के उन्होंने क्या किया, वोह तो जंगले में रहते हैं और उन्हें अपने अधिकारों का पता नहीं है. इससे अधिक दुखद और बेबुनियाद बात कोई नहीं है क्योंकि अपने क्षेत्र की रक्षा के लिए आदिवासी संघर्ष जारी है. हाँ वोह भोले हैं और मनुवादी तिकड़मे नहीं जानते इसलिए हम उन्हें हलके में लेते हैं  

आज आदिवासी अगर अपने जल जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं तो हम उन्हें भाषण पिलाये जा रहे हैं के तुम विकास करो. सवाल ये है के जब आपके सर पर बन्दूक हो और जब आपको अपने ही घर में उजड़ा जा रहा हो तो क्या करें ? मैं तो हमारे साथियों से कहता हूँ के वो बताएं के बस्तर के आदिवासियों को क्या करना चाहिए और उन्हें बिज़नस कैसे सिखाया जाए. बिज़नस और अन्य चीजे व्यक्तिगत प्रयास होते हैं. हर एक व्यक्ति चाहे किसी भी जाती का क्यों न हो बिज़नस नहीं कर सकता. हम सबको इतनी आसानी से 'ज्ञान' बाँट देते हैं जैसे उन्होंने इन बातो पर विचार नहीं किया.

आज अगर आदिवासी और अन्य सभी को संघर्ष करना पद रहा है तो हमें हमारे देश की नीतियों को सवाल करना होगा. विस्थापन का सबसे बड़ा शिकार आदिवासी हुए हैं और एक व्यक्ति जब अपनी ही जमीन पर अजनबी बनकर रहे और उसकी पूरी संस्कृति और जीवन ध्वस्त हो जाए तो उसके बाद देश का विकास हो या विनाश उसे क्या फुर्सत. यह प्रश्न इतना पाखंडपूर्ण है के देश का विकास चाहिए लेकिन सवाल यह है के विकास किसकी कीमत पर. विकास के लिए किसका बलिदान. अगर इस विकास के दर्द को समझना हो तो टिहरी चले आइये या कुदंकुलन चले, या नर्मदा को देखें. गंगा और उसकी विभीषिका को समझे. ब्रह्मपुत्र की तबाही को देखें. यह प्रश्न केवल जातिगत नहीं अपितु हमारे विकास के माडलों की हवा गोल कर देंगे. कौन सा विकास और कैसा विकास. क्या अपना पर्यावरण और अपने पानी को बर्बाद होने दे. सब जानते हैं आना वाला संघर्ष पानी का है. और देखिएगा कितना भयावह होगा. आज उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल में चलिए तो एक भी स्थान पर साफ़ पानी नहीं है. ज्यादातर बड़े लोगो के घर पर प्यूरीफायर लगा है लेकिन गाँव के गरीब के लिए तो हैण्ड पम्प का पानी भी नसीब नहीं होता. साड़ी नदियाँ ख़तम हैं, खनन जोरो पर है, मल्लाहों की आजीविका पे संकट है और उनके भूखे मरने की नौबत है. अब मेरे पास जब भी ये सवाल आते हैं मुझे उनके संघर्ष में जाना पड़ेगा. मैं उन्हें भाषण नहीं दूंगा के तुम ये करो या वोह करो. सब लोग समझदार हैं और अपनी सीमायें और हकीकत को समझते हैं. पहले आज तो ठीक हो जाए तभी तो भaविष्य ठीक होगा. फिर हर एक तो दूकान नहीं चला सकता और जो दो चार लोग कुच्छ दुकाने खोलते हैं वोह खली बैठे रहते हैं. क्या करियेगा. जब मैंने कसगर समाज से पुछा के तुम और काम क्यों नहीं करते तो सीधे जवाब था कितने लोगो को नौकरी दिलवा दोगे. यह समझना जरुरी है के परिवर्तन सब चाहते है और वोह होगा भी लेकिन यह एक सततशील प्रक्रिया है और धीरे धीरे होता है.

