Saturday, 18 March 2017

बहुजन समाज के एकजुट होने के लिए ऐतहासिक समय



विद्या भूषण रावत 



योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री होंगे। गोरखनाथ मठ के महंत योगी भाजपा की भविष्य की राजनीती के लिए बहुत जरुरी हैं इसीलिए उनकी ताजपोशी केवल इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण नहीं है के एक उग्र हिन्दू को राज सौंपा जा रहा है अपितु ये भी के अंदर ही अंदर संघ मोदी के विकल्प भी तैयार कर रहा है।  योगी अभी मात्र ४५ वर्ष के हैं और उनके आग उगलने वाले भाषण उनके भक्तो के लिए अमृत  की तरह है।  

योगी की ताजपोशी करके भाजपा ने संकेत दिया है के उनका विकास की राजनीती से कुछ लेना देना नहीं है और इसका इस्तेमाल वो समय समय पर अपने उन भक्तो को खुश करने के लिए करते रहेंगे जो मध्यवर्गीय है , प्राइवेट कंपनियों में काम करते हैं और अमेरिका जाना जिनका आदर्श रहा है ताकि ओपिनियन मेकिंग क्लास उनके साथ खड़ा रहे।  अन्यथा संघ और भाजपा को पता चल चूका है के उत्तर प्रदेश के लोग क्या चाहते हैं और जो चाहते हैं उन्हें मिल चूका है। आज लगता है के मार्क्स ने धर्म के बारे में  जो लिखा वो गलत नहीं था।  धर्म की अफीम में मदमस्त जनता अपने 'निर्वाण' के लिए ढोंगी पाखंडी बाबाओ की शरण में जा रही है।  जिस सरकार से विकास के प्रश्नों पर सवाल किये जाने चाहिए थे वो पूरी बहस को कब्रिस्तान और शमशान में ले गयी।  अब संघ और भाजपा ने योगी को उत्तर प्रदेश की गद्दी सौंपकर अपना अजेंडा तय कर दिया है। 

जातिगत बैलेंसिंग करने के लिए एक ब्राह्मण और एक पिछड़े को उप मुख्यमंत्री का पद सौंप दिया गया है।  अभी बाकी लोगो को भी उनकी जातीय अहमियत के हिसाब  से पद  मिलेगा। वैसे भाजपा के पास दलित पिछडो के नेताओ की लंबी लाइन है जिनको पता है के उनको कुर्सी मिलकर ही जनता तृप्त हो जायेगी और इसलिए काम हो न हो जातीयता को तो अवसर मिलेगा ही।  सामाजिक समरसता और दलित पिछडो को मुसलमानो के खिलाफ करने का क्या हस्र हुआ है ? इसका सामाजिक विश्लेषण करने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।  आज भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडा से  लगभग १२५ विधायक ( शायद ६३ ब्राह्मण और ६२ ठाकुर ) चुनाव जितने में कामयाब रहे।  ये वोट किसका था ? उत्तर प्रदेश की राजनीती को समझने के जरुरत है।  जातीय राजनीती पर धर्म का मुलम्मा यदि चढ़ गया तो सबसे बड़ा लाभ सवर्णो को होता है और भाजपा एवं संघ ये जानते हैं इसलिए वह बार बार हिन्दू मुसलमान, भारत पाकिस्तान की बात करते हैं ताकि पुरे हिन्दू समाज की ठेकेदरी उनको मिल जाए और वो ऐसा करने में कामयाब हुए। हैं  मुसलमानो के सामाजिक आर्थिक पिछड़ेपन का सवाल उठाना जरुरी है।  अब जातीय मतगड़ना के प्रश्न को  उठाना भी आवश्यक है।  मात्र मुस्लिम विरोध पर पैदा हुई राजनीती के खतरों के और वैचारिक धयान दिलाना पड़ेगा। लेकिन मुसलमाओं में भी अंदरूनी बदलाव को समर्थन, महिलाओ  पर प्रश्न और मुस्लिम धार्मिक नेताओ को राजनीती में सर पर चढ़ा कर हम इन सवालो के उत्तर नहीं ढूंढ सकते।  आम मुस्लिम जो समाजहिट में संघर्षरत हैं , उनको आगे बढ़ाने का समय आ गया हैं. हिन्दू जातिवाद या  मुकाबला मुस्लिम साम्प्रदायिकता या किसी और किस्म के पृथकतावाद से नहीं दिया जा सकता। इसके लिए बुद्ध की सम्यक और मानववादी विचारधारा ही विकल्प बन सकती हैं जहाँ दबे कुचले समुदायों से नेतृत्व उभारा जाए और जो समुदाय के बीच काम कर रहा हो। 

