Monday, 12 November 2012

America Mandalised

अमेरिका का मंडलीकरण 

विद्या भूषण रावत 

अमेरिका में राष्ट्रपति बराक ओबामा का चुनाव जीतना एक नए समीकरण की और संकेत कर रहा है। अमेरिका की दक्षिणपंथी तकते अफ्रीकी मूल के लोगो, अप्रवासियों, अल्पसंख्यको और महिलाओ के इस नए समीकरण को ख़त्म करने के लिए कोई अयोध्या कांड करने का प्रयास करेंगी . क्योंकि अमेरिका में कोई बाबरी मस्जिद नहीं है तो यह सब या तो ईरान पर हमला करवाने के प्रयास होंगे या शिव सेना स्टाइल में आप्रवासियों के विरुद्ध मोर्चा खोला जायेगा क्योंकि उद्योपति और पूंजीपति सब रिपब्लिकन  पार्टी के प्रमुख समर्थक रहे हैं इसलिए भारत की तरह अमेरिका में भी धार्मिक उन्मादियों और पूँजी का एक सशक्त गठबंधन बन सकता है। क्योंकि अमेरका के कई प्रान्तों में समलैंगिक विवाहों को भी लोगो ने मान्यता दे दी है जिसके विरुद्ध अमेरिकन चर्च और उनके कट्टरपंथी पादरी लगातार आवाज उठा रहे थे।

आज के परिणामो से साबित हो गया है के अमेरिका के हासिये के लोग अब सत्ता में भागीदारी चाहते हैं। वे चाहते हैं स्वस्थ्य सेवाओ का रस्त्रियाकरण जिसके विरुद्ध प्राइवेट कंपनियों की कोशिश जारी है। बुश के मुस्लिम विरोधी स्वरों को अमेरकी गोरो ने बहुत समर्थन दिया और इस्लाम को निशाना बनाकर वह का चर्च दक्षिणपंथी अजेंडा लागू कर रहा था। भगवन और भाग्य को तभी लाया जाता है जब हासिये के लोग अपने अधिकारों के लिए सड़क पर आते हैं। अमेरिका के काले लोगो ने आप्रवासियों और महिलाओ के साथ गठबंधन करके अपनी त्क्कत दिखा तो दी लेकिन व्यवस्था में बदलाव आएगा ऐसा नहीं कहा जा सकता। ये सिस्टम ताकतवर लोगो के लिए बना है। हम सब जानते हैं के अमेरिका के चुनावो में बेतहाशा खर्च होता है और पूंजी का बहुत बड़ा रोल है। 

अमेरिकी लोकतंत्र को जनतंत्र बनाने में समय लगेगा और वह तभी सफल हो सकता है जब बराक ओबामा के समर्थक समूह अपनी पहचान और अस्मिता के आलावा अमेरिका में अपने भविष्य को ध्यान में रख कर अपनी रणनिति बनाये। लोतंत्र में उनकी भूमिका ओबामा को चुनाव जीताकर ख़त्म नहीं हो जाती। दुर्भ्ग्यवाश अमेरिकी चुनाव प्रणाली ऐसी नहीं है के जिसमे गोरी ताकत को रोका जा सके। यह वैसे ही है  जैसे भारत में राजनैतिक सत्ता परिवर्तन के बावजूद भी सत्ता की नकेल अभी भी ताकतवर जातियों के हाथ में ही है। और जब उसको ख़त्म करने का प्रश्न उठाया जाता है तो अन्य प्रश्न खड़े कर दिए जाते हैं। ओबमा को चाहिए के सामाजिक न्याय की शक्तियों को मज़बूत करे और अम्बेडकर और फुले के संघर्ष को समझे। यह भी अच्चा होगा के अमेरिका दुसरे देशो में दखलंदाजी देना बंद करदे तो वहां के पूंजीवादी तबके की दुकान बंद हो जाएगी। यह वोही तबका है जो अमेरिकी घृणा फैलने वाले चर्च के साथ मिलकर दुनिया पर अपनी दादागिरी  रखना चाहता है।

अमेरिका के चारसौ वर्षो के इतिहाश में पहली बार 20% महिलाएं सीनेट में जीत कर आयी हैं और उम्मीद है वे बदलाव वाली ताकतों के साथ रहेंगी' अमेरिका की प्रतिनिधि सभ में रिपब्लिकन पार्टी का कब्ज़ा बना हुआ है। वैसे चुनाव हरे हुए मिट रोमनी ने रास्त्रपति को तुरंत बधाई दी और सहयोग का वादा किया। भारत में मुख्या विक्पक्षी दल और उसके वेट लिस्टेड प्रधानमंत्री श्री लाल कृष्णा अडवाणी आज तक नहीं पचा पाए हैं के वे सरकार में नहीं हैं। 

अमेरिका से बहुत उम्मीद तो नहीं कर सकते क्योंकि पूंजी और धर्म की भूमिका वह बहुत ज्यादा है और सबसे बड़ा खतरा यह है के काले, हिस्पैनिक और आप्रवासियों के अन्दर आ रहे बदलाव को पूंजी और धर्म की ताकते ख़त्म करने का माद्दा रखती हैं। यह वैसे ही है जैसे भारत में हिंदुत्व और पूंजी का भयावह गठबंधन बदलाव की सारी ताकतों को रोके हुए है हालाँकि वो सत्ता में नहीं दिखाई देता फिर भी उसके बिना सत्ता चलते नहीं और वोह हमरे मीडिया और पूंजी तंत्र पर हावी है।

चुनाव जीतने पर राष्ट्रपति ओबामा को बधाई और उम्मीद करते हैं की अमेरिका प्रोपगेंडा आधारित  नहीं करेगा और दुसरे देशो पर अपनी मिलिट्री ताकत की आजमाइश नहीं करेगा। हम यह भी उम्मीद करते हैं के ओबामा अपनी घरेलु समस्याओ पर ज्यादा ध्यान देंगे और आतंकवाद के नाम पर चल रही दुन्कानो को बंद करेंगे। अमेरिका अगर अपने को अलग थलग नहीं चाहता तो उसे दादागिरी छोड़ लोकतान्त्रिक परम्पराव को बढ़ाना पड़ेगा। हम सब लोकतंत्र चाहते हैं लेकिन उसकी मजबूती  अमेरिकी द्रोंतंत्र के जरिये नहीं हो सकती। फिलहाल अमेरिकी अफ्रीकी लोगो और वहां की धार्मिक, भाषाई, और सेक्सुअल अल्पसंख्यको को केवल एक सलाह के भारत के दलित बहुजनो के राजनितिक संघर्ष से कुच्छ सीख सकते हैं। अमेरिका के मंडलीकरण की शुरुआत हो चुकी है और असली नतीजे 2020 के बाद दिखाई देंगे।

-- 

Women and customs


असभ्यता के स्थलों से खुद को मुक्त करने की आवश्यकता 

विद्या भूषण रावत 

बम्बई की हाजी अली दरगाह में औरतो के प्रवेश पर पर्तिबंध से बहुत से लोग आहात हैं लेकिन प्रश्न यह है के क्या यह हमारे 
समय की पहली घटना है ? बहुत से लोगो ने कहा के धर्म ऐसी इजाजत नहीं देता और इसलिए वोह दरगाह में महिलाओ के ऊपर प्रतिबन्ध के खिलाफ बोलेंगे। बहुत से मानवाधिकार कार्यकर्ताओ ने भी प्रश्न उठाये हैं के पुजस्थालो में जाना किसी भी भक्त का मूल अधिकार है। क्या बात इतनी आसांन है। क्या हम धर्मस्थलो पे अपने आधुनिक कानून लागु कर सकते हैं। 

यह जानना आवश्यक है के मंदिर प्रवेश की लड़ाई धर्म की सत्ता को मज़बूत करने के लड़ाई है और जो लोग उसमे विश्वाश करते हैं मैं उनसे केवल इतना कहना चाहता हूँ के क्या मज़हब वाकई में स्त्री और पुरुष को बराबर समझते हैं। असल में धर्मो की सत्ता तो इसबात में होते है की कुच्छ लोगो पर भगवन की विशेष कृपा है और कुच्छ पर कम। जिस पर कम कृपा है उसे अनलकी कहा जाता है और फिर पुरोहित उसकी अज्ञानता या भय का लाभ लेते हुए टोन टोटके बताता है। 

सूफी स्थलों को प्रेम का सन्देश देने वाले स्थल बताने वालो की कमी नहीं है। उन्हें धर्मनिरपेक्ष बताने वालो की भी कमी नहीं लेकिन वे धर्मनिरपेक्ष केवल अज्ञानता और जाडु टोने के सन्दर्भ में हैं जहाँ लोग अपने 'काम' करवाने आते हैं, मन्नते मांगते हैं और जब वे 'पूरी' हो जाती हैं तो फिर चढ़ावा चढाने आता हैं। अगर सूफी स्थलों को देखे तो ज्यादातर स्थानों पर औरतो के प्रवेश पर पाबन्दी है और वोह खुल के होती हैं। महिलाएं उसे 'गर्भ गृह' तक प्रवेश नहीं कर सकती। एक सूफी स्थल पर मुझे वहः के खादिम ने बड़े फक्र से बताया के औरतो को इसलिए अन्दर नहीं बुला सकते क्योंकि वे 'गन्दी' होती हैं। वैसे 'गंदे' का मतलब सब जानते हैं और यह तो बहुत से मंदिरों और अन्य धर्म स्थलों में भी है के महिलाओ के माहवारी के समय उन्हें इन स्थल पर जाने की इजात नाहे है और इस बात को पुक्ता करने के लिए उनके प्रवेश को उम्र से जोड़ दिया गया के या तो 8 वर्ष से कम की लड़की हो या 60 वर्ष से उपर की उम्रदाज। सबरीमाला के मंदिर में महिलाओ का प्रवेश बंद है।

मंदिरों में या अन्य धर्मस्थलो में महिलाओ और दलितों के प्रवेश के विरुद्ध कानून कम नहीं कर सकते। बात यह भी है हमारे कानून आज की परिस्थतियो के अनुसार बनते हैं जबकि धार्मिक परम्पराएँ जब से बनी हैं उनमे कोई बदलाव नहीं आता क्योंकि उन्हें 'इश्वर' या 'अल्लाह' ने 'स्वयं' बनाया है इसलिए उसमे सुधर नहीं किया जा सकता। अब तक सभी धर्मो और व्यवस्थाओ में औरतो को पुरुषो के समकक्ष कभी नहीं मन गया है। वे उस संस्कृति के वाहक और पोषक हैं जो उनकी शोषक है और इसलिए मंदिर और इन स्थलों में प्रवेश के आन्दोलन उसी व्यवस्था को मज़बूत करती हैं जिसने औरतो को कभी बराबरी का दर्जा नहीं दिया। 

बाबा साहेब आंबेडकर ने बताया के दलितों को मंदिर प्रवेश की जरुरत नही है क्योंकि वहां उनकी इज्जत नहीं है और इसलिए कालाराम मंदिर आन्दोलन के बाद उन्होंने मंदिर प्रवेश के आन्दोलन को बंद कर दिया और नयी व्यवस्था के निर्माण में लगे। अगर महिलाओ को अपने पे विश्वाश है तो उन्हें ऐसी व्यवस्था में नहीं जाना चाहिए जहाँ उनकी इज्जत नहीं है और इसलिए ऐसे भगवन को बता दो के अगर तू हमें बराबर मानने को तैयार नहीं तो हम भी तेरे द्वार पे आने को तैयार नहीं। आज की सबसे बड़ी चुनौती यह है के आधुनिक संविधान हमारे समाज को नहीं बदल पा रहे हैं क्योंकि धार्मिक ताकते अभी भी हावी हैं और हमारी अज्ञानता और भय के चलते इन पाखंडी परम्परआओ की शिकार बनी  है क्योंकि उसकी सामाजिक पहचान भी यही से है और समाज में अलग थलग होने का वोह खतरा उठा नहीं सकती और अंत में उन्ही सदी गली परम्पराव को ढोटी चली जाती हैं जो उसके खिलाफ हैं।

लेकिन आज के समाज की जरूरती है के औरतो को ऐसे सभी स्थानों को पूर्ण बायकाट करना चाहिए जहाँ उसे बरबरी की दृष्टी से नहीं देखा जाता और जहाँ वह अभी भी पुराणी दकियानूसी परम्पराओं के आधार पर अपमानित की जाती हैं। समय आ गया है के ऐसी परमपराओ, ऐसे धर्मस्थलो और लोगो को पूर्णतया नकार दो जो इंसानी बराबरी में विश्वाश नहीं करते और आज़ादी, बराबरी और सम्मान के मानवीय मूल्यों को नहीं समझते। 


-- 

Women and Karwachowth



महिलाएं और संस्कृति 

विद्या भूषण रावत 




करवा चौथ का व्रत आज बड़े जोश खरोश से मनाया जा रहा है बाजारों में रौनक है और टीवी के भीतर भी बहुत बहस है। सुष्माजी का यह 37 व करवाचौथ है और उनके पति का प्यार 37 गुना बढ़ चूका है। यह  नहीं सुषमा जी ने टीवी पर खुद कहा है। महिलाएं कह रही है के ये उनका प्यार है और कोई उनको दबाव नहीं दल रहा। वैसे यश चोपड़ा के सिनेमा ने करवा चौथ का इतना महिमा मंडान किया और उसकी रंगीनियों को ऐसे दिखाया मनो हर एक महिला जो करवाचौथ रख रही है, स्विट्ज़रलैंड जाने वाली हो। खैर, रंजना कुमारी जी ने कहा है के करवा एक लें दें भी है और अगर दबाव नहीं है तो उन्हें इसमें कोई ऐतेराज नहीं है। बात ये के आज के युग में भी ऐसे सड़ी गली परमपरो के तहत अगर हम जी रहे हैं तो उस देश का क्या कहने 

वैसे ब्राह्मणवादी परम्पराव में महिलाओ को बहुत से व्रत करने के लिए दिए गए हैं जैसे करवाचौथ में पति की लम्बी उम्र के लिए और फिर कुच्छ दिनों बाद भाई दूज आएगा और सभी बहिने अपने भाइयों की आरती उतरेंगी। रक्षा  तो जा चूका है जब बहिनों ने अपने बहियों को राखी बंधी और अपने   जीवन को धन्य बनाया। फिर माएं अपने बेटो की खातिर व्रत रखती हैं। हमारे समाज में भी अलग अलग डिपार्टमेंट हैं भगवानो के। जैसे संतोषी माँ भाई या बेटा  देती हैं, शिवजी, अच्छा  पति देते हैं,..काम देव के महिमा न्यारी वोह प्यार और रोमांस की ताकत देते है। 

वैसे औरतो की मज़बूरी तो वर्णाश्रमधर्मियों पहले की बना दी थी जब उन्होंने कहा के उसे आज़ाद रहने का अधिकार नहीं है और बचपन में वो अपने पिता के अधीन रहेंगी और फिर अपने पति के और अगर पति नहीं रहे तो बेटे के अधीन रहना चाहिए और शायद इन्ही रिश्तो के टूटने के भय से इतने दवाब में रहकर ये व्रत रखे जाते हैं के अगर नहीं रखे तो बहुत संकट होगा . घर पर एक पुरुष जरुरी है और बेटे के चाहत पति का प्यार, और पिता का आशीर्वाद तो बम्बई की फिल्मे भी बहुत बाँट रहते है लेकिन वोह सब ब्रह्मनिया संस्कृति का हिस्सा है जिसे बहुत हे स्टाइल में बाज़ार द्वारा प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे यह बहुत बड़े प्रेम और बराबरी का त्यौहार है। ठीक होता यदि करुआ में महिला और पुरुष के बराबरी होती। यह सभी त्यौहार पुरुषो के प्रधानता का प्रतीक है और इनको प्रेम का त्यौहार बताने का धंधा करनेवाले लोग पूंजी और धर्म का बहुत बेहतरीन घालमेल करते हैं इसलिए कमाई की कमाई और परम्परऔ को पुनर्स्थापित करने का संकल्प। इससे अच्छे बात क्या हो सकती है के महिलाएं ही खुद कहें के यह तो बहुत महँ त्यौहार है और यह वे अपने मर्जी से करते हैं।

खैर जो व्रत रख रही है उनसे तो हम नहीं कह सकते के उनके व्रत से उनके पति की कितनी उम्र बढ़ेगी और फिर पति की उम्र की  बढे, पत्नियों के क्यों नाही। लेकिन भारतीय समाज की क्रूरता और विधवाओ के हालत को जिसने देखा है वोह बता सकता है के अधिकांश स्त्रियाँ उस सोच से ही घबराती हैं और पाती से पहले मरने की कामना करती हैं। यह एक असिई हकीकत है के जब पत्नी पहले ही चली जाए तो ब्रह्मनिया संस्कृति में सुहाग्वंती होकर मरने को बहुत बड़ा बताया गया है। अतः हम समझ सकते हैं काहे महिलाएं इतने व्रत रखती है।

अब समस्या व्रतियों की नहीं है। उन्होंने तो सिद्ध कर दिया के वे अपने पतियों को बहुत चाहती है चाहे बाकि दिन वे पतियों को पीते या पति उनको पीते इसके कोई मतलब नहीं लेकिन जिन महिलाओं ने व्रत नहीं रखा वोह तो समाज के ताने सुन रही होंगी . उन्हें इन व्रतियों ने अलग थलग खलनायिका   बना दिया है। 

वैसे अधिक्नाश पति कहते हैं जिनमे क्रन्तिकारी भी शामिल हैं के उनकी पत्नियों के आगे उनकी नहीं चलती और वे अपनी पत्नियों के सी प्यार के आगे असहाय हैं यह जाहिर करता है के क्रांति के यह दूत दुसरो के घर पर भगत सिंह देखना चाहते हैं और अपने घर के मनुवाद को जिन्दा देखते रहना चाहते हैं। वैसे भारतीय समाज का पाखंड यही है के हम सब कहते हैं लेकिन व्यक्तिगत जीवन में फ़ैल हैं और भारत में साड़ी क्रांतियों के असफलता का कारण भी वर्णाश्रम की कुतिय्ल्ताओ में फंसी हमारी जिंदगी है और जब तक उसे उखाड़ नहीं फेंकेंगे तब तक बदलाव नहीं आएगा। 

-- 
-- 

Friday, 12 October 2012

An answered question of 'uncommon' people



अनाम जनता के प्रश्न 

विद्या भूषण रावत 


राबर्ट वद्र के डी एल एफ के रिश्तो को उजागर करने पर कई महारथी अरविन्द केजरीवाल का शुक्रिया अदा कर रहे हैं और कह रहे हैं के अब राजीनति में कोई भी पवित्र गाय  नहीं रही क्योंकि जब गाँधी परिवार पर हमले शुरू हो गए हैं तो किसी को भी क्यों छोड़ा जाये। लेकिन हकीकत यह है के वद्र एक बहुत छूती आइटम हैं इस पूरे दर्शन में। क्या वाकई में हमने पवित्र गायों पर हमला किया है या हम चालबाज़ हैं और बुइल्दारो के इस खेल को नैताकता का लबादा ओढा के भ्रस्थाचार के विरुद्ध जंग का नाम दे रहे हैं। 

राजीनति में भ्रस्थ्चार कब से बढा इसके लिए नरसिम्हा राव के बाद के परिस्थितियों को समझना पड़ेगा जब देश में निवेश के लिए सरकारों ने जमीनों और प्राकृतिक संशाधनो पे हमला करना शुरू किया। नेताओ, अधिकारीयों और लालाओ की लूटखोर और घूश्खोर जमातो का गठबंधन हो गया और मिलजुल के खाने का एक नया दौर चला। जहाँ उद्योगपतियों को राजनीती भने लगी वही नेताओ ने उद्योग लगाने शुरू किया। दोनों तब तक अच्छे थे जब तक एक दुसरे के क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं कर रहे थे। लेकिन जब नेताओ ने उद्योगपतियों पर ही डाका डालना शुरू किया तो उन्होंने भी कमर कास ली और 'विकल्प' देना शुरू कर दिया। असल में अन्ना-केजरीवाल उसी विकल्प का हिस्सा हैं। हलानिक इन सबके पीछे संघ के योध्द्य दिन रत लगे रहे। लेकिन महत्वाकांक्षाओ का टकराव होना लाजमी है। जैसे अन्ना और अरविन्द का टकराव पैसे का तो रहा होगा लेकिन मह्त्वकअंक्षा का भी था। अरविन्द और उनकी टीम अन्ना को मुखौटा बना कर खुद निर्णय लेना चाहती थे और अन्ना पहले मुखौटा बने रहे लेकिन बाद में उन्हें लगने लगा के सब उनके कारण ही चल रहे हैं तो उन्हें यह दिखने की जरुरत पडी की अन्दोनल उनकी उपज था और वोह राजनीती से घृणा करते हैं। अन्ना को पता है राजनीती में महारास्त्र के अन्दर ही उनकी दुर्गति हो जाएगी। लेकिन केजरीवाल के इरादे दुसरे थे। वह जानते हैं के दिल्ली के मध्यवर्ग में गाँधी परिवार के प्रति बहुत घृणा है और यह अब जातिगत स्वरुप में भी दिखाई देती हैं। मूलतः यह माध्यावार्ग, आरक्षण विरोधी, सांप्रदायिक और जातिवादी है लेकिन मीडिया के लगातार समर्थन से इसको स्वीकार्यता मिल गयी है। दिल्ली में चुनाव में अरविन्द वोट कटुआ तो बन सकते हैं और वोह किसका काटेंगे ये जानने के जरुरत नहीं है। खैर, मीडिया मैनज करने के बाद केजरीवाल को लग रहा है के वह कुच्छ भी कहें तो  मीडिया  उसका संग्यान लेगा सरकार के लिए मुसीबते पैदा करता रहेगा और वोह इस प्रकार से समाचारों में बने रहेंगे।

मीडिया के माफिया लिंकों का सबको पता होना चाहिए। उनके व्यावसायिक हितो के बारे में भी जानकारी होनी चाहिए तभी हम ऐसे शातिर खेलो को समझ सकते हैं। 1990 में दूरदर्शन पर जब वर्ल्ड दिस  वीक का कार्यक्रम आया तो भास्कर घोष सुचना प्रसारण मंत्रालय के सचिव थे। आरोप लगे थे की एनडीटीवी पर उनकी विशेष कृपा थी क्योंकि राजदीप उसके एक प्रमुख स्तम्भ बने थे। जब स्टार न्यूज़ और एनडीटीवी का मिलन हुआ तो भास्कर घोष के प्रभाव चला। आज सी  एन एन आई बी एन पर अम्बानी का 500 करोड़ से ऊपर का निवेश है। इंडिया टुडे में भी रि ला येंस की बड़ी भागीदारी है। आज बिल्डर और प्रोपर्टी डीलर देश में अख़बार और चैनल चला रहे हैं और अभी तो खबर चल रही है के कैसे बड़े संपादक और पत्रकार सबसे बड़े ब्लाच्क्मैलेर बन रहे हैं। सरकार को यह सब पता है। और राजनीती में सबको ऐसी बाते पता होती हैं।

अगर जांच हो तो पता करे के धीरुभाई अम्बानी भारत में उद्योगों के शंहाँशाह कैसे बने। उन्होंने तो खुद कई बार कहा के बगैर घुश देकर यह संभव् नहीं था। रामदेव के पास इतनी बड़ी सम्पति कैसे आये। और रामदेव तो बेचार शुद्र है इसलिए बहुत आसान टार्गेट हैं जैसे रोबेर्ट वद्र। हिआरे में पुछा म्मत है तो किसी शंकराचार्य पर केस करके दिखाएँ। हिम्मत है तो आर्ट ऑफ़ लिविंग की जांच कराएँ और बताये के यह सब महान आत्माएं कैसे अरबो रुपैया के मालिक बन गए। अरविन्द केजरीवाल करोल्बह के बनियों के बताएं के वे हेर खरीद पर बिल दे तो देश का काला धन ख़त्म हो जाएगा . भारत का महान' व्यापारी बिल मांगने वाले को गाली देता और उसको बताता है बिल मांगोगे तो ज्यादा देना पड़ेगा। कितने लाले अपनी इन्कोमे टैक्स सही भरते और सही दिखाते हैं। 

कभी केजरीवाल और उनके इंडिया अगेंस्ट कोर्रुप्तिओन को मुकेश अम्बानी का 5000 करोड़ रुपैये के आलिशान शहंशाही बंगले के आगे प्रदर्शन करने की जरुरत है या नहीं। यह 5000 करोर क्या मुकेश के पिताजी के हैं,. क्या मुकेश ने इन्वेस्टर्स से इसके  बारे में पुछा। क्या कभी अमिताभ बच्चन के व्यावसायिक रिश्तो को देखा। उनपर कुच्छ लिखा आज अमिताभ महात्मा है जो प्रवचन देते हैं और मीडिया के भाड उनको नतमस्तक सुनते हैं। क्या सचिन तेंदुलकर को कभी पुछा तेरे इतने पैसे का क्या हुआ। लेकिन वोह सब 'मेहनत ' की कमाई है।

भारत के मंदिरों और माथो में सबसे बड़ा भ्रस्ताच्चार है और हम सरअकार से मांग करते हैं इनका नियंत्रण करे और इनकी कमाई पे टैक्स लगाये क्या अरविन्द और उनके नतमस्तक  अनुयायी कभी इन मुद्दों को उठाएंगे अभी एकता परिषद् का इतना बड़ा मार्च था लेकिन हमारे देशी जातिवादी मीडिया की नज़र उस पर नहीं पडी क्योंकि वोह गरीबो का प्रश्न था। वोह लोग 'आम नहीं थे'. भैया अरविन्द मैं भी आम आदमी नहीं हूँ। तुम्हारे जैसे पैसा हमारे पास नहीं है। हम तो सुबह के इन्तेजाम के लिए शाम को सोचते हैं। जिन लोगो के साथ हम लड़ रहे हैं वोह तो आम की गुठली भी नहीं है क्योंकि वोह भी खाने को नहीं मिलती। यह आम आदमी का धंदा बंद करो यार। यह उद्योगों के बादशाह जो आज नैतित्कत के घूँट अपने पालतू लोगो से हमको पिला रहे है उनको बंद करो भाई। बहुत हो गया अब कम पर लौटने की जरुरत है। आम लोगो के लिए तो पूरा देश खड़ा है।। सअर्कार भी उनके साथ है लेकिन जो आम भी नहीं हैं उकी बात कौन कर रहा . वे इश देश की जाती वर्ना रंग, साम्प्रदायिकता सभी का तो शिकार हैं। उनकी जमीनों पर मंदिर, मैथ, गुरूद्वारे, मस्जिद सब बनते हैं और उनकी ही कब्र पर हमारे उद्योग फल फूल रहे हैं। भारत के सभी आम लोगो की जिन्दगी इन्ही लोगो की बदौलत चलती है। आम, लोगो की शान में हमारे अनाम लोग दिन रात लगे होते हैं उनको तुम्हारे   और प्रोपर्टी से कोई सरोकार नहीं वे केवल ये चाहते हैं उनके प्रश्नों को दरकिनार कर देश में हल्ला मचने के राजनीती जो ऐसे लोग कर रहे हैं, जिनके लिये यह अनाम केवल एक तमाशा हैं। आज जरुरत ऐसे अनामं लोगो के प्रश्नों को आगे लाने की है और उसके लिए जो जिम्मेवार हैं उन पर हमला करने की है। माफ़ कीजियेगा मैं केवल राजनीतिज्ञों को गाली देने वालो में और उनको भ्रस्ताचार कहने वालो में नहीं हूँ।मैं जानता हूँ के सफ़ेद कपड़ो के यह बादशाह जो हमारे ऊपर सफलता के रूप में प्रस्तुत किये जाते हैं उनके हाथ हमारे संशाधनो और उन अनाम लोगो के खून में रंगे हैं और हमारे लड़ाई को ऐसे बैमानो से किनारे कर तथाकथित नेताओ की और सरका देना एक चालाकी और धूर्तता का  कदम है।अपने राजनेताओ से हम निपटते हैं लेकिन इन बादशाहों से भी बी निपटना जरुरी  हैं जिन्हें हम चुनाव के जरिये नहीं हटा पाते।

राजनीती की दुधारू गाया केवल नेताओ के काम नहीं आती वोह इन पाखंडियों के ज्यादा काम आती है जिन्हें हम अंगरेजी हिंदी अखबारों के पेज थ्री में देखते हैं।आज जिन्हें हम रोल मॉडल बनाकर और जिनके जीवन चरित्रों और सफलताओ का व्याख्यान करके बच्चो को सुबह शाम दिखा रहे हैं दरअसल वोही हमारी पवित्र गे हैं और मीडिया की बदमाशियों के चलते और उनकी धुर्त्तात के चलते मुद्दों को बदलने में माहिर लोगो ने लोगो को लूटने वालो को सबसे इमानदार बना दिया। जरुर जनता अपने राजनितिक प्रतिनिधियों से परेशां है क्योंकि इन भ्रस्थ जातिवादी उद्योगों के स्वामियों ने उन्हें ख़रीदा है। आज ऐसे घरानों की ताकत बहुत मज़बूत है और इसलिए जरुरी है के उन पर लगाम लगे और उनकी करनियों और उनके सौदों पर सरकार की नज़र हो। और जो अपने को सामाजिक संघठन और सिविल सोसाइटी कहते हैं उनको भी इन धन्देबजो के धंदे को समझने की जरुरत है। आज भारत को अनाम लोगो के प्रश्नों को देखने की जरुरत है जो इस विकास ने नए मॉडल का शिकार हुए हैं और जिनकी जल जंगल और जमीन पर इन आम लोगो के परम पूज्य लोगो का कब्ज़ा हो चूका है। देश की अनाम जनता इतने वर्षो से संघर्ष कर रही है और यह आम लोग उनके साथ कोई सहानुभूति भी नहीं रखते ऐसे आम लोगो के खास मुद्दे से अनाम लोगो को कोई मतलब नहीं है। और हम सब देख रहे हैं शातिर लोगो के कारनामे जो अनाम लोगो को ख़त्म करने के लिए खास लोगो के साथ मिलकर नए मुद्दों का जाल बुन रहे हैं ताकि देश उन मूलबूत प्रश्नों से अपना ध्यान हटा दे जिसके कारण अनाम लोगो का जीना दूभर हो गया है और जिसके कारण वो इतने वर्षो से अपने जंगलो में, खेतो खलिहानों और पानी के अन्दर संघर्ष कर रहे हैं। अनाम लोगो की एक संघर्षगाथा को जारी रखना है ताकि आम जनता के नाम पर खास लोगो के अजेंडे का मुकाबला किया जा सके 

Monday, 10 September 2012

Violence in Kudankulam


कुदंकुलन पर तमिलनाडु सरकार का शर्मनाक रवैया

विद्या भूषण रावत


आज कुदंकुलन परमाणु संयत्र का विरोध कर रहे लोगो पर तमिलनाडु सरकार ने अपनी गुंडई दिखा दी. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का दावा करने वाली सरकार ने दिखाया के लोगो के भय और आक्रोश के उसे कोई परवाह नहीं है. कुदंकुलन सयंत्र के विरोध में भरी संक्या में ग्रामीण मच्चुअरो के प्रतिरोध के चलते पहले सरकार ने झूठे वायदे किये. क्या आप जान सकते है के ७००० लोगो पर रस्त्रद्रोह का मुक़दमा लगाया गया है और लगभग ४०,००० पर अन्य मुक़दमे लगाये गए हैं. शर्मनाक बात यह है के एक सयंत्र के लगने पर भी सरकार ने कोई भी प्रयास नहीं किया के लोगो की बात सुनी जाए.

हमें पता है के भारत को बिजली की जरुरत है. सबको पता है. लेकिन हमें यह भी देखना है के देश के निर्माण के नाम पर जो लोगो का बलिदान किया जाता है उस पर सवाल करने की जरुरत है. चाहे कुडनकुलम हो या ओम्कारेश्वर, देश के विकास के नाम पर लोगो की बलि दी गयी है. आज़ादी के बाद से भारत में ६-८ करोड़ लोग विस्थापित हुए है. इसका ४०-५०% यानि लगभग ३-४ करोड़ लोग आदिवासी समाज के लोग है जिन्हें दुबारा नहीं बसाया जा सका. शेष लोग दलित और पिच्च्दी जातियों से हैं. 

ओंकारेश्वर में सरकार ने किसी को भी एक इंच जमीन नहीं दी. सरकार ने कोर्ट में साफ़ कहा के उसके पास जमीन नहीं है. यह मध्य प्रदेश सरकार उद्योगों के लिए २० हज़ार हेक्टारे जमीन १५ सितम्बर तक देने को तैयार है. कोयले घोटाले में उद्योगपतियों की बदमाशियों के राज तो अभी पूरे तरीके से खुले नहीं है. सवाल यह है के जब सरकार ने संविधान में किये गए अपने वायदों को पूरा नहीं किया तो उसको लोगो को बेदखल करने का क्या कोई अधिकार है.

५० वर्ष के बाद भी देश में लोग भूख से मरते है. जब उसे कोई बताये के भारत ने श्रीहरिकोटा से कोई यान छोड़ा है तो भूखे मजदूर को उससे क्या लेना. क्या उस भूख में रहते हुए उसे देश के प्रगति पर कोई गर्व हो सकता है. यह कैसी प्रगति जहाँ लोग भूख से मर रहे हैं. 

कुदंकुलन के लोगो की अपनी चिंताएं है. २००४ में मैंने वहां का दौरा किया था और मेरे मित्र उदयकुमार ने मुझे पूरे क्षेत्र दिखाए जो भारत के विकास ने नाम पर समाप्त होने जा रहा था. अपने जीवन में कुच्छ इलाको में जाकर मुझे हमेशा अपनापन और खूबसूरती दिखाई दी और उसमे तमिलनाडु राज्य और कन्याकुमारी का क्षत्र है. समुद्र का इतना खूबसूरत नज़ारा बहुत कम दिक्खाई देता है लेकिन आज उस क्षेत्र की ख़ूबसूरती को विकास ने डंक मार दिया है. वोह खूबसूरती नहीं दिखाई देती जो थी. उस वक़्त जब मैं और उदय समुद्र में बालू माफिया के पास गुजरे और मैं कुच्छ तस्वीरे खींच रहा था तो हमें धमकी दी गयी के चुप चाप चले जाओ. मैं मछुआ समाज के नेताओ से मिला जो इस प्लांट का विरोध कर रहे थे. उनके विरोध बिजले से नहीं अपितु अपनी जिन्दगी से है. मैं मान सकता हूँ लोग परमाणु सयंत्रो का विरोध कर रहे हैं वो उसके विश्श्ग्य हैं मैं नहीं लेकिन चेर्नोब्य्ल, भोपाल, फुकिशामा और अन्य स्थानों पर हुई दुर्घटनाओ को अच्छे से जानता हूँ और मुझे विश्वास है के कुदंकुलन के लोग, बच्चे सब इसी बात से चिंतित है. यह चिंता श्रीलंका की भी है क्योंकि किसी भी दुर्घटना की स्थिथि में उनके यहाँ भी गंभीर संकट पैदा हो सकता है.

बहस बिजली या विकास की नहीं है. भारत का नागरिक होने के नाते अगर सरकार किसी की गरीबी नहीं दूर कर सकती है तो न करे लेकिन लोगो की बनी बनाई जिंदगी को खत्म करने का अधिकार उसे नहीं है. अंतरास्ट्रीय कानूनों के अनुसार सरकार को कोई भी  परियोजना शुरू करने से पहले लोगो को उसकी पूरी जानकारी देनी पड़ते है और फिर यदि लोग चाहे तभी कोई योजना लागू की जा सकती है. क्या भारत सरकार या राज्य सरकारों ने कभी भी ऐसा किया के लोगो को किसी योजना की जानकारी दी हो अन्यथा कोई क्या अपने के बर्बाद करने के लिए किसी परियोजना का समर्थन करता है क्या. भारत की स्थिथि जापान और जर्मनी जैसी नहीं है जो गंभीरता से विकल्पों की तलाश कर रहे हैं. 

बिना किसी विकल्प दिए लोगो को उनकी जमीन से बेदखल करना क्या रास्त्र द्रोह नहीं है. ७००० लोगो पर रस्त्रद्रोह  का आरोप लगाना क्या मज़ाक नहीं है. बाबरी मस्जिद के विध्वंश और दिल्ली में १९८४ के सिख विरोधी दंगो के बाद या गुजरात में २००२ के खून खराबे पर तो एक भी व्यक्ति पर देशद्रोह का आरोप नहीं लगाया गया. और तो और, अभी तक सामान्य कानून के तेहत भी कोई सजा  नहीं हो पायी है लेकिन अपनी जमीन के लिए अहिंसात्मक आन्दोलन करना देशद्रोह कैसे हो सकता है ? क्या सरकार को हमारी आज़ादी और हमारे जीवन को लेने का अधिकार है ? आज समय आ गया है जब हमें ऐसे कानूनों का विरोध करना चाहिए जो देश के लोकतंत्र को कमज़ोर करते हैं और लोकतंत्र के नाम पर राज कर रही ताकतों को फासीवादी अधिनायकवाद की तरफ ले जाते हैं.

कुदंकुलन के संघरशील साथियो को हमारा सलाम और हम उम्मीद करते हैं के सरकार उनकी बातो को सुनेगी और उन्हें अपराधी नहीं बनाएगी. ऐसे अधिकारीयों के खिलाफ कार्यवाही की जाए जिन्होंने निहत्थे लोगो पर गोलियां चलायी और लाठिया बरसाई. 



Friday, 7 September 2012



विकास का मनुवाद
विद्या भूषण रावत 

इस देश में बड़ी बहस है और कभी कभी हमारे दलित साथी भी वो भाषा बोलते हैं जो नरेन्द्र मोदी की है, चिदंबरम की है और मनमोहन की है. हम सुब्को विकास चाहिए लेकिन उसके मायने क्या हैं. विकास किसका और कैसा. अक्सर हमारे साथी आदिवासियों का मजाक उड़ाते हैं के उन्होंने क्या किया, वोह तो जंगले में रहते हैं और उन्हें अपने अधिकारों का पता नहीं है. इससे अधिक दुखद और बेबुनियाद बात कोई नहीं है क्योंकि अपने क्षेत्र की रक्षा के लिए आदिवासी संघर्ष जारी है. हाँ वोह भोले हैं और मनुवादी तिकड़मे नहीं जानते इसलिए हम उन्हें हलके में लेते हैं  

आज आदिवासी अगर अपने जल जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं तो हम उन्हें भाषण पिलाये जा रहे हैं के तुम विकास करो. सवाल ये है के जब आपके सर पर बन्दूक हो और जब आपको अपने ही घर में उजड़ा जा रहा हो तो क्या करें ? मैं तो हमारे साथियों से कहता हूँ के वो बताएं के बस्तर के आदिवासियों को क्या करना चाहिए और उन्हें बिज़नस कैसे सिखाया जाए. बिज़नस और अन्य चीजे व्यक्तिगत प्रयास होते हैं. हर एक व्यक्ति चाहे किसी भी जाती का क्यों न हो बिज़नस नहीं कर सकता. हम सबको इतनी आसानी से 'ज्ञान' बाँट देते हैं जैसे उन्होंने इन बातो पर विचार नहीं किया.

आज अगर आदिवासी और अन्य सभी को संघर्ष करना पद रहा है तो हमें हमारे देश की नीतियों को सवाल करना होगा. विस्थापन का सबसे बड़ा शिकार आदिवासी हुए हैं और एक व्यक्ति जब अपनी ही जमीन पर अजनबी बनकर रहे और उसकी पूरी संस्कृति और जीवन ध्वस्त हो जाए तो उसके बाद देश का विकास हो या विनाश उसे क्या फुर्सत. यह प्रश्न इतना पाखंडपूर्ण है के देश का विकास चाहिए लेकिन सवाल यह है के विकास किसकी कीमत पर. विकास के लिए किसका बलिदान. अगर इस विकास के दर्द को समझना हो तो टिहरी चले आइये या कुदंकुलन चले, या नर्मदा को देखें. गंगा और उसकी विभीषिका को समझे. ब्रह्मपुत्र की तबाही को देखें. यह प्रश्न केवल जातिगत नहीं अपितु हमारे विकास के माडलों की हवा गोल कर देंगे. कौन सा विकास और कैसा विकास. क्या अपना पर्यावरण और अपने पानी को बर्बाद होने दे. सब जानते हैं आना वाला संघर्ष पानी का है. और देखिएगा कितना भयावह होगा. आज उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल में चलिए तो एक भी स्थान पर साफ़ पानी नहीं है. ज्यादातर बड़े लोगो के घर पर प्यूरीफायर लगा है लेकिन गाँव के गरीब के लिए तो हैण्ड पम्प का पानी भी नसीब नहीं होता. साड़ी नदियाँ ख़तम हैं, खनन जोरो पर है, मल्लाहों की आजीविका पे संकट है और उनके भूखे मरने की नौबत है. अब मेरे पास जब भी ये सवाल आते हैं मुझे उनके संघर्ष में जाना पड़ेगा. मैं उन्हें भाषण नहीं दूंगा के तुम ये करो या वोह करो. सब लोग समझदार हैं और अपनी सीमायें और हकीकत को समझते हैं. पहले आज तो ठीक हो जाए तभी तो भaविष्य ठीक होगा. फिर हर एक तो दूकान नहीं चला सकता और जो दो चार लोग कुच्छ दुकाने खोलते हैं वोह खली बैठे रहते हैं. क्या करियेगा. जब मैंने कसगर समाज से पुछा के तुम और काम क्यों नहीं करते तो सीधे जवाब था कितने लोगो को नौकरी दिलवा दोगे. यह समझना जरुरी है के परिवर्तन सब चाहते है और वोह होगा भी लेकिन यह एक सततशील प्रक्रिया है और धीरे धीरे होता है.

 हमें बताया जाता है के कानून का पालन करो, न्याय प्रक्रिया में जाओ और संविधान के लड़ाए लड़ो. हमें पता है न्यायिक संघर्ष कैसे होता है और कितना लम्बा है. अगर इतना आसान होता तो लोग बन्दूक नहीं उठाते . मैं तो एक संगर्ष में हर न्यायलय में जीता हूँ, लेकिन अपने सामने न्याय होते नहीं देख पाया. न्यायलय को ही विनती करता हूँ के आप अपना निर्णय लागू करो. क्या चीजे इतनी आसान हैं जो हमें दिखती हैं/  एक जज महिला को तलक नहीं देता और कहता है पति से पिटती रहो क्योंकि वोह तुम्हे कम के देता है. कोई और है तो वोह उस कुर्सी को गंगा जल से धो देता है जिसके ऊपर कोई दलित बैठा करता था. यह घटनाएं आज भी बदस्तूर जारी हैं.. चेहरे बदल गए हैं लेकिन चरित्र वही है, घनघोर मनुवादी. 

हमें विकास करना हैं, दिमागी गुलामी से निकलना है लेकिन जब लोग संघर्ष में होते हैं तो केवल साथ दिया जाता है भाषण नहीं. नर्मदा के लोगो ने संघर्स को चुना है. उनकी संस्कृति को समाप्त करने का प्रयास है, उनके जीवन को पूर्णतया समाप्त करने का प्रयास है. २० वर्ष से जमीन पर काम करते मुझे पता है के इस देश ने अपने गरीब जनता को कितना चूसा है. इसका तंत्र कितना खतरनाक और पाखंडी है जो लोगो को भाषण देता है न्याय नहीं. आज भारत का संकट मात्र मनुवाद का नहीं है. मनुवादी अब हर जगह है इसलिए वो आपके पास, आपके रूप और रंग के साथ और आपकी जातिवाला भी हो सकता है इसलिए अब नज़रो को और मज़बूत करने की जरुरत है. दलित आदिवासी और पिच्चादी जातियों के प्रश्न केवल आरक्षण तक ही नहीं है अपितु उनके प्राकृतिक संशाधनो, जल जंगल और जमीन का भी है. यदि हम इन सवालो पर अपने संघरशील साथियों और समाजो के साथ नहीं खड़े दीखते तो कोई एकता नहीं बन पायेगी.

पुनः, एक रास्ट्र और समाज वहां के निवासियों से बनता है. कोई भी समाज या कोई भी रास्ट्र कभी खुश नहीं रह सकता जब उसके लोग दुखी हों. देश की तरक्की में सबकी भागेदारी होनी चाहिए और लोगो को पता होना चाहिए के मेरे 'विकास' के वास्ते दिल्ली में रहने वाले 'बाबु' के पास क्या है . क्या किसी गाँव से पुछा गया के तुम्हे कैसे विकास चाहिए. क्या देश की तरकी के लिए दलित आदिवासियों के घरो को उजाड़कर महल बनाना आवश्यक है. यदि देश के बहुजन समाज की चिता पर रखकर देश का विकास करना है तो शायद प्रकृति की रौशनी में ही काम चलाना अचछा. विकास की मूलभूत अव्धारनाओ को समझना होगा और अगर हमारे घर, खेती और खलिहानों को चौपट कर जो सपने हमें देखाए जा रहे हैं उसको समझने की जरुरत है. 

एक सभ्य समाज अपने लोगो से बड़ा नहीं होता. एक सभ्य रास्ट्र अपने लोगो की कब्र पर विकास नहीं करता. भारत को एक सभ्य रास्ट्र और एक सभ्य समाज बन्ने के लिए जरुरी है विकास का एक ऐसी अवधारणा जहाँ सबका दिमागी विकास हो जो मनुवादियों के हाथ न मज़बूत करे और बराबरी का समाज बनाये. विकास के नाम पर यदि गरीब की कमर पूरी तरीके से तोडनी है तो फिर उसको मुख्यधारा में कैसे लाया जायेगा और फिर वोह कौन सा उद्योगपति बन पायेगा क्योंकि एक अच्छे बिज़नस और विज्ञानं के लिए भी तो हमें अच्छा माहौल और जीवन के स्थिरता चाहिए और जब हमारे घर और खलिहान उजाड़ रहे हों तो हम इसकी उम्मीद कैसे कर सकते हैं. फिर सदियों तो अपनी जिंदगी को पटरी में लाने में लग जाते हैं. जिन लोगो की जिंदगी पटरी पर है वे थोडा संवेदनशील बने और संघर्ष का सम्मान करें.

Wednesday, 29 August 2012


फैसलों पे गर्व की घडी
विद्या भूषण रावत

उच्चतम न्यायलय ने अजमल कसब की याचिका को खारिज कर उसकी सजा को बरकरार रखा है क्योंकि कसब पर भारत के विढ़द्ध युध्ध छेड़ने का आरोप है और मुंबई के २६ नवम्बर के भयावह काण्ड का वह सरगना था. लेकिन आज ही गुजरात की विशेष अदालत का जो फैसला आया है वोह हिंदुत्व के माठाधीशो को भी मौत के दरवाजे तक पहुंचा सकता है. गुजरात के विशेष अदालत ने बाबु बजरंगी और माया कोदनानी को नरोदा पाटिया हत्याकांड का दोषी पाया है जिसमे १०० से अधिक मुसलमानों का कत्लेआम किया गया. यह घटना मानवता के नाम पर एक कलंक था. आश्चर्य की बात यह की माया मोदी के सबसे नज़दीक लोगो में शामिल थी और उन्हें बच्चो और महिला विकास का मंत्रालय सौंपा गया. ऐसी महिला जिस पर महिलाओ और बच्चो के खून का इलज़ाम हो हिंदुत्व के 'नैतिक' धरातल पर ही फिट बैठती हैं. आज भाजपा जैसी पार्टियाँ जो नैतीकता का लबादा ओढ़े रहती है और संसद तक नहीं चलने देती उसके इतने नेता देश में दंगा फ़ैलाने के और क़त्ल के आरूपों में घिरे हैं लेकिन वहां उनकी नैतिकता धरी की धरी रह जाती है. हिंदुत्व के मठाधीश और उनके चमचे लगातार झूठ बोलकर और मीडिया के जरिये अपने कार्य कर रहे हैं. वैसे भी उनकी राजनीती का मुख्या बिंदु परदे के पीच्चे के काम हैं.

अभी देशद्रोह और देश के विरुध्ध युद्ध छेड़ने की बात हो रही थी. कसब ने देश के विरुद्ध जंग छड़ी और अंत में सुप्रेमे कोर्ट ने उसे माफ़ नहीं किया. नरेन्द्र मोदी और उनके भक्तो ने गुजरात में नो नरसंहार किया वोह माफ़ नहीं किया जा सकता और एक कौम के खिलाफ जहर उगलने से लेकर उसका पूरा खत्म करने के प्रयास किये. देश की एक बड़ी आबादी के खिलाफ दुष्प्रचार क्या देश के विरुद्ध जंग नहीं है? आज हिंदुत्व के सौदागरों से पूछना पड़ेगा के गुजरात और अन्य जगहों पे आग लगाकर क्या वे देशद्रोह का कार्य नहीं कर रहे हैं. 

उम्मीद है के माया कोदानी जैसी महिलाएं हमारे समाज का रोल मॉडल नहीं बनेंगी और उनको भारत की न्याय प्रणाली उसी जगह पर भेजेगी जहाँ कसब बैठा है ताकि दोनों प्रायाषित कर सकें के आज के दौर में भारत की मजबूती का रास्ता पाकिस्तान की मजबूती से भी है और देश में विविध लोगो के साथ रहने में भी है. उम्मीद करते हैं के यह मामले न्याय प्रक्रिया के झमेलों में नहीं फंसेंगे और जल्दी से अपने अंजाम तक पहुँच जायेंगे.  भारत की एकता यहाँ रहने वालो के सामाजिक न्याय और आपसी सौहार्द से बनेगी और वोही २१वी सड़ी के भारत को मज़बूत करेगी. हमारे आपस के रिस्तो को मज़बूत करने का एक ही उपाय है न्याय और कानून का सख्ती से पालन. सांप्रदायिक और जातिवादी शक्तियों को न केवल राजनैतिक तरीके से उखड फेंका हर भारतीय का कर्तव्य है अपितु कानूनी तौर पैर भी उनके अजेंडे का खात्मा करना होगा ताकि एक मज़बूत सभ्य और धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील भारत सभी को साथ लेकर आगे बढ़ सके नहीं तो हमारे समाज की मनुवादी तकते अपने राजनितिक स्वार्थ के लिए सांप्रदायिक जहर फ़ैलाने में कामयाब हो जाएँगी और इसका सबसे बड़ा नुक्सान हमारे अपने समाज को ही होगा. माया कोदनानी जैसी महिलाएं हमारे समाज के लिए कलंक हैं और शर्म हैं और उनके साथ कोई हमदर्दी नहीं होनी चाहिए उन्हें कानून के उन्ही मापदंडो से गुजरना चाहिए जो कसाब या किसी और के लिए हैं.