Tuesday, 8 January 2013

एक भयाक्रांत समाज





विद्या भूषण रावत 

हमारे समाज को आसा राम बापू से बहुत बड़ा खतरा नहीं है क्योंकि उसने वोही कहा जो हमारी परम्पराओं और ग्रंथो में लिखा है। बेचारा सीधा साथ मनुवादी और हम सब इतने गुस्से मैं हैं ऐसे लगता है उसने भारतीय संस्कृति के विरुद्ध कोई बात कह दी . हकीकत तो यही है के वोह हमारी परम्पराऔ  के अनुसार ही बोल रहा था जिसमे लड़की को दब के रहना है, दया की भीख मंगनी है और हमेशा अपनी 'गुलामी' के सबुत देने हैं। आसाराम जैसे लोग भाषा ज्ञान वाले नहीं हैं वे तो जैसे समझे वैसे बोल दिए।  हमें तो सबसे बड़ी दुश्मनी उनसे हैं जिनके जुबान और दिल अलग अलग हैं। बहुत से लोग जानते हैं के मीडिया सामने है और टीवी पे सुनायी देंगे इसलिए वे बातो को घुमा फिर के कह देते हैं परन्तु आसाराम की तो महिमा न्यारी है वो तो अपने भक्तो के लिहाज से कहते हैं।

अब आसाराम के खिलाफ बोलके क्या करोगे। सुष्माजी के पार्टी वाले तो कह रहे हैं के वोह आसाराम की बोलने के स्वतंत्रता का सम्मान कर रहे हैं और यह कि  भारत में बोलने की आज़ादी है। आसाराम एक बहुत बड़े  भारत के सोच को प्रदशित करते हैं। आन्दोलन चाहे जितने हों गाँव में और छोटे कस्बो में, लड़कियों के जाने पर प्रतिबन्ध लगेंगे और घर से बहार निकलना दूभर होगा क्योंकि वोह तो हमारी 'इज्जत' हैं।

अब आसाराम तो देश के प्रशाशक नहीं हैं लेकीन जो प्रशाशक हैं उनकी भी सुन लो। अगर महिलाओं की बात कहें तो हिंदुत्व की  पलटन के फौजी तो लगातार ये कह रहे हैं की महिलाओं को अपनी सीमा भी जाननी  चाहिए। छात्तिश्गढ़ महिला आयोग के अध्यक्ष विभा राव  ने कह दिया कि  लडकियां ही मौका देती हैं और आसाराम कहते हैं के भाई बना लो। कैलाश विजयवर्गीय कहते हैं के लक्ष्मणरेखा पार करोगी तो भुगतना पड़ेगा तो संघी प्रहरी मोहन  भागवत अब पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव को पुरे घटनाक्रम के जिम्मेवार मान रहे हैं। भाभी फिल्म में एक गाना था ' जवान हो या बुढिया, औरत जहर की है पुडिया' और संघ परिवार का इसमें पूरा यकीं दीखता हैं।

क्या करें उस समाज का जो उन लोगो का नेतृत्व चाहता है जो उसके गिरने में और मरने में भी अपनी दुकान सजा रहे हैं। भारत में सामाजिक बदलाव की लड़ाई को छुपा दिया गया और उसे केवल पृथकतावादी  नज़रिए से देखा गया। जो मुहीम सावित्रीबाई फुले की थी या बाबा साहेब आंबेडकर का जो  सपना थी और पेरियार का आन्दोलन थी वो हमारे तथाकथित मुख्यधारा के अजेंडे में कहीं भी नहीं है। भारत में हम कभी भी किसी लड़ाई को मुकाम तक नहीं पहुंचा पाए क्योंकि सबके अपने ब्राह्मणवाद हैं और मनुवादी तंत्र ने हर समाज और हर जगह अपनी तगड़ी घुश्पैठ बना ली है। जब भी लड़ाई आगे बढ़ती है तो लड़ने  वाले एक दुसरे को ज्यादा धमकाते हैं और जहाँ निशाना होना चाह्हिये  वह नहीं हो पाता . इतने वर्षो के संघर्ष के बाद हमारे अपने अपने कुनबे हैं और अपनी अपनी खापे हैं लेकिन हम खापो को खात्मे के लिए बात नहीं कर पाए।

मनुस्मृति पर हमला करना या भगवानो पर 'आक्रमण' आसान है। गीता की पोल पट्टी  खोलना और रामायण को गरियाना भी आसान है लेकिन जिन परम्पराओं और जकडन में  हम हैं उन्हें चुनौती देना बहुत मुश्किल है। क्या अम्बेडकरवादी कभी देवी भक्त हो सकते हैं ? लेकिन बहुत से  हैं और बड़े गर्व से जाते हैं। मंदिर या मस्जिद जाना किसी का व्यक्तिगत अधिकार है लेकिन फिर अपने को मानववादी या अम्बेडकरवादी न कहे।  हमने विवाहों के मुहूर्तो को खत्म कर दिया परन्तु अपने मुहूर्त बना दिए। हमने ब्राह्मणों से छुटकारा पाने की कोशिश की लेकिन अपने पुरोहित बनालिए तो फर्क क्या पड़ा क्या हमारे पुरोहित, हमारे मुल्ले हमारा शोषण नहीं करेंगे . यह हमारी तुम्हारी बहस में ही हमारे मुद्दे हैं। कह रहे हैं के हमारा मुद्दा नहीं उठाया तो भाई आपको मुद्दे उठाने और धरना देने से कौन रोकता है।  हम यहाँ बैठकर कम से कम काम करनेवालों को तो न गरियायें। जब हम अपने अपने मिसन में लगेंगे तो किसी की निंदा का समय कहाँ है। अम्बेडकरवाद को सकारात्मक कार्य में यही बाद बदल सकती है के हमारी सकारात्मक उर्जा सार्थक कार्यो में लगे। केवल पत्थर फेंकने से काम नहीं चलेगा आखिर इतने बड़े समाज में बदलाव के लिए वैकल्पिक विचारधारा की आवश्यकता है। मान  लिया की मनुवादियों ने अपनी महिलाओं और दलित महिलाओं का अपमान किया और हम सबको उसकी निंदा करनी चाहिए लेकिन क्या हमने अपने महिलाओं को उतना सम्मान दिया। सवाल लड़ने का है। अगर 'वोह' अपने अधिकारों के लड़ रहे तो आपको कौन रोकता  हैं अपने अधिकारों के लड़ने के लिए? जहाँ तक मीडिया के बात है, उनके लिए यह सब इवेंट मैनेजमेंट हैं और यदि हमारी इवेंट अच्छी रही तो वो इसे भी रिपोर्ट करेंगे। दुसरे यह के आन्दोलन मीडिया से न तो बनते और न ही उन्हें उम्मीद रखने चाहिए। केजरीवाल मीडिया की उपज हैं लेकिन आज कहाँ हैं यह हम सब जानते हैं । मायावती और कांशीराम बिना मीडिया के एक पूरा आन्दोलन खड़ा किये और आज मीडिया उनके पीछे पीछे भागता है। मीडिया में आकर आन्दोलन नहीं चलते और नहीं उससे हम चीजो को जिन्दा रख पाएंगे। बाबा साहेब आंबेडकर ने अपने लेखन से इतना काम किया के कोई उनको किनारे नहीं कर सकता 

