Lokayaat is a materialistic philosophy that places most of its emphasis on the here and now and life as we perceive it as we live through it. The Carvaka system only accepts perceived knowledge to be true and therefore dismisses the concept of an afterlife. It does not believe in a cult system where devotees look for a master. Our discussions must follow that route which go towards liberation and restore human dignity.
Wednesday, 5 December 2012
Lokaayat: भारत के संकल्प का दिन
Lokaayat: भारत के संकल्प का दिन: विद्या भूषण रावत आज 6 दिसम्बर है। भारत वर्ष के करोडो लोगो के लिए एक शोक का दिन जब वे बाबा साहेब डॉ आंबेडकर की पुन्य स्मृति को या...
भारत के संकल्प का दिन
विद्या भूषण रावत
1980 और 1990 के दशक भारत में उथल पुथल और बदलाव के थे। बामसेफ की ताकत बढ़ी। कांशीराम ने बहुजन समाज के नारे को पुरे देश में प्रचलित किया और केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने बाबा साहेब के शताब्दी वर्ष में उनका सम्मान किया। उनका साहित्य देश भर में लोगो को सस्ते दरो में उपलब्ध हुआ। और जिन बाबा साहेब को भारत के हुक्मरानों ने संसद के बाहर रखा, उनके चित्र को संसद के अन्दर लाया गया। बाबा साहेब हालाँकि के भारत रत्ना से बहुत बड़े हैं लेकिन उनको भारत रत्ना देने से भी बहुत लोगो को परेशानी हो गयी। 1990 में मंडल के आने के बाद तो ब्राह्मणवादी ताकतों को लगने लगा के यदि अब कुछ ऐसा नहीं किया गया जो लोगो को दिग्ब्रमित कर दे तो वर्णव्यस्था की चूले हिल जाएँगी और हिंदूवादी ताकतों की एकछत्र राज समाप्त हो जायेगा। और इसलिए एक बहुत बड़े 'प्रोजेक्ट' पर कार्य शुरू हुआ और इसका नाम था 'अयोध्या'.
अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए लाल कृष्णा अडवाणी रथ यात्रा पर निकले। उनके मानाने की कोशिश हुई लेकिन वे नही माने'. देश में खून खराबा हुआ लेकिन उससे उन्हें क्या मतलब। वर्णवादी बाबाओ को आगे किया गया। राम मंदिर के लिए ईंटो को देश भर में घुमाया गया।खूब चंदा इकठ्ठा हुआ लेकिन मजाल क्या की किसी ने चंदे का हिसाब माँगा हो। बाबरी मस्जिद के नाम पर भी दुकाने सजी। जब हिन्दू वर्णवादी सामने आएगा तू मुस्लिम सामंती ताकते पीछे रहेंगी क्या। उन्होंने भी अपनी दुकान सजाई और लोगो पिसते रहे। खैर 1990 में केंद्र सरकार इसलिए गयी क्योंकि वो अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ध्वंश को बचा पायी क्योंकि तैयारी तो उस वक्त भी थी।
केंद्र में नरसिम्हाराव की सरकार आये और वो तो पूर्णतया संघ में प्यार में पागल थी। तिकडमें उनको पूरी करनी थी। वाजपेयी और अडवाणी उनके परम मित्र थे। फिर अडवाणी ने यात्रा निकली और इस बार कसम खाई के मंदिर जरुर बनायेंगे। लेकिन मंदिर बनाना मुख्या उद्दश्य नहीं था। मुख्या उद्देश्य था दलितों और पिछडो में आ रही बदलाव की चाह और क्रांति को खत्म करना। दलितों को बाबा साहेब ने एक दर्शन दिया और इसलिए बाबा साहेब से जुदा कर तो कोई उन्हें अपने पाले में नहीं ला सकता लेकिन पिछ्डी जातियों में सांस्कृतिक बदलाव के आभाव में मुस्लिम विरोध के नाम पर और 'राम' के नाम पर बहुत बड़ा तबका हिंदुत्व के पाले में आ गया। इसके लिए कल्याण सिंह, उमा भारती, शिव राज सिंह, और बहुत से अन्य नेताओ को आगे बढाया गया। यानी हिंदुत्व का भी मंडलीकरण हुआ लेकिन इसके मूल में था मुसलमानों का विरोध और सत्ता की नकेल ब्राह्मणवादी ताकतों के हाथ में। इसलिए मैं ये मानता हूँ, बाबरी मस्जिद का ध्वंश हिंदुत्व की एक चाल थी जो मुसलमानों के विरोध के नाम पर विभिन्न जातियों को हिंदुत्व के नियंत्रण में या उनके अधीन लेन की एक साजिश थी जिसमे वे सफल हुए। ऐसे नेता समुदायों के नाम पर आये जिन्हें पार्टी की मंडल विरोधी स्वरूप से कोई मतलब नहीं था वे तो राम के नाम की दुकान चला कर लोगो को बरगलाना चाहते। इसलिए राम मंदिर का आन्दोलन और कुछ नहीं दलित पिछडो को धर्म के नाम पर कुंद कर देने का आन्दोलन था जो मंडल के बाद की आग को बुझाने में कामयाब होगया और बहुत बेहतरीन तरीके से संघ के विशेषज्ञों ने इस पर सेंध मारकर जातिविरोधी आग को आज दलित विरोधी आग में बदला है।
अब नए बाबा पैदा किये जा रहे हैं और वो जातियों के नाम पर आ रहे हैं। इन साजिशो को ध्यान देना पड़ेगा। अस्मिता की राजीनति या कूटनीति के पहले विशेषज्ञ संघ परिवार है। यह हमेशा ध्यान रखना पड़ेगा।
बाबरी मस्जिद के ध्वंश में कांग्रेस और नरसिम्हाराव की भूमिका को नाकारा नहीं जा सकता। कांग्रेस की दोगली चलो ने हिंदुत्व के इन ठगों को मज्बूत किया। अगर इतने मज्बूत थी कांग्रेस तो नरसिम्हाराव ने अपने पहले प्रसारण में बाबरी मस्जिद के दोबारा निर्माण की बात कही लेकिन हिंदुत्व के मठाधीश यह जानते हैं के अब कोई पार्टी ऐसी बात नहीं करेगी क्योंकि 'सांप्रदायिक' तनाव बदेगा। सबचुप हैं।
अफ़सोस के जिन लोगो को जेल के सीखचों में होना चाहिए था वे देश के मंत्री और भविष्य भी बन रहे हैं। क्या यह भारत के लोकतंत्र का दोगलापन नहीं के यह यदि मुसलमान दंगो में फंसे तो आतंकवादी, दलित और आदिवासी अपने मुद्दों पर हिंसक हो तो नक्सलवादी और माओवादी लेकिन ब्राह्मणवादी हिंसक हों तो सीधे सत्ता में आते हैं और रास्ट्रवादी कहलाते हैं। इस बात को संघ से लेकर हिंदुत्व की सारी कौम जानते है हैं इसलिए ठाकरे अपराधी नहीं होते, मोदी मुख्यमंत्री बनते हैं और अडवाणी के उप प्रधान मंत्री और गृह मंत्री बन्ने पर किसी को अफ़सोस नहीं होता, कोई आवाज नही उठती। आज अडवाणी हमारे सभ्य देश के सभ्य नागरिक हैं और कोई नहीं कहते के सी बी आई क्यों नही मुकद्दमा चलती। लालू और मुलायम या मायावती के नाम पर चिल्लाने वाले ये क्यों भूल जाते हैं के आज तक सांप्रदायिक और जातीय दंगो को करवाने वाले एक भी हिंदुत्व के हिंसक को सजा नहीं मिल पाई है। ये दिखता है हमारा देश कितने खतरनाक तौर पर सांप्रदायिक जातीय लोगो की गिरफ्त में है।
दलित बहुजन समाज की एकता ने भारत में सम्प्र्दायिक्क ताकतों को बाहर खदेड़ा लेकिन आज उनके बीच बढ़ती दुरी भारत में जातीय दुराग्रह और सांप्रदायिक ताकतों को दिल्ली की और बढ़ने के संकेत दे रही है। यह बिलकुल सच है के दलितों में वैचारिक मजबूती आ चुकी है और वोह ऐसी परिस्थितयों को समझ चुके हैं। आज बाबा साहेब को नमन करने का दिन है और ये भी समझना जरुरी है के अम्बेडकरवाद में भारत की एकता और प्रबुद्ध भारत बनाने की ताकत है। इसलिए आंबेडकर और उनके दर्शन को अपनाकर अन्य लोग भी आगे बढ़ सकते हैं। और मुझे यकीं है के भारत में एक तर्कवादी मानववादी संस्कृति के चाहने वाले लोगो बाबा साहेब अम्बेडकर के विचारो में अपनी क्रांति के बीज देखेंगे ताकि इस देश में चल रही हिंदुत्व की साजिशी संस्कृति को समाप्त किया जा सके और के पूर्णतया प्रबुध समाज की नीव डाली जा सके जहाँ कम से कम सत्ता का तंत्र धर्म निरपेक्ष हो और सरकार भेदभाव रहित काम करे और आगे बढ़ने का मौका हो।
हिंदुत्व के ताकतों ने बाबरी मस्जिद के ध्वंश के लिए आज का दिन चुनकर भारत में आंबेडकर के मानववादी दर्शन को खत्म करने की कोशिश की है और उसके स्थान पर मनुवादी ब्राह्मणवादी दकियानूसी परम्परो को अमली जमा के प्रयास किये हैं जो कभी सफल नहीं होंगे। हमें विश्वाश है के सभ्य समाज के सभी लोग कभी भी अपना जीवन इन कुंठित, दम्भी और पाखंडी लोगो के हवाले नहीं करेंगे और इन सबके लिए हमारे सामाजिक जीवन में वैकल्पिक सांस्कृतिक बदलाव की आवश्यकता है और वोह बाबा साहेब आंबेडकर के जीवन दर्शन से हमको मिलता है। आइये उनके प्रबुध्ध भारत के आन्दोलन को आगे बढ़ाएं।
Friday, 30 November 2012
Introspection time for Media in India.
मीडिया के आत्म चिंतन का समय
विदया भूषण रावत
जी टी'वी और नवीन जिंदल के घटनाक्रम के बाद यह प्रश्न खड़ा हुआ है की क्या मीडिया में कोई नियंत्रक होना चाहिए। अख़बार हिन्दू ने एक ओम्बड्समैन रखा जो उसकी खबरों और उन पर लोगो की आपत्तियों को देखता है लेकिन दुसरे समाचार पत्रों या टी वी चनलो के पास तो उसको रखने का वक़्त भी नहीं। अखबारों के मालिक किसी भी नियंत्रण के इसलिए खिलाफ है क्योंकि यह 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का 'हनन' है। प्रश्न यह है की संपादको और उनके मालिको के आलावा और लोगो को भी यह अधिकार है और यदि किसी खबर से किसी व्यक्ति के प्रतिष्ठा को चोट लगती है तो मीडिया के पास क्या है के उसकी इज्जत को वापस किया जा सके ज्यादातर मामलो में अख़बार रेजोइंडर को ऐसे छापते हैं के पता ही नहीं चलता . आज तक किसी भी समाचार पत्र ने अपने खेद को उस तरीके से और उतने महत्व के साथ नहीं छपा जितने महत्व से खबर छापि गयी होती है।
जी के मसले में यह सवाल भी पूछना पड़ेगा के क्या संपादको की गिरफ़्तारी उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्र का हनन है। क्या ये प्रेस पर हमला है। आज अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की प्रतिबधता और विश्वशनीयता पर संकट है। यह संकट जी जिंदल घटनाक्रम से नहीं हुआ बल्कि इसके मूल बिंदु में मीडिया की ताकत और धनधान्य की प्रचुरता रही हा। आज के रिपोर्टर पुराने ज़माने का 'पत्रकार' नहीं है जो एक सैधांतिक निष्ठा और मिशन के जरिये पत्रकारिता करता है। आज का मिशन कनेक्शन है।
समाचार कक्ष में विज्ञापन और मार्केटिंग कर्मियों का हावी होना और संपादक को उसकी औकात बता कर रखना यह नए तरीके है जिस कारन देश के सबसे मीडिया घराने ने संपादक रखने बंद कर दिया जो अख़बार कल अक संपादको ने नाम से जाना जाता था आज वोह अपने मालिको के नाम से चलता है। कहा गया के संपादक नहीं अख़बार ब्रांड है। हम लोग तो राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, एस पी सिंह , अरुण शौरी, एन राम, आदि को ब्रांड समझकर पढ़ते थे और उनके लेख को कई कई बार देखते गुनते थे। लेकिन अब वोह समय नहीं। न्यूज़ एक मार्किट है और उसके फलस्वरूप पैसा निकलना है। अख़बार प्रोडक्ट है और उसे विज्ञापनदाताओ को लाभ देना है। ऐसे स्थिथि में जी जैसे घटनाक्रम को होना ही था और यह नयी बात नहीं हा।
जब खबर पैसे देखर चपटी हो और सम्पादकीय विज्ञापन और मार्किट के हिसाब से लिखे जाएँ तो फिर सुधीर चौधरी और समीर अहुल्वालिया जो कर रहे थे वोह क्या गलत है। आज कल न्यूज़ एंकर भी तो ब्रांड हैं। टी वी पे देखेंगे तो दिखाई देगा कैसे इन्वेस्टीगेशन करते हैं और अपने प्रति कितने सतर्क हैं। सबको लगता है के देश उनको सुनता है और इसमें जितना राजनेताओ को गरीयो तो अच्चा रहेगा क्योंकि मध्यमार्ग तो नेताओ को गली देने से ही इतिश्री मान लेता है। नेताओ को टीवी पर गली देकर या गरियाकर टी आर पी तो बढ़ सकती है लेकिन सत्ता परिवर्तन नहीं होना। आखिर जो लोगो सोनिया गाँधी के वंशवाद का विरोध करते हैं वोह दुसरे वंशवाद पे चुप क्यों रहते हैं। और राजनीती में तो वंशवाद के बावजूद भी लोगो के वोट लेने पड़ते हैं लेकिन मुकेश अम्बानी, अनिल अम्बानी, अभिषेक बच्चन, समीर और विनीत जैन और भारत का पूरा व्यवसायी तबका वहः कैसे पहुंचा क्या वो बिना वंशवाद के पंहुंच गया। क्या यह महारथी अब कहेंगे के उनकी कंपनिया अब आगे से उनके रिश्तेदारों और चाटुकारों से नहीं चलेंगी। वंशवाद हमारी जड़ो में है और भ्रस्थ्छार की जननी है लेकिन उसके लिए केवल नेताओ को गली गलोज कर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। देश के सबसे 'सेक्युलर' अख़बार हिन्दू को जब वंशवाद से हटाने के प्रयास हुए तो हंगामा हुआ। अभी तक उस अख़बार के सारे संपादक परिवार से निकले .
खैर, बहस में मीडिया नी नैतिकताएं और सीमायें हैं। अख़बार क्यों अपने यहाँ आचार संहिता लागु करने से कतराते हैं। दुनिया को नैतिकता का पथ पढ़ने वाले कमसे कम खुद भ ई तो कुच्छ करके दिखाएँ . यह कहना जरुरी इस्लिए है क्योंकि संपादको के नाम पर अब केवल मार्केटिंग मेनेजर और पब्लिक रिलेशन ऑफिसर ही बैठे हैं और इसी कारण से संपादक की कुर्सी का इस्तेमाल अखबारों के सम्पादकीय के लिए नहीं कंपनी के काम के लिए होता है। इसलिए सवाल यह है के जी के एडिटर्स जिंदल के ऑफिस में क्या कर रहे थे।
सवाल यह उठता है के क्या भ्रश्ताच्कार के विरुद्ध मीडिया की तथाकथित जंग केवल ब्लाच्क्मैलिंग का साधन थी . क्या खबरों की कडुई सच्चाई को संपदक और पत्रकार नेताओ को पहले ही बता देते हैं और यदि बात नहीं बनी तो 'भंडाफोड़' और बन गयी तो 'दुश्मन' का भंडाफोड़'. अगर कोई संपादक होता जो देशकाल के घटनाक्रम से चिंतित होता तो ऐसे हरकते नहीं करता। हम उनके विचारो से असहमत होते लेकिन उनको कभी दलाल नहीं कहते . जिन लोगो के मैंने नाम लिखे उनके सम्पादकीय मैं बड़े चाव से पढता था और लेख भी क्योंकि उनसे असहमति हो सकती थी लेकिन कोई उनके मंतव्य पर भ्रस्थ्चार या दलाली के आरोप नहीं
लगाता। आज स्थिति गंभीर है और वो इसलिए क्योंकि बाजारी तकते मीडिया के नाम से दंधेबाज़ी कर रही है और उनके लिए लोग ज़रूरी नहीं हैं अपितु अपने मालिको के हित ज़रूरी है और मालिक अगर केवल अख़बार चलाते तो कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन आज तो मालिको के पास रियल एस्टेट से लेकर शेयर बाज़ार के धंधे भी हैं और इसलिए उनके हर कार्य अपने हितो से जुड़े हुए हैं।
आज मीडिया को एक नयी दिशा की जरुरत है। बहस की जरुरत है। और खुली बहस की। मीडिया की मोनिटरिंग भी होनी चाहिए और एक मज़बूत कानून आये जिसमे मीडिया कर्मी, सामजिक कार्यकर्ता लेखक, कानूनविद, इत्यादि शामिल हों जो मीडिया के कंटेंट्स इत्यादि पर नज़र रखे और यह 'स्वंत्रता' के धंधेबाजो को देखे के वो ल;लोगो को कितनी स्वतंत्र खबरे पंहुचा रहे हैं। मीडिया को रेगुलेटर की जरुरत है ताकि देश में एक अच्चा माहोल हो और हम इन चीख चीख केर क्रांति करनेवालों से बचे और अख़बार और टीवी एक सभ्य और पारदर्शी बहस चलायें और आलोचना और निंदा केवल अपने व्यावसायिक होतो के मुताबिही ही न करें . मीडिया देश और समाज से बड़ा नहीं है। जो कानून हम सबके लिए हैं वोह मीडिया के लिए भी है . अभिव्यक्ति की आजादी बहुत जरुरी है क्योंकि ये हमारी वैचारिक प्रश्न है और व्यावसायिक हितो के नाम पर इसका इस्तेमाल नहीं क्या जा सकता। इसलिए यदि एक रेगुलेटर होगा तो वोह पहले ही बातो को नियंत्रित कर लेगा और फिर पत्रकारों या पी आर एजेंटो को जेल नहीं जाना पड़ेगा और सरकार को दख्लांजी का बहाना नहीं मिलेगा और हमारी आज़ादी बची रह पायेगी।
-- Tuesday, 27 November 2012
भारतीय राजनिति को विश्वनाथ प्रताप सिंह की देन
विद्या भूषण रावत
अपने लम्बे राजनैतिक जीवन में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने आम जनता से जुड़ने का प्रयास किया और मूल्यों पर आधारित राजनीती की। दिल्ली की झुग्गी झोपड़ियों के लिए उनके संघर्ष को भुलाया नहीं जा सकता। सुचना का अधिकार और नरेगा जैसे सवालो पर भी वे देशव्यापी संघठनो के साथ खड़े थे।
धुर्भाग्यवाश रिलायंस के विरुद्ध भ्रस्थाचार का धामभ भरने वाले तथाकथित कार्यकर्ताओ को पता नही की राजीव की मंत्रिपरिषद वित्त मंत्री की हैसियत से धीरू भाई अम्बानी की हालत ख़राब करने वाले वी पी को रिलायंस की दुश्मनी जिंदगी भर झेलनी पड़ी लेकिन दादरी में रिलायंस के जिस पॉवर प्लांट को लगवाने के लिए किसानो की भूमि को कौड़ियो के भाव मुलायम सिंह के फैसले के विरुद्ध उन्होंने संघर्ष किया और लोगो को उनकी जमीन वापस दिलवाई।
वी पी सिंह में दंभ नहीं था और आज के दौर की राजनीती में भी उन्होंने जनोन्मुख राजनीती की। आज उनकी कमी इसलिए खलती है क्योंकि तीसरे मोर्चे को जीवंत रूप देने वाले वह ही थे। उनके अन्दर एक करिश्मा था, एक नैतिक बल था जो उन्हें औरो से बहुत ज्यादा आगे खड़ा करता था। अस्मिताओ की राजनीती की दौर में उन्होंने उन लोगो से भी गालियाँ खाई जिनके लिए वह अपने समाज से दूर हटते चले गए। वी पी का जीवन और उनकी राजनीती भारत में जाति और उसके खूंटे से बंधे होने के हमारे चरित्र को भी दिखता है। उनके प्रति इतनी नकारात्मकता की भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्दोनल के 'मसीहा' लोग भी उनका नाम लेने से डरते हैं। उसका करान केवल एक के दलितों और पिच्च्दो के हक के लिए उन्होंने जो भी कुच्छ किया उसे हिन्दू वर्ण व्यवस्था के शुभचिंतको ने कभी माफ़ नहीं किया। इससे यह भी जाहिर होता है के वर्णव्यवस्था के विरुद्ध किसी भी आन्दोलन को समाप्त करने के लिए ये आतताई कुछ भी करेंगे और उन सबका नाम मिटा देने की पूरी कोशिश करेंगे जो उनकी राह में रोड़ा थे।
चाहे वे जो भी करें लेकिन जो बीज वी पी ने बो दिए उनसे देश के राजनीती नहीं हट सकते। अब उसको आगे उनलोगों को बढ़ाना नहीं जिनके संगर्ष के वे साथी थे हालाँकि पिच्च्दी राजनीति को हिंदुत्व ने काट खाया है और इस कारण से ही ब्राह्मणवादी सम्प्रदायकता का मुकाबला करने में हम असमर्थ हैं या उसका हिस्सा बन गए हैं। सामाजिक न्याय की कोई लड़ाई सम्प्रदाकिता की लड़ाई को छोड़ के नहीं हो सकती। वी पी इन दोनों प्रश्नों पर बहुत साफ़ रहे और उनके मूल्यों से सीखकर हमारे वर्तमान राजनीती के 'तीसरे मोर्चे' को खड़ा कर सकते हैं। वी पी सिंह हो उनकी पुण्य तिथि पर श्रन्धांजलि।
Tuesday, 13 November 2012
सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आवश्यकता
विद्या भूषण रावत
तमिलनाडु के धर्मपुरी जिले में वहां की ताकतवर वन्नियार जाति के लोगो ने दलितों के घर पर हमला कर लगभग 300 परिवारों के घरो को पूरी तरह से तहस नहस कर दिया। एक गाँव के दलित युवक के साथ वन्नियार जाती की एक लड़की के प्रेम विवाह के बाद यह घटना घटी। विवाह के बाद लड़की लड़का एक साथ अपने घर में रह रहे थे जब वन्नियार जाती की एक पंचायत ने निर्णय लिया के लड़की को अपने पिता के वापस आ जाये लेकिन ऐसा नहीं हुआ। लड़की के पिता इस से बहुत आहात हुए और उन्होंने फांसी लगाकर आत्महत्या कर डाली। इसके बाद तो जैसे तूफान खड़ा हो गया। वन्नियार लोगो ने दलित के घरो पर हमले शुरू कर दिए और पुलिस के बावजूद हिंसा जारी रही। सभी दलित, जो आदि द्रविदा जाति के थे, उन्हें अपने घरो से भागना पड़ा . दिव्या और उनके पति भी अपने घर से भाग चुके थे नहीं तो उनके साथ क्या स्थिथि होती इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। रास्ट्रीय दलित आयोग के सदस्य भी वह गए और उस हिंसा को प्रायोजित बताया।
इस घटना के कई पहलु हैं और उन पर विचार करना चाहिए। तमिलनाडु ने गैर ब्राह्मणवाद के नाम पर बड़ी राजनीती हुयी है और उसके फलस्वरूप बहुत बड़ी पिछडी जातियों को सत्ता पर भागीदारी भी मिली . स्वंतंत्रता के बाद तमिलनाडु पिछड़ी जातियों के नाम पर राज कर रही पार्टियों के चंगुल में रहा हैं। उन्होंने बहुत अच्छे काम भी किये होंगे लेकिन दलित अस्मिता के प्रश्न पर तमिलनाडु के पिछडो ने दलितों के साथ बहुत ही हिंसक वर्ताव किया है। दलित अस्मिता के प्रश्न को हिंसक तरीके से दबाया गया है।
वन्नियार एक ताकतवर पिछड़ी जाति हैं और पी एम् के नामक पार्टी उनकी सबसे बड़ी ताकत है। कई वर्षो से वन्नियार और थेवर नाम की दलितों के उपर सबसे ज्यादा हिंसक बन कर उभरी हैं। आश्चर्य जनक बात यह है के सामाजिक न्याय के नाम पर चल रही इन पार्टियों और तमिलनाडु और देश के अन्य हिस्सों में दलितों पर हो रही हिंसा के उपर लिखने वालो की जुबान और कलम रुकी हुए हैं। इसका कारन यही है के हमारी कलम और जुबान भी राजनीती के समीकरणों के अनुसार चलती है जो बेहद खतरनाक है।
तमिलनाडु में पेरियार के गैर ब्राह्मणवादी आन्दोलन के कारण से बहुत प्रगतिशीलता के तत्वे भी आये लेकिन ब्राह्मण विरोधी आन्दोलन जातिविरोधी आन्दोलन में तब्दील नहीं हो पाया। तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश या बिहार के सामाजिक और राजिंतिक परिपेक्ष्य को देखने तो अस्मिता की राजनीती ब्राह्मण विरोधी शक्तियों के इकठ्ठा करने के लिए उपयोगी तो हो सकती है लेकिन अपने अन्दर के अन्तर्द्वन्दो और अंतरविरोधो को नहीं मिटा सकती। और इन्हें दूर करने के कोई प्रयास भी नहीं हुए क्योंकि जब एक बार सत्ता की चाबी जिस जाति के नेता के हाथ पहुंची वो उसे दुसरे के साथ साझा करने को तैयार नही है। आज इन पार्टियों की जुबान पर ताला लगा है। यह वोह तमिलनाडु है जहाँ श्रीलंका के मसले पर हर एक घंटे में भरी प्रदशन हो जाता है और ट्वीटर और फेसबुक पर स्टेटस की झड़ी लग जाती है।
अभी तमिलनाडु में मंदिरों में दलित और पिछड़ी जाति के अर्चाको को नियुक्त करने को क्रन्तिकारी कदम बताया जा रहा है। हमारे लिहाज़ से यह दलितों को हिंदूवादी ढांचे में घुसाने की साजिश है और आश्चर्य यह है के जो पार्टी अपने को नास्तिक कहती हैं वे यह हिंदूवादी अजेंडा लागु करते हैं। दलित पिछड़े ब्राह्मण मंदिरों में मनुस्मृति को ही पढ़ाएंगे और ये दूर से क्रन्तिकारी कदम दीखता हो लेकिन क्या हमारे देश में पिछड़े मठाधीश नहीं है जो मनुवादी शिक्षा दे रहे हैं। यदि आज के बाबाओ को देखे तो वोह शुद्रो से ज्यादा आ रहे हैं और इसे अगर कोई क्रन्तिकारी माने तो मान सकता है क्योंकि ब्रह्माण्डी मनुवादी व्यवस्था को बचाने के लिए अब नए पुलिस वालो के जरुरत है जो इसको बचा सके। आश्चर्य यह के दलितों पे हिंसा पे सब चुप हैं। ऐसा क्यों यह समझ नहीं आ रहा।
असल में जातिगत अस्मिता के नाम पर अभी राजनितिक चोंचले बाजी से आगे हम नहीं पहुंचे हैं। देश को एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण की जरुरत है जो ब्राह्मणवादी जातिवादी मानसिकता और संस्कृति को समाप्त कर आगे बढे लेकिन अस्मिताओ के इस दौर में व्यक्तीगत विचारो और चाहतो का कोई मतलब नहीं है और इसीलिये प्रेम विवाह को खत्म करने में हम सभी एक हो जाते हैं। दलित के मध्य जो राजनैतिक या सामाजिक की बात हम करते हैं वोह एक सांस्कृतिक विकल्प के बिना संभव नहीं है। जातिगत अस्मिताएं इन विकल्पों की राह में रोड़ा हैं क्योंकि यह व्यक्तिगत चाहतो को जाति की सीमओं से बहार नहीं मानते। दुसरे, भारत में अगर सभी जातियां एक हो और केवल अपना गाँव या परिवार के नाम तक सीमित हो तो कोई बात नहीं है लेकिन जब अस्मिता के मायने अपनी झूठी शान और दुसरे से बड़े होने की कहानी है तो सोचना पड़ेगा के व्यक्ति के अपनी अस्मिता कहाँ गायब हो जाती हैं। बाबा साहेब आंबेडकर ने कहा था के भारत एक रास्ट्र नहीं है क्योंकि यहाँ व्यक्ति के अस्मिता का सम्मान नहीं है क्योंकि वोह अपनी चाहत अपनी अनुसार जिंदगी नही जी सकता। जाति और अस्मिताओं की दीवारे उसको घेरेंगी।
अस्मिताओ से परेशानी नहीं है लेकिन वोह सामाजिक न्याय और बरबरी के उपर नही जा सकती। वैसे ही जैसे तमिलनाडु में ब्रह्मंविरोधी आन्दोलन जाति विरोधी आन्दोलन नहीं बन पाया क्योंकि जाती उन्मूलन के लिए केवल ब्राह्मण या अन्य हिन्दुओ का जाती और उससे बहार निकलना ही काफी नहीं है अपितु दलित पिछडो को भी अपने अन्दर उसको समाप्त करना पड़ेगा और धर्मपुरी जैसी घटनाओ की पुनाराविरती तब नहीं हो पायेगी। जब बाबा साहेब आंबेडकर ने नवयान की स्थापन की तो इसका एक ही सन्देश था के जातिगत खांचो से बहार निकलकर एक नयी जिंदगी की शुरुआत करें क्योंकि केवल विरोध की राजनीती से हम एक नए समाज का निर्माण नहीं कर पाएंगे इसलिए एक विकल्प की जरुरत होगी और इसलिए ब्राह्मणवादी जातिवादी मानसिकता से बहार निकलकर बुद्ध के करुना और बरबरी के मार्ग को उन्होंने अपनाया। बाबा साहेब ने उसकी स्वयं व्याख्या को और उसके नीति निर्देश दिए।
इस हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता के जातिगत समाज में सुधर की कोई सम्भावना नहीं है जब तक हम जातिगत अस्मिताओ को मज़बूत करेंगे। धर्मपुरी जैसी घटनाएँ हरयाणा से एक कदम आगे हैं क्योंकि यहाँ सामाजिक न्याय के नाम पर काम करने वाली ताकते शाशन में हैं और वोह भी पिछले 50 वर्ष से। वर्ना व्यवस्था मनुवाद को ही मज़बूत करती रहेंगी और ऐसे घटनाएँ होगी रहेंगी क्योंकि जातिगत अस्मिताएं और कुच्छ नहीं जातिगत अहम् है जो सीढ़ीनुमा खांचे में अपने आप को दुसरे से श्रेस्ठ समझती हैं और दुसरी अस्मित को कुचल देना चाहती हैं। अस्मिताओ का सम्मान जातिगत समाज में नही हो सकता और ल्सिये उसके लिए आंबेडकर के दिखाए मार्ग के आलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है।
फिलहाल, तमिलनाडु में धर्मपुरी जैसी घटनाओ को रोकने के लिए जरुरी है के हमारी संवैधानिक मूल्य हमारे दैनिक जीवन के मूल्य बने। संविधान केवल एक कानून न होकर हमारे जीवन की रहन सहन और आदत बन जाये और उसका इस्तमाल हमारे मतभेदों को सुलझाने और लोगो को न्याय दिलाने के लिए हो। राजनितिक दल यदि अपनी जातिगत मूल्याङ्कन से आगे बधकर सामाजिक न्याय में विश्वास करें और संविधान के मूल्यों की इज्जत करें तो देश में एक पुन्राजागरण हो सकता है। मनुवादी जातिवादी विचार को उसके बहार आकर और संविधानिक मूल्यों को जीवन मूल्यों में तब्दील करके ही हम एक नए भारत का निर्माण कर सकते हैं और तभी जातिगत अस्मिताओ के नाम पर या इज्जत के नाम पर हो कत्लो को रोका जा सकेगा।
Monday, 12 November 2012
Revisiting Vivekananda and Ram
विवेकानंद और राम का पुनर्वालोकन
विद्या भूषण रावत
नितिन गडकरी की मुसेबतें कम होने का नाम नहीं ले रही। उनकी कंपनियों का धंधा मंदा चल रहा है और विवेकानंद और द़ाउड़ इब्राहीम के आई क्यू को बराबर बताकर उन्होंने एक नयी बहस शुरू कर दी। ऐसे लग रहा था मानो गडकरी आई क्यू विशेषज्ञ हैं क्योंकि आई क्यू की खोज विवेकानंद के निधन के बहुत बाद हुयी है। दूसरी बात, जब आप बात कर रहे हो तो तुलना का अध्ययन कैसे हो और किससे हो यह भी तो समझ का विषय है। यदि दाउड़ इब्राहीम कोई दार्शनिक होता तो या समाज सुधारक होता और उनके विचारो का कोई मतभेद होता तो बात थी। या फिर विवेकानंद को कोई गंग होता और फिर दाउद से तुलना होती तो बात थी।
अब प्रश्न यह नही के क्या हम विवेकानंद को मानते हैं या नहीं। भाजपा के तो शीर्ष पर विवेकानंद हमेशा रहे हैं और 'वेदों की और लौटो' और 'वेदान्तिक दिमाग' के जन्मदाता ने बहुत सी जगहों पर ब्राह्मणों और वर्ण व्यवस्था को गरियाया भी है लेकिन उसका समाधान अंत में वेदांत और वेदों में घुसकर अपने बदलाव का सारा बेडा गर्क कर दिया। लोगो को उनका वेदान्तिक बुद्धि'तो पसंद आ गया लेकिन 'इस्लामिक शरीर ' को छोड़ दिया। याद रहे विवेकानंद ने कहा एक मज़बूत भारत के लिए वेदान्तिक दिमाग और इस्लअमिक शारीर की जरुरत है। यानी सफलता के लिए ब्राह्मण बुद्धि और इस्लाम की तरह की निष्ठा बहुत जरुरी है। वैसे इस्लाम के बारे में विवाकनद के विचारो को उनकी पुस्तकों के प्रकाशकों ने चुपचाप साफ़ भी कर दिया क्योंकी आज के राजनैतिक परिपेक्ष्य में वोह नरेन्द्र मोदी जैसे घृणा के सरदारों के काम नहीं आयेंगे।
गडकरी को माफ़ी मंगनी पड़ी लेकिन अब राम जेठमलानी ने नया राग अलापा के राम एक अच्छा पति नहीं था। और लक्ष्मण तो और भी ख़राब था जो अपनी भाभी की सुरक्षा नहीं कर पाया। संघ परिवार में हडकंप है क्योंकि उन्ह्होने तो राम की दूकान चलाई और आगे भी उसके नाम पर वोट लेना चाहते हैं। राम जेथ्मलाई का हक बनता है क्योंकि राम तो उनके आगे वैसे भी लगा है और उनको दुःख हो रहा होगा के यदि आज के ज़माने की बात होती तो जेठमलानी को बहुत बड़ा केस मिलता कोर्ट में लड़ने के लिए। उन्होंने इतने बड़े केस लडे हैं के अभी राम भक्त उनका कुछ नहीं बिगड़ सकते क्योंकि इस देश में इतने राजनेता हैं जिनको कोर्ट में उनसे बहुत काम हैं और राम तो सबका बेडा पार करते हैं।
इसलिए एक बात पे मैं जेठमलानी के साथ नहीं हूँ हालाँकि जो उन्होंने राम के बारे में कहाँ वोह तो बिलकुल सत्य है और अगर सत्य नही भी है तो हमें उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आदर करना चाहिए लेकिन यदि यह केस आज हुआ होता तो जेठमलानी क्या करते। क्या वोह सीता का केस लड़ते और राम को जेल भिजवाते। सत्य बात यह है के सीता पर केस लड़ने के लिए पैसे भी नहीं होते और राम जेठमलानी को राम पहले ही अपनी पार्टी में लेकर अपनी पैरवी करवाते . आज की हकीकत यही है। राम जेठमलानी उसी पार्टी की पैरवी कर रहे हैं जिसके पास सीता के अपमान का बदला लेने के लिए शब्द नही है और जो इन सड़ी गली परम्पराओं को देश पर लाद कर असली मुद्दों से हमारा ध्यान हटाना चाहते हैं। आज भी हज़ारो सीतायें हमारे समाज में हैं जिन्हें हमारे समर्थन की जरुरत है और सामाजिक न्याय चाहिए और जिनके साथ अन्याय होने के बावजूद भी समाज उन्ही से उत्तर मांगता है। हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, और देश के अन्य राज्यों पर महिलाओ पर अत्याचार जारी हैं और अत्याचारी समाज में से है और महिला को मुंह ढक के रहना पड़ता है। राम की महिमा का मंडान करने वाले पूरी राम सीता कथा से अनेकार्थ निकल सकते हैं और सोच सकते हैं के आज की सीता कहाँ है और क्या आज का समाज वोह सब नहीं कर रहा है जो राम ने सीता के साथ किया था लेकिन आज के कानून के हिसाब वोह अपराध है। जेठमलानी उस पार्टी में जो आज के कानून को नहीं मानती और जिसका आदर्श मनुस्मृति है इसलिए जेठमलानी सत्य तो कह रहे हैं लेकिन उन जैसे लोगो पर कितना विश्वास करें यह सोचने की बात है।
America Mandalised
अमेरिका का मंडलीकरण
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विद्या भूषण रावत
अमेरिका में राष्ट्रपति बराक ओबामा का चुनाव जीतना एक नए समीकरण की और संकेत कर रहा है। अमेरिका की दक्षिणपंथी तकते अफ्रीकी मूल के लोगो, अप्रवासियों, अल्पसंख्यको और महिलाओ के इस नए समीकरण को ख़त्म करने के लिए कोई अयोध्या कांड करने का प्रयास करेंगी . क्योंकि अमेरिका में कोई बाबरी मस्जिद नहीं है तो यह सब या तो ईरान पर हमला करवाने के प्रयास होंगे या शिव सेना स्टाइल में आप्रवासियों के विरुद्ध मोर्चा खोला जायेगा क्योंकि उद्योपति और पूंजीपति सब रिपब्लिकन पार्टी के प्रमुख समर्थक रहे हैं इसलिए भारत की तरह अमेरिका में भी धार्मिक उन्मादियों और पूँजी का एक सशक्त गठबंधन बन सकता है। क्योंकि अमेरका के कई प्रान्तों में समलैंगिक विवाहों को भी लोगो ने मान्यता दे दी है जिसके विरुद्ध अमेरिकन चर्च और उनके कट्टरपंथी पादरी लगातार आवाज उठा रहे थे।
आज के परिणामो से साबित हो गया है के अमेरिका के हासिये के लोग अब सत्ता में भागीदारी चाहते हैं। वे चाहते हैं स्वस्थ्य सेवाओ का रस्त्रियाकरण जिसके विरुद्ध प्राइवेट कंपनियों की कोशिश जारी है। बुश के मुस्लिम विरोधी स्वरों को अमेरकी गोरो ने बहुत समर्थन दिया और इस्लाम को निशाना बनाकर वह का चर्च दक्षिणपंथी अजेंडा लागू कर रहा था। भगवन और भाग्य को तभी लाया जाता है जब हासिये के लोग अपने अधिकारों के लिए सड़क पर आते हैं। अमेरिका के काले लोगो ने आप्रवासियों और महिलाओ के साथ गठबंधन करके अपनी त्क्कत दिखा तो दी लेकिन व्यवस्था में बदलाव आएगा ऐसा नहीं कहा जा सकता। ये सिस्टम ताकतवर लोगो के लिए बना है। हम सब जानते हैं के अमेरिका के चुनावो में बेतहाशा खर्च होता है और पूंजी का बहुत बड़ा रोल है।
अमेरिकी लोकतंत्र को जनतंत्र बनाने में समय लगेगा और वह तभी सफल हो सकता है जब बराक ओबामा के समर्थक समूह अपनी पहचान और अस्मिता के आलावा अमेरिका में अपने भविष्य को ध्यान में रख कर अपनी रणनिति बनाये। लोतंत्र में उनकी भूमिका ओबामा को चुनाव जीताकर ख़त्म नहीं हो जाती। दुर्भ्ग्यवाश अमेरिकी चुनाव प्रणाली ऐसी नहीं है के जिसमे गोरी ताकत को रोका जा सके। यह वैसे ही है जैसे भारत में राजनैतिक सत्ता परिवर्तन के बावजूद भी सत्ता की नकेल अभी भी ताकतवर जातियों के हाथ में ही है। और जब उसको ख़त्म करने का प्रश्न उठाया जाता है तो अन्य प्रश्न खड़े कर दिए जाते हैं। ओबमा को चाहिए के सामाजिक न्याय की शक्तियों को मज़बूत करे और अम्बेडकर और फुले के संघर्ष को समझे। यह भी अच्चा होगा के अमेरिका दुसरे देशो में दखलंदाजी देना बंद करदे तो वहां के पूंजीवादी तबके की दुकान बंद हो जाएगी। यह वोही तबका है जो अमेरिकी घृणा फैलने वाले चर्च के साथ मिलकर दुनिया पर अपनी दादागिरी रखना चाहता है।
अमेरिका के चारसौ वर्षो के इतिहाश में पहली बार 20% महिलाएं सीनेट में जीत कर आयी हैं और उम्मीद है वे बदलाव वाली ताकतों के साथ रहेंगी' अमेरिका की प्रतिनिधि सभ में रिपब्लिकन पार्टी का कब्ज़ा बना हुआ है। वैसे चुनाव हरे हुए मिट रोमनी ने रास्त्रपति को तुरंत बधाई दी और सहयोग का वादा किया। भारत में मुख्या विक्पक्षी दल और उसके वेट लिस्टेड प्रधानमंत्री श्री लाल कृष्णा अडवाणी आज तक नहीं पचा पाए हैं के वे सरकार में नहीं हैं।
अमेरिका से बहुत उम्मीद तो नहीं कर सकते क्योंकि पूंजी और धर्म की भूमिका वह बहुत ज्यादा है और सबसे बड़ा खतरा यह है के काले, हिस्पैनिक और आप्रवासियों के अन्दर आ रहे बदलाव को पूंजी और धर्म की ताकते ख़त्म करने का माद्दा रखती हैं। यह वैसे ही है जैसे भारत में हिंदुत्व और पूंजी का भयावह गठबंधन बदलाव की सारी ताकतों को रोके हुए है हालाँकि वो सत्ता में नहीं दिखाई देता फिर भी उसके बिना सत्ता चलते नहीं और वोह हमरे मीडिया और पूंजी तंत्र पर हावी है।
चुनाव जीतने पर राष्ट्रपति ओबामा को बधाई और उम्मीद करते हैं की अमेरिका प्रोपगेंडा आधारित नहीं करेगा और दुसरे देशो पर अपनी मिलिट्री ताकत की आजमाइश नहीं करेगा। हम यह भी उम्मीद करते हैं के ओबामा अपनी घरेलु समस्याओ पर ज्यादा ध्यान देंगे और आतंकवाद के नाम पर चल रही दुन्कानो को बंद करेंगे। अमेरिका अगर अपने को अलग थलग नहीं चाहता तो उसे दादागिरी छोड़ लोकतान्त्रिक परम्पराव को बढ़ाना पड़ेगा। हम सब लोकतंत्र चाहते हैं लेकिन उसकी मजबूती अमेरिकी द्रोंतंत्र के जरिये नहीं हो सकती। फिलहाल अमेरिकी अफ्रीकी लोगो और वहां की धार्मिक, भाषाई, और सेक्सुअल अल्पसंख्यको को केवल एक सलाह के भारत के दलित बहुजनो के राजनितिक संघर्ष से कुच्छ सीख सकते हैं। अमेरिका के मंडलीकरण की शुरुआत हो चुकी है और असली नतीजे 2020 के बाद दिखाई देंगे।
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