Friday, 19 July 2013

मौत का कुआँ




विद्या भूषण रावत 


१ ४ जलाय, रविवार की सुबह का वक़्त था और राजेश अपने चार साथियों के साथ इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट में सेवेज लाइन की सफाई के लिए निकल पड़ा . सामान्यतः यह  छुट्टी का दिन होता है और सब लोग घर  पे अपना काम करते हैं लेकिन पैसे के मज़बूरी ने इन चारो को इस दिन भी काम करने को मजबूर कर दिया उन्होंने सोचा थोडा अतिरित्क्त पैसे से घर के खर्चे निकालने में मदद मिल जाएगी। राजेश के साथ अशोक, सतीश और छोटू भी नई दिल्ली स्थित इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट के कैंपस की और निकल पड़े। 

कैंपस में जाकर उन्हें बताया गया के ६ सीवेज टैंक्स की सफाई करनी है जो ए सी प्लांट के पास हैं  इसलिए सुबह से ही उन्होंने काम करना शुरू कर दिया ताकि दिन होते घर निकल जायेंगे। करीब ६ बजे तक उन्होंने ५ टैंक्स की सफाई कर दी थी लेकिन अंतिम पिट की सफाई में हादसा हो गया.  पुलिस उन्हें राम मनोहर लोहिया अस्पताल में ले गयी जहाँ राजेश, अशोक और सतीश को मृत घोषित कर दिया गया. अफ़सोस इस बात का है के सरकार के एक प्रमुख संस्थान के अन्दर हुई इन मौतों की कोई जांच नहीं हुई है और पुलिस और अस्पताल ने सभी को अननोन या लावारिस समझ कर मृतक घोषित कर दिया गया और उनके परिवारों को इस प्रकार से चुपचुपी में सुचना दी गयी के वे सुबह तक ही अस्पताल से शव ले पाए. अगर संसथान में किसी सवर्ण जाती के व्यक्ति की मौत होती या वो जो सफाई का कार्य नहीं कर रहा होता तो क्या पुलिस और अस्पताल का रवैया ऐसे रहता . 

अशोक के घर पर भी मातम है क्योंकि परिवार में दो लडकिय और दो बेटे हैं जो छोटे हैं और वह भी किराये के मकान में रहता है. पांच हज़ार तनख्वाह में से चार हज़ार किराये में निकल जाते हैं और इसलिए वह ढोल बजाने का कार्य भी करता था जिससे थोडा अतिरिक्त आय हो जाती थी. आश्चर्य जनक बात यह के दिल्ली में बी पी एल कार्ड का इंतना हंगामा है लेकिन वो इनमे से एक को भी नसीब नहीं है . 

राजेश के परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटी और एक बेटा है. एक जवान बेटी ,की मौत इस वर्ष में हुई और इसीलिये दूसरी की शादी दो महीने पहले कर दिया. छोटा बेटा शायद पहली कक्षा में पढ़ रहा है और इस वक़्त स्कूल जाने के लिए वर्दी नहीं है इसलिए जाने से डरता है . परिवार पर एक लाख रुपैया का कर्ज था इसीलिए वोह दिन रात काम करता था और शाम को घर वापस आकर फिर देर रात तक रिक्शा चलाता था तो घर का खर्च चलता था क्योंकि तीन हज़ार रुपैये किराये में निकल जाते थे और प्राइवेट ठेकेदार से मात्र पांच हज़ार की तनख्वाह पर वो काम कर रहा था. 
 
तीन मौतों के बाद भी कोई चिंता न तो एम् सी डी ने दिखाई और न ही संस्थान के किसी व्यक्ति ने इन मौतों के लिए कोई अफ़सोस या दुःख व्यक्त किया। ठेकेदार का तो क्या कहना उसका तो कोई पता नहीं। इससे पता चलता है के हमारा समाज सीवर में घुश कर उनकी जिंदगी बचने वाले लोगो को कैसा देखता है. यह इस समाज के पाखंड और झूठी शान की कहानी कहते हैं ,  दिल्ली की शान की पीछे एक समाज की कुर्बानिया हैं और उस समाज को हमने जो इनाम दिया वोह था जलालत और छुआछूत का द्वंश। संभ्रांत भारत उनसे केवल काम लेना चाहता है और उनसे काम करवाना अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानता है . 'अगर वोह यह काम नहीं करेंगे तो कौन करेगा' के सवाल खड़े होते है. ' आखिर हम उनसे मुफ्त में तो काम नहीं करवाते । हमारी खोटी ढोंगी मानसिकता में इस काम की कोई कीमत नहीं और जो पैसा हम देना चाहते हैं वोह भीख की तरह से देते हैं.  
 

पूर्वी दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके में लगभग ५०००० बाल्मीकि रहते हैं और सभी या तो एम् सी डी या एन डी एम् सी, दिल्ली जल बोर्ड अथवा प्राइवेट ठेकेदारों के साथ काम करते हैं. अधिकांश लोगो को न्यूनतम मजदूरी ही नहीं  मिलती और ठेकेदारों के यहाँ भी रजिस्टर में उनका नाम नहीं होता . सरकार और राजनितिक दलो की लापरवाही के कारण से उनकी स्थिति और विकट हुयी है क्योंकि सैनिटेशन के अलावा दुसरे स्थानों में उन्हें कोई काम नहीं मिलता।

सवाल इस बात का है के इतनी मौतों के बावजूद भी हमारा प्रशासन  कुंडली मारे बैठा है और उसे कोई ख्याल नहीं। हम कहते हैं मैला ढोने का काम बंद होना चाहिए लेकिन क्या काम ऐसे बंद होता है . सीवर पाइप में घुसना भी मलमूत्र के कुएं में जाना होता है और मैं तो इसे मौत का कुआ कहता हूँ जिसमे मर कर आपकी जान की कोई क़द्र नहीं और आप लावारिश की मरोगे। यह शर्मनाक घटनाक्रम है. एक पुरे समाज पे यह काम थोपा गया और फिर उसको अपमान से देखकर उसको और जलील करना क्या जाहिर करता है के  सभ्य कहलाने वाले हमारे संभ्रांत लोग निहायत घटिया, असभ्य और क्रूर हैं जो इस प्रकार की घटनाओं को सही ठहराने की कोशिश करते हैं. 