आज बौद्धिक इमानदारी की जरुरत है। हमारी शिकायत मीडिया से वाजिब है लेकिन हम इन अखबारों से इतनी ज्यादा उम्मीद क्यों करते हैं जो धंधेबाजी में लगे हैं। हम उनका इस्तेमाल केवल समाचार इकठ्ठा करने में कर सकते हैं क्योंकि अगर हमने एक दो अख़बार ले भी लिए तो भी सूचनाएं इकठा करना आसान नहीं है। इसलिए उस संस्कृति की और जाना पड़ेगा जहाँ हर एक साथी एक विशेषज्ञ है और उसको किसी टाइम्स ऑफ़ इंडिया की जरुरत नहीं अपनी विशेषज्ञता दिखने के लिए। यदि हम अपने पे भरोषा करते हैं तो इन अखबारों के जरिये अपनी विशेषज्ञता न दिखाये। हम अपना कार्य करते रहे। किसी प्रबुद्ध आन्दोलन का उद्देश्य होता है अधिक से अधिक लोगो को अपनी विचारधारा में लाने का और इंसान की जिजीविषा और कर सकने की क्षमता में विश्वास दिलाने का। आज देश को गर्त में ले जाने वाली ताकतों का पर्दा फास हो रहा है। दिल्ली के घटनाक्रम ने बहुत सी बातो का पर्दाफास किया है। ब्राह्मणवादी धकोस्लेवादी भी खुल चुकी है तो इस्लाम के दीवानों ने भी अपनी सही हकीकत बता दी है के औरत के मामले में वोह कितने सतर्क है क्योंकि औरत के खुलने से उनके यहाँ भी व्यवस्था के चरमराने का खतरा बना हुआ है।

जब बहस ज्यादा तेज हो जाए तो उसको कैसे खत्म करें। इसके लिए सबसे मज़बूत मंत्र है वोह सामंती सोच और जातिवादी मानसिकता के परोकारो ने हमें दिया। हमारी किस्मत ख़राब है इसलिए ये सब हुआ और देखिये किस तरह छात्तिश्गढ़ के ननकू राम ने महिलाओं पे हो रही हिंसा को 'नक्षत्रो' के ऊपर डाल दिया। अब हम मंगल गृह पर जाने की तैयारी कर रहे हैं और ननकू जी अपने प्रदेश में हो रही घटनाओं पर अपने मंत्रालय की नाकामी को छिपा रहे हैं और गृह नक्षत्रो को बीच में ला रहे हैं। अब असा राम ने तो ग्रहों को हवाला नही दिया लेकिन अब  पुरोहितो की चांदी  आ जाएगी। वोह तो सब जानते हैं, ताबीज, व्रत इत्यादि और वोह दिन दूर नहीं जब टीवी पर हम 'बलात्कार' से कैसे बचे मुद्दे पर भी इन 'भुदेव्ताओ' के टोटके देखेंगे। इस देश में लोगो की बहुत बड़ी आबादी है जो भाग्य के इस खेल में जकड़ी है और सामाजिक बदलाव को रोकने के लिए सभी समाजो के अंदर घनघोर विरोध है तो ऐसे पाखंडी बाबा, पुरोहित, विशेषज्ञ जिन्दा रहेंगे। समय है के ऐसे मोहन प्यारो, उनकी आसाओ  और ननकुओ को समझने की। अपने अपने दुश्मनों को हम सब अच्छे से जानते हैं जरा दोस्तों को पहचान लो यारो नहीं तो ऐसे ही सवाल बनते रहेंगे और जब भी पुरोहितवाद का पर्दाफास होगा हमारे अपने अन्दर ही उसको बचाने  के गुण विकसित हो जायेंगे और यही कारण है वर्णवाद और पुरोहितवाद जिन्दा है और जिन्दा रहेगा क्योंकि बदलाव से हम सभी को डर लगता है।

Monday, 7 January 2013

इंसानी आज़ादी के लिए सांस्कृतिक धार्मिक मूल्यों की आहुति जरुरी



विद्या भूषण रावत 

मोहन भगवत कहते हैं के महिलाओ पर हिंसा इंडिया का फिनामिना है और अपना भारत तो 'महान' है। यह तो पश्चिमी संस्कृति का असर है जो हमारे यहाँ हिंसा हो रही है नहीं तो हम तो 'धर्म' के साशानाधीन थे न। पता नहीं, हमारी खाप पंचायते कितनो को पी गयी हैं के पुलिस थानों में शिकायते भी दर्ज नहीं होती। मतलब यह के हिंसा और बलात्कार तभी माँने जायेंगे जब पुलिस में  रिपोर्ट होगी अन्यथा उसका मतलब यह के हमारी गाँव में धर्म का राज्य है। वाकई में हमरे गाँव में धर्म की सत्ता चलती है और उसका विरोध होने पर सजाये मौत होती है और उसका पता भी नहीं चलता। आज भी गाँव में जो हो रहा है वोह एक परदे के भीतर छुपा हुआ है और उसकी खबर तक नहीं लगती। आखिर तुलसी की सामंती मानसिकता ने बिना देखे ही थोड़े लिखा के 'ढोल गंवार शुद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी'. 

मोहन कहते हैं के शादी सामाजिक गठबंधन है जो पुरुष और स्त्री के बीच होता है जिसमे पुरुष की जिम्मेवारी कमाँ कर लाना और महिला की बच्चे और घर संभालना है। अगर शादी सामाजिक कॉन्ट्रैक्ट है तो उसके ना चलने पर उसको तोड़ने में इतना भयभीत क्यों होते हैं हमारे रहनुमा। अगर [पुरुष अपने कर्त्तव्य को नहीं पूरा कर रहे तो शादी का कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म हो जाना चाहिए लेकिन वोह होता नहीं। यह गठबंधन बेमेल है जहाँ एक पार्टनर के पास कोई ताकत नहीं है और वोह धार्मिक परमराओ को धोती हुई लुटती रहती है और पुरुष अपना पुरुषार्थ दिखाते हैं। आखिर हम राम को पुरुशारती या आदर्श पुरुष क्यों मानते हैं। और जब तक हमारे आदर्श ढकोसले और झूट पर आधारित होंगे तो कोई न्याय की उम्मीद कैसे कर सकता है।

दिल्ली की घटना के बाद से ही महिलाओं का सवाल अब मुख्य बन चूका है और इस पर व्यापक बहस है। संघ इस बहस को केवल बलात्कार तक सीमित रखना चाहता है और इसको केंद्र सर्कार और कांग्रेस तक सीमित कर व्यापक मुद्दे से ध्यान बंटाना चाहता है। इसलिए सुषमा स्वराज उस लड़की को ' अशोक चक्र' देने की बात कहती हैं जैसे यह पुरुस्कार किसी के बलात्कार होने पर दिए जाते हों। प्रश्न यहाँ पर भरी  पुरुस्कार या कानून के नाम कारन की नहीं है अपितु न्याय की है। हमारा समाज, हमारी सरकार  और हमारी वयवस्था चरमरा गयी है और उसका जवाब देना जरुरी है। यह भाजपा या कांग्रेस का अथवा दिल्ली या मुंबई का नहीं है, प्रश्न यह है के हमारे समाज में महिलाओं के प्रश्न कैसे रहेंगे और क्या हम ईमानदारी से उनके उत्तर ढूँढने की कोशिश करेंगे भी या नहीं 

आशा राम बापू कह रहे हैं के बलात्कार के लिए वह लड़की जिम्मेवार थी और यदि वह उन लडको को भाई कह देती या उनसे भीख मांग लेती तो बच  जाती . यह उसी मानसिकता की सोच है जो कहते हैं लड़की को जुबान चलने का हक़ नहीं या उसे अपनी बात कहने का अधिकार नहीं। आशाराम जी यदि बात इतनी आसान हो तो सभी लड़कियों को राखी का धागा अपने पर्स में रखने के लिए  ताकि वे सुरक्षति रहें।  अब एक नया धंधा चला है के भारत में पच्छिमी संस्कृति बढ़ रही है इसलिए ऐसा हो रहा है। 

पूरी बहस यहाँ तक पहुँच गयी है मनो सेक्स बहुत बड़ा अपराध है और सेक्स और बलात्कार में कोई अंतर करना ही बहुत मुश्किल हो गया है। नैतिकता के पुजारी अब हमारे बेडरूम तक झांकेंगे और  कहेंगे के क्या प्यार है और क्या अपराध। हमें संभल कर इन प्रश्नों को देखना है क्योंकि अब हमारी सामंती मानसिकता का पर्दाफास हो रहा है और संघ और उसके बहुदेवता इसलिए अब अपनी जुबान खोलने लगे हैं क्योंकि पहले तो वे केवल दिल्ली वाली घटना के परिपेक्ष्य में बात कर फांसी आदि की सजा की बात कर रहे थे लेकिन जब लगा की बहस से हिंदुत्व का पूरा टायर फट जायेगा तो नागपुर वालो ने होश संभाला और अपनी बात रख यही दी। सवाल यह हैं की महिला हिंसा का प्रश्न बहुत व्यापक है और इसको धर्मो की ऊपर देखना पड़ेगा और जहाँ पर धार्मिक कानूनों को चुनोती देनी हो वहां देनी पड़ेगी। लेकिन उससे पहले हमें सेक्स को पाप कहने से रोकना होगा। यदि सेक्स पाप है तो 2 अरब भारतीय लोग पापी हैं और उनको बात करने का हक नहीं। मैं यह बात इसलिए कर रहा हूँ के धर्म के ठेकेदार यह ही चाहते हैं के महिला हिंसा को सेक्स से जोड़कर उसके अधिकारों पर अतिक्रमण किया जाए। सेक्स और बलात्कार होने पर महिला की 'अस्मिता' और 'अबरू' लुटने की बात अब बंद होनी चाहिए क्योंकि यह महिला को और प्रताड़ित करते हैं। सेक्स एक व्यक्ति चाहे महिला हो या पुरुष उनका व्यक्तिगत अधिकार है और अपनी सहमती से वे यह कर सकते हैं लेकिन नैतिकता के पुजारी अपनी सामंती सोच को थोपने के लिए अवसर तलाशते हैं। आज दिल्ली की घटना ने हरेक मठाधीश को अपनी बात कहने और गंगाजल में हाथ धोने के अवसर दिए हैं जहाँ रामदेव से लेकर आसाराम तक कुच्छ न कुछ कह रहे हैं।

आज हमें महिलाओं के प्रश्न पर बात करते समय अपनी संस्कृति और धार्मिक ग्रंथो का पुनर्पाठ करना होगा ताकि समाज के सामने कटु सच उजागर हो सके  बरबरी के लिए कोई भी जंग धर्मो की चिता के बिना संभव नहीं है। महिलाएं धर्मो की 'रक्षक' हैं उनसे 'समाज' चलता है और 'परिवार' बनते हैं इसलिए इन सभी को 'बचाने' के लिए क़ुरबानी की जरुरत होती है और वो सभी धर्मपरायण लोग दे रहे हैं। आज जरुरत है इन रीति रिवाजो और परमपराओ को तोड़ने की और उनहे छोड़ने की ताकि नए भारत का निर्माण हो। यह निर्माण मनुवाद को पूर्णतया ध्वस्त किये बिना संभव नहीं है। महिलाओं की आज़ादी का प्रश्न सांस्कृतिक धार्मिक परम्परओ को छेड़े बिना संभव नहीं है और जो लोग उसे केवल 'बलात्कार' और उसकी फांसी तक सीमित रखना चाहते है वे औरत की आज़ादी के सबसे बड़े दुश्मन हैं क्योंकि वे 'पवित्रता' और 'सतीत्व' पर प्रश्न भी खड़ा नहीं करना चाहते क्योंकि अंत में बलात्कारी को चाहे मृतु दंड हो या आजीवन कारवाश, उत्पीडित महिला तो 'जिन्दा लाश' बन कर ही रहेगी क्योंकि मनुवाद की द्रिस्थी में उसकी 'पवित्रता' खत्म हो चुकी है। सुष्माजी या आसाराम इन सवालो को कारपेट की नीचे ही देखते रहना चाहते हैं क्योंकि ज्यादा बहस हमारे समाज को 'खत्म' कर सकती है और पुरोहितो की दुकानदारी बंद हो सकती है और यह सभी 'समझदार' हैं और अपनी दुकान बंद नहीं होने देंगे लेकिन हमें भी पूरा जोर लगाना होगा ताकि मनुभक्तो की दूकान पर पूर्णतया ताले लग जाएँ और हम एक प्रबुद्ध भारत का निर्माण  कर सके जहाँ सभी आज़ाद हवा में सांस ले सके।


Thursday, 13 December 2012

तलाश एक अदद दुश्मन की





विद्या भूषण रावत  

गुजरात चुनाव में नरेन्द्र मोदी एक बहुत बड़ी जंग लड़ रहे हैं। यह जुंग उन्होंने खुद कड़ी की है। हजारो लोगो की मौत का आरोप अभी भी उनके सर पर लगा हुआ है। मोदी उसे एक तगमा भी मानते हैं लेकिन जानते हैं के भारत की राजनीती में आने के लिए उन्हें अपना माथे के इस कलंक को धोना भी पड़ेगा। मुसीबत यह की यदि वोह इस कलंक को धोते हैं तो उनके हिंदुत्व के रिश्तेदार उनसे दूर छिटक जायेंगे . जिस प्रकार की राजनीती को मोदी ने गुजरात में खड़ा किया है उसको धोने में अभी बहुत समय लगेगा और मात्र गुजरात के आर्थिक विकास के नारे से वहां की अंदरूनी हकीकत को बयां नहीं किया जा सकेगा।

मोदी और उनके समर्थको का प्रयास बार बार रहा है के उनको एक दमदार प्रशासक के रूप में प्रस्तुत करें और गुजरात विकास के मॉडल को दुनिया के समक्ष रखा जाए हालाँकि मोदी का आर्थिक मॉडल राहुल के राजनितिक सलाहकारों जैसे मोंटेक सिंह और चिदम्बरम से भिन्न नहीं है और विदेशी पूंजी के लिए उनके रस्ते बहुत पहले से ही खुले हुए हैं यह बात और है के मोदी की आर्थिक नीति उनके राजनैतिक क्रय कलापों से स्वीकार्य नहीं हो पा रही। फिर भी उनकी साम्प्रदायिक और दकियानूसी छवि को गुजरात विकास मॉडल के नाम पर ढकने से उनके देश में स्वीकार्य होने की कोई सम्भावना    नहीं  है।

मैं यह मानता हूँ के मोदी को गुजरात का शक्तिशाली वर्ग पसंद करता हो क्योंकि हमारी राजनैतिक प्रणाली ऐसी है के इसमें एक दुसरे को लड़ा के और वोटो के अंकगणित फिक्स करके और  फिर पूंजी की चासनी में उसको दल दे तो मोदी जैसे लोग सफल होंगे। गुजरात में अभी भी दलित बहुजन राजनीती हासिये पे है और वोह ज्यादा चल नहीं पाए। पैसों की ताकत से पूंजी ने अपना सबसे बड़ा रौद्र रूप गुजरा में दिखाया है जहाँ विकास के मायने मारवाड़ी सिन्धी बनिया पटेल आदि लोगो को ही 'विकसित' मानकरके पुरे गुजरात का आर्थिक विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है। यह जातियां तो पहले से ही व्यापारिक रही हैं और गुजरात हो या न हो इन्होने पैसे कमाए हैं क्योंकि सामाजिक बदलाव या देश के हालातो से उन्हें बहुत मतलब नहीं। वे धर्म, ढोंग, बाबा, महात्मा पर पुरे पैसे खर्च करने को तैयार हैं लेकिन यदि दलित पिछड़ा गुजरात में जब भी किसी कार्यक्रम में भागीदार है तो उनके आर्थिक बहिस्कार की संभावना होती है। अगर गुजरात के विकास को मॉडल देखना हो तो आदिवासियों और दलित पिछडो की हालत को देखना होगा और फिर विश्लेषण करना होगा। मुस्लमान तो मोदी के राज में हासिये पे रहा हे है और उसकी बात तो कोई भी पार्टी नहीं कर रही।

क्या यह शर्म की बात नहीं के गुजरत में धर्मनिरपेक्षता की बात कर रही कांग्रेस पार्टी के पास मुसलमनो को प्रतिनिदित्व देने  के लिए मात्र 6 सीटें ही थी। मोदी तो 'सद्भाव मिशन' चला रहे हैं और इरफ़ान पठान को घुमा रहे हैं लेकिन मुसलमानों को राजनैतिक प्रतिनिधित्व के लिए उनके पास समय नहीं है और लोग नहीं हैं। 2002 की शर्मनाक घटनाओ और उनके उत्पीडित लोगो को कोई न्याय नहीं मिला है और ऊपर से मोदी बार बार माहौल को सांप्रदायिक बनाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वोह हिंदुत्व की राजनीती कर अच्छे वोट बटोर सकें 

मोदी केवल एक राजनैतिक व्यक्तित्व नहीं है। वह एक विचार भी है जिसके मूल में हिटलर की विचार धारा है। वोह आर्थिक विकास की आधार पर कोई वोट नहीं वाटर सकते क्योंकि जो उनका वोट बैंक है या उनके प्रशंशक हैं उन्होंने पहले ही अच्छे से पैसे कमायें हैं और उस पैसे को और लगा कर वोह देश में भी वोही मॉडल लाना चाहते हैं। आज, मोदी अमेरिकी मॉडल पे चुनाव लड़ रहे हैं। उनका ब्रांड बनाया जा रहा है और उसे हमारे सामने परोसा जा रहा है। यह खेल पूंजी के हैं इसीलिये कांग्रेस की तरफ से कुच्छ लोगो के 2014 के लिए चिदंबरम का नाम आगे किया। यह बहुत शातिर राजनीती का हिस्सा है जिसमे देश के ऊपर पूंजी तंत्र के चाहने वाले लोगो को थोपा जाए ताकि दलालों की दलाली अच्छी से चलती रहे।

मोदी का गुजरात मॉडल पिट चूका है। गुजरात की राज्य बसें राजस्थान से अच्छी नहीं हैं। वहां के विश्वविद्यालयो के कोई और स्कूल कालेजो में कोई बहुत ब्रांड नहीं है। आई आई एम् अहमदाबाद या आनंद के रूरल डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट को छोड़ दे तो गुजरात में कुच्छ नहीं और ये दोनों संसथान मोदी की दें नहीं हैं अपितु पहले से चल रहे हैं . गुजरत के मुस्लमान अच्छे व्यापारी थे और मोदी की साम्प्रदायिक निति ने उन्हें सबसे ज्यादा चोट पहुंचाइये उनके होटलों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया और उनका बहिष्कार किया गया। अगर गुजरात के मुसलमान अपने को अक्ल पाते हैं तो क्या यह मोदी की सफलता है?

शायद हाँ क्योंकि हिंदुत्व की राजनीती भी यही है के मुसलमानों को अलग थलग कर देश की राजनीती का हिन्दू कारन किया जाए। यानि की हिंदुत्व की बात करने की ठेकेदारी अब केवल भाजपा की ही ना हो अपितु कांग्रेस भी वोह राम नाम जपे और अन्य पार्टियाँ भी वैसा ही करें और शायाद आज वोह अपने इस मिशन में तो कामयाब हो गए लगते हैं।

लेकिन, गुजरात में राहे अभी भी इतनी आसान नहीं हैं। हिंदुत्व के पुराने प्रहरी केशुभाई जी नाराज चल रहे हैं और मोदी की हालत खस्ता कर सकते हैं इसलिए मोदी के वादों की झड़ी लगने की बाद भी उन्हें अपनी आर्थिक नीतियों पर कम भरोषा हैं। पचास लाख घर बनवाने के लिए वादा करने वाले नरेन्द्र मोदी के 'गौरवशाली' शासन की पोल इसी बात में  जाती है के उनके इस बात का मतलब यह की गुजरात में कम से कम इतनी बड़ी संख्या में बेघर लोग हैं और बेरोजगारी भी ज्यादा है। और शायद इसीलिये मोदी बार बार 'रास्ट्रीय' प्रश्नों को उठा रहे हैं। वैसे मोदी के कृपा से गुजरात के चुनाव हमेशा अंतररास्ट्रीय रहे हैं क्योंकि उन्हें किसी 'मियां' की जरुरत हमेशा रहती है, मिया मुशर्रफ से शुरू हुयी उनकी पुरानी पारी कभी जेम्स माईकेल लिंगदोह को निशाना बनाती तो कभी उन्हें मिया अहमद पटेल की जरुरत पड़ती।  जब वोह फलसफा भी नहीं चला तो मोदी को सर क्रीक को मुद्दा नज़र आ गया। मिया इरफ़ान पठान शायद ज्यादा काम न आयें इसलिए मोदी को बार बार एक दुश्मन चाहिए ताकि गुजरात को वोह वोह सांप्रदायिक आधार पर विभाजित किया जा सके और उनकी राजनीती चल सके  लेकिन मोदी अगर अपनी हिंदुत्व की राजनीती ज्यादा करेंगे तो भले ही गुजरात जीत जाएँ वोह कांग्रेस के लिए शुभसंकेत दे रहे हैं क्योंकि भारत की राजनीती को हिंदुत्व के गुजराती मॉडल के जरिये नहीं चलाया जा सकता। यहाँ देश की विविधता का सम्मान करना पड़ेगा और देश में 15 करोड़ मुसलमानों को अलग थलग करके या उनका अपमान करके आप कुच्छ भी नहीं कर सकते। देश के दुसरे हिस्सों में दलित, पिछड़ा और आदिवासी अपने अधिकारों के लिए जाग चूका है इसलिए मोदी के ब्राह्मणवादी हिंदुत्व के झांसे में वह नहीं आ सकता . गुजरात के परिणाम 20 दिसंबर को आ जायेंगे और चाहे मोदी वहां दोबारा आयें या नहीं, मोदी भारत के शासक नहीं बन सकते क्योंकि हिंदुत्व के ब्राह्मणवादी दकियानूसी एवं सांप्रदायिक  अजेंडे को देश अच्छे से समझ चूका है और  पहले ही ख़ारिज कर चूका है।

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Wednesday, 5 December 2012

Lokaayat: भारत के संकल्प का दिन

Lokaayat: भारत के संकल्प का दिन: विद्या भूषण रावत  आज 6 दिसम्बर है। भारत वर्ष के करोडो लोगो के लिए एक शोक का दिन जब वे बाबा साहेब डॉ आंबेडकर की पुन्य  स्मृति को या...

भारत के संकल्प का दिन




विद्या भूषण रावत 

आज 6 दिसम्बर है। भारत वर्ष के करोडो लोगो के लिए एक शोक का दिन जब वे बाबा साहेब डॉ आंबेडकर की पुन्य  स्मृति को याद करते हैं जिन्होंने हमारा जीवन बदला और हमें ससम्मान संघर्ष की प्रेरणा दी। उनकी जलाई मशाल हमारे दिलो में जलती है और हमें बदलाव की और जाने को प्रेरित करती है। संघर्षरत हर एक व्यक्ति के लिए आंबेडकर रोज उनके पास है। उनके कथनों और संघर्षो को हम रोज गुनते हैं और पढ़ते हैं। भारत के दलित बहुजन आन्दोलन के नायक हैं बाबा साहेब आंबेडकर है और उनको केंद्र में रखे बिना यह आन्दोलन कभी आगे नहीं बढ़ सकता। आंबेडकर एक विचारधारा का नाम है जिसने हिंदुत्व और वर्णवादी ब्राह्मणवादी व्यवस्था का विकल्प भारत को दिया और जिस पर चलकर करोडो लोगो का जीवन बदला है। भारत में हुई शांतिपूर्ण क्रांति के प्रतीक है आंबेडकर और यदि  जालसाज ताकते अपनी तिकड़मो से बाज नहीं आयी तो यह शांति एक नयी क्रांति को जन्म दे सकती है और हो सके वोह क्रांति शांतिपूर्वक न हो।

1980 और 1990 के दशक भारत में उथल पुथल और बदलाव के थे। बामसेफ की ताकत बढ़ी। कांशीराम ने बहुजन समाज के नारे को  पुरे देश में प्रचलित किया और केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने बाबा साहेब के शताब्दी वर्ष में उनका सम्मान किया। उनका साहित्य देश भर में लोगो को सस्ते दरो में उपलब्ध हुआ। और जिन बाबा साहेब को भारत के हुक्मरानों ने संसद के बाहर रखा, उनके चित्र को संसद के अन्दर लाया गया। बाबा साहेब हालाँकि के भारत रत्ना से बहुत बड़े हैं लेकिन उनको भारत रत्ना देने से भी बहुत लोगो को परेशानी हो गयी। 1990 में मंडल के आने के बाद तो ब्राह्मणवादी ताकतों को लगने लगा के यदि अब कुछ  ऐसा नहीं किया गया जो लोगो को दिग्ब्रमित कर दे तो वर्णव्यस्था की चूले हिल जाएँगी और हिंदूवादी ताकतों की एकछत्र राज समाप्त हो जायेगा। और इसलिए एक बहुत बड़े 'प्रोजेक्ट' पर कार्य शुरू हुआ और इसका नाम था 'अयोध्या'.

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए लाल कृष्णा अडवाणी रथ यात्रा पर निकले। उनके मानाने की कोशिश हुई लेकिन वे नही माने'.  देश में खून खराबा हुआ लेकिन उससे उन्हें क्या मतलब। वर्णवादी बाबाओ को आगे किया गया। राम मंदिर के लिए ईंटो को देश भर में घुमाया गया।खूब चंदा इकठ्ठा हुआ लेकिन मजाल क्या की किसी ने चंदे का हिसाब माँगा हो। बाबरी मस्जिद के नाम पर भी दुकाने सजी। जब हिन्दू वर्णवादी सामने आएगा तू मुस्लिम सामंती ताकते पीछे रहेंगी क्या। उन्होंने भी अपनी दुकान सजाई और लोगो पिसते रहे। खैर 1990 में केंद्र सरकार इसलिए गयी क्योंकि वो अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ध्वंश को बचा पायी क्योंकि तैयारी तो उस वक्त भी थी।

केंद्र में नरसिम्हाराव की सरकार आये और वो तो पूर्णतया संघ में प्यार में पागल थी। तिकडमें  उनको पूरी करनी थी। वाजपेयी और अडवाणी उनके परम मित्र थे। फिर अडवाणी ने यात्रा निकली और इस बार कसम खाई के मंदिर जरुर बनायेंगे। लेकिन मंदिर बनाना मुख्या उद्दश्य नहीं था। मुख्या उद्देश्य था दलितों और पिछडो में आ रही बदलाव की चाह  और क्रांति को खत्म करना। दलितों को बाबा साहेब ने एक दर्शन दिया और इसलिए बाबा साहेब से जुदा कर तो कोई उन्हें अपने पाले में नहीं ला सकता लेकिन पिछ्डी  जातियों में सांस्कृतिक बदलाव के आभाव में मुस्लिम विरोध के नाम पर और 'राम' के नाम पर बहुत बड़ा तबका हिंदुत्व के पाले में आ गया। इसके लिए कल्याण सिंह, उमा भारती, शिव राज सिंह, और बहुत से अन्य नेताओ को आगे बढाया गया। यानी हिंदुत्व का भी मंडलीकरण  हुआ लेकिन इसके मूल में था मुसलमानों का विरोध और सत्ता की नकेल ब्राह्मणवादी ताकतों के हाथ में। इसलिए मैं ये मानता हूँ, बाबरी मस्जिद का ध्वंश हिंदुत्व की एक चाल  थी जो मुसलमानों के विरोध के नाम पर विभिन्न जातियों को  हिंदुत्व के नियंत्रण में या उनके अधीन लेन की एक साजिश थी जिसमे वे सफल हुए।  ऐसे नेता समुदायों के नाम पर आये जिन्हें पार्टी की मंडल विरोधी स्वरूप से कोई मतलब नहीं था वे तो राम के नाम की दुकान चला कर लोगो को बरगलाना चाहते। इसलिए राम मंदिर का आन्दोलन और कुछ  नहीं दलित पिछडो को धर्म के नाम पर कुंद कर देने का आन्दोलन था जो मंडल के बाद की आग को बुझाने में कामयाब होगया और बहुत बेहतरीन तरीके से संघ के विशेषज्ञों ने इस पर सेंध मारकर जातिविरोधी आग को आज दलित विरोधी आग में बदला है।

अब नए बाबा पैदा किये जा रहे हैं और वो जातियों के नाम पर आ रहे हैं। इन साजिशो को ध्यान देना पड़ेगा। अस्मिता की राजीनति या कूटनीति के पहले विशेषज्ञ संघ परिवार है। यह हमेशा ध्यान रखना पड़ेगा। 

बाबरी मस्जिद के ध्वंश में कांग्रेस और नरसिम्हाराव की भूमिका को नाकारा नहीं जा सकता। कांग्रेस की दोगली चलो ने हिंदुत्व के इन ठगों को मज्बूत किया। अगर इतने मज्बूत थी कांग्रेस तो नरसिम्हाराव ने अपने पहले प्रसारण में बाबरी मस्जिद के दोबारा निर्माण की बात कही लेकिन हिंदुत्व के मठाधीश यह जानते हैं के अब कोई पार्टी ऐसी बात नहीं करेगी क्योंकि 'सांप्रदायिक' तनाव बदेगा। सबचुप हैं।

अफ़सोस के जिन लोगो को जेल के सीखचों में होना चाहिए था वे देश के मंत्री और भविष्य भी बन रहे हैं।   क्या यह भारत के लोकतंत्र का दोगलापन नहीं के यह यदि मुसलमान दंगो में फंसे तो आतंकवादी, दलित और आदिवासी अपने मुद्दों पर हिंसक हो तो नक्सलवादी  और माओवादी लेकिन ब्राह्मणवादी हिंसक हों तो सीधे सत्ता में आते हैं और रास्ट्रवादी  कहलाते हैं। इस बात को संघ से लेकर हिंदुत्व की सारी कौम जानते है हैं इसलिए ठाकरे अपराधी नहीं होते, मोदी मुख्यमंत्री बनते हैं और अडवाणी के उप प्रधान मंत्री और गृह मंत्री बन्ने पर किसी को अफ़सोस नहीं होता, कोई आवाज नही उठती। आज अडवाणी हमारे सभ्य देश के सभ्य नागरिक हैं और कोई नहीं कहते के सी बी आई क्यों नही मुकद्दमा चलती। लालू और मुलायम या मायावती के नाम पर चिल्लाने वाले ये क्यों भूल जाते हैं के आज तक सांप्रदायिक और जातीय दंगो को करवाने वाले एक भी हिंदुत्व के हिंसक को सजा नहीं मिल पाई है। ये दिखता है हमारा देश कितने खतरनाक तौर पर सांप्रदायिक जातीय लोगो की गिरफ्त में है।

दलित बहुजन समाज की एकता ने भारत में सम्प्र्दायिक्क ताकतों को बाहर  खदेड़ा लेकिन आज  उनके बीच बढ़ती दुरी भारत में जातीय दुराग्रह और सांप्रदायिक ताकतों को दिल्ली की और बढ़ने के संकेत दे रही है। यह बिलकुल सच है के दलितों में वैचारिक मजबूती आ चुकी है और वोह ऐसी परिस्थितयों को समझ चुके हैं। आज बाबा साहेब को नमन करने का दिन है और ये भी समझना जरुरी है के अम्बेडकरवाद में भारत की एकता और प्रबुद्ध भारत बनाने  की ताकत है। इसलिए आंबेडकर और उनके दर्शन को अपनाकर अन्य लोग भी आगे बढ़ सकते हैं। और मुझे यकीं है के भारत में एक तर्कवादी मानववादी संस्कृति के चाहने वाले लोगो बाबा साहेब अम्बेडकर के विचारो में अपनी क्रांति के बीज देखेंगे ताकि इस देश में चल रही हिंदुत्व की साजिशी संस्कृति को समाप्त किया जा सके और के पूर्णतया प्रबुध समाज की नीव डाली जा सके जहाँ कम से कम सत्ता का तंत्र धर्म निरपेक्ष हो और सरकार भेदभाव रहित काम करे और  आगे बढ़ने का मौका हो। 

हिंदुत्व के ताकतों ने बाबरी मस्जिद के ध्वंश के लिए आज का दिन चुनकर भारत में आंबेडकर के  मानववादी दर्शन को खत्म करने की कोशिश की है और उसके स्थान पर मनुवादी ब्राह्मणवादी दकियानूसी परम्परो को अमली जमा  के प्रयास किये हैं जो कभी सफल नहीं होंगे। हमें विश्वाश है के सभ्य समाज के सभी लोग कभी भी अपना जीवन इन कुंठित, दम्भी और पाखंडी लोगो के हवाले नहीं करेंगे और इन सबके लिए हमारे सामाजिक जीवन में वैकल्पिक सांस्कृतिक बदलाव की आवश्यकता है और वोह बाबा साहेब आंबेडकर के जीवन दर्शन से हमको मिलता है। आइये उनके प्रबुध्ध भारत के आन्दोलन को आगे बढ़ाएं।

Friday, 30 November 2012

Introspection time for Media in India.


मीडिया के आत्म चिंतन का समय 

विदया  भूषण रावत 

जी टी'वी और नवीन जिंदल के घटनाक्रम के बाद यह प्रश्न खड़ा हुआ है की क्या मीडिया में कोई नियंत्रक होना चाहिए। अख़बार हिन्दू ने एक ओम्बड्समैन रखा जो उसकी खबरों और उन पर लोगो की आपत्तियों को देखता है लेकिन दुसरे समाचार पत्रों या टी वी चनलो के पास तो उसको रखने का वक़्त भी नहीं। अखबारों के मालिक किसी भी नियंत्रण के इसलिए खिलाफ है क्योंकि यह 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का 'हनन' है। प्रश्न यह है की संपादको और उनके मालिको के आलावा और लोगो को भी यह अधिकार है और यदि किसी खबर से किसी व्यक्ति के प्रतिष्ठा को चोट लगती है तो मीडिया के पास क्या है के उसकी इज्जत को वापस किया जा सके ज्यादातर मामलो में अख़बार रेजोइंडर को ऐसे छापते हैं के पता ही नहीं चलता . आज तक किसी भी समाचार पत्र ने अपने खेद को उस तरीके से और उतने महत्व के साथ नहीं छपा जितने महत्व से खबर छापि गयी होती है। 

जी के मसले में यह सवाल भी पूछना पड़ेगा के क्या संपादको की गिरफ़्तारी उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्र का हनन है। क्या ये प्रेस पर हमला है। आज अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की प्रतिबधता और विश्वशनीयता पर संकट है। यह संकट जी जिंदल घटनाक्रम से नहीं हुआ बल्कि इसके मूल बिंदु में मीडिया की ताकत और धनधान्य की प्रचुरता रही हा। आज के रिपोर्टर पुराने ज़माने का 'पत्रकार' नहीं है जो एक सैधांतिक निष्ठा और मिशन के जरिये पत्रकारिता करता है। आज का मिशन कनेक्शन है।

समाचार कक्ष में विज्ञापन और मार्केटिंग कर्मियों का हावी होना और संपादक को उसकी औकात बता कर रखना यह नए तरीके है जिस कारन देश के सबसे मीडिया घराने ने संपादक रखने बंद कर दिया जो अख़बार कल अक संपादको ने नाम से जाना जाता था आज वोह अपने मालिको के नाम से चलता है। कहा गया के संपादक नहीं अख़बार ब्रांड है। हम लोग तो राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, एस पी सिंह , अरुण शौरी, एन राम,  आदि को ब्रांड समझकर पढ़ते थे और उनके लेख को कई कई बार देखते गुनते थे। लेकिन अब वोह समय नहीं। न्यूज़ एक मार्किट है और उसके फलस्वरूप पैसा निकलना है। अख़बार प्रोडक्ट है और उसे विज्ञापनदाताओ को लाभ  देना है। ऐसे स्थिथि में जी जैसे घटनाक्रम को होना ही था और यह नयी बात नहीं हा।

जब खबर पैसे देखर चपटी हो और सम्पादकीय विज्ञापन और मार्किट के हिसाब से लिखे जाएँ तो फिर सुधीर चौधरी और समीर अहुल्वालिया जो कर रहे थे वोह क्या गलत है। आज कल न्यूज़ एंकर भी तो ब्रांड हैं। टी वी पे देखेंगे तो दिखाई देगा कैसे इन्वेस्टीगेशन करते हैं और अपने प्रति कितने सतर्क हैं। सबको लगता है के देश उनको सुनता है और इसमें जितना राजनेताओ को गरीयो तो अच्चा रहेगा क्योंकि मध्यमार्ग तो नेताओ को गली देने से ही इतिश्री मान लेता है। नेताओ को टीवी पर गली देकर या गरियाकर टी आर पी तो बढ़ सकती है लेकिन सत्ता परिवर्तन नहीं होना। आखिर जो लोगो सोनिया गाँधी के वंशवाद का विरोध करते हैं वोह दुसरे वंशवाद पे चुप क्यों रहते हैं। और राजनीती में तो वंशवाद के बावजूद भी लोगो के वोट लेने पड़ते हैं लेकिन मुकेश अम्बानी, अनिल अम्बानी, अभिषेक बच्चन, समीर और विनीत जैन और भारत का पूरा व्यवसायी तबका वहः कैसे पहुंचा क्या वो बिना वंशवाद के पंहुंच गया। क्या यह महारथी अब कहेंगे के उनकी कंपनिया अब आगे से उनके रिश्तेदारों और चाटुकारों से नहीं चलेंगी। वंशवाद हमारी जड़ो में है और भ्रस्थ्छार की जननी है लेकिन उसके लिए केवल नेताओ को गली गलोज कर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। देश के सबसे 'सेक्युलर' अख़बार हिन्दू को जब वंशवाद से हटाने के प्रयास हुए तो हंगामा हुआ। अभी तक उस अख़बार के सारे संपादक परिवार से निकले .

खैर, बहस में मीडिया नी नैतिकताएं और सीमायें हैं। अख़बार क्यों अपने यहाँ आचार संहिता लागु करने से कतराते हैं। दुनिया को नैतिकता का पथ पढ़ने वाले कमसे कम खुद भ ई तो कुच्छ करके दिखाएँ . यह कहना जरुरी इस्लिए है क्योंकि संपादको के नाम पर अब केवल मार्केटिंग मेनेजर और पब्लिक रिलेशन ऑफिसर ही बैठे हैं और इसी कारण से संपादक की कुर्सी का इस्तेमाल अखबारों के सम्पादकीय के लिए नहीं कंपनी के काम के लिए होता है। इसलिए सवाल यह है के जी के एडिटर्स जिंदल के ऑफिस में क्या कर रहे थे। 

सवाल यह उठता है के क्या भ्रश्ताच्कार के विरुद्ध मीडिया की तथाकथित जंग केवल ब्लाच्क्मैलिंग का साधन थी . क्या खबरों की कडुई सच्चाई को संपदक और पत्रकार नेताओ को पहले ही बता देते हैं और यदि बात नहीं बनी तो 'भंडाफोड़' और बन गयी तो 'दुश्मन' का भंडाफोड़'. अगर कोई संपादक होता जो देशकाल के घटनाक्रम से चिंतित होता तो ऐसे हरकते नहीं करता। हम उनके विचारो से असहमत होते लेकिन उनको कभी दलाल नहीं कहते . जिन लोगो के मैंने नाम लिखे उनके सम्पादकीय मैं बड़े चाव से पढता था और लेख भी क्योंकि उनसे असहमति हो सकती थी लेकिन कोई उनके मंतव्य पर भ्रस्थ्चार या दलाली के आरोप नहीं 
लगाता। आज स्थिति गंभीर है और वो इसलिए क्योंकि बाजारी तकते मीडिया के नाम से दंधेबाज़ी कर रही है और उनके लिए लोग ज़रूरी नहीं हैं अपितु अपने मालिको के हित ज़रूरी है और मालिक अगर केवल अख़बार चलाते तो कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन आज तो मालिको के पास रियल एस्टेट से लेकर शेयर बाज़ार के धंधे भी हैं और इसलिए उनके हर कार्य अपने हितो से जुड़े हुए हैं।

आज मीडिया को एक नयी दिशा की जरुरत है। बहस की जरुरत है। और खुली बहस की। मीडिया की मोनिटरिंग भी  होनी चाहिए और एक मज़बूत कानून आये जिसमे मीडिया कर्मी, सामजिक कार्यकर्ता लेखक, कानूनविद, इत्यादि शामिल हों जो मीडिया के कंटेंट्स इत्यादि पर नज़र रखे और यह 'स्वंत्रता' के धंधेबाजो को देखे के वो ल;लोगो को कितनी स्वतंत्र खबरे पंहुचा रहे हैं। मीडिया को रेगुलेटर की जरुरत है ताकि देश में एक अच्चा माहोल हो और हम इन चीख चीख केर क्रांति करनेवालों से बचे और अख़बार और टीवी एक सभ्य और पारदर्शी बहस चलायें और आलोचना और निंदा केवल अपने व्यावसायिक होतो के मुताबिही ही न करें . मीडिया देश और समाज से बड़ा नहीं है। जो कानून हम सबके लिए हैं वोह मीडिया के लिए भी  है . अभिव्यक्ति की आजादी  बहुत जरुरी है क्योंकि ये हमारी वैचारिक प्रश्न है और व्यावसायिक हितो के नाम पर इसका इस्तेमाल नहीं क्या जा सकता। इसलिए यदि एक रेगुलेटर होगा तो वोह पहले ही बातो को नियंत्रित कर लेगा और फिर पत्रकारों या पी आर एजेंटो को जेल नहीं जाना पड़ेगा और सरकार को दख्लांजी का बहाना नहीं मिलेगा और हमारी आज़ादी बची रह पायेगी।
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Tuesday, 27 November 2012





भारतीय राजनिति को विश्वनाथ प्रताप सिंह की देन 


विद्या भूषण रावत 


आज भूतपूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की पुण्य तिथि है। देश की राजनीती में उनके योगदान को हमेशा याद किया जायेगा क्योंकि उनके किये गए प्रयोग आज की राजनीती के मुख्या स्तम्भ हैं। भ्रस्ताचार के खिलाफ उनके अभियान के कारण उन्हें मंत्रिपरिषद से हटना पड़ा था और मंडल लागु करने के कारण  भारत के ब्राह्मणवादी तबका उनका सबसे बड़ा दुश्मन बना।

अपने लम्बे राजनैतिक जीवन में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने आम जनता से जुड़ने का प्रयास किया और मूल्यों पर आधारित राजनीती की। दिल्ली की झुग्गी झोपड़ियों के लिए उनके संघर्ष को भुलाया नहीं जा सकता। सुचना का अधिकार और नरेगा जैसे सवालो पर भी वे देशव्यापी संघठनो  के साथ खड़े थे।

धुर्भाग्यवाश रिलायंस के विरुद्ध भ्रस्थाचार का धामभ भरने वाले तथाकथित कार्यकर्ताओ को पता नही की राजीव की मंत्रिपरिषद वित्त मंत्री की हैसियत से धीरू भाई अम्बानी की हालत ख़राब करने वाले वी पी को रिलायंस की दुश्मनी जिंदगी भर झेलनी पड़ी लेकिन दादरी में रिलायंस के जिस पॉवर प्लांट को लगवाने के लिए किसानो की भूमि को कौड़ियो के भाव मुलायम सिंह के फैसले के विरुद्ध उन्होंने संघर्ष किया और लोगो को उनकी जमीन वापस दिलवाई।

वी पी सिंह में दंभ नहीं था और आज के दौर की राजनीती में भी उन्होंने जनोन्मुख राजनीती की। आज उनकी कमी इसलिए खलती है क्योंकि तीसरे मोर्चे को जीवंत रूप देने वाले वह ही थे। उनके अन्दर एक करिश्मा था, एक नैतिक बल था जो उन्हें औरो से बहुत ज्यादा आगे खड़ा करता था। अस्मिताओ की राजनीती की दौर में उन्होंने उन लोगो से भी गालियाँ खाई जिनके लिए वह अपने समाज से दूर हटते चले गए। वी पी का जीवन और उनकी राजनीती भारत में जाति और उसके खूंटे से बंधे होने के हमारे चरित्र को भी दिखता है। उनके प्रति इतनी नकारात्मकता की भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्दोनल के 'मसीहा' लोग भी उनका नाम लेने से डरते हैं। उसका करान केवल एक के दलितों और पिच्च्दो के हक के लिए उन्होंने जो भी कुच्छ किया उसे हिन्दू वर्ण व्यवस्था के शुभचिंतको ने कभी माफ़ नहीं किया। इससे यह भी जाहिर होता है के वर्णव्यवस्था के विरुद्ध किसी भी आन्दोलन को समाप्त करने के लिए ये आतताई कुछ भी करेंगे और उन सबका नाम मिटा देने की पूरी कोशिश करेंगे जो उनकी राह  में रोड़ा थे। 

चाहे वे जो भी करें लेकिन जो बीज वी पी ने बो दिए उनसे देश के राजनीती नहीं हट सकते। अब उसको आगे उनलोगों को बढ़ाना नहीं जिनके संगर्ष के वे साथी थे  हालाँकि पिच्च्दी राजनीति को हिंदुत्व ने काट खाया है और इस कारण से ही ब्राह्मणवादी सम्प्रदायकता का मुकाबला करने में हम असमर्थ हैं या उसका हिस्सा बन गए हैं। सामाजिक न्याय की कोई लड़ाई सम्प्रदाकिता की लड़ाई को छोड़ के नहीं हो सकती। वी पी इन दोनों प्रश्नों पर बहुत साफ़ रहे और उनके मूल्यों से सीखकर हमारे वर्तमान राजनीती के 'तीसरे मोर्चे' को खड़ा कर सकते हैं। वी पी सिंह हो उनकी पुण्य तिथि पर श्रन्धांजलि।