 क्या उनके ऐसे प्रश्नों का उत्तर राजनैतिक 'विकास ' के मुद्दे उछाल कर किया जा सकता हैं. अखिलेश यादव ने विकास का मुद्दा उठाया लेकिन बहुजन समाज की सोच, उसकी अस्मिताओं की चाहत और उसके महापुरुषों के इतिहासबोध शायद उन्हें नहीं था।  जो समाज और नेता अपने इतिहास से परिचित नहीं हैं वो ब्राह्मणवाद की कुटिलताओं को कभी समझ नहीं पाएंगे।  मुझे अखिलेश पसंद थे लेकिन मेरी परेशानी यही थी के अपने पिता  की भांति उन्होंने बाबा साहेब आंबेडकर को एक बिरादरी के नेता के तौर पर देखा और लोहिया को उनकी काट के तौर पर।  ये बिलकुल झूट और गलत बात है।  लोहिया खुद चाहते थे  बाबा साहेब उस आर पी आई के नेता बने जिसमे वह और उनके अन्य कई समाजवादी साथी शामिल हों। समाजवादी पार्टी ने ऐसा कोई कार्य नहीं  जिसमे पिछड़े वर्ग के लोग उनसे जुड़ सके।  ऐसा जुड़ाव केवल जातीय नहीं हो सकता।  सामाजिक तौर पर बहुजन अस्मिता की मजबूती के लिए उन्होंने कोई कार्य किया हो ऐसा हमें नहीं दीखता।  पार्टी की कोशिश सवर्णो में खासकर ब्राह्मण ठाकुरो में स्वीकार्यता प्राप्त करने की थे लेकिन वे ये नहीं जानते के जाति की राजनीती करने वाले  ब्राह्मण ठाकुर कायस्थ या बनिया तभी तक उनके साथ है जब तक उन्हें सत्ता मिल रही है।  अतः जब लगा के हिंदुत्व और कॉर्पोरेट का जादू चल रहा है तो ये तबका सबसे पहले खिसक लिया। 

बसपा से हमें बहुत उम्मीदे थी।  हम उत्तर प्रदेश में तमिलनाडु के तरह का दो पार्टी राजनीती देखना चाहते थे जो बहुजन पार्टियों के बीच में लोकतान्त्रिक झड़प हो ताकि ब्राह्मणवादी तकते हासिये पे रहे।  बहुजन समाज पार्टी का इतिहास संघर्ष का रहा है।  मान्यवर कांशीराम ने अपने जनसंपर्कों और जनसंघर्षो से इसको सींचा लेकिन पार्टी ने जान संघर्ष का रास्ता कभी छोड़ दिया।  पार्टी को अति  दलित अति पिछड़ी जातियो में नेतृत्व विकसित करना करना होगा और बहुजन सांस्कृतिक आंदोलन को प्रगतिशील बहुजन वामशक्तियो के साथ जोड़कर संघ के ब्राह्मणवादी पूंजीवादी चरित्र का पर्दाफास करना होगा।  साथ ही साथ लोगो को अन्धविश्वाश से दूर करने और उनके अंदर वैज्ञानिक चिंतन पैदा करने लिए साधारण भाषा में कार्यक्रम तैयार करने होंगे। मुसलमानो में से भी पसमांदा मुसलमानो में नेतृत्व पैदा करना होगा और केवल जाती और धार्मिक नेतृत्व से मतलब नहीं , जरुरी ये के व्यक्ति वैचारिक तौर पर बहुजन समाज के प्रति, जिसमे पसमांदा मुसलमान भी शामिल  हैं, के प्रति समर्पित हो।  