वाल्मीकि समाज की लड़ाई केवल सरकार से आर्थिक मुवावाजे की लड़ाई नहीं है . यह लड़ाई बड़ी है जिसके लिए दलित  आन्दोलन के अन्दर उन्हें जद्दोजहद करनी पड़ती है क्योंकि वहां भी वो हाशिये पे है. समाज को हाशिये पर धकेल दिया गया है और जिंदगी और मौत से रोज के संघर्षो के कारण अन्य किसी बात पर सोचने का वक्त कहाँ ?

हम सरकार से मांग करते हैं के सीवर में हुई इन मौतों की जांच करवाए और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही करे, प्राइवेट ठेकेदार को गिरफ्तार करे और इन  घायल व्यक्ति को सम्पूर्ण मुवाजा दे, उनके परिवार का सम्मानपूर्वक पुनर्स्थापन करे. यह तीनो लोग अपना परिवारों को नै दिशा में ले जा रहे थे ताकि उनके बच्चे यह काम न करें लेकिन इनके 'कातिलो' ने उनके परिवारों को सड़क पर ला खड़ा कर दिया है. आज वो अनिश्चय की स्थिति में हैं जो वहुत खतरनाक होती है और जहाँ से अगला रास्ता केवल उनके शोषण का होता है . मानवाधिकार आयोग, दिल्ली सरकार इन पर कार्यवाही करे और इन परिवारों की पूरी जिम्मेवारी ले क्योंकि इन मौत के लिए सरकार और उसका तंत्र जिम्मेवार है . यह मौते असल में हत्या हैं और उन सभी लोगो पर हत्या का मुकदमा चलना चाहिए जिन्होंने इन सभी को मौत के इन कुओं में धकेला।

हमारे एक पाठक ने अंग्रेजी में लिखे मेरे लेख पर अपनी टिपण्णी में लिखा के ' अब सरकार को सफाई का कार्य भी बंद करवा देना चाहिए'. यह एक अस्वेंदंशील टिपण्णी है क्योंकि सवाल यह है के यदि सफाई का कार्य करते ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया, जैन, मारवाड़ी या कोई और इन मौत की कुओ में घुसता तो आज तक दिल्ली की सडको में मानवाधिकार के उल्ल्लान्घन के नारे गूंजते। आखिर एक समाज विशेष यह काम क्यों करे? आखिर देश में, घरो में सफाई का ठेका एक समाज विशेष क्यों ले और फिर जव सफाई में पैसा आ गया तो दुकान का ठेकेदारी इन लोगो के पास नहीं लेकिन काम की जिम्मेवारी इनकी। दूसरी बात, सीवर लाइन में घुसने से हर वक़्त मौते हो रही हैं और सरकार बताये के मरने वालो को अभी तक क्या दिया ? सफाई के काम को बंद करने को कोई नहीं कहता लेकिन उसको करने की जिम्मेवारी एक समाज की क्यों? और उसके करने पर मरने वाले लावारिश की तरह क्यों छोड़ दिए जाते हैं ? हमारे पाखंडी, दकियानुशी समाज को इसका जवाब देना होगा ? 

Wednesday, 17 July 2013

अपराधी बनाने की तरकीब


विद्या भूषण रावत 

परसों शाम महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ के छात्र नमोनारायण मीणा ने मुझे फ़ोन किया तो उनकी आवाज में एक अजब सा तनाव था। 'सर हम लोगो को सी आर पी ऍफ़ ने गिरफ्तार कर लिया है', उन्होंने कहा ? मुझे समाझ नहीं आया तो मैंने पूछा क्यों और तुम कहाँ हो ? 'हम ८ छात्र बनारस से पूर्वी चम्परान आये हुए हैं और एक कार्यक्रम में शिरकत कर रहे हैं। इस गाँव में हमारा सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था. मुझे ध्यान है नमोनारायण इस सांस्कृतिक ग्रुप के विषय में मुझसे अक्सर चर्चा करते हैं और मैंने भी हमेशा कहाँ के थिएटर और नुक्कड़ नाटको के जरिये हम अपनी बात को अच्छे से समाज में पहुंचा सकते हैं। नमो नारायण ने बस इतना कहाँ के सर हम केवल आपको जानकारी दे रहे हैं ताकि साथियों की जानकारी में रहे के वे कहाँ हैं और किन परिस्थितियों में गिरफ्तार हुए है। मैंने उनसे कहाँ के मुझे जानकारी दे के क्या स्थिति है ताकि मैं लोगो से संपर्क कर सकूं। रत में करीब साढ़े नौ बजे पुनः नमो नारायण का फ़ोन आया और अबकी बार तनाव उसके चेहरे पे साफ़ पढ़ा जा सकता था। सर, यह लोगो हमको कही ले जा रहे हैं और हमें कुछ बताया नहीं जा रहा . चारो तरफ अँधेरा है और जंगल है। मैंने उनसे पूछा के क्या इन लोगो ने तुम लोगो से मार पिटाए हुई क्या तो पता चला के अच्चे से की गयी। खैर मैंने कहा के थोड़ी देर में मैं बिहार के अपने साथियों से फोन पर बात कर इन छात्रो तक पहुचने की कोशिश करता हॊ क्योंकि ८ या ९ छात्रो को इस तरीके से पुलिस कहाँ ले जा रही है इसकी जानकारी होनी चाहिए . पटना, चंपारण सभी जगह कोशिश की मित्रो को पकड़ने के लेकिन कामयाबी नहीं मिली फिर खालिद भाई से संपर्क किया तो पता चला वोह भी दिल्ली से बहार है लेकिन उन्होंने अली अनवर साहेब से बात करली थी और हमने भी अली अन्वर जी का संपर्क नमो नारायण को दे दिया। मैंने सोचा के जब ये लोग अपने गंतव्य पर पहुँच जाएँ तो फिर बात करूंगा लेकिन यह क्या रत के साढ़े दस के बाद फ़ोन स्विच ऑफ जा रहा था। मैं जानता हूँ पुलिस वाले फ़ोन, लैपटॉप पहले ले लेते हैं और बात भी बाद में करेंगे पहले पिटाई करते हैं इसलिए मेरी चिंता बढ़ गयी।

