Saturday, 2 March 2013

नए पुरोहितो से नहीं अपितु पुरोहितवाद के खात्मे से ही आएगा बदलाव




विद्या भूषण रावत 

गुजरात के विकास मॉडल पर इतना शोर मचाया जा रहा है जैसे उसे अपनाकर हम एक विकसित रास्त्र बन जायेंगे। पहले भी कई बार मैंने लिखा है के गुजरात में 'दुकान' के आलावा कुछ नहीं है और गुजराती अपनी जाति और धर्म के धंधो में ही व्यस्त है और नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार ने गुजरात को एक सवर्ण हिन्दू रास्त्र के तौर पर विक्सित करने के अलावा कुछ नहीं किया है और ऐसे हिन्दू रास्त्र के बारे में सबको पता चले तो अच्चा है ताकि समय रहते लोग संभल जाएँ और इनको समझ सके।

नरेन्द्र मोदी को देश पर थोपने के लिए विभिन्न प्रकार से उनकी मार्केटिंग की जा रही है. पहले उनके विकास में मॉडल को चढ़ाया गया और फिर उनके सांप्रदायिक सौहार्द को देश वासियों को बताया गया की किस प्रकार मोदी मुसलमानों के दुश्मन नहीं दोस्त है। गुजरात में सबरी और एकलव्य को पुनर्जीवित कर उन्होंने आदिवासियों को पुनः आदर्श हिन्दू व्यवस्था को सँभालने की जिम्मेवारी दी हालाँकि आदिवासियों के जल जंगल जमीं के प्रश्नों को न तो वह कभी समझेंगे और न ही उसको सुलझाने के प्रयास करेगे। अब खबर आयी के उनकी सरकार ने दलितो को 'सम्मान' देने के लिए 'दलित पुजारियों' की ट्रेनिंग की व्यवस्था करी है . मतलब यह के गुजरात सरकार ने २२ लाख रुपैये की व्यवस्था कर दी है बल्मिकियों को संस्कृत पढ़ने के लिए ताकि वे सोमनाथ संस्कृत विद्यापीठ और अन्य संस्कृत विश्वविद्यालयों से संस्कृत पढ़ सकें और 'पंडिताई' कर सके। मुख्यमंत्री मानते हैं के सफाई कर्मी लोग भी पुजारी है क्योंकि वोह नगर की देखभाल करते हैं और पुजारी मंदिर की।

दरअसल, गुजरात की चकाचौंध में जो सबसे कटु सत्य है वो है वहां की जातिवादी राजनीती और समाज. गुजरात में आज भी मानव मल ढ़ोने का कार्य होता है जबकी वहां की सरकार सुप्रीम कोर्ट तक में कह चुकी है की गुजरात में ऐसा नहीं होता  लेकिन २० १ १ की जनगणना के मुताबिक़ कम से कम २ ५ ०० घरों में अभी भी मानव मलमूत्र उठाते हैं लेकिन यह संख्या भी झूठी है क्योंकि सरकारी आंकड़ो पे तो वैसे भी भरोषा नहीं किया जा सक्त. उसी जनगणना के आंकड़े बताते हैं के गुजरात के 5२ लाख घरो में कोई लैट्रिन की व्यवस्था नहीं है और ४९  लाख लोग अभी भी खुले में सोच करते है। केवल २ लाख आम शौचालय हैं। अब सरकारी आंकड़ो से ही चमकते गुजरात की पोल पट्टी खुल गयी है तो अगर हम लोग सर्वे करने चल दिए तो नरेन्द्र मोदी का तिलिस्म चुनाव से पहले ही टूट जायेगा। एक गैर सरकारी अध्ययन टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेस ने किया जिसमे बताया गया के गुजरात में अभी भी 1२,५०६ व्यक्ति मानवमल धोने का काम काम करते है। 

आज भी अहमदाबाद और अन्य शहरो में सफाई पेशे में लगे लोग मलमूत्र हाथो से उठा रहे हैं और इसके विडियो इन्टरनेट पे मौजूद है। सवाल यह है के मोदी की सरकार इस हकीकत को क्यों नहीं स्वीकारती और बाल्मीकि लोगो के उठान के लिए इसने क्या कार्य किये है। गुजरात के शहरों और गाँव में दलित विरोधी माहौल है और किसी भी अस्मिता के उठते ही ज्यादातर हालात में लोगो के आर्थिक बहिष्कार हो जाते है। पटेलो और अन्य सवर्ण जातियों की दादागिरी जारी है. बाल्मीकि लोगो को इंदिरा आवास भी मुहैया नहीं है और ज्यादातर आवास उन्हें गाँव के सबसे किनारे वाले इलाके में दिए गए हैं जहाँ न बिजली की सुविधा है न पानी कि. गुजरात की दूकान में सामाजिक परिवर्तन के लिए कोई जगह नहि. यहाँ के केवल पुरोहित , पोथी ( धर्म की पोथी )  और  पूंजीपति ही लोकप्रिय हैं और गुजरात के धनाध्य  लोगो को उसकी ही जरुरत है. सामाजिक परिवर्तन के लिए उठ रहा अम्बेडकरवाद यहाँ नहीं चल सकता और उसे हटाने के पहले से ही षड़यंत्र हो जाते हैं . दलित और पिछडो को अलग थलग करने के लिए मुसलमानों को दुश्मन दिखाकर हिंदुत्व के बेडे में शामिल करने के लिए अनेक साजिशें होती हैं .

मोदी के अरबो रुपैये के खेल में मात्र बाइस लाख रुपैये दलितों के पुरोहित बनने के लिए अलग से रखे गए हैं। मोदी को यह पुरोहिताई केवल दलितों के लिए क्यों खोलनी है क्या सब लोग मिलकर पंडिताई नहीं कर सकते। दुसरे यह की संस्कृत जैसे मृत भाषा को तो ब्राह्मण और सवर्ण पहले ही छोड़ चुके हैं इसलिए इसके लिए नए कन्वर्ट क्यों ढूढे जा रहे हैं। प्रश्न यह भी है के आज के वैज्ञानिक युग में अंग्रेजी, विज्ञानं, मैनेजमेंट और तकनिकी पढाई के लिए दलित, पिछडो और अन्य सभी को जरुरत है और गुजरात के पैसे वाले यह काम कर सकते हैं तो मोदी ऐसा क्यों नहीं कर सकते ताकि सभी बाल्मीकि और अन्य लोग आधुनिक शिक्षा प्राप्त करें और आगे बढे। तीसरी बात, बेचारे बाल्मीकि लोगो को कौन कौन से मंदिर सौंपे जायेगे यह जरुरी है और मोदी ने ऐसा कुछ भी वादा नहीं किया। इसका अभिप्राय केवल इतना के मोदी बाल्मीकि लोगो को हिंदुत्व का गुलाम बनाना चाहते हैं और उनको अपने मंदिरों की देखभाल करने का जिम्मा खुद ही सौंपना चाहते हैं। मतलब यह के अक्षरधाम, अम्बेजी या सोमनाथ की पुरोहिताई तो ब्राह्मणों के पास ही रहेगी ताकि उनका धंधा मंदा न पड़े और पैसे थोक के भाव मिलते रहे लेकिन गाँव के टूटे फूटे मंदिर जिनमे कोई नहीं जाता उन्हें नए भक्तो को सौंप दिया जाये. मोदी बताएं के क्या बल्मिकियों के पुजारी या पडा बनने से पटेल या ब्राह्मण लोग उनसे शादियाँ या उपनयन संस्कार करवाएंगे ? यह तो कभी भी नहीं होगा और ना ही मोदी की सोच के पीछे ऐसे बदलाव की धारणा है क्योंकि मोदी तो केवल हिंद्तुवा भक्त लोग चाहते हैं ताकि भारत के प्रधानमंत्री की कुर्शी तक पहुचने में यह वर्ग उनको साम दाम दंड भेद से मदद करे और दुसरे दुनिया को लगे के मोदी केवल आर्थिक बदलाव की बात नहीं करते अपितु सामाजिक क्रांति भी ला रहे हैं।

अभी कुछ दिनों पहले अल्लाहाबाद के कुम्भ में भी ऐसी ही क्रांति की बात कही गयॆ. बताया गया के बाल्मीकि महिलाओं ने कुम्भ में स्नान कर ब्राह्मणवाद को चुनौती दी है. हकीकत यह है के यह चुनौती नहीं बल्कि लोगो को दुबारा उसी कूड़े दान में धकेलने की बात कर रहे हैं जिसने उनको जानवर से भी बदतर कर दिया . ऐसे विचारधारा या व्यवस्था को तो पूर्णतया ख़ारिज और खत्म करना पड़ेगा  जहाँ आदमी पैदा होते ही जाती के खांचो में बैठा दिया जाता हो और जिसमे आदमी के मलमूत्र को साफ़ करने के लिए विशेष रिजर्वेशन की व्यवस्था की हो, जो मात्र एक जाती का ' विशेशाधिकार' बना दिया गया हो. ऐसे क्रांतियाँ लोगो में व्यवस्था के प्रति गुस्से को कम करने के प्रयास हैं और अपने कुकर्मो पर पर्दा डालने जैसे है। मोदी या कोई अन्य  जाति  और जातिगत भेदभाव पर बात नहीं करते लेकिन लोगो को उस दकियानूसी व्यवस्था में दोबारा  चाहते हैं जिसमें उनका कोई भविष्य नहीं है. क्या पुरोहिताई करके बल्मिकियों की जात बदल जायेगी ? यदि  तो मोदी उनको कहाँ रखेंगे और क्या सवर्णों के  संस्कार से लेकर, शादी विवाह तक में बाल्मीकि पंडितो की कोई  रहेगी ? वैसे तो  पुरोहितवाद को आमूलचूल ख़त्म करने की जरुरत है इसलिए चाहे ब्राह्मण पुरोहित हो या बाल्मीकि, उसका काम लोगो को बेवकूफ बनाना ही होगा और वोह लोगो के खुलते दिमाग और बदलाव की चाह को रोकने का काम ही करते हैं .

 मंदिर प्रवेश का मुद्दा मानवाधिकारों से जरुर जुदा है लेकिन संकरी मानसकिता इन गलियों से लोगो को दूर करना जरुरी है क्योंकि   भाग्य और भगवान् एक  राजनैतिक बाजीगरी है जो यथास्थितिवादी  शक्तियों का खेल है और इसके जरिये वे सत्ता और और तंत्र पर अपना कब्ज़ा बरक़रार रखते है।  बाबा साहेब आंबेडकर ने ये अपने जीते जी देख लिया था के कैसे कालाराम मंदिर प्रवेश के समय ब्राह्मणवादी सत्ताधारियों ने उनका जमकर विरोध किया था. छुआछूत, जातिवाद और मंदिर प्रवेश के प्रश्न जातिवादी समाज और उसकी सरंचना को सवाल किये बगैर नहीं हल किये जा सकते और उसके लिए जरुरी है 'जातियों की उसंपूर्ण विनाश की जो आंबेडकर का सबसे बड़ा सपना था जिसके संपूर्ण विनाश में ही वह एक प्रबुद्ध भारत का सपना देखते थे इसलिए मोदी की बाजीगरी और चमकधमक से लोगो को सावधान होना पड़ेगा क्योंकि यह दलितों के भले के लिए नहीं अपितु मोदी को 'महान' और 'क्रांतिकारी' बनाने के लिए की जा रही तिकड़मे हैं जिनसे कुछ होने वाला नहीं है. वैसे भी हमारे समाज की भलाई नए पुरोहित बनाने में नहीं अपितु पुरोहितवाद के  संपूर्ण खात्मे में ही निहित हैं क्योंकि पुरोहितवाद का सिद्धन्त जातियों की शुद्धता, उनके बड़े और छोटे होने और उनकी पैदाइश आधारित व्यवस्था का सिद्धन्त है जो आधुनिक काल में जाती और रंगभेद का विभेदकारी व्यवस्था है इसलिए उसका संपूर्ण खत्म ही एक नए समाज की रचना कर सकता है जो सबकी बराबरी पर आधारित होग. । क्या मोदी और उनका हिंदुत्व इसके लिए तैयार है ? 

Thursday, 28 February 2013

साम्प्रदायिकता का लोकतंत्र






विद्या भूषण रावत 

आज से ग्यारह वर्ष पूर्व एक अनाम जगह की क्रुर और अमानवीय घटना ने गोधरा को विश्व पटल पर एक नाम दे दिया. घटना की क्रूरता में साबरमती एक्सप्रेस के एस-६ कोच में दंगाइयों ने आग लगादी जिसके फलस्वरूप ५६ निर्दोष लोग जिन्दा जलकर मर गये. इतिहास में कलंकित इस घटना ने मानवता के हत्यारों का काम और आसान कर दिया जब हिंदुत्व के ठेकेदारों ने यह निर्णय ले लिया के अब हमें इस घटना का बदला लेना है और फिर अगले कुच्छ दिनों तक गुजरात में जो हुआ वो स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे बदसूरत समय में गिना जायेगा. यह एक ऐसा घटनाक्रम था जब राज्य सरकार ने अपनी जिम्मेवारी भुलाकर एक धर्म विशेष की हितैषी और दुसरे की दुश्मन के तौर पर बनाकर पूरी की। पुरे घटनाक्रम में राज्य के सांप्रदायिक प्रशाशन ने मुसलमानों के कत्लेआम में पूर्ण भूमिका निभाई और उसको 'हिन्दुओ ' का गुस्सा करार दिया. इसके नतीजे राजनैतिक तौर पर कामयाबी के थे क्योंकि गुजरात के हिन्दुओ के ह्रदय सम्राट बनकर नरेन्द्र मोदी ने हिन्दुवा की प्रयोग्शाला में अपने अभिनव प्रयोग शुरू कर दिये. राज्य की सत्तारूढ़ सरकार द्वारा प्रायोजित इन दंगो में केंद्र सरकार ने आँख बंदकर मौन धारण कर लिया। गुजरात की हिंदुत्व की प्रयोगशाला ने दलितों और आदिवासियों को अलग थलग किया और उन्हें मुसलमानों के विरुध्ध लामबंद करने की कोशिश की।

लेकिन राजनीती में ऐसे प्रयोग केवल संघ परिवार ने किये हों ऐसा नहीं है. १९ ८५ में राजीव गाँधी ने चुनावों में भरी बहुमत प्राप्त किया क्योंकि इंदिराजी की हत्या के बाद देश में तथाकथित सहानुभूति ने उन्हें तीन चौथाई बहुमत दिल दिया जो उनके नाना जवाहरलाल को भी नसीब नहीं हुआ था. हाँ, अगर विशेषज्ञों की भाषा का इस्तेमाल करून तो यह इंदिराजी के प्रति 'श्रधांजलि थी' और यदि राजनैतिक विश्लेषण करूँ तो साफ तौर पर एक सांप्रदायिक वोट क्योंकि अक्टूबर के अंत में इंदिरागांधी की हत्या के बाद पुरे देश में सिख विरोधी हवा को बढ़ने में सत्तारूढ़ दल की पूरी भूमिका थी और यह भी जरुरी है के कांग्रेस उस वक़्त हिंन्दुत्व की शक्तियों की प्रथम पसंद बन चुकी थी क्योंकि इंदिरा की हत्या को 'हिन्दुओ' पर खतरा मान लिया गया. सरकार ने इंदिरागांधी की हत्या के बाद के नारों 'खून का बदला खून से लेंगे ' को दूरदर्शन और आकाशवाणी पर खूब सुनवाया ताकि हमारा खून जल्दी 'पानी' न बन जाये. 

भारत की एक खतरनाक हकीकत है पूर्वाग्रहों में समाज का जीना और नए पूर्वाग्रहों का निर्माण फलस्वरूप प्रशाशन और मीडिया पूर्णतया जातिवादी और सांप्रदायिक बन चूका है और पूंजी और धर्म के गठबंधन को और मज़बूत कर रहा है. याद करें १ ९ ८ ४ में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिख विरोधी लहर को बढ़ने में हिन्दू साम्प्रदायिकता ने अपना रोल ऐडा किया और राजीव गाँधी हिंदुत्व के सबसे बड़े मैस्कॉट बने. उनके गौर माथे पर लाल टिका भारत के सवर्ण जन को याद दिलाने की कोशिस था के वह उनके अपने ही है। फिर अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण राजीव का सपना था क्योंकि उन्होंने अपनी चुनाव सभाओं में वो वादा किया। चौरासी के कांग्रेस के खेल ने हिंदुत्व के प्रहरियों को मौका दे दिया के बहुमत का निर्माण अल्पसंख्यको के विरुद्ध घृणासे किया जा सकता है और जरुरी है के मीडिया का सांप्रदायिक कारन किया जाए और उसकी जातीय अस्मिताओ को जिन्दा किया जाये. इसी का नतीजा है के १ ९ ९ ० में मंडल की घोषणा के बाद मीडिया ने  विश्वनाथ प्रताप को भारत के सबसे घृणित व्यक्तियों में शुमार किया ताकि उनके द्वारा लगे चिंगारी को बुझाया जा सके और अच्छे से बदनाम किया जा सके.. लेकिन वो हो न सका क्योंकि मंडल की ताकते मज़बूत हुयी हैं ये बात और है के हिंदुत्व के डंक ने उन ताकतों को भी डस लिया है और उनके नेतृत्व को ब्राह्मणवादी सत्ता की सेवा में लगा दिया है. यही कारन है के कांग्रेस के अनुभव का लाभ लेते हुए हिंदुत्व की ताकते इस वक्त देश में हावी हो रही हैं और तथाकथित सेक्युलर बिरादरी केवल रियेक्ट कर रही है . हिन्दू सेकुलरवाद का सबसे बड़ा शिकार इस देश का दलित और मुसलमान हुआ है क्योंकि सेक्युलर स्पेस में इन तबको के लिया दरी उठाने के अलावा कुछ और नहीं था इसी लिए मुस्लिम विरोधी हवा में पिछड़ी जातिया गुजरात में मोदी का पल्लू थम लेती हैं तो मध्य प्रदेश, छात्तिश्गढ़ और उत्तर प्रदेश में भी हवा का रुख बदलता दीखता है. भारत के मध्य वर्ग में व्याप्त मुस्लिम विरोध को हिंदुत्व के शक्तियों ने बहुत अच्छे से इस्तेमाल किया है और इसका एक मात्र कारण हमारी सत्तारूढ़ शक्तियां जो मुसलमानों को सत्ता से दूर रखना चाहती हैं और जिनको यह लगता है के अधिक मुसलमानों के आने से 'एक और पाकिस्तान' का निर्माण हो जायेग.

लोकतंत्र में यह लूट खसोट हमारे चुनाव प्रणाली से हो रही है क्योंकि मुसलमानों के विरुद्ध हवा देकर सभी दलित पिछड़े 'हिन्दू' स्वरूप में शामिल हो जाते है और जो जातीय उत्पीडन की लड़ाई है वोह पीछे छूट जाती है. उत्तर प्रदेश और बिहार में फिर भी दलित पिछडो के पास एक विकल्प है लेकिन बाकि स्थानों में उस विकल्प के आभाव में स्थिति बहुत गंभीर है. चुनाव के इस जुगाडवाजी से मुस्लिम समुदाय को बहुत नुकसान उठाना पड़ा है क्योंकि संसद और राज्यों के विधान सभाओं में उसका प्रतिनिधित्व बहुत ही सीमित हो गया है और मुस्लिम बहुल इलाको से भी गैर मुस्लिम ही सीटें निकल रहे हैं। सत्ता की इस राजनीती ने मुसलमानों को और अलग थलग किया है इसलिए चुनाव प्रणाली में सुधर का वक्त आ गया जिसमे भारत के मुसलमान अपने सच्चे प्रतिनिधत्व के बल पर संसद में आयें और अपनी आबादी के अनुसार अपना हिस्सा मांग सके. 

आज हालत बहुत ख़राब हैं क्योंकि हिंदुत्व के महारथी मीडिया और सैम दम दंड भेद से ऐसी स्थिथ्याँ पैदा कर रहे हैं के देश में साम्प्रदायिकता फैले ताकि दलित, पिछड़े, आदिवासी जो अपना हक् मांग रहे हैं वो मुस्लिम विरोध के नाम पर भूल जाये। साम्प्रदायिकता का एक बहुत बड़ा नियम है की एक अदद दुश्मन तलाशो और यदि दुश्मन नहीं है तो उसको पैदा करो ताकि विभिन्न अस्मिताओ के संघर्ष को उस विरोध की आग में जला दो। गुजरात के बाद देश में ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है के मुस्लिम अपने सवाल न उठा सके और उनको लगातार हासिये पे रखा जाये.हैदरबाद के बोम कांड के बाद फिर से मुस्लिम युवा हमारी गुप्तचर एजेंसियों के निशाने पर हैं। गृह राज्य मंत्री आर पी एन सिंह ने लोक सभा में साफ़ बताया के एन आई ए ने मुंबई हमलो के बाद अभी तक ३३४ लोगो को गिरफ्तार किया और उसमे २० ० से अधिक मुस्लिम हैं . असल में भारत की जेलों में सबसे ज्यादा कैदी इस वक़्त मुसलमान ही है उसके बाद आदिवासियों और फिर दलितों का नंबर आता है. स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे अधिक साम्प्रदायिक दंगो में हिन्दू सांप्रदायिक तत्वों के सीधे हाथ की बात कई जांच रिपोर्टो में है लकिन आज तक एक भी व्यक्ति फंसी के फंदे तक नहीं पहुंचा। आखिर क्यो। बाबरी मस्जिद गिरने की बाद के दंगो में बहुत मुसलमान मारे गए, अडवाणी की रथ यात्रा ने बहुत दंगे करवाए, बम्बई के १ ९ ९ २ के दंगो ने शिव सेना को सत्ता सौंपी, और उत्तर प्रदेश में जय श्री राम के नारे के बाद कल्याण सिंह सत्ता में आये और फिर राम नाम के सहारे भाजपा एकं केंद्र सत्ता में आयी। हकीकत यह है के मुसलमानों को खलनायक बनाकर सत्ता में पंहुचने के ऐसे तरीके देश के लिए बहुत खतरनाक साबित होंगे और ऐसे राजनीती में कोई पीछे नहीं है. 

अफज़ल गुरु को फंसी में लटकाने को तत्पर हिंदुत्वे के मठाधीश पंजाब की अकाली सरकार द्वारा बेंअंत सिंह के हत्यारों को फांसी देने पर रोक लगाने समबंधी प्रस्ताव या जयललिता और करुणानिध द्वारा राजीव गाँधी के हत्यारों और वीरप्पन के सहयोगियों की फांसी पर रोक पर चुप रहते है। क्या कारण है के इनकी फांसी पर रोक कोई चुनावी मुद्दा नहीं बनती ? क्या कारण है के हिंदुत्व के मठाधीश और मीडिया के उनके चेले गैर मुसलमानों के फांसी पर उतने उतावले नज़र नहीं आते जितना अफजल गुरु को लेकर थे. महा पंडित नरेन्द्र मोदी के चुनाव के लिए हर वक्त किसी मियां मुशर्रफ़ या अफ्ज्ज्ल गुरु की जरुरत क्यों पड़े। 

कुछ दिनों पूरा एक फौजी अफसर ने मुझे बताया के छात्तिश्गढ़ में कम कर रहे आदिवासी हमारे 'अपने हैं' और उनको हम दुश्मन नहीं कह सक्ते.. मैंने केवल इतना पूछा के बहुत अच्छा है लेकिन हम कश्मीरियों और उत्तर पूर्व में हो रहे संघर्षो के प्रति ऐसा रवैया क्यों नहीं अपनाते। केवल इसलिए के वोह 'हमारे' हिसाब के धर्म को नहीं मानते ? हमारे गुप्तचर और पुलिस तंत्र के दिमाग से 'दुश्मन' की परिभाषाओं की हटाना पड़ेगा और देश के चुनाव प्रणाली में व्यापक बदलाव की जरुरत है ताकि एक धर्म या सम्प्रदाय क्र विरुद्ध जहर घोल कर सत्ता तक पहुँचने के सारे दरवाजो को बंद कर दिया जाये. भारत को यह करना होगा नहीं तो इस देश के अन्दर धार्मिक उन्माद बढेगा और फासीवादी ताकतों को सत्ता तक पहुचने से कोई रोक नहीं सकता और यदि एक बार फिर वे दिल्ली की सत्ता तक आ गए तो इतना जरुर है के एक लम्बी पारी खेलेंगे और तब देश में जो हालत होंगे उनके बारे में हम कल्पना भी नहीं कर पायेंगे।

Monday, 25 February 2013

ख़ामोशी की साजिश




विद्या भूषण रावत 

बिहार को अक्सर क्रांतिकारियों की धरती कहा जाता है और पिछले दो दशको के राजनैतिक बदलाव को बिहार में सामाजिक क्रांति के बदलाव के रूप में बताया जाने लगा था. जिन्हें जातिगत अस्मिताओ से चिड़ है वे जय प्रकाश का नाम गुण कर अपने को 'बड़ा' साबित करने की कोशिश करते है। हकीकत यह है के बिहार के राजनैतिक सामाजिक बदलाव से जेपी का कुच्छ लेना देना नहि क्योंकि उनके बड़ी जातियों के भक्त अभी भी सामाजिक न्याय से बहुत डरते हैं और दूर भागते है और जेपी का नाम लेकर हिंदुत्व की शक्तियों का साथ देना उनकी विचारधारा की कमजोरी को दर्शाती है. 

बिहार में दलितों के हालत ख़राब हैं और सामाजिक न्याय के नाम पर शाशन करने वाली पार्टियों के लिए वे मात्र वोट बैंक से अधिक कुच्छ भी नहीं रहे. ऐसे में जब हर जाती का वोट महत्वपूर्ण है बूथ मैनेजमेंट करने वाली जातियों ओर लोगो की पहचान सभी पार्टियों को है और उनके खिलाफ कार्यवाही करना तो दूर रहा उनको अब सत्ता में महत्वपूर्ण भूमिकाएं मिल रही है और यही कारण है के भूमिहारो की राजनैतिक ताकत अभी भी बनी हुयी है और रणबीर सेना [पर सरकार के हाथ भी नहीं लगते और दलितों पर उनका दबाब लगातार है. 

उत्तर प्रदेश के तुलना में बिहार अभी भी बहुत पिछड़ा है क्योंकि कम से कम उत्तर प्रदेश में दलित अस्मिता का संघर्ष बिहार की तुलना में ज्यादा मज़बूत और वैचारिक धरातल पर खड़ा है. बसपा के आने से उत्तर प्रदेश में दलितों के राजनैतिक ताकत बढ़ी लेकिन बिहार में रामविलास पासवान वो काम नहीं कर पाए जो मायावती की पार्टी ने उत्तर प्रदेश में किया है।

ऐसा माना जाता है के पटना में कोई भी घटना घटे तो राजनैतिक दल और आम आदमी बहुत चिल्लाता है लेकिन अभी जो दलितों पे हिंसा है उस पर पटना और बिहार के सामाजिक न्याय के लोग खामोश क्यों हैं? पटना में एक हॉस्टल में दलित छात्रो की पिटाई होती है और हमारे नेतृत्व उस पर चुप रहते हैं और अखबारों में भी कोई खबर नहीं बनती .

चंचल पासवान एक होनहार लड़की थी और अपने घर के लिए  कुच्छ कम भी रही थी। पिछले वर्ष २१ अक्टूबर की रात्रि को जब चंचल अपनी बहिन के साथ घर की छत पे सो रही थी तो उस पर ४ लोगो ने हमला किया . यह लोग छत पर चढ़ गए और चंचल को पकड़ कर उसके ऊपर एसिड डालने लगे.  चंचल का शरीर खासकर उसका  चेहरा  बुरी तरह से झुलस गया और वो  दर्द में  कराह रही थी . उसके मम्मी पापा उसकी आवाज सुन कर छत पर आये और फिर देख तो अनिल और उसके साथी उसकी बहिन पर भी हमला करने वाले थे. चंचल के जीवन को ख़त्म करने के उद्देश्य से और उसको सबक सिखाने के लिए इन लोगो ने जो नीच और वहिसियाना हरकत की वो और ज्यादा शातिर और कायर है क्योंकि बिहार के न तो अख़बार और नहीं राजनैतिक दलों ने कोई सवाल उठाया। इस हमले में चंचल की बहिन भी घायल हो गयॆ. उन्नीस साला चंचल को उसके पिता शैलेन्द्र पासवान मेडिकल कॉलेज में ले गए जहाँ उसकी हालात गंभीर बनी हुयी है. इतने महीनो के बाद अब चंचल की स्थिथि सुधर रही है लेकिन गरीब माँ बाप के पास बेटी के इलाज़ के लिए पैसे नहीं है और अनुसूचित जाति जनजाति अधिनियम की धरा के तहत जो मुआवजा उन्हें मिला वोह २ लाख 4 2  हज़ार रुपैया था और आज की स्थितियों में चंचल के इलाज के लिए कम से कम ६-१० लाख रुपियों की जरुरत होती है. 

अभी कुछ दिन पहले बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार का कहना था के जस्टिस मार्कंडेय काटजू उनके राज्य को बदनाम कर रहे हैं और मीडिया के बारे में झूठे बयां दे रहे है  लेकिन जब मैंने इस घटना के बारे में जानकारी लेने की कोशिश के तो मुझे गूगल सर्च में कोई खबर नहीं मिलि. थोडा सी जानकार एक दो ब्लोग्स में थी जो चेंज डॉट ओर्ग के अभियान के कारण से मिली थे. कितनी बड़ी बात है के एक अंतरास्ट्रीय एडवोकेसी अभियान के तहत हमें जानकारी मिलटी है लेकिन स्थानीय अख़बार चुप बैठे है। क्या बिहार के राजनैतिक सत्ताधारी पेड न्यूज़ के सरगना बन गए हैं के इस प्रकार की घटनाओं पर भी पूर्णतया सेंसरशिप लगी हुयी है. 

आखिर क्यों चंचल पासवान पर हुआ हमला खबर नहीं बनता जबकि उसके एक महीने बाद की घटना से एक अनाम मसीहा जन्म लेती है जिसे हम सभी नए कानूनों और बदलाव की बात करते है। इसको समझने के लिए हमारे देश की घटिया जातीय राजनीती और मीडिया के अन्दर बैठे दकियानूसी चापलूस और जातिवादी पत्रकार हैं और उनके काले कारनामो प् पर्दाफास करना जरुरी है ताकि जनता को उसका पता रहे. 

मुझे इस घटना की जानकारी केवल चेंज डॉट ओर्ग से मिली क्योंकि एक पेटीशन पर हस्ताक्षर करने को कहा गया लेकिन जब मैं घटना की तह में गया तो मुझे अफ़सोस हुआ के किस प्रकार से मीडिया अपने जातिगत और वर्ग चरित्र की रक्षा कर रहा है और इस कारण से घटनाओं को छुपा रहा है जो शर्मनाक है.  पहले ये देखे के चंचल के अनुसार हमलावर कौन थे.  इनके नाम हैं अनिल राय, घनश्याम राय, बदल राय और गुलशन राय। इसमें कोई शक नहीं है के इनके जातिगत हितो और उसकी ताकत को देखकर ही न तो पटना में राजनैतिक पहल हुयी और न ही मीडिया ने इस सवाल को उठाया . पुलिस ने तो अनिल राय को अभी माईनर साबित करने की कोशिश की है ताकि इस विभत्स घटनाक्रम में उसे कोई सजा न मिले और चंचल को भी कम मुआवजा मिले इसके लिए पटना पुलिस ने उसे नाबालिग दिखाया जबकि वो १ ९ वर्ष से ऊपर की थॆ. राजनीती की बिसात में सही और गलत का निर्णय जाति  की संख्या और ताकत निर्धारित करेगी इसलिए ब्रह्मदेव सिंह की हत्या के बाद सत्तारूढ़ दल के बहुत से बिधयको ने उसे 'गाँधी' की पदवी दी और किसान नेता बताया। बिहार के सामाजिक न्याय में लगता है भूमिहारो की भूमिका अब ज्यादा बढ़ गयी लगती है और इसलिए सभी राजनैतिक दलों और अखबारों में उनके शुभचिंतको ने खबर को दबाने और उसके जातिगत मतलब न निकले जाएँ इसका पूर्ण प्रयास किया है और शायद नितीश जी की सत्ता के रहते चंचल को न्याय मिलेगा यह भी अब शक के दायरे मैं है. इसमें कोई शक नहीं के अनिल राय चंचल को लगातार परेशान करता रहता था और आज भी उनका परिवार भय में जी रहा है और पुलिस और प्रशाशन की और से ऐसा कोई प्रयास नहीं हुआ के यह भय खत्म हो सके. 

आश्चर्य की बात यह है के बिहार में सबकी जुबान क्यों बंद है ? अगर नितीश ने अखबारों को नियंत्रण में ले लिया है तो क्या हुआ जो नितीश कुमार को गरियाते हैं उनको क्या हुआ. जो जातीय अस्मिता को लेकर हमेशा हंगामा करने के लिए उतावले रहते हैं वोह कहाँ है?  बिहार के क्रांतिकारियों की यह चुप्पी बहुत खतरनाक है. यह चुप्पी नितीश के पेड मीडिया की चुप्पी से ज्यादा खतरनाक है. उम्मीद है पटना के साथी इस मामले को आगे बढ़ाएंगे और इस मामले में आरोपित लोगो जेल की सलाखों के पीछे भिजवाएंगे ताकि चंचल और उस जैसी अन्य लड़कियों पर ऐसे जातिवादी महिला विरोधी गुंडे दोबारा हाथ न उठा सके।



Friday, 22 February 2013

मानसिकता का संकट




विद्या भूषण रावत 

 हैदराबाद में बम ब्लास्ट की घटना के बाद से भारत के अख़बार और टीवी चैनल  सबूत पकड़ लिए के यह 'इंडियन मुजाहिदीन' के लोगो ने करवाएं है। दरअसल ब्लास्ट के दस मिनट के अन्दर ही हमारे विशेषज्ञ इस नतीजे पे पहुँच चुके थे के यह किसने करवाए है। जब केंद्रीय गृह मंत्री ने बताया के राज्यों को इसकी जानकारी एडवांस में दी जा चुकी थी तो गृह मंत्री को लेकर हमारे स्वनामधन्य पत्रकारों ने ढोल पीटना शुरू कर दिया के वोह बिलकुल भी इस पद लायाक नहीं हैं। यह बात तो कांग्रेस और उसके प्रधानमंत्री निर्धारित करेंगे के कौन किस लायक है या नहि. राजदीप सरदेसाई और बर्खादुत्त  से पूछकर तो कोई अपनी कैबिनेट गठित नहीं करता। सवाल सही है के देश में आतंकवादी घटना को लेकर हर के प्रश्न पूछेगा लेकिन क्या इसके लिए किसी के जाति  को कैसे जिम्मेवार ठहराया जा सकता है. आखिर जब शिवराज पाटिल देश के गृह मंत्री थे तो मुंबई के ताजमहल होटल में हमले के बाद उनकी क्षमताओ पर सवाल खड़े हुए लेकिन किसी ने उनकी जाति को लेकर कमेंट नहीं किये. 

मुझे समझ नहीं आता के राजदीप को शिंदे की जाति  को लेकर सवाल करने का क्या मतलब था . क्या राजदीप ने कभी लिखा के विजय बहुगुणा में वोह कौन सी खासियत थी के उन्हें उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाया गया. लेकिन कोई भी जातिवादी पत्रकार नहीं कहेगा के ब्राह्मण होना ही उनकी खासियत थी और इसलिए उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया. केंद्रीय गृह  मंत्री के ओहदे पर चिदंबरम भी रहे लेकिन दो वर्षो में ही उनकी हालत ख़राब हो गयॆ. अच्छी अंग्रेजी के मालिक चिदंबरम मंत्रालय से बहार निकलने के लिए उतावले थे. जहाँ तक गृहमंत्रालय के पद पर 'भारी भरकम' व्यक्ति को रखने की बात है तो अडवानी के गृह मंत्री बनाने से क्या हुआ। क्या आतंकी हमले रुके? उलटे कंधार में आतंकवादियों को गिफ्ट देने के लिए जसवंत सिंह को भेज गया। बेहद निराशाजनक बात यह है के ज्ञानी जेल सिंह को भी बहस में लपेट लिया गया जो भारत के राष्ट्रपति थे। बताया गया के पंजाब में आतंवाड के लिए वह जिम्मेवार थे और राष्ट्रपति बन्ने लायक नहीं थे क्योंकि उन्होंने इंदिरागांधी के कहने पर झाड़ू लगाने की बात कहि. 

राजनीती स्वनामधन्य पत्रकारों से नहीं चलती जो मुह में जो आया बक दिया. राजनीती में बहुत कुच्छ देखा जाता है और निष्ठाएं बहुत मायने रखती है। ज्ञानीजी पंजाब के मुख्यमंत्री थे और उनका राजनैतिक अनुभव बहुत ज्यादा था। भारत के रास्त्रपति के पद पर जैलसिंह ने कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे उनको शर्मिंदा होना पड़े। अपितु इस देश के राष्ट्रपति पद की गरिमा को उन्होंने और बढ़ाया। वोह अंत तक अपनी भाषा और जमीर से जुड़े रहे. राष्ट्रपति के अधिकारों के लेकर उन्होंने जो बहस चलाई वो भारत के इतिहास में कोई राष्ट्रपति नहीं कर पाया और राजीव गाँधी को अपने समय में राष्ट्रपति का अपमान करने का मतलब उन्होंने अच्छे से समझा दिया. 

मुझे शिंदे से कोई सहानुभूति नहीं है लेकिन देश में आतंकवादी घटनाओं के लिए उन्हें कैसे जिम्मेवार ठहराया जा सकता है. शिवराज पाटिल की तरह वह भी गंभीर न दिखने वाले राजनैतिक व्यक्ति है . कांग्रेस को लगता है के गृहमंत्रालय में एक राजनैतिक व्यक्ति आना चाहिए न के एक नौकरशाह जो संघ परिवार का अजेंडा लागु कर सके. लेकिन इस वक़्त यह प्रयास हो रहे हैं के हर मंत्रालय में एक 'विशेषज्ञ' बैठकर भारत के लोकतंत्र को भी पीछे से नियंत्रित किया जा सके. वैसे भी यह लोकतंत्र इस वक़्त धर्म और पूंजी की गिरफ्त में है और जो थोडा सा रास्ता कही भी खली बचा है उसमे भी ये शक्तिं सबके रस्ते बंद कर देना चाहती है .

वैसे शिंदे को तो यह द्वंश झेलना पड़ेगा क्योंकि वो अम्बेडकरवाद से निकले वे योद्धा तो नहीं है. वे तो कांग्रेसी संस्कृति में रमे हुए व्यक्ति हैं जिन्हें जब इस्तेमाल करना होता है बुला लिया जाता है . एक अम्बेडकरवादी विचार का व्यक्ति कमसे कम आत्मसम्मान से अपना काम करेंगे और वोह अपनी क्षमताओं में किसी के कम तो नहीं हो सकता यदि ज्यादा भी नहीं है तो. शिंदे कांग्रेस में व्याप्त ' चारण संस्कृति' की उपज हैं और उनसे बहुत अपेक्षाएं नहीं की जा सकती क्योंकि पहले हिंदुत्व के आतंकवाद पर जिस तरीके से उन्होंने पलती खाइ वोह शर्मनाक था लेकिन क्या करें उनका हिंदूवादी हाई कमान यही चाहता था. कांग्रेस संस्कृति में मंत्रियों को हाई कमान के अनुसार काम करना होता है और उसमे अगर सफलता मिलती है तो वोह हाई कमान की सफलता होती है और अगर विफलता होती है तो व्यक्ति की विफलता है. क्योंकि गृह मंत्रालय एक काँटों का हार है और इस वक्त असफलताओं का दौर  है इसलिए शिंदे को वोह सब झेल पड़ेगा और वोह इसको आसानी से निगल भी लेंगे क्योंकि कांग्रेस संस्कृति से आते है। 

शिंदे की जाति  को लेकर राजदीप सरदेसाई या जो कोई भी प्रश्न उठा रहा है वोह जातीय पूर्वाग्रह से युक्त है और उसकी निंदा   की जानी चहिये. एक गृह मंत्री के तौर पर उनका मुल्यंकन करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन यह कहना के वह दलित हैं इसलिए असफल हैं या यह पद उन्हें इसलिए मिला क्यंकि कोटा देना था देश का अपमान है. देश में बहुत ही योग्य दलित हैं जो प्रधानमंत्री बन्ने के काबिल भी हैं लेकिन क्या देश में नेतृत्व का सवाल कभी कबिलिअत के आधार पर हुआ है ? अगर नहीं तो सिर्फ दलितों से कबिलिअत क्यों पूछी जा रही है. ? यह देश अथाह जुगाडबाजी और बाजीगरो का देश है और इसलिए यहाँ की राजनीती में वैसे ही व्यक्ति चाहिए जैसे उसके नेतृत्व को चाहिए और इसमें सभी लोग पूर्णतया 'धर्मनिरपेक्ष' हैं . जुगाडी केवल नेता ही नहीं हैं हमारे पत्रकार बंधू भी नेता बनने की मुहीम में लगे है। चैनलो को पास करवा रहे हैं और पार्टी के प्रचार में लगे है, फर्क इतना है के सबने 'बोर्ड' पत्रकारिता का लगाया हुआ है अन्यथा अगर अन्दर झांक के देखेंगे तो जनेउ दिखाई देगा और पूरी बहस किधर ले जानी है साफ पता चल जायेगा. फिलहाल सभी पत्रकार बंधू अपने अजेंडे में लगे हैं और कांग्रेस पार्टी को भी देखना है शिंदे साहेब कहाँ ज्यादा अच्छे से फिक्स होते हैं। वैसे पार्टी का इतिहास बताता है वोह इन पत्रकारों की बातो को ज्यादा तवज्जोह देने को तैयार नहीं और शायद वोह अच्छा ही है. 

Wednesday, 20 February 2013

मात्र कानूनों से नहीं सामजिक मान्यताओं के बदलने से बदलेगा भारत




विद्या भूषण रावत 

आज कल के लॉबी युग में हर मर्ज की दवा कानून बनाने से ढूंढी जा रही है। यह वैसे ही है जैसे नए डॉक्टर्स कभी भी परहेज की बात नहीं करते अपितु कहते हैं खूब खाइए और फिर हर बीमारी के लिए एक नयी दवा ले लीजिये। लोग भी दवा खाकर स्वस्थ रहना चाहते हैं। काम ना करना पड़े इसलिए ऐसे तुरत फुरत के नुख्से ढूँढ़ते हैं जहाँ से तुरंत फायदा हो। सार्वजानिक जीवन में काम करने वाले लोगो की भी एक बीमारी हो गयी है और उसके लिए उनको 'सरकार', तंत्र, नेता, महात्मा इत्यादि लोगो की आवश्यकता होती है। वैसे तो सरकार और राजनीती आवश्यक बुराई हैं और हमें उसको लेकर चलना पड़ेगा ही लेकिन जब यह आवश्यक बुराइ हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा न बने तो अच्छे लेकिन हो ये रहा है के ये बुराई अब दवाई में बदल गयी है और हस्र ये हुआ है के यदि कोई सांसद, मंत्री, विधायक, तथाकथित साहित्यकार, कवि , सामाजिक कार्यकर्ता सभी परिवर्तन की बात कर रहे हैं और सोचते हैं के दुसरे बदले और कानून बनायें जाए ताकि हर बात पर नियंत्रण हो सके 

किसी भी सभ्य समाज के लिए कानूनों की जरुरत नहीं पड़ती क्योंकि लोगो को अपने अधिकार और अपने कर्तव्यों का पता रहता है। हमारे समाज में  सबको अपने अधिकार पता हैं और दुसरे के भी और फिर भी उन पर आसानी से अतिक्रमण होता है। हमारे संविधान की मान मर्यादाएं हमारे सार्वजनिक जीवन का हिस्सा नहीं बन पाई और संविधान में दी गयी वैयक्तिक स्वाधीनता का सबसे बड़ा लाभ हमारे समाज के प्रभावशाली तबके ने ले लिया है और यह तबका अपने हितो को ही समाज के हितो के तौर पर देखता है। यह एक खतरनाक सन्देश है और इसी कारण दो व्यक्तियों के व्यक्तिगत मामले हमारे यहाँ पर सामजिक द्वेषो में बदल जाते हैं। यह बहुत आसान तरीका है व्यक्तिगत हितो की बल्बेदी पर समाज को चढाने का।

पिछले वर्ष दिसम्बर से ही देश में हंगामा था एक 'निर्भय' को लेकर। यह नाम अखबारों ने दिया और मुझे पता नहीं क्यों। जब कोई मर जाए और पिट जाए  तो उसे बहादुरी के तगमे बांटो लेकिन उसके साथ क्यों ऐसे हुआ उस पर मत सोचो। सबने सोचा जिन्होंने भी उस लड़की के साथ हिंसा की वोह हमारे बीच के नहीं थे वोह तो किसी दूसरी दुनिया से आये थे इसलिए सब लगे थे कानून बनवाओ, फांसी की सजा दिलवाओ , धरना, प्रदर्शन,  मंत्र तंत्र सब कुच्छ हुआ लेकिन जो नहीं होना चाह्हिये तो वो हो रहा है और जो होना चाहिए था वो हुआ नहीं। सरकार को रिपोर्ट मिल गयी और वर्माजी की रिपोर्ट पर कुछ लोग घबरा भी गए के अगर पति पर भी हिंसा और बलात्कार का आरोप लगेगा तो 'परिवार' ही टूट जायेगा और यह पश्चिमी   देशो के प्रभाव  में हो रहा है। शीघ्र ही महिलाओं पे हो रही हिंसा की बात औरतो के अधिकार तक पहुँच गयी और यह बात धर्म के मठाधीश स्वीकार नहीं करेंगे इसलिए के मामला सामाजिक बदलाव का है। सामाजिक जीवन में मनु के पद चिन्हों पर चलने वाले लोग कैसे अपने संविधान की सत्ता को स्वीकारेंगे ये एक ज्वलंत प्रश्न है।

महिलाओं पे हिंसा के विरोध में फांसी की मांग करने वाले  लोग भूल जाते हैं के जिस दिन जोगिनी और देवदासी प्रथा के  खलनायको को फांसी मिलना शुरू हो जायेगी विरोध करने वाले 'एक जाति ' के विरुध्ध सबकी साजिश का जाप करते हुए भूख हड़ताल पर बैठ जायेंगे। इसलिए कानून की मांग होगी लेकिन सामाजिक जीवन में बदलाव की मांग नहीं होगी। हम सब यही चाहते है क्योंकि यह सबसे सस्ता है आखिर हम कोई हड़ताल या आन्दोलन क्यों करते हैं / केवल इसलिए के हमारा नया कानून आये और हम उसे बदले। लेकिन हकीकत यह है छुअछूट के विरुद्ध कानून है, जातीय उत्पीडन के विरुद्धं कानून है लेकिन वे लागू क्यों नहीं होते क्योंकि लागू करने वाले मनु के पदचिन्हों पे चलने वाले लोग हैं। फिर हर जाती को एक बीमारी है दुसरे से बड़ा दिखने की। जो जातिव्यस्था के शिकार हैं उनके खेमे में भी जातीय पूर्वाग्रह हैं और वहां भी छूट अछूत है। मतलब यह के बीमारी से लड़ते लड़ते नयी बीमारियाँ भी घर कर गयी हैं और बाबा साहेब आंबेडकर ने इसका बेहतरीन मूल्याङ्कन कर भी दिया था लेकिन अगर हम उनको दिल से समझे तो जाने . उन्हें पता था के जंग बहुत मुश्किल है क्योंकि सारे अमीर एक तरफ तो हैं लेकिन सारे गरीब एक तरफ नहीं हैं क्योंकि उनकी असमानताएं सीढ़ीनुमा हैं और हर एक अपने को एक दुसरे से ऊंचा मानता है और इस प्रकार जो जितनी ऊंचाई पर है उसका सम्मान ज्यादा है और जो जाती की पायदान पर जितना नीचे उसकी सबसे अधिक बेइजत्ति। इसीलिए समाज के यह विरोधाभास आपस में ज्यादा मज़बूत हो गए और उनको समाप्त करने की बजे शायद लोग उनको और मज़बूत कर रहे हैं इसलिए जो जंग ब्राह्मणवादी मनुवादी समाज के विरुद्ध होनी थी वोह आपस में हो रही है। इसलिए बाबा साहेब आंबेडकर का जातिविहीन समाज का सपना अधुरा है और वोह उसको खत्म किये बिना संभव नहीं है। सरकार के कानून जाति नहीं तोड़ सकते और नहीं प्रेम विवाह करवा सकते। वे ऐसी शक्तियों को समर्थन करें, उनको शक्ति प्रदान करे और उनको प्रश्रय दे। लेकिन होगा कैसे जब सत्ता में बैठे लोग जातिवादी हों और उसी मानसकिता से ग्रस्त हों जिसके खिलाफ हमारी जंग है ? इसलिए हमारे राज्य के हर एक अंग का सेक्युलर होना अत्यंत जरुरी है। जरुरत है हर प्रकार के धार्मिक पाखंड, कर्मकांड, और उनको दी जा रही विशेष रियायतों को बंद कर दिया जाए। धार्मिक संघठनो को टैक्स में छूट बंद करें और उनपर लैंड सिलीग कानून लागु किये जाएँ। सत्ता में बैठे लोगो को और उनके कार्यकर्ताओं को सेक्युलर बनाना पड़ेगा। धर्म के नाम पर लोगो को हवाई जहाज में बिठाकर सऊदी भेजना बंद करना पड़ेगा और पाखंड और पूजा के लिए अरबो के पैसे को बहाने पर भी प्रतिबंधित करना पड़ेगा। फिर किसी को हेलमेट पहनने से इसलिए नहीं छूट मिलेगी की धार्मिक भावनाएं आहात होती है। 

तो फिर हम क्या करें ? शायद फ्रांस की व्यवस्था को देखना पड़ेगा। सरकार में रहने वाले और देश का प्रतिनिधित्व करने वाले हर बात को सेक्युलर बनाना पड़ेगा। सेक्युलर पंडित मुल्ला पादरी ग्रंथि भाई भाई वाला नहीं अपितु राज्य किसी धर्म को नहीं मानेगा। फ्रांस की सामाजिक क्रांति ने यह बताया के फ्रांस को धर्म विहीन होना है और तभी एक मज़बूत फ्रांस बनेगा। हम केवल यह चाहे हैं के भारत  सरकार का व्यक्ति देश के संविधान का सम्मान करे और अपने व्यक्तिगत जीवन में भी धर्मनिरपेक्ष रहे। मतलब यह उसकी विचारधारा धर्मनिरपेक्ष रहनी पड़ेगी क्योंकि वो संविधान की सौगंघ खा कर नौकरी करेगा। यदि हम ऐसे नौकरशाह नहीं बना सकते तो फिर बदलाव असंभव है। दुसरे यह के धार्मिक पाखंडियों को हम अपना जिम्मा सौंप के इस देश को बर्बाद कर रहे हैं इसलिए हमारे कानून मात्र बदलने से सामाजिक बदलाव नहीं आने वाला और एक बहुत बड़ी सामाजिक क्रांति के बिना बदलाव असंभव है . सामजिक जीवन के बदलाव के बिना हमारे रास्ट्रीय जीवन में कभी बदलाव नहीं आएगा और हम केवल कानून बनाकर अपने कर्तव्यों की इत्श्री समझ बैठेंगे। इसलिए समय है के अब सामाजिक बदलाव की लडाई की ताकतों को मज़बूत होकर एक नयी रह चुन्नी पड़ेगी जो जाति और धर्म की सत्ता को चुनौती दिए बिना संभव नहीं है तभी एक प्रबुद्ध भारत का बाबा साहेब आंबेडकर का सपना साकार होगा और हम अपने को सभ्य समाज कहलवाने के काबिल होंगे 

Tuesday, 19 February 2013

काटजू से क्यों डरती है भाजपा



विद्या भूषण रावत 

अरुण जेटली एक सूझ बुझ बाले नेता हैं और इतनी जल्दी आप नहीं खोते लेकिन मार्कंडेय काटजू के एक लेख ने उन्हें इतना उत्तेजित कर दिया के वह और उनके हमसफ़र भाजपा के अन्य नेता इस वक़्त बदहवास से हैं। मोदी को नायक बनाने की मुहीम जारी है और उसके लिए भारत का धन धान्य से संपन्न पूंजीवादी मीडिया और उनके धर्मगुरु सभी एक साथ कई मोर्चे खोल कर काम कर रहे हैं। भारत को मोदीमय बनाने के लिए अलग अलग जतन  किये जा रहे हैं। अर्नब लगे हैं, चौरसिया लगे हैं और शर्मा और गुप्ताजी भी पीछे नहीं हैं लेकिन मुसीबत यह है की 2002 का भूत पीछे नहीं छोड़ता। मोदी ने गुजरात के अन्दर मुसलमानों को अलग थलग  के लिए पूरी सरकारी मशीनरी लगाई और अपना 'राजधर्म' भूल गए इसलिए यह कैसे संभव है के वह अभी देश को स्वीकृत हो जाएँ। क्या गुजरात में रहने वाले मुसलमान गुजराती नहीं हैं। 

मोदी के गुजरात विकास के मॉडल को बहुत बताया जा रहा है। आखिर है क्या गुजरात में। गुजरात ने भारत के बौद्धिक विकास में क्या योगदान दिया है? कौन सी बात है गुजरात की जिसे भारत को स्वीकार कर चलना चाहिए? क्या अहमदाबाद की सड़के और कॉलोनियां बंगलोरे या दिल्ली से अच्छी हैं। क्या गुजरात विश्विद्यालय की शिक्षा मुंबई विश्विद्यालय से अच्छे है। क्या है गुजरात में शिक्षा का स्टार 
जहाँ तक गुजरात के लोगो की व्यावसायिक योग्यता की बात तो वे तो पहले से ही ऐसा कर रहे हैं इसमें मोदी का क्या योगदान है। क्या मोदी के गुजरात में छुआछूत बंद हो गयी है। क्या मोदी के गुजरात में जातिवाद नहीं है? क्या मोदी का हिन्दू रास्त्र ब्राह्मणवादी समन्तिवादी राज्य नहीं जहाँ दलित मुस्लिम और पिच्च्दो के लिए कुच्छ न नहीं है। मोदी के हिन्दू रास्ट्र में पूंजीवादी जातिवादी लोगो के लिए गरीबो के जमीन है और और गरीबो के लिए कुच्छ नहीं।

जब मोदी को महान बनाने में हमारे पत्रकार बिक जाएँ तो दो चार लोग जो अपने जमीर के सहारे लिख सकते हैं या कह सकते हैं उनमे मारकंडेय  काटजू भी हैं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के तौर पर उन्होंने बहुत से प्रगतिशील निर्णय दिए और उनके निर्णय बहुत ही दूरगामी और भारत के आम लोगो के हित में थे।  प्रेस कौंसिल में उनके आने के बाद से भारत के पूंजीवादी प्रेस के अन्दर थोडा सी घबराहट तो आये क्योंकि एक दन्त विहीन प्रेस कौंसिल से आखिर डरता कौन था। क्या हम नहीं जानते के इन पूंजीवादी अखबारों के संपदक और मालिक प्रेस कौंसिल से कभी नहीं डरते बल्कि उसके प्रति एक तुच्छ भाव रखते है लेकिन काटजू के आने के बाद प्रेस कौंसिल की औकात बढ़ी है और अब मीडिया के दलाल उनसे डरने लगे हैं।

काटजू प्रेस कौंसिल के अध्यक्ष है लेकिन भारत के एक नागरिक भी हैं और एक नागरिक की हैसियत से उनको बात रखने का हक़ है। आखिर वोह भारत की एकता और साम्प्रदायिकता के सवाल पर अपनी बात रख रहे हैं क्या उनको अपनी बात कहने का अधिकार नहीं? हम यह जानते है के काटजू बहुत से महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं लेकिन कभी मीडिया के जरिये अपनी बात नहीं रखी लेकिन अब जब वोह एक पद पर नहीं हैं अपनी बात रख सकते हैं। हम उन्हें इसलिए नहीं पढ़ रहे के वो प्रेस कौंसिल के अध्यक्ष हैं बल्कि इसलिए के काटजू कह रहे हैं और काटजू का बोलना जरुरी है चाहे वो हमें ख़राब ही क्यों न लगे क्योंकि खरी खरी कहने वालो की कमी है और जो खरी खरी  है वो लल्लो चाप्पो नहीं करते और चौरसिया जैसों को उनकी औअकत बता देते हैं। 

काटजू कटु बोलते है। वह सुप्रीम कोर्ट में थे और बौध्हिकता में यकीन करते है। उनका यह कहना के भारत में पत्रकार नहीं पढ़ते बिलकुल सही है। यह एक सामान्य कथन है लेकिन इसमें सच्चाई है।और पत्राकारो को सोचना पड़ेगा के जब एक पढ़े लिखे बौध्हिक व्यक्ति से सवाल करें तो वो कैसे होना चाहिए और कम से कम जब पता है के काटजू जैसा व्यक्ति कैसे जवाब  देता है।हमारे पत्रकार दलालों की श्रेणी में आ गए हैं। वो मोदी से लेकर नेताओं की दलाली कर रहे हैं। उनके पास गाँव में जाकर देश की स्थिथि को देखने का समय नहीं है।

भाजपा ने पिच्च्ले कुच्छ वर्षो में संवैधानिक पदों में आसीन लोगो के सरकार विरोधी रुख का फायदा उठाया है . सी ए जी विनोद राय लगातार सरकार विरोधी बयान दे रहे है और भाजपा उसका इस्तेमाल करते है और उनकी लीक की हुयी रिपोर्ट को पर संसद में शोर मचाती है। काटजू तो विनोद राय के मुकाबले बहुत सिनिअर हैं और कम से कम ऐसे पद पर नहीं है जिससे उनके पद की गरिमा का हनन  होता हो। 
प्रेस कौंसिल के अध्यक्ष का पद केवल नाम मात्र का नहीं होना चाहिए और उनको लगातार कहते रहना चाहिए आखिर नितीश कुमार के तथाकथित 'सुशाश' और पेड न्यूज़ पर प्रेस कौंसिल को कुछ तो करना चाहिए न। नितीश जैसे महान व्यक्तित्व को महान न मानना, ममता की महानता पर सवाल करना, मोदी की सम्प्रदाय्किता को सवालो के कठघरे में लाने की हिम्मत काटजू ही कर सकते है और इसके लिए उनको सलाम। यह वह ही कर सकते हैं के फेसबुक में अपडेट के बाद जब महारास्ट्र पोलिस किसी को गिरफ्तार करती है तो उसके खिलाफ कहा जाए।
हमारी बहुत से पहचान है। हम अपने संघठनो से जुड़े होते है और उसके साथ ही हमारी अपनी व्यक्तिगत अस्मिताएं हैं और हम अपने विचारो को रखने की आज़ादी रखते है। अरुण जातले भाजपा में रहते अमर सिंह का केस लड़ सकते है या BCCI में आ सकते है तो काटजू भी प्रेस कौंसिल के अध्यक्ष पद पर रहकर अपने व्यक्तिगत विचार रख सकते है। जब विनोद राय कुछ कहते हैं तो देश हित में है तो काटजू मोदी के बारे में लिखें तो  कैसे देश विरोधी ?

काटजू हमारी आवयश्कता है क्योंकि इस देश में सच बोलने वालो की कमी है कम से कम उन लोगो में  सत्ता के आस पास हैं और उसमे राजनीती और पत्रकारिता भी शामिल है। जब पत्रकारिता दलाल हो जाए तो काटजू की वाणी सुन्नी पड़ेगी और जो लोग पैसे खाकर, दलाली कर, मोदी को देश पर लादना चाहते  है उनके लिए चेतावनी है, लोग  लड़ेंगे और छोड़ेंगे नहीं। अभी अमेरिका और यूरोप केवल हवा का रुख देख रहा है और हवा  बदली नहीं है।और दलालों के कहने से यह बदल नहीं जाएगी। 

Friday, 15 February 2013

सम्मान के लिए शुरू हुयी जंग




विद्या भूषण रावत 

हसीना की आँखों में भविष्य के सपने दिखाई दे रहे थे और मुझे उसके पूर्ण रंग रूप में भारत के लिए एक नयी मिसाल क्योंकि कई बार हम हमारे इर्द गिर्द बड़ी बड़ी बातो को छोटा समझकर छोड़ देते हैं . हसीना नट  समुदाय से आती हैं और यह समुदाय दलितो में भी स्वीकृत नहीं हो पाया है। पुराने समय में ब्रिटिश काल में नटो को आपराधिक जाती का दर्जा था यानी जिसके भी घर में चोरी हो नटो को जेल जाना पड़ता था। तब से लेकर अब तक कानूनों में परिवर्तन तो आये हैं लेकिन हमारी मानसिकता में बदलाव नहीं आये है और पुलिस अभी भी वोही रवैया अख्तियार करती है जो पहले था। लगभग 450 नट लोग हसीना और अन्य लोगो के नत्रेत्व में पडरौना के डी एम् के कार्यालय पर एकत्रित हुए और  अपनी मानगो के सिलसिले में एक ज्ञापन दिया . हमारी मानवीयकरण यात्रा के बीच में उनसे मुलाकात होना एक बेहतरीन अनुभव था जिसने यह बताया के जिस जाती को 'मांगता' कह कर रोज रोज अपमानित किया जाता है उसके पास इस देश को देने के लिए बहुत कुच्छ है। 

दरअसल नट एक घुमंतू जाती हैं और कबीलों के तरीके से रहते हैं लेकिन अब स्थितियां बदल रही हैं और उनके आश्रय के स्थान भी नहीं रहे। इसके आलावा वे भी चाहते हैं के उनके बच्चे आगे बढे और तरक्की करें इसलिए की अपमान और जिल्लत की जिंदगी को वे अलविदा कहना चाहते हैं।

ऐसा नहीं की उनको काम नहीं आता . मेहनत करने में कोई संकोच नहीं है और  बहुत से बच्चे मजदूरी भी करते हैं। गोदने की कला में यह माहिर हैं लेकिन अब शायद उतना पैसा नहीं मिल पाटा और जब शादियों का समय हो तो शायद सौ डे ड सौ रुपैया दिन का कम लेते हैं अन्यथा स्थिथि बहुत ख़राब है।

कुशीनगर जनपद के रवीन्द्रनगर गाँव में यह लोग करीब 100 परिवार रहते होंगे लेकिन एक के पास भी राशन का कार्ड नहीं है, न ही किसी के पास कोई आवास या नरेगा का कार्ड। उनके नाम से भी राशन के कार्ड हों भी तो उनके पास नहीं होते, यदि नरेगा के कार्ड हों भी तो प्रधान जी के घर पे होंगे। गाँव में उनकी औरतो को गनी नज़रो से देखा जाता हैं क्योंकि नट  जाती में पर्दा प्रथा नहीं है और आपस में वे लोग खुश भी रहते हैं। जिस सामंती खेत्र में सामंतवाद का असर हर समाज में रहा हो वहां नट अपनी खुली जीवन शैली से सबको एक नया सन्देश दे सकते है लकिन अगर समझने वालो को कोई तमीज हो तो न।

इतनी मुश्किल हालत में जिंदगी व्यतीत करने पर भी उनके चेहरे की मुस्कराहट लाखो डालर कमानों वालो के चेहरे के तनाव से ज्यादा अच्छी है। अपमानपूर्वक उनको मांगता कहा जाता है क्योंकि यह लोग भीख मांगकर गुजरात करते हैं लेकिन आजकल भीख भी नहीं मिलते और कम से कम इनकी महिलाओ को रोजाना अपमान का शिकार होना पड़ता है। 
मैंने हसीना से पूछा तुम कौन से धर्म को मानती हो। तो उसका कहना था सभी धर्मो को। उसका नाम हसीना जरुर है लेकिन वोह हिन्दुओ के रीती रिवाज़ पर भी चलते है और व्रत रखते है। जब ईद का मौका आता है तो सब लोग रोज़ा भी रखते हैं। मैंने पूछा, तुम्हारे पति का क्या नाम है। ' जमालु' और तुम्हारे बच्चो के क्या नाम हैं।। पिंकी, मनोज, आरती वर्षा इत्यादि। मैं थोडा और आश्चर्य में पड़ा क्योंकि इस देश में नाम और पहचान के नाम पर इतने खून खराबे होते हैं और यहाँ एक समुदाय है जिसकी जीवन शैली हम सबके लिए एक बहुत बेहतरीन उदहारण है के 'नाम से क्या  लेना'. हम तो सेकुलारिस्म को जीते हैं और केवल भाषणों में बोलते नहीं है। 

इसी विरोध प्रदर्शन में एक बुजुर्ग हबीब से मिलता हूँ ' आप किसे मानते हैं, मैं पूछता हूँ। ' जी हम तो राम को भी मानते हैं और रहीम को भी। ' मैं नवरात्र में व्रत भी रखता हूँ तो ईद के समय रोज भी। आपके पिता का क्या नाम है। जी' बाबु राम और बेटे का न्यूटन . मुझे तो बहुत ख़ुशी है के न्यूटन हो या लूटन, ऐसे लोग नहीं देखे जो जिंदगी को इस तरीके से जीते हो। आप अपने को मांगता क्यों कहते है भाई ब्राह्मण तो अंतररास्ट्रीय मांगता है लेकिन कभी अपने को मांगता नहीं कहता हमारी सरकार भी तो मांगती है लेकिन कोई उसे कभी भिखारी कहता है क्या। अब अपने को मांगता कहना बंद करो,  मैंने उन्हें समझाया। आरे भाई आप लोगो के पास तो दुनिया को देने के लिए बहुत कुच्छ है। लोग तो धर्मनिरपेक्षता का तगमा लगाये घूमते हैं और  आप लोग तो उसे जीते हैं असल जिंदगी में। भारत के लोगो के लिए तो नत मिसाल हैं। ऐसी मिसाल जो ढूंढे नहीं मिलेगी।

हसीना के अन्दर आत्मा विश्वास था। वोह हमारी यात्रा के अंत में लखनऊ आये और जल जंगल जमीन के आन्दोलन में शरीक हुयी है। उसे नहीं पता था के उसके जीवन में एक नयी क्रांति आने वाली है और उसके समाज के अन्दर बदलाव के हवा को तूफ़ान में बदलने के लिए उसको तैयार होना पड़ेगा . उत्तर-प्रदेश लैंड अलायन्स के अधिवेशन में हसीना को उपाध्यक्ष चुन गया। उसने मुझसे कहा वो इस लायक नहीं है। कैसे बोलेगी पढ़े लिखों के बीच लेकिन उसने जो कहाँ और जो जिया वोह हम सबके लिए जिंदगी का सबसे बड़ा सबक है। उसके पास दुनिया को देने लिए बहुत है और अब समय है हम नट  समाज का सम्मान करें उनकोसत्ता और संघर्ष में  सम्मान सहित भागीदारी देकर . ऐसे बहुत से समाज हैं जो बिलकुल हासिये में हैं और उन सभी को हमारे अन्दोलनो में इज्जत के साथ भागिदार बनाना पड़ेगा तभी छुआछूत जातिवाद और अंधविश्वास के विरुद्ध हमारी जंग कामयाब हो पाएगी। हमें यह भी जानना है के धर्मनिरपेक्षता हमारे समाज में बहार से नहीं आये अपितु पसमांदा तबके से आये जिसके जनक थे कबीर और जिसकी जीती जगती तस्वीर है नट समाज। आज इस समाज को हमारे प्यार और इज्जत की आवश्यकता है ताकि उनका भविष्य अच्चा हो और उनके बच्चे अपने बचपने को आज़ादी से जी सकें .