आज का दौर सूचना और बौद्धिकता का दौर है इसलिए पुराने ढर्रे की मशीहाई राजनीती का दौर चला गया है।  मोदी के जुमलो  को उनकी ही भाषा में जवाब केवल लालू यादव दे सकते हैं। नए युवा बहुत बेहतर बोल रहे हैं इसलिए राजनीती में उनको यदि समय पर इस्तेमाल नहीं करेंगे तो कोई लाभ नहीं।  चुनाव प्रचार केवल एक ही नेता के इर्द गिर्द न हो इसके लिए बढ़ी संख्या में युवा, महिलाये, कलाकार, बुद्धिजीवियों का साथ लेना होगा।  नए दौर के युवाओ  को नेतृत्व में लाने के लिए बुद्ध, आंबेडकर, फुले, भगत सिंह , राहुल सांकृत्यायन लोहिया, पेरियार, मार्क्स, नेहरू, विवेकानंद, नरेंद्र देव, रामसरूप वर्मा , शहीद जगदेव प्रसाद,  आदि की विचारधारों का अध्ययन करना जरुरी है. मतलब यह नहीं  हम इनके मतभेद ढूंढ कर इस्तेमाल करें अपितु इन सभी ने पूंजीवाद, ब्राह्मणवाद, साम्रज्य वाद के बारे में क्या कहा है वो समझे. सभी लोगो को संघ के इतिहास की जानकारी होना जरुरी है के गोलवलकर, हेडगेवार, श्यामा प्रसाद मुख़र्जी. अब समय आ गया है गाँधी  नेहरू की आलोचनाओ पर हम अपना समय न व्यर्थ करें क्योंकि अभी संघ उसका इस्तेमाल अपने लाभ के लिए कर रहा है।  आवश्यकता इस बात की है के मौजूदा सरकार और उसके सांस्कृतिक विंग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ क्या हैं चाहते हैं ये जानना जरुरी हैं.  संघ और भजपा के इंटरनेट विशेषज्ञओ ने पूरी बहस को नेहरू गाँधी परिवार परिवार के इर्द गिर्द रखा ताकि उन पर चर्चा न हो।  धयान रखिये लोहिया का गैर कांग्रेसवाद के अब कोई मतलब नहीं जब संघ परिवार देश की सत्ता पर काबिज हो और पूरे देश में में ब्राह्मणवादी ताकते पूंजीवादी ताकतों के साथ मिलकर यहाँ के बहुजन समाज के खिलाफ साम दाम दंड भेद से अपनी लड़ाई लड़ रही हो।  संघ द्वारा प्रायोजित मीडिया बहसों में व्यर्थ समय न गवाये अपितु गाँव गाँव अपने सांस्कृतिक अभियान को  बढाए।   सवाल पूछिये के सबको शिक्षा ,सबको स्वास्त्य का क्या हुआ।  विश्विद्यालयों में बहुजन छात्रों के साथ जो हो रहा है उसको उठाए।  सोशल मीडिया और वैकल्पिक मीडिया को मज़बूत करिये लेकिन भक्तो से दूरी बनाइये क्योंकि ये आपको कभी सही स्थिति की जानकारी नहीं देंगे। 

अभी भी सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है।  उत्तर प्रदेश  में बिहार की तर्ज पर गठबंधन की आवश्यकता है।  सपा -बसपा गठबंधन वक़्त की आवश्यकता है लेकिन उस और विस्तृत करना होगा ताकि वोट के विभाजन का लाभ दोबारा से जातिवादी लोगो को न मिले इसलिए कांग्रेस इस गठबंधन में जरुरी है ताकि देश के दूसरे हिस्से में जहाँ वो मौजूद हो , उसे कुछ लाभ मिले. ये गठबंधन एक शर्त पे मज़बूत हो सकता है।  यदि मायावती जी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाए, राहुल गाँधी गठबंधन के संयोजक बने और अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए खुले तौर पर घोषित किया जाए. मैं जानता हूँ के जो मैं लिख रहा हूँ वो असंभव नहीं है।  आज देश पर बहुत बड़ा संकट है और अगर बहुजन ताकते साथ नहीं आयी तो देश पर मनुवादी ताकतों का पूर्णतया नियंत्रण होगा और जो थोड़ी बहुत उपलब्धिया पिछले साथ सत्तर वर्ष में बाबा साहेब आंबेडकर की कुर्बानियो से हमें मिली वो सब मटियामेट कर दी जाएंगी।  मैं केवल ये कहना चाहता हूँ के गठबंधन लंबे समय के लिए हो और जिनकी वैचारिकता में थोड़ा भी संदेह हो उन्हें फिलहाल गठबंधन से बाहर रखे. संघ के उग्र ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आप मात्र विकास की जुमलेवाली सर्वजन राजनीती से नहीं कर सकते।  उसके पर्दाफास के लिए बहुजन नायको और सामजिक न्याय के लिए संघर्ष करने वाली सभी शक्तियों और नायको  के संघर्ष और उनके विचारो को साथ लेकर समाज में विचार और सांस्कृतिक बदलाव के संघर्ष की शुरुआत करनी होगी।  आंबेडकर, भगत सिंह, जोतिबा फुले ,  बिरसा, राहुल सांकृत्यायन , पेरियार आदि की सांस्कृतिक विरासत को जनता की बीच खुद्दारी और ताकत के साथ रखना होगा तभी हम एक सभ्य और प्रबुद्ध भारत के बाबा साहेब के सपने को पूरा कर पाएंगे। ये दौर बहुत खतरनाक जरूर है लेकिन विचारो की मज़बूती और व्यक्ति के वैचारिक प्रतिबद्धता तभी पता चलती है जब ऐसे कठिन दौर आते हैं।  अभी नयी पार्टियों का समय नहीं है अपितु जो हमारे पास उपलब्ध हैं उन्हें लोकतान्त्रिक और वैचारिक तौर पर मज़बूत करने का समय है।