 हमें बताया जाता है के कानून का पालन करो, न्याय प्रक्रिया में जाओ और संविधान के लड़ाए लड़ो. हमें पता है न्यायिक संघर्ष कैसे होता है और कितना लम्बा है. अगर इतना आसान होता तो लोग बन्दूक नहीं उठाते . मैं तो एक संगर्ष में हर न्यायलय में जीता हूँ, लेकिन अपने सामने न्याय होते नहीं देख पाया. न्यायलय को ही विनती करता हूँ के आप अपना निर्णय लागू करो. क्या चीजे इतनी आसान हैं जो हमें दिखती हैं/  एक जज महिला को तलक नहीं देता और कहता है पति से पिटती रहो क्योंकि वोह तुम्हे कम के देता है. कोई और है तो वोह उस कुर्सी को गंगा जल से धो देता है जिसके ऊपर कोई दलित बैठा करता था. यह घटनाएं आज भी बदस्तूर जारी हैं.. चेहरे बदल गए हैं लेकिन चरित्र वही है, घनघोर मनुवादी. 

हमें विकास करना हैं, दिमागी गुलामी से निकलना है लेकिन जब लोग संघर्ष में होते हैं तो केवल साथ दिया जाता है भाषण नहीं. नर्मदा के लोगो ने संघर्स को चुना है. उनकी संस्कृति को समाप्त करने का प्रयास है, उनके जीवन को पूर्णतया समाप्त करने का प्रयास है. २० वर्ष से जमीन पर काम करते मुझे पता है के इस देश ने अपने गरीब जनता को कितना चूसा है. इसका तंत्र कितना खतरनाक और पाखंडी है जो लोगो को भाषण देता है न्याय नहीं. आज भारत का संकट मात्र मनुवाद का नहीं है. मनुवादी अब हर जगह है इसलिए वो आपके पास, आपके रूप और रंग के साथ और आपकी जातिवाला भी हो सकता है इसलिए अब नज़रो को और मज़बूत करने की जरुरत है. दलित आदिवासी और पिच्चादी जातियों के प्रश्न केवल आरक्षण तक ही नहीं है अपितु उनके प्राकृतिक संशाधनो, जल जंगल और जमीन का भी है. यदि हम इन सवालो पर अपने संघरशील साथियों और समाजो के साथ नहीं खड़े दीखते तो कोई एकता नहीं बन पायेगी.

पुनः, एक रास्ट्र और समाज वहां के निवासियों से बनता है. कोई भी समाज या कोई भी रास्ट्र कभी खुश नहीं रह सकता जब उसके लोग दुखी हों. देश की तरक्की में सबकी भागेदारी होनी चाहिए और लोगो को पता होना चाहिए के मेरे 'विकास' के वास्ते दिल्ली में रहने वाले 'बाबु' के पास क्या है . क्या किसी गाँव से पुछा गया के तुम्हे कैसे विकास चाहिए. क्या देश की तरकी के लिए दलित आदिवासियों के घरो को उजाड़कर महल बनाना आवश्यक है. यदि देश के बहुजन समाज की चिता पर रखकर देश का विकास करना है तो शायद प्रकृति की रौशनी में ही काम चलाना अचछा. विकास की मूलभूत अव्धारनाओ को समझना होगा और अगर हमारे घर, खेती और खलिहानों को चौपट कर जो सपने हमें देखाए जा रहे हैं उसको समझने की जरुरत है. 

एक सभ्य समाज अपने लोगो से बड़ा नहीं होता. एक सभ्य रास्ट्र अपने लोगो की कब्र पर विकास नहीं करता. भारत को एक सभ्य रास्ट्र और एक सभ्य समाज बन्ने के लिए जरुरी है विकास का एक ऐसी अवधारणा जहाँ सबका दिमागी विकास हो जो मनुवादियों के हाथ न मज़बूत करे और बराबरी का समाज बनाये. विकास के नाम पर यदि गरीब की कमर पूरी तरीके से तोडनी है तो फिर उसको मुख्यधारा में कैसे लाया जायेगा और फिर वोह कौन सा उद्योगपति बन पायेगा क्योंकि एक अच्छे बिज़नस और विज्ञानं के लिए भी तो हमें अच्छा माहौल और जीवन के स्थिरता चाहिए और जब हमारे घर और खलिहान उजाड़ रहे हों तो हम इसकी उम्मीद कैसे कर सकते हैं. फिर सदियों तो अपनी जिंदगी को पटरी में लाने में लग जाते हैं. जिन लोगो की जिंदगी पटरी पर है वे थोडा संवेदनशील बने और संघर्ष का सम्मान करें.

Wednesday, 29 August 2012


फैसलों पे गर्व की घडी
विद्या भूषण रावत

उच्चतम न्यायलय ने अजमल कसब की याचिका को खारिज कर उसकी सजा को बरकरार रखा है क्योंकि कसब पर भारत के विढ़द्ध युध्ध छेड़ने का आरोप है और मुंबई के २६ नवम्बर के भयावह काण्ड का वह सरगना था. लेकिन आज ही गुजरात की विशेष अदालत का जो फैसला आया है वोह हिंदुत्व के माठाधीशो को भी मौत के दरवाजे तक पहुंचा सकता है. गुजरात के विशेष अदालत ने बाबु बजरंगी और माया कोदनानी को नरोदा पाटिया हत्याकांड का दोषी पाया है जिसमे १०० से अधिक मुसलमानों का कत्लेआम किया गया. यह घटना मानवता के नाम पर एक कलंक था. आश्चर्य की बात यह की माया मोदी के सबसे नज़दीक लोगो में शामिल थी और उन्हें बच्चो और महिला विकास का मंत्रालय सौंपा गया. ऐसी महिला जिस पर महिलाओ और बच्चो के खून का इलज़ाम हो हिंदुत्व के 'नैतिक' धरातल पर ही फिट बैठती हैं. आज भाजपा जैसी पार्टियाँ जो नैतीकता का लबादा ओढ़े रहती है और संसद तक नहीं चलने देती उसके इतने नेता देश में दंगा फ़ैलाने के और क़त्ल के आरूपों में घिरे हैं लेकिन वहां उनकी नैतिकता धरी की धरी रह जाती है. हिंदुत्व के मठाधीश और उनके चमचे लगातार झूठ बोलकर और मीडिया के जरिये अपने कार्य कर रहे हैं. वैसे भी उनकी राजनीती का मुख्या बिंदु परदे के पीच्चे के काम हैं.

अभी देशद्रोह और देश के विरुध्ध युद्ध छेड़ने की बात हो रही थी. कसब ने देश के विरुद्ध जंग छड़ी और अंत में सुप्रेमे कोर्ट ने उसे माफ़ नहीं किया. नरेन्द्र मोदी और उनके भक्तो ने गुजरात में नो नरसंहार किया वोह माफ़ नहीं किया जा सकता और एक कौम के खिलाफ जहर उगलने से लेकर उसका पूरा खत्म करने के प्रयास किये. देश की एक बड़ी आबादी के खिलाफ दुष्प्रचार क्या देश के विरुद्ध जंग नहीं है? आज हिंदुत्व के सौदागरों से पूछना पड़ेगा के गुजरात और अन्य जगहों पे आग लगाकर क्या वे देशद्रोह का कार्य नहीं कर रहे हैं. 

उम्मीद है के माया कोदानी जैसी महिलाएं हमारे समाज का रोल मॉडल नहीं बनेंगी और उनको भारत की न्याय प्रणाली उसी जगह पर भेजेगी जहाँ कसब बैठा है ताकि दोनों प्रायाषित कर सकें के आज के दौर में भारत की मजबूती का रास्ता पाकिस्तान की मजबूती से भी है और देश में विविध लोगो के साथ रहने में भी है. उम्मीद करते हैं के यह मामले न्याय प्रक्रिया के झमेलों में नहीं फंसेंगे और जल्दी से अपने अंजाम तक पहुँच जायेंगे.  भारत की एकता यहाँ रहने वालो के सामाजिक न्याय और आपसी सौहार्द से बनेगी और वोही २१वी सड़ी के भारत को मज़बूत करेगी. हमारे आपस के रिस्तो को मज़बूत करने का एक ही उपाय है न्याय और कानून का सख्ती से पालन. सांप्रदायिक और जातिवादी शक्तियों को न केवल राजनैतिक तरीके से उखड फेंका हर भारतीय का कर्तव्य है अपितु कानूनी तौर पैर भी उनके अजेंडे का खात्मा करना होगा ताकि एक मज़बूत सभ्य और धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील भारत सभी को साथ लेकर आगे बढ़ सके नहीं तो हमारे समाज की मनुवादी तकते अपने राजनितिक स्वार्थ के लिए सांप्रदायिक जहर फ़ैलाने में कामयाब हो जाएँगी और इसका सबसे बड़ा नुक्सान हमारे अपने समाज को ही होगा. माया कोदनानी जैसी महिलाएं हमारे समाज के लिए कलंक हैं और शर्म हैं और उनके साथ कोई हमदर्दी नहीं होनी चाहिए उन्हें कानून के उन्ही मापदंडो से गुजरना चाहिए जो कसाब या किसी और के लिए हैं. 

Sunday, 19 August 2012

 सबसे महान भारतीय कौन

विद्या भूषण रावत

आज एक चैनल ने अपने खेल का पटाक्षेप कर ही दिया. गाँधी के बाद सबसे बड़ा भारतीय कौन के जवाब में बाब साहेब आंबेडकर को सम्मानित करना उनकी मजबूरी थी. और अगर किसी ने कार्यक्रम देखा हो तो पता कर सकते हैं कैसे सारे लोग शोक संतप्त दिख रहे थे. मुस्कुराने की कोशिश कर रहे थे के भारत की जनता ने बाबा साहेब आंबेडकर को देश का महानतम व्यक्ति करार दिया है, गाँधी के बाद लेकिन इससे बड़ा फरेब हो नहीं सकता. हिंदुस्तान के मनुवादी कभी आंबेडकर को स्वीकार नहीं करेंगे लेकिन जैसे के बाज़ार का नियम है यहाँ जिसके वोट ज्यादा हैं उसको रोक नहीं सकते. इसलिए बाब साहेब को ज्यादा वोट मिलने का मतलब साफ़ है है के ब्रह्मंवादियों को उनके ही खेल में हराने के लिए वोही तौर तरीके अपनाने पड़ेंगे. वैसे मेरा यह मानना है के राजदीप सरदेसाई या अमिताभ बच्चन के मानाने या न मानने से डॉ आंबेडकर का महत्व कम नहीं होता है. हम जैसे लोगो के लिए उनकी महत्ता हमेशा रहेगी क्योंकि उन्होंने लोगो के जीवन में इतना बड़ा परिवर्तन किया है.

बहुत दुःख हुआ सहारा कार्यक्रम देख कर. किस तरह से हर एक व्यक्क्ति के बारे में बताने के लिए सबके पास बहुत कुच्छ था.. सचिन, लता, टाटा, अमिताभ, अटलजी, इंदिरागांधी, अब्दुल कलम  और नेहरु. सभी की विस्तार से चर्चा हुयी और इनकी महानता के चर्चे हुए लेकिन डॉ आंबेडकर के बारे में बताने और उनके जीवन मूल्यों के बारे में बताने के लिए राजदीप सरदेसाई को एक विश्श्ग्य नहीं मिला. आयोजको के चेहरे दुखी नज़र आ रहे थे. शायद पहली बार मार्केट की ताकतों को लगा होता के चुनाव के आलावा अब अन्य स्थानों पर भी अम्बेद्कर्वादीयों के प्रहार नज़र आयेंगे और उनको बचना मुश्किल होगा. 

आंबेडकर का महत्व भारत के आम जनमानस के जीवन में इतना अधिक है के वोह इंसानी आज़ादी के प्रश्नों से जुदा है. वोह हमारे जीवन को एक नए आयाम देते हैं. वोह किसी खाप पंचायत के नेता के तौर पर नहीं. मैं गाँधी को अपना रहनुमा नहीं मान सकता जब तक वोह दकियानूसी परम्परो, जातिवादी सोच और भारत के गाँव को बदलने का सपना नहीं बुनते. मुझे आंबेडकर में आशा की किरण दिखाई दी क्योंकि उन्होंने लोकतंत्र, व्यक्ति और बदलाव की बात की. दुनिया के अंदर एक सांस्कृतिक और राजनितिक बदलाव की बात के जो वोह अपने समय तो नहीं देख पाए लेकिन आज खुश हो रहे होंगे जब उनके मानने वाले अलग अलग क्षेत्रो में अपनी बलंदियों को छु रहे हैं. आज भारत के लोकतंत्र अगर मज़बूत है तो आंबेडकर के मानाने वालो का शुक्रिया अदा करना होगा जिन्होंने एक सेकुलर संविधान को अपना मूल धर्मं मन और संविधान चलने वालो के लाख बदनियतो के बावजूद उस पर भरोषा रखा. बाबा साहेब ने कहा था के ख़राब लोग एक बेहतरीन संविधान को भी ख़राब कर सकते हैं. 

एक सभ्य समाज के लोग यह बहस नहीं करते के महान कौन है. वोह ईमानदारी से इस बात को स्वीकार करते हैं के उनके जीवन एक व्यक्ति ने बदलाव लाया है. आंबेडकर की भारत को दें एक महान संविधान ही नहीं है अपितु भारत के करोडो कोगो को जीवन में एक नयी आशा और बदलाव का सन्देश था. उनलोगों को जिनके गाँधी या नेहरु ने भूख हड़ताल नहीं की और न ही अपने जीवन में कोई लड़ाई लड़ी.

इसलिए, अमिताभ या शबाना आज़मी को बाबा साहेब के नाम का महत्व समझना है तो हिन्दुओ को समझाना पड़ेगा और देखना पड़ेगा के क्यों देश के बहुसंख्यक समाज के लोग १४ अप्रैल, ६ दिसम्बर और दशहरे के दिन दिल्ली, मुंबई और नागपुर में भरी संख्या में इकठ्ठा होते है. यह भीड़ कोई पैसे से नहीं लाई जाती. यह भीड़ अपने सबसे बड़े व्यक्ति के लिए सम्मान के वास्ते आती है.. बाज़ारवाद  से सावधान रहना क्योंकि यह बड़े बड़े पूंजीपति और धन्ध्य लोगो को भी उन लोगो के साथ महान बताने पे तुला है जिन्होंने अपना सर्वोच्च बलिदान किया. फिलहाल, हम येही कह सकते हैं के देश के बहुसख्यक समुदाय के लिए आंबेडकर  का महत्व गाँधी से बहुत बड़ा है इसलिए हम बाज़ार के  इस तिकड़म को ख़ारिज करते है के  'गाँधी' के बाद बाबा साहेब सबसे बड़े भारतीय हैं.. बाबा साहेब सभी भारतियों के लिए सर्वोच्च हैं जिन्होंने संविधान, इंसानियत, बराबरी और भ्रतित्व को अपना उद्देश्य माना. गाँधी के जातिवादी ग्रामीण विचारो से केवल खप पंचायते और हिंदुत्ववादी ही मज़बूत हुए है   न की भारत का संविधान. इसलिए, एक मज़बूत, आधुनिक और प्रगतिशील भारत के लिए अम्बेडकरवाद ही २१वी सदी का विचार हो सकता है.


हिंदुत्व के ठग आसाम के घटनाक्रम में राजनैतिक रोटियां सकने की तयारी शुरू कर दिए हैं. कल से बंगलोरे में हमारे कई मित्रो को फ़ोन पर मेसेज दिए गए के बंगलोरे छोड़ दो नहीं तो कुच्छ दिनों में मुसलमान आप पर हमला करेंगे. संघ के लोग उत्तर पूर्व के लोगो को बंगलोरे स्टेशन पर मदद कर रहे हैं. संघ का ऐसा दुह्मुहापन हमने बहुत देखा है.

आज देश संकट में है और असाम की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओ के चलते उसको समाधान करने की बजे हमरे राजनैतिक नेता लोगो की लाशो पर राजनीती कर रहे हैं. ऐसी घटनाओ को तुरंत रोकना होगा. असाम में जिसके भी साथ अन्याय हुआ उसको संपत करना हमारी रास्ट्रीय जिम्मेवारी है लेकिन पूरी समस्या का संप्रदायीकरण करके जो लोग रोटियाँ सेकने की तैयारी कर रहे हैं सरकार को उनसे निपटाना होगा. 

ये सच है के बंगाल्देशियों के नाम पर मुस्लिम समुदाय जुल्म का शिकार हुआ है लेकिन यह भी हकीकत है बोडो क्षेत्र में अतिक्रमण हुआ है और आदिवासियों के प्रश्नों को आसानी से दरकिनार नहीं किया जा सकता. उन प्रश्नों पर देश के संसद को भाषण नहीं गंभीर चिंतन की जरुरत है. रास्ट्रीय एकता परिषद् की बैठक बुलाई जानी चाहिए ताकि असाम के प्रश्न को देश के दुसरे हिस्सों में फैलने से रोका जा सके.

यह समझने की जरुरत है के ऐसा क्यों हो रहा है. गत एक हफ्ते में बंगलोरे और हैदराबाद से लगभग ७ हज़ार लोग वापस उत्तरपूर्व में अपने राज्यों में जा चुके हैं. मेस्सेजेस के जरिये लोगो को बताया जा रहा है के मुसलमानों ने हमला किया है और रमजान ख़त्म होने के बाद हमले होने वाले हैं. ऐसी स्थितियों को समझना होगा. छोटी सभाओ में कई बार इमोशन का सहारा लेकर ऐसी बाते बोली जाती हैं जो हिंदुत्व के ध्वज़धारियों के बहुत काम आती हैं और उसका इस्तेमाल मीडिया के जरिये होता है.

बहुत समय से देश में दंगे नहीं हुए हैं. उनका एक अर्थशास्त्र और एक समाजशास्त्र है. राजनीती तो है ही. जब जब देश के दलित पिच्च्दे जगेनेंगे हिंदुत्व के यह मठाधीश दंगो का इस्तेमाल करेंगे. असाम का घटनाक्रम उनके २०१४ के चुनाव के लिए बहुत उपयुक्त है और इसलिए उस पर अभी से अमल शुरू हो गया है. ऐसी स्थिथि में नरेन्द्र मोदी को भी देश का एकमात्र नेता प्रस्तुत किया जाएगा जो मज़बूत है और 'घुश्पैथियों' से मुकाबला कर पायेगा. लच्छेदार भाषा और उसपर चरण पत्रकारों की टोली, बाकि क्या चाहिए देश को आग में धकेलने के लिए. वैसे भी यह सरकार कुच्छ नहीं करते यह केवल तमाशा देखती है. पहले से कार्यवाहीं करना इसका काम नहीं है.

असाम और उत्तर पूर्व के हमारे भाई बहिन हमारे देश के नागरिक है और उनकी हिफाजत करना हमारी सरकार और हमारा कर्त्तव्य है. उत्तर पूर्व के लोग पहले से ही हमारे समाज की जातीय मनुवादी मानसिकता का शिकार बने हैं. उन पर हमले हुए है और उनको एक विदेशी के तरह देखा जाता है. अपने देश के अंदर अपने देश के नागरिको के साथ ऐसा सलूक बर्दस्थ नहीं किया जा सकता. 

आज भारत के सेकुलर संविधान पर हमला है. सांप्रदायिक तकते इसको अपने हिसाब से इस्तेमाल करना चाहती है और देश की एकता और अखंडता को खत्म कर देना चाहते हैं. सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतों का एक ही काम होना चाहिए के हिंदुत्व और संघ के छिपे हुए अजेंडे को पहचानने और उसका पर्दाफास करे. भारत इस वक़्त संघ के आतंकवाद का शिकार है और इसके संविधान को ख़ारिज करने की अलग अलग सियासी चलो को नेस्तनाबूद करना होगा. असाम की समस्या का तत्काल समाधान करने के प्रयास शुरू करने चाहिए और बंगलादेश की सरकार को भी इसमें शामिल करना चाहिए ताकि आरोपों और प्रत्यारोपो को मौका न मिले और ऐसे अफवाहे फ़ैलाने वाले अराजक तत्वों के विरुद्ध सख्त कार्यवाही होनी चाहिए ताकि उस पर रोक लग सके. कर्नाटक में हो रही ऐसी घटनाओं पर प्रशाशन की असफलता से शक होता है के उनकी शाह ऐसे लोगो को रही होगी जो अफवाहे फैला रहे हैं. हैदराबाद से भी ऐसी सूचनाये मिल रहे हैं. सरकार इस सवाल को हवा में नहीं उड़ा सकते और राज्य सरकारों को चाहिए के वो उत्तर पूर्व के लोगो को पूर्ण सुरक्षा दे और अफवाहे फ़ैलाने वालो पर तुरंत कार्यवाही करे.



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क्या समाजवादी पार्टी ने फूलनदेवी का राजनैतिक इस्तेमाल कर भुला दिया

विद्या भूषण रावत

फूलन देवी की हत्या हुए लगभग ११-१२ वर्ष होगये हैं. उनके हत्या के कारणों की जांच चल रही है और वोह कहाँ तक पहुँची उसकी न किसी को जानकारी है और न ही चिंता. दुखद बात तो यह के न ही फूलन को राजनीती में लेन वाले लोगो ने उनके परिवार वालो के बारे में जानने की कोई कोशिश की . यह साबित करता है हमारी राजनीती का क्या स्वरूप है और यहाँ चढ़ते सूरज को सलाम है और जब आपके सितारे गर्दीश में हो या डूब गए तो फिर आशा न करें के कोई राजनेता उसकी जानकारी भी लेगा. यह भी सत्य की जिन लोगो को राजनीती की सही जानकारी नहीं या जिनका मन उस प्रकार की तिकड़मो में नहीं है वोह राजनीती नहीं कर सकते हैं और फूलन की सहजता और राजनीतिक असमझ के कारण की आज उनकी पार्टी के ही लोगो ने उनको पूर्णतया भुला दिया है.

फूलन के पैत्रिक गाँव शेखपुरागुद्धा गाँव में आज भी उनका परिवार अपमान और नारकीय जिंदगी जी रहा है. जालौन जिले के कालपी शहर से लगभग १०-१२ किलोमीटर दूर बीहड़ो  के बीच बसा शेखपुरा गाँव यमुना के किनारे पे बसा है. फूलन की छोटी बहिन रामकली अपनी माँ और बेटे के साथ यहाँ रहा रही हैं. यह घर फूलन के पिता ने बनवाया था और थोडा इंदिरा आवास योजना की मदद लेकर एक छोटा सा बाथरूम और एक कमरा बना है. यहाँ आकर यह नहीं लगता के एक  सेलेब्रिटी सांसद के परिवार के सदस्य आज खाने को मोहताज हैं. 

फूलन की माँ और बहिन के पास कुच्छ नहीं है. हद तो यह है के उनके पास अपने इलाज करवाने के लिए पैसे नहीं है. यदि एक दिन मजदूरी नहीं करेंगे तो घर में चूल्हा नहीं जलता. माँ इलाज़ न हो पाने की वज़ह से अपने बेटे शिव नरियन के पास  ग्वालियर चली गयी वोह पुलिस में काम करता है. फूलन के ताऊ और उनके चचरे भाई मैयादीन ने पत्रिक सम्पति को हड़प लिया फलस्वरूप उनके पिता के पास कोई सम्पति नहीं आये. फूलन को पहली बार जेल उनके चचरे भाई मैयादीन ने ही भिजवाया जब उसने अपने पिता का हको की मांग की.

जब मैं रामकली से मिला तो मेरी आँखों में सन्नाटा था. क्या मैं उस परिवार के सदस्य को देख रहा हूँ जिसकी दो बार सदस्य दो बार सांसद बनी. फूलन ने आत्मसमर्पण के बाद ८ वर्ष जेल में बिताये और फिर रिहाई के बाद समाजवादी पार्टी ने उनका इस्तेमाल करना शुरू किया. फूलन के नाम पर मल्लाह बिरादरी को इकठ्ठा किया गया और उनको मिर्ज़ापुर क्षेत्र से चुनाव लड़ाया गया. उनकी बहिन और गाँव के अन्य सदस्यों का साफ़ मानना था के फूलन गाँव के लिए बहुत कुच्छ करना चाहती थी लेकिन उम्मेद सिंह ने उनकी उम्मीदों को ख़त्म कर दिया. वोह ये मानते हैं के जहाँ समाजवादी पार्टी ने उनको राजनैतिक तौर पर इस्तेमाल किया वहीँ उम्मेद ने उनके पैसे पर नज़र रखी और आज फूलन के न रहने पर उनकी पूरी सम्पति पर कब्ज़ा कर बैठा है जबकि उनकी माँ और छोटी बहिन आज दर दर को मोहताज हैं.

रामकली का दर्द बयां नहीं किया जा सकता. उसने सपने देखे अच्छी जिंदगी के. फूलन एक जिंदादिल इंसान थी लेकिन थी बहुत भोली. उसका सपना अपने गाँव में दुर्गा माँ एक विशाल मंदिर बनवाने का. वोह चाहती थी बहुत कुच्छ करना लेकिन राजनैतिक अपरिपक्वता के चलते ऐसा संभव नहीं था. फूलन एक राजनेता नहीं थे. वो एक विद्रोही थी जिन्होंने अपने साथ हुए अन्याय को सहन नहीं किया. उन्होंने शर्म से सर छुपा कर जीना स्वीकार नहीं किया और सर उठा कर बदला लिया. समाज ने उनको कई नाम दिया. क्रूर, दस्यु सुंदरी और न जाने क्या क्या लेकिन फूलन वाकई में अपने इर्द गिर्द रह रही घटनाओं का शिकार होती चली गयी.

उनका व्यक्तिगत जीवन एक कहानी था जिससे हमारे समाज की लडकिया सीख सकती हैं के जिनके साथ दुर्व्यवहार होता है उनको शर्म से जिंदगी नहीं अपितु इज्जत से जीना सीखना पड़ेगा आखिर कोई भी महिला अपने पे तो हिंसा नहीं करती. जो उन पर हिंसा करता है उसके विरुद्ध कार्यवाही हो. फूलन उन मध्य वर्ग की महिलाहो की तरह नहीं रही जो  उन पर हिंसा होने के बाद घुट घुट कर जिंदगी  जीती, न ही उन्होंने मरने की सोची. उन्होंने जिंदगी जीने की सोची और ये उनकी सबसे बड़ी ताकत थी. एक आज़ाद भारत में ऐसे जज्बे वाली महिलाये कम है  और इसीलिये फूलन को अंतरास्ट्रीय मीडिया ने हाथो हाथ लिया क्योंकि उनके जीवन की कहानी में एक जज्बाती और सर उठाकर जीने वाली महिला की कहानी है.
लेकिन फूलन को क्या पता के उनके अपने ही लोग उनको 'दुधारू गया' की तरह इस्तेमाल करेंगे. रिहाई के बात फूलन मार्केट के प्रोडक्ट हो चुकी थी अतः पैसे भी काफी आये लेकिन राजनैतिक सोच के आभाव में फूलन यथास्थ्तिवादी ताकतों के हाथ में ही चली गए और फिर वही हुआ जिसका खतरा था. फूलन केवल निषाद समुदाय की महिला बनाकर रह गयी और उनकी मौत के बाद तो उनको उनके की लोगो ने पूरी तरह से भूला दिया.

फूलन दलित बहुजन महिला आन्दोलन के वास्ते बहुत कुच्छ कर सकती थी. उत्तर प्रदेश के अन्दर दलित अति पिच्च्दे समाज को इकठ्ठा करने और उसको नयी दिशा देने में वो निर्णायक भूमिका कर सकती थी लेकिन ऐसा तब संभव होता जब फूलन को दलित बहुजन आन्दोलन की जानकारी होती और उसके महापुरुषों के बारे में बताया जाता. उनके समाज में आज भी ब्राह्मणवादी परम्पराओं का बोलबाला है. अन्धविश्वाश आज भी बदस्तूर जारी है. दुखद बात यह है के फूलन उत्तर प्रदेश में बसपा विरोधी प्रोपगंडा का शिकार हुई. मैं यहाँ पर पार्टी की बात नहीं करना चाहता लेकिन केवल उसके सन्दर्भ ढूँढा रहा हूँ के फूलन एक सामाजिक आन्दोलन को मजबूत बना सकती थी लेक्किन सत्ता के गलियारों तक और सत्ता के चकाचौंध ने उत्तर प्रदेश में एक बहुत बड़ी क्रांति को रोक दिया.

आज फूलन अपने गाँव के लिए कुच्छ नहीं कर पाई. उसकी माँ और बहिन दो जून की रोटी के लिए मोहताज हैं और उनके नाम से वोट बटोरने वाली पार्टी और उनके राजनेताओ को यह पता भी नहीं के उनका परिवार किस हालत में रह रहा होगा. क्या यह फूलन के भोलेपन और ईमानदारी का सबूत नहीं के उन्होंने अपने लिए कुच्छ किया नहीं. लेकिन दुसरी तरफ यह भी सच है के उनके पास पैसे थे लेकिन उनके असमय मौत से उनकी सम्पति उनके परिवार तक नहीं पहुँच पाई. लोग बार बार यह सवाल पूछते हैं के फूलन की हत्या क्यों हुई? क्योंकि जो उनका हत्यारा माना जा रहा है वोह उनके घर पे आता जाता रहा है और ऐसे पहुँच कैसे हुई.

फूलन की बहिन रामकली ने मुलायम सिंह यादव को पिता कहा. फूलन भी मुलायम सिंह जी को पिता कहते थी. वोह आज भी उनके अहसानमंद है लेकिन दुखी भी के आज दो बार की संसद फूलन की माँ के पास सर छुपाने की जगह नहीं. एक छोटा सा टूटा फूटा सा घर है और खाने के लिए अब उनकी माँ काम नहीं कर सकती और न उनको कोई विधवा पेंसिओं है न ही गरीबे रेखा  का कार्ड. क्या ये शर्मनाक नहीं की आज हम समाजवादी पार्टी और उनकी सरकार से फूलन के परिवार के लिए तीन सौ रुपैया पेंसन और गरीबी रेखा कार्ड की बात कहें. रामकली भी बीमार है और उसका बेटा मानसिक रोक से ग्रस्त है. कुच्छ वर्ष पूर ट्रेन की छत पर यात्रा करते वक़्त उसका सर किसी वस्तु से टकरा गया और तब से उसकी स्थिथि ठीक नहीं लेकिन त्रासदी है के उसके ठीक से इलाज़ के लिए पैसे भी नहीं है. मुलायम सिंह जी यादव और उनकी समाजवादी पार्टी से अनुरोध है के वे फूलन के परिवार को ससम्मान जीवन जीने के लिए कुच्छ करे और अपनी उस सांसद को थोडा याद कर ले जिसके भरोशे उन्होंने एक ज़माने में मल्लाह-निषाद समुदाय में पैठ बनाने का प्रयास किया.