सुबह फिर कोशिश की लेकिन कोई संपर्क नहीं हुआ तो नमो नारायण के साथी पंकज गौतम से बात हुई और उन्हें भी इस विषय में बहुत जानकारी नहीं थी। इस पुरे मामले की सबसे ख़राब बात यही थी के किसी को भी जानकारी नहीं दी गयी थे। खैर पंकज ने मुझे बताया के वह साथियों से संपर्क करके पता करेगा और मुझे जानकारी देगा। वैसे थोडा बहुत उसे पता था के यह लोग बिहार गए हैं। दोपहर में पंकज ने मुझे बताया के इन लोगो को गया लाया गया है और शायद दोपहर तक छूट जायेंगे। लेकिन दोपहर में भी फोन पर नमोनारायण से बात नहीं हो पाए और अंततः छूटने के तुरंत बाद उन्होंने मुझे फोन किया तो मैंने ये प्रश्न ही पूछा के तुम्हारा फोन बंद क्यों था तो उसने बता दिया के जिस वक़्त वह अली अनवर जी से बात कर रहा था और उन्हें जानकारी दे रहा था एक पुलिश अधिकारी ने वोह बात होने नहीं दी और फोन छीन लिया और उसके बाद से ही उसे बंद कर दिया गया।

खैर इस घटना की कड़ी निंदा की जानी चाहिए क्योंकि यह सभी छात्र समाज बदलाव के लिए अपनी हैसियत के मुअत्ताबिक कुछ करना चाहते थे और उन्हें गिरफ्तार किया गया और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया गया और मार पिटाई की गयी। पुलिस ने तो अखबारों को भी बताया की इन लोगो को माओवादी बताकर पकड़ा गया है. फिलहाल यह लोगो को मोतिहारी में ले जाया गया और शाम तक छोड़ दिया गया है .

मैं सभी साथियों से अनुरोध करता हूँ के अपने काम के प्रति उद्देश्यों को कम न करें लेकिन बहुत सावधानी से काम करे। सभी के संपर्क में रहे और स्थानीय संघठनो का सहयोग ले. कही भी ऐसे ही मत जाइये और सभी साथियों को अपने पुरे कांटेक्ट दीजिये . भारत की पुलिस और प्रशाशन आपके विचारो से डरता है। वोह चाहता है आप कुआ खोदे, सड़क बनाएं खडंजा बनवाए, कंडोम बेचें, दूकान लगवाएं, 'भलाई' करें लेकिन आप कोई विचार न दें।। यह विचार से डरने वाले लोग हैं और हमें देखना है की कैसे हम अपने जनमानस को तर्कशील और राजनैतिक तौर पर परिपक्व बना सकें। सभी साथियों को ऐसी घटनाओं की कड़ी निंदा करनी चाहिए क्योंकि अगर इन सभी साथियों के नाम इमरान, सुल्तान मोहम्मद या कुछ और होते तो मैं शर्तिया कहता हूँ के लश्कर, इंडियन मुझाहिदीन या कोई और कह दिया जाता और अगर एनकाउंटर हो जाती तो आश्चर्य नहीं होना चहिये। यह समय है संविधान प्रदत् अधिकारों को मांगने का और उन्हें लागू करवाने का। हम एक मिलिट्री राज्य बन रहे हैं और सत्तारूढ़ तकते यही चाहती हैं के हमारे विचारो की धार कुंद हो जाए और हम पूंजी और धर्म के धंदे में फंसकर इनकी शरण में नतमस्तक रहे।

Thursday, 11 July 2013

जज साहेब कृपया सांप्रदायिक पार्टियों और धार्मिक आयोजनों पर भी रोक लगे क्योंकि मेरी भावनाएं आहत होती हैं



विद्या भूषण रावत 



जातीय आयोजनों पर हाई कोर्ट ने रोक लगा दी लेकिन उत्तर  प्रदेश में हिंदुत्व का सांप्रदायिक अजेंडा चलता रहेगा और गुजरात के सांप्रदायिक दंगो के अपराधी उत्तर प्रदेश को गुजरात बनाने की फिराक में हैं। क्या अल्लाहाबाद हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट देश में सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने  वाली ताकतों के खिलाफ कुछ कठोर कदम उतायेगा। क्या राम मंदिर के नाम की दूकान पर राजनीती करने वालो को अयोग्य घोषित करने की ताकत हमारे न्यायालयों में है और यदि हाँ तो क्या 'न्यायालय' का सम्मान करने की हिम्मत हिंदुत्व के लठैतो में आएगी। जातिगत सम्मलेन बंद होने पर ऐसे खुश हो रहे हैं मानो कुछ मैडल मिल गया हो लेकिन अगर अभी सावन के नवरात्रों में जो विभस्त शोर और नौटंकियाँ हम संस्कृति के नाम पर देखते हैं उन्हें बंद कर दिया जाए तो सारे प्रगतिशील लोगो को सांप सूंघ जायेगा। इसलिए महामना न्यायाधिशो से ज्यादा उम्मीद न करें असल में वोह भी राजनीती कर रहे हैं और हमारे पार्टियाँ उनका और वे पार्टियों का मज़ा ले रहे हैं . अगर कोर्ट का फैसला हमारे हिसाब सो हमारे न्यायलय महान और नहीं हो 'विचार' किया जायेगा। राजनैतिक अवसरवादिता और अस्थिरता का लाभ वो संस्थाएं ले रही हैं जिनकी सामजिक न्याय में कोई आस्था नहीं है। आरक्षण और भूमी सुधार और उसका पुनर्वितरण सामाजिक न्याय और सत्ता में भागीदारी के सबसे बड़े हथियार हैं लेकिन  इन दोनों ही महत्वपूर्ण प्रश्नों  पर हमारे न्यायालयों का द्रष्टिकोण बहुत ही निराशावादी रहा है . मीडिया और सामाजिक न्याय विरोधी  इन बातो  का आनंद लेती हैं। न्यायधिशो को भी पता है के कई मामले हमारी सत्तारूढ़ तकते 'राजनैतिक' 'मजबूरी' के नहीं कह सकती इसलिए उनके हस्तक्षेप के बाद मामला बदल जाता है। 

मैं तो माननीय न्यायाधिसो से आग्रह करूंगा के सावन के   में,  दशहरे में और दिवाली में  जो शोर होता है उसे रोकने के आदेश दे। जो हमारे अन्दर आस्था का  जबरन घुसाया  जाता है उसे रोकने के इंतज़ाम  करें .  बुजुर्ग लोग या बीमार  जिन्हें शोर या प्रदुषण से दिक्कत होती हैं उनकी भावनाएं भी समझे। पुरे त्योहारों में जो नुक्सान छात्रो को होता है वो समझे और नवरात्रों में 'भंगेड़ी' और लठैती में माहिर इन भक्तो की  मनमानियों को रोके जो हरिद्वार से दिल्ली के रस्ते में  होती हैं। क्या एक  तरफ का रास्ता बंद करना उनलोगों के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं है जो इन ढकोसलो को नहीं  मानते। 

क्या हमारे न्यायाधिश धर्म के राजनैतिक डकैतों पर  प्रतिबन्ध लगायेंगे जिन्होंने अपनी सत्ता के लिए देश में सांप्रदायिक दंगे करवाए जिसमे हजारो लोगो की जाने गयी . क्या उतर प्रदेश में सांप्रदायिक राजनीती का जो खेल चल रहा है उस पर हमारे मान्यवर न्यायाधीश  कुछ आदेश देंगे देंगे . क्या गुजरात के दंगो के  जिम्मेवार लोगो की राजनीती पर  प्रतिबन्ध नहीं  लगना चाहिए ? क्या बाबरी मस्जिद को गिराने वाले जेल के सींखचो के पीछे नहीं होने चाहिए  लेकिन उनके हौसले बुलंद हैं और वोह 'राम मंदिर' के निर्माण की बात कर रहे है . इस देश में साम्प्रादायिक दंगो को फ़ैलाने वाले ठेकेदारों के लिए क्या कोई फैसला आएगा और क्या धर्म के नाम पर देश को बर्बाद करने वाले पार्टियों पर तुरंत प्रतिबन्ध नहीं लग्न चाहिए। उम्मीद है हमारे न्यायलय कुछ सोचेंगे और हमारी सरकारे भी ध्यान देंगी। साम्प्रादायिकता एक  भयावह अपराध है और देशद्रोह है क्योंकि ये हमारी संवैधानिक मर्यादा के विरुद्ध है लेकिन उसके लम्बरदार खुले में घुम्र रहे हैं और हमारा अजेंडा बना रहे हैं। क्या इस देश के लिए इससे बड़ी कोई शर्म की बात हो सकती है के हज़ारो लोगो के कत्ल के जिम्मेवार जेल जाने की बजाय ७  रेस कोर्स रोड में बैठने के सपने देख रहे हैं। हमारे न्यायालयों को बहुत की सावधानी से विचार करना चाहिए ताकि उनके फैसलों को तोड़मरोड़ कर  न किया जा सके। फिलहाल इलाहबाद हाई कोर्ट के फैसले का विस्तार होना चाहिए तभी यह एक निष्पक्ष फैसला माना जायेगा नहीं तो जातिवाद ख़त्म करने की जिम्मेवारी यदि साम्प्रादायिक लोगो के  हाथ में आ गयी तो देश का बहुत नुक्सान होगा। हकीकत यह है के जातीय असिम्ताओ के चलते ही सांप्रदायिक शक्तियों पर रोक लग पायी क्योंकि गुजरात मध्य प्रदेश राजस्थान आदि स्थानों पर सांप्रदायिक ताकतों ने जातीय अस्मिताओ को दबा दिया और मुसलमानों के विरुद्ध इस्तेमाल कर दिया इसलिए यह प्रदेश साम्प्रदायिक राजनीती से प्रभावित हैं . देश को सांप्रदायिक राजनीती और उनके घृणा की राजनीती से बचने में उत्तर प्रदेश और बिहार की 'जातिवादी' जनता के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता जिनकी बदोलत हिंदुत्व का देश पर राज करने का सपना कभी कामयाब नहीं हो पाया। 

जातिवाद को ख़त्म करने में किसकी दिलचस्पी है ? केवल चुप रहकर और छुपाकर जातीयता के कोढ़ को ज्यादा समय तक छुपाया नहीं जा सक्त. जाति ख़त्म हो गयी तो तथाकथित 'धर्म' खत्म. क्या कोर्ट हिन्दू धर्म को खत्म करना चाहेगा क्योंकि उसकी बुनियाद ही जाती है। हम तो चाहेंगे के कोर्ट एक निर्णय और देदे के जातिवाद को खत्म करने के लिए देश के बड़े बड़े मंदिरों में जो एक जाति की जो ठेकेदारी है उसे तुरंत समाप्त करे और यहाँ के  सब मंदिरों   पर हो रही आय पर   भक्तो का  कब्ज़ा हो . कोर्ट ये निर्णय भी दे मलमूत्र साफ़ करने का ठेका एक विशेष जाती के लोग क्यों करें . क्या हम तैयार हैं इन सब बातो से लड़ने के लिये.  दुर्भाग्य के हमारी राजनैतिक  अवसरवादिता के चलते ऐसे निर्णय आयेंगे और सांप्रदायिक पूंजीवादी  शक्तियां उसका लाभ उठाने के लिए तैयार बैठी हैं .

Dangerous Idea of Dera Sachha Sauda regarding Women's of Uttarakhand who lost their Husbands



डेरा सच्चा  सौदा के 'महात्मा' का कहना है के उनके १५ ० ० अनुयायी उत्तराखंड की त्राशादी में विधवा हुयी महिलाओं के साथ विवाह करने को तैयार हैं। सवाल इस बात का है के क्या यह एक क्रांतिकारी कदम है या बाबा उत्तराखंड में पूरा दफ्तर बनाना चाहते हैं . क्या किसी ने इन महिलाओं से पुछा और उनसे बात भी की के उनकी क्या समस्या हैं ? क्या इन महिलाओं की घरेलु जिनदगी की और किसी का ध्यान गया? क्या बाबा की बात में यह नज़र नहीं आता के महिलायें पति के बिना 'अबला' नहीं  हैं और उन्होंने संघर्ष किया हैं , । पहाड़ो में जिन्दगी बहुत कठिन है लेकिन महिलाओं ने अपना संघर्ष किया है और वो पुरुषो से अधिक काम करती रही हैं इसलिए उनको अबला कहना अपमान है। भारत के समाज में महिलाओं के साथ जो  हुआ है उस अपमान को आप पुनः परंपरा के खूंटे से ना बंधे तो अच्छा होग. हम तो चाहते हैं के महिलायें अपने दर्द को भुला कर अपनी जिंदगी को पुनः शुरू करें और जो मदद सर्कार और समाज को करनी है वोह करें। यह बहुत ही बेवकूफी की बात होगी की अभी घटना को घटे एक महिना भी नहीं हुआ है और हम शादी के प्रपोजल लेकर वहां पहुंचे ? शायाद पुरुषवादी मानसिकता का नतीजा है के अभी से महिलाओं के बारे निर्णय ले रहे हैं और उन्हें लग रहा है जैसे बहुत बड़ी क्रांतिकारी बात कर रहे हो . हम तो चाहेंगे के समय आने पर महिलायें स्वयं इनका निर्णय लें और यह तभी संभव होगा जब वे सार्वजानिक जीवन में आयें और समाज उनको उत्साहित करे. किसी भी समाज में बदलाव के लिए बाहर से 'क्रांतिकारियों' को आयात करने की आवश्यकता नहीं है . हमें उम्मीद है के उत्तराखंड के अन्दर भी ऐसे जुझारू साथी होंगे जो समय आने पर सही निर्णय ले सकते हैं लेकिन महिलाओं को 'अबला' समझकर एहसान करने वालो से सावधान रहने की जरुरत है खासकर वो लोग जो धर्म की दुकानदारी लगाकर अपना व्यापार आगे बढ़ाना चाहते हैं ।  उत्तराखन्ड में महिलायें किसी भी दुसरे प्रान्त से बेहतरीन स्थिथि में हैं और अपने अधिकार जानती हैं। यह वो जगह हैं जहाँ साक्षरता और लिंग अनुपात रास्ट्रीय औसत से ज्यादा है इसलिए हमारे क्रन्तिकारी बाबा यदि समाज की मदद करना चाहते हैं तो अच्छा लेकिन अहसान और भीख देने की कोशिश न करें तो बेहतरीन होगा।

आइये एक दिया जलाएं इल्वारसन की याद में



विद्या भूषण रावत 

तमिलनाडू की धर्मपुरी जिले में रहने वाले इल्वार्सन  ने प्यार करके शायद बहुत बड़ा गुनाह कर दिया क्योंकि जिले के वन्नियार लोगो ने उनकी दलित बस्ती को जल दल और उसके प्रेमिका दिव्या के पिता ने अपनी बेटी के इस विद्र्हो से डरकर आत्महत्या कर ली। और फिर दवाब और ब्लैकमेल की इस पूरी व्यवस्था ने अंततः इल्वारासन की जान भी ले ली। हालाँकि मामला कोर्ट में है और इल्वारासन के माता पिता ने दोबारा पोस्ट मार्टम की मांग की है लेकिन इस घटना ने हमारे समाज के विभत्स सच को उजागर कर दिया के जाति व्यवस्था की जड़े हमारे दिमागो में कूट कूट कर भरी हुयी है और उसको थोडा से भी छेड़ने पर मौत की सजा के आलावा और कुछ नहीं है और हमारी सेक्युलर दिखने वाली सरकार और उसका प्रशाशन कुछ नहीं कर पाटा क्योंकि हकीकत यह है सेकुलरिज्म केवल किताबी बाते है क्योंकि कानून लागु करने वाले मनु के चेले उसको नहीं मानते और यह भी सोचना जरुरी है के ब्राह्मणवाद को बचने की लड़ाई अब केवल ब्राह्मणों या सवर्णों के हाथ में ही नहीं है अपितु शुद्रो को तो उसकी सबसे बड़ी जिम्मेवारी दी गयी लगती है। यह ही हिंदुत्व का अजेंडा है और जरुरत है के हम एक मानववादी समाज की स्थापना की बात कहें जो हमारे संविधान के मूल्यों को ईमानदारी से लागु करके ही संभव है .

आज हमें स्वयं से सवाल पूछने हैं क्योंकि यह वक्त चुप रहने का नहीं है और न ही दुसरे को दोष देने का ? हम अपने लेवल पर एक सभ्य समाज बनाने के लिए क्या कर रहे हैं ? जातिवादी व्यवस्था का शिकार बने इल्वार्सन के लिए क्या हम कोई कैंडल लाइट मार्च कर सकते हैं ? भारत की वर्णवादी व्यस्था का सबसे कटु सत्य है जातिवाद और उसके सहारे राजनीती करने वाले लोग. इस हत्या ने तमिनाडु की 'द्रविड़ियन' राजनीती की भी पोल खोल दी है जो गैर ब्राह्मणवाद के नाम पर शुरू हुयी थी और जिसने दलितों को और अधिक हाशिये पर दखेल दिया। 

पिछले पचास वर्षो से बदलाव की बात करने वाले तमिलनाडु में एक दलित लड़के का वन्नियार यानि पिछड़ी जाती की लड़की के साथ प्रेम सम्बन्ध अगर दलितों के घर जलाने और अंत में  इल्वारासन की मौत से होती है तो मामला गंभीर है और तमिलनाडु सरकार को इस पर कार्यवाही करनी चाहिये। शर्मनाक बात यह है के एक तरफ हमारा संविधान कहता है हमें आधुनिक बनना है और दो बालिग युवक युवतियों को अपनी मर्जी से शादी करने की अनुम्पति होनी चाहिए लेकिन हमारा समाज इसके लिए तैयार नहीं है. 

हम सभी जातियों के उन्मूलन की बात करते हैं और वो बाबा साहेब आंबेडकर का सपना था और यही पेरियार का सपना भी था लेकिन यह बात समझ में नहीं आती के उसका उन्मूलन कैसे होगा यदि हमारा समाज अपने पूर्वाग्रहों को समाप्त करने के लिए तैयार नहीं है। दुखद बात यह है के इन पूर्वाग्रहों की बुनियाद पर बहुत से नेता अपनी दूकान चला रहे हैं यह वो दल हैं जो मंडल कमीशन के समय दलित बहुजन एकता का नारा देते हैं और इन्हें पता है के मंडल की सबसे बड़ी लड़ाई पिछडो ने नहीं दलितों ने लड़ी। आज सवाल इस बात का है के अपने को पिछड़ी जातियों का नुमैन्दा कहने वाली यह पार्टियाँ क्यों ऐसी घटनाओं का विरोध नहीं करती। जातिवाद का विरोध केवल ब्राह्मणवाद के नाम पर ब्राह्मण विरोध से नहीं हो सकता अपितु हर प्रकार के कट्टरवाद और यथास्थिति वाद के विरोध से करना पड़ेगा। यह भी जरुरी है के हम सभी को अपने युवाओं को अपने साथी चुनने की आज़ादी देनी होगी तभी जातिवाद और वर्णव्यस्था टूटेगी अन्यथा शादिय और प्यार केवल दुनिया को दिखने के लिए नहीं होता और कोई भी व्यक्ति केवल अंतरजातीय विवाह करने के लिए स्वयं तैयार नहीं होंगे। वर्णव्यस्था का सबसे बड़ा खेल पित्र्सत्ता की सर्वोच्चता और महिलाओं की 'पवित्रतता' है और इन सिद्धांतो पर हमला करे बगैर हम कभी एक सभ्य समाज की स्थापना नहीं कर सकते। सभी ब्रह्मवादी शक्तियों को गरियाते हैं लेकिन यह भूल जाते हैं की सामंतवाद की यह विचारधारा किसी के जरिये भी आ सकती है और इसलिए इसे समाप्त करने लिए एक बेहतरीन विचार की जरुरत होगी।

इल्वारासन की मौत अपने प्यार के लिए हुऎ चाहे वो आत्महत्या हो या हत्या क्योंकि दोनों ही मामलो में उस पर समाज का दवाब था और सरकार उसे सुरक्षा नहीं प्रदान कर पाई . क्या हम ऐसी कुर्बानियों को बेकार जाने देंगे जो हमारे देश के वर्णव्यस्था को तोड़ने का सबसे बड़ा साधन है . आइये प्यार पर कुर्बान इस जांबाज़ साथी की याद में एक रौशनी जलाएं। क्या हम तैयार हैं ? क्या हम जातिवाद के इस खतरनाक किले को तोड़ने के लिए तैयार हैं ?  

Thursday, 23 May 2013

Akhilseh Yadav's dangerous decision..




बहुजन मूल्यों की लड़ाई जातिवादी नहीं अपितु एक वैचारिक लड़ाई है। 

विद्या भूषण रावत 

कुछ दिनों पूर्व  एक सम्मलेन में एक मित्र ने मुझसे कहा के हमें अपने नेताओं की आलोचना नहीं करने चाहिए ?' क्या ब्राह्मणों ने डकैती और लूटपाट नहीं की? आज हमारे नताओ पर थोडा सी आरोप लग जाते हैं और हम उनकी निंदा शुरू कर देते है', मित्र मुझे समझा रहे थे. वैसे पिछले कम से कम बीस बर्षो से से तो मैं ऐसे ज्ञान सुन सुन के पक भी गया हूँ . मतलब थप्पड़ जब 'दूसरा' मारे तभी वोह निंदनीय है और जब 'अपने' लूटें तो वोह समाज का है. सबसे बड़ी बात यह है के यह 'अपना' किस को लूट रहा है ? अगर अम्बानी, प्रेमजी, गोयल, अग्रवाल साहेब से पैसे खींच कर समाज में लगा सके तो फिर भी बात चलती लेकिन अपने ही लोगो को लूट कर कौन सा कमाल कर रहे हो. हम सुन रहे हैं के देने वाले हो गए है। और हमारे लोकतंत्र में अब आस्था बढ़ चुकी है। हमें प्रवचन दिए जा रहे हैं के अब हम देने वाले हैं तो जलन काहे कि। अरे भाई देने वाले हो तो देदो न गरीबो को उत्तर प्रदेश, बिहार में जहाँ हमारे पास सत्ता है. अगर दलित बहुजन सब एक हैं तो हम प्रयास क्यों नहीं करते जो शाशन कर रहे हैं उनको समझाने का के भाई एक हो जाओ. अगर चीजे इतनी आसान हैं तो शरद को बी जे पी के पास बैठकर क्या हमें नहीं लगता के वहां नहीं होना चाहिए था.. अगर सब ठीक हैं तो उत्तर प्रदेश में जो दलित और मुसलमानों के साथ इस वक़्त हो रहा हैं वो क्या सही है ? हम तो जानते हैं के मुलायम, माया, लालू, पासवान, नितीश, शरद कम से कम एक होकर यूपी बिहार तो नियंत्रण कर सकते हैं और दिल्ली की सत्ता पे अपनी पकड़ मज़बूत कर सकते हैं लेकिन क्यों नहीं करते और जो प्रवचन  देते हैं वोह भी जानते हैं के यह इतना आसन नहीं क्योंकि जातियों का नाम लेकर परिवारों की राजनीती हो रही है. और हम कहते हैं के कांग्रेस भाजपा कर रही है तो हम क्यों नहीं करते .. भाई अगर वोही करना है तो डुप्लीकेट को क्यों कोई वोट दे। बाबा साहेब आंबेडकर ने तो नई दिशा दी, नया मंत्र दिया और अपने विकल्प को सोचा, लोहिया ने भी अपना विकल्प दिया। उन्होंने ने कांग्रेस या ब्रह्मंवादियों की नक़ल करने का प्रयास नहीं किया और कोई भी उनपर भ्रस्थ्चार के एक छोटा सा आरोप भी नहीं लगा सकता। कांशीराम ने भी परिवार को दूर रखा ताकि आन्दोलन को ताकत मिल सके और भाई भातिज्ज्वाद से बाख सके. दलित बहुजन आन्दोलन को परिवारवाद से सबसे बड़ा खतरा है और बहुजन के नाम पर परिवारों की राजीनति और कुछ नहीं ब्राह्मणवादी षड़यंत्र है ताकि विचार ख़त्म हो जाएँ और हम उस व्यवस्था को धोने वाले सबसे बड़े लोग बन जाएँ 

  अब अखिलेश की सरकार ने लखनऊ के  प्रेरणा स्थल और अन्य ऐसे स्थलों को जिन्हें मायावती सरकार ने बनवाया था, किराये पैर देने का फैसला किया है. यह निर्णय शर्मनाक है और जान बुझकर  लिया गया ताकि दलितों को चिढाया जा सके। उत्तर प्रदेश की सरकार लगातार ऐसे कदम उठा रही है जो दलित विरोधी हैं और जिन पर हम सभी को शर्म आती है। आपस में राजनैतिक मतभेद होना कोई बुरी बात नहीं लेकिन मतभेदों के नाम पर क्रांतिकारी सामाजिक विचारको और चिन्तको का अपमान नहीं क्या जा सकता। अखिलेश यादव को शायद आंबेडकर, फुले, शाहूजी महाराज या रमाबाई आंबेडकर के योगदान की जानकारी नहीं है या वोह इन लोगो को केवल एक जाती बिरादरी से जोड़कर देख रहे हैं। हमारे देश के दुर्भाग्य है के अभी तक हमे ऐसे लोग नहीं मिल पाए जो अपने इतिहास को जनता की नज़र से देखे। क्या ऐतिहासिक स्थलों पर शादी, ब्याह और अन्य कार्यक्रम करने की अनुमति दी जानी चाहिए ? क्या हम राजघाट, ताजमहल लालकिला और अन्य स्थलों को भी ऐसे ही इस्तेमाल कर पाएंगे। मायावती सरकार ने इन स्मारकों को बनाने में बेइन्तेहा पैसा खर्च किया और लोकायुक्त ने उस पर टिपण्णी भी की है और खर्चो पे सवाल उठ सकते हैं लेकिन स्मारकों की महतता और उनकी जरुरत पे सवाल नहीं खड़े किये जा सकते क्योंकि वे देश प्रदेश की लाखो लोगो को प्रेरणा देते हैं जिन्होंने जातिभेद और छुआछूट के विरुद्ध संघर्ष किया अतः मायावती के पैसे पर सवाल खड़े कर सकते हो उनके स्मारकों पर नहीं क्योंकि वे सभी अब जनता का हिस्सा हैं और लोगो को उनके इतिहास की जानकारी मिलेगी जो ब्रह्मनिया तंत्र में समाप्त कर दिए गए है। मान्यवर मुलायमजी अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे और अखिलेश जी को मार्गदर्शन करें के दलित बहुजन नायको का विरोध करना महंगा पड़  सकता है. 

अखिलेश और मायावती परशुराम जयंती के कार्यक्रम करें या नहीं कोई दिक्कत नहीं है. वैसे अखिलेश और मायावती में अंतर है क्योंकि बसपा अम्बेडकरवाद की बुनियाद पर बनी पार्टी है और वोह ब्राह्मणवादी परम्पराओं और कार्यक्रमों का समर्थन नहीं कर सकती। दिवाली, दसहरा होली, राखी इत्याद्दी पर शुभकामनायें देना कोई समस्या नहीं लेकिन परशुराम जयंती मनाना तो बिलकुल ही अत्म्सम्पर्पण है क्योंकि यह तो जुम्मा जुम्मा ५-१० वर्ष पुराना नुख्सा है। अखिलेश को आंबेडकर जयंती मानाने या बुद्धापुर्निमा मानाने से कौन रोकता है ? मूलनिवासी बोलकर चिल्लाने वाले क्यों नहीं सिखाते उन्हें के बुद्ध, रविदास और कबीर इस देश की सबसे ताकतवर विरासत हैं। क्यों नहीं मुलायम सिंह को बताया जाता के फुले, आंबेडकर, पेरियार, शाहूजी महाराज ने हमारे समाज को जोड़ने और उसे नयी दिशा देने में कितनी बड़ी कुर्बानियां दी। क्या मूलनिवासी होना ही हमारे सही होने का संकेत है ? माफ़ कीजियेगा हमारी लड़ाई को एक वैचारिक स्वरुप दीजिये मात्र जातिवादी स्वरुप देकर लड़ाई लड़ने का कोई लाभ नहीं क्योंकि यह जातिवाद देश की बहुसंख्यक आबादी के मध्य की करने की तैयारी है ? हिंदुत्व के नए लंबरदारो के जातीय चरित्र को देखकर यदि हमें उनके पिछड़े होने में गर्व है तो यह हमारा मानसिक दिवालियापन ही कह्लायेगा. जो पिछड़े मोदी पर गर्व कर सकते हैं वोह कितने बहुजनवाद के समर्थक हैं इस पर बिलकुल शक है. 

एक राजनैतिक कार्यकर्ता को सवाल करने चाहिए चाहे 'अपने' से हो या पराये से।। वैसे जिन 'ब्राह्मणों' और 'सवर्णों' को हमारे नेता 'दे' रहे हैं उनकी कोई विचारधारा नहीं है। उनके केवल अपने 'हित' हैं और वे 'अपने' 'हित' के वास्ते 'पार्टियों' में आते हैं और उसकी पूर्ति होने पर चले जाते हैं और हम .. वहीँ के खड़े रह जाते हैं ..सारी दुनिया का बोझ हम उठाते है।। राजनैतिक कार्यकर्ता चुचाप सहन नहीं करते वे  सवाल करते हैं और अपने नेतृत्व को अपनी जनता से दूर नहीं होने देते. कांशीरामजी का चमचा युग दुसरो के लिए ही नहीं अपितु 'अपने' लिए ज्यादा था इसलिए चमचो से सावधान। 

Thursday, 7 March 2013

धार्मिक सत्ता को चुनौती दिए बिना हमारी आज़ादी असंभव



विद्या  भूषण  रावत 

महिला दिवस पर यदि हमें  भारतीय महिलाओं की ताकत का सम्मान करना है तो सबसे पहले उन प्रश्नों को देखना पड़ेगा जिस के विरूद्ध लड़ते लड़ते उन पर हमले होते है। इसलिए अमेरिका की पहली महिला  उस अनाम महिला को सम्मान देने के पीछे कॉर्पोरेट और अमेरिकन साम्राज्यवादी प्रपंचो के अलावा कुच्छ नहीं है जिसका नाम लेने में अब भी हम डरते है. किसी महिला पे हिंसा होती है तो उसका वह विरोध  करेगी क्योंकि जहाँ पर हमारे राज्य को सुरक्षा प्रदान करनी है वह वो असफल है. 

आखिर क्यों नहीं अमेरिका या भारत सरकार सोनी सोरी का सम्मान करती है जो इतने उत्पीदन के बावजूद भी लड़ रही है, अपनी इज्जत के लिए और अपने समाज के अधिकारों के लिये. क्यों नहीं भारत सरकार इरोम शर्मीला का सम्मान करती है जो अपने समाज के लिए लड़ रहे हैं, उसके मानवधिकारो की रक्षा के लिए संघर्षरत है. क्या भारत के मीडिया को पता है के दिल्ली के बलात्कार कांड से पहले बिहार में चंचल पासवान पर हमला हुआ है और चंचल ने किस बहादुरी से अपना संघर्ष किया है लेकिन अभी उसको अपने इलाज़ के लिए भी पैसा इकठ्ठा करने के लिए संघर्ष करना पड  रहा है और उस पर एसिड से   हमला करने वाले सरे आम उसको धमकी दे रहे है। 

फूलन को अपराधी कहने वाले भूल जाते हैं के फूलन ने अपने पर  हुई हिंसा का जवाब दिया। वह सर छुपाकर या कुंए में कूदकर मर नहीं गयी और इसके लिए बहुत जज्बा चाहिए होता है. फूलन ने लड़ना स्वीकार किया मरना नहीं और इसलिए उसकी बहादुरी की कहानी हमारे हर बच्चे  को बताई जानी चाहिए। आज मायावती ने किस तरीके से संघर्ष किया वोह भी हमारे छात्रो को पता होना चाहिए इसलिए के मायावती और सुषमा स्वराज में बहुत अंतर है. सुषमा को कभी भी नारीवादी नहीं कहा जा सकता क्योंकि वो ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को हमारे उपर थोपने का ब्राहणवादी  षड़यंत्र है। यह जानना आवश्यक है के मात्र महिला होना महिला हितो की बात करने वाला नहीं हो सकता क्योंकि आज पूंजी के युग में धार्मिक सत्त्तायें गुलाम बनाने के लिए उनके ही 'प्रतीकों' का इस्तेमाल करती हैं इसलिए दक्षिण एशिया में महिलायें प्रधानमंत्री हुए हैं, राजनैतिक दलो की अध्यक्शायें बनी हैं लेकिन उन्होंने महिलाओं के लिए कुच्छ किया नहीं क्योंकि वो अपने पदों पर मात्र पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण से पहुंची हैं। आज धर्मं का झंडा और महिलाओ को परम्पराओ में ढलने की जिम्मेवारी महिलाओं की ही है इसलिए ऐसे महिलाएं पितृसत्ता या भारत के संधर्भ में ब्राह्मणवाद को ही मज़बूत करती हैं और उसको बहुत अछे से समझने की जरुरत है. 

आज महिलावाद ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद की कठपुतली बन गया है. यह बाजारू ताकते नए अजेंडा बना रहे हैं इसलिए महिल दिवस पर ऐसे लोग हावी हैं जो महिला उत्पीडन के मुद्दे को व्यक्तिगत प्रश्नों तक सीमित करके धर्म और पूंजी में ही उसका उत्तर ढूंढ रहे है। महिलाओ के आज़ादी का प्रश्न व्यापक है और इसे धर्म द्वारा हमारे अधिकारों के हनन के तौर पर भी देखा जाना चहिये. महिला आन्दोलन कभी भी आगे नहीं बढ़ सकता यदि वह धर्म के सत्ता को चुनौती नहीं देगा और यदि पूंजीवाद और सत्ता पर निजी शक्तियों के केन्द्रीयकरण पर कुछ नहीं बोलटा। साम्प्रदायिकता और जातिवाद के प्रश्नों को दरकिनार करके, हमारे जल जंगल जमीन के प्रश्नों को किनारे करके और छुआछूत और जातीय भेदबाव पर बात न करके हम केवल उन्ही ताकतों को मज़बूत करते हैं जिनके विरुद्ध खड़े होने का हम दावा कर रहे है। 

आज का दिन उन सभी को सलाम करने का जिन्होंने हमारे समाज को  बेहतरीन करने के लिए उन प्रश्नों को खड़ा किया जिन्हें हम छुपाते है। यह दिन है  गौरा देवी को याद करने का जिन्होंने चिपको आन्दोलन की नीव राखी और जिनकी संघर्ष की कमाई को एक ब्राह्मणवादी पुरुष अपने नाम से इस्तेमाल कर बैठा . इसलिए आज सलाम करने का दिन है उन सभी को जिन्होंने एक विचार को लेकर लड़ाई लड़ी और अपने समाज के लिए लड़ा।  एक महत्वपूर्ण बात यह है की महिलाओं पे हो रही  हिंसा को रोकने में नाकामयाब हमारा समाज और उसकी सत्ता बहुत ही शातिराना अंदाज में उसकी 'बहादुरी' का गुणगान करते है. आखिर एक अनाम लड़की पे हिंसा हुए और वो हमारे समाज की बीमार पुरुषवादी मानसिकता का प्रतीक है लेकिन उसको मार्किट की दुकान बनाने का काम केवल ऐसे पूंजीवादी ब्राह्मणवादी शक्तियां ही कर सकती हैं जिन्होंने देव्दासी को हमारी 'संस्कृति का हिस्सा बनाया'. अगर बहादुरी की बात आती है तो फूलन से बड़ा बहादुर कौन हो सकता है लेकिन हमारा दकियानूसी जातिवादी समाज कभी उसको रोल मॉडल नहीं बनाएगा क्योंकि अभी तो सेक्स की पवित्रता का सिद्धन्त है. मतलब यह के जब लड़की को मात्र छो देने भर से उसकी 'सुचिता' भंग हो गयी है और यह अभी तक जारी है. आखिर अमेरिका किसका सम्मान कर रहा है ? उसका कोई नाम तो हो ? उसे कैसे रोल मॉडल बनायेंगे और हमारे समाज में यदि सेक्सुअल हिंसा की शिकार किसी लड़की नाम छुपाया जाता है तो फूलन का नाम क्यों बताया गया ? क्या किसी अधिकारी को उस वक़्त निलंबित किया गया ? हकीकत है के अगर फूलन दब जाती तो यह समाज उसको मार  के हो छोड़ता और उसने लड़ने का निर्णय लिया तो वोही समाज जहाँ महिलाओ को बहार रखने का हक़ नहीं उसकी पूजा करता है .

पूंजीवादी ब्राह्मणवादी तकते महिला हिंसा की बात करने में उनका उत्तर व्यक्तिगत तरीके से देते हैं इसलिए वोह एक नए मसीहा का निर्माण करते है ताकि लोग महिलाओं पे हिंसा के मूल को भूल जाएँ और एक छोटे से क़ानूनी पैबंद से चुप बैठ जाये। महिलाओं का प्रश्न केवल महिलाओ पर पुरुष हिंसा से नहीं है अपितु उनकी आज़ादी, उनके अधिकार और शाशन से लेकर हर जगह उनकी हिस्सेद्दारी से भी है और इसके आभाव में कोई बहस नहीं हो सकती। 

महिलाओ का संघर्ष हमारे समाज को बदलने का संघर्ष है. गायत्री मंत्र पढ़कर  या धार्मिक ग्रंथो का नाम जपकर या गंगा में उनको डुबकी लगवा देने से न तो छुअछोत भागेगी न ही महिलाओ पर हिंसा ख़त्म होगि. महिलाओ या किसी भी व्यक्ति की आजादी और बदलाव के जरुरी है हम सबको सर्व धर्मं संभव के धंदे से दूर धार्मिक ग्रंथो, परम्परो को न केवल चुनौती देनी होगी बल्कि उनको अपने व्यक्तिगत जीवन से भी दूर करना होगा और महिलाओं के लिए यह इसलिए भी जरुरी है क्योंकि उन्ही के जरिये 'संस्कृति' के चलने का धंधा चल रहा है और वोही इसकी सबसे बड़ी शिकार है. सभी साथियों को  उनके संघर्ष और बेहतरीन जीवन के लिए शुभकामनायें .