Friday, 30 September 2016

हिंदुत्व की राजनैतिक ताकतों को हराने के लिए उत्तर प्रदेश में बसपा ही अभी अंतिम विकल्प : भंवर मेघवंशी








भंवर मेघवंशी राजस्थान के प्रगतिशील दलित आंदोलन के एक प्रमुख स्तम्भ है और आज के हालातो पर उनकी लेखनी बेबाक जारी है। उन्होंने देश भर के जनांदोलनों के साथ लगातार हिस्सेदारी की है और गाँव गाँव साम्प्रदायिकता, जातिवाद, महिला हिंसा, वैश्वीकरण, विस्थापन आदि के प्रश्नों पर जनजागरण किया है.  राजस्थान में भीलवाड़ा जिले के एक छोटे से गाँव सिरडीयास  में 25 फरवरी 1975 को दलित बुनकर परिवार में जन्मे भंवर मेघवंशी को महज 13 साल की उम्र में ही कट्टरपंथी आर एस एस जैसे संगठन ने अपने साथ जोड़ लिया ,जिसके साथ उन्होंने तकरीबन पांच साल तक सक्रिय रूप से काम किया .वे अपने गाँव की शाखा के मुख्य शिक्षक रहे ,बाद में कार्यवाह बने और अंततः जिला कार्यालय प्रमुख के पद तक भी पंहुचे .उन्होंने बाबरी मस्जिद तोड़ने के लिए हुई पहली कारसेवा में भी शिरकत की ,मगर अयोध्या पंहुचने से पहले ही गिरफ्तार हुए तथा 10 दिन आगरा की जेल में रहे .बाद में एक घटना से उनका आर एस एस की दलित विरोधी सोच और नफरत एवं कट्टरता की विचारधारा से मोहभंग हो गया और उन्होंने संघ से अपना नाता तोड़ लिया और खुलकर आर एस एस का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया .

आर एस एस छोड़ने के बाद मेघवंशी ने एक फुल टाइम कार्यकर्ता के रूप कौमी एकता ,भाईचारे और शांति एवं सदभाव के लिए काम शुरू किया जो आज तक जारी है .उन्होंने 2002 में गुजरात में हुए अल्पसंख्यकों के नरसंहार के विरुद्ध जमकर आवाज उठाई ,गुजरात पीड़ितों के लिए बने पीपुल्स ट्रिब्यूनल के सदस्यों के साथ दस्तावेजीकरण किया और लेख लिखे .साम्प्रदायिकता और जातिवाद के खिलाफ जमकर संघर्ष करते हुए उन्होंने 2000 से वर्ष 2012 तक डायमण्ड इंडिया नामक मासिक पत्रिका का संपादन एवं प्रकाशन किया .

भंवर मेघवंशी ने एक स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सदैव अपनी कलम शांति ,आपसी सदभाव ,भाईचारे और सोहार्द्र के लिए काम किया। उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय के बारे में व्याप्त स्टीरियो टाईप मिथ्स को तोड़ने और सच्चाई को सामने लाने का काम किया है . भंवर जी से आज के ज्वलंत प्रश्नों पर मैंने विस्तारपूर्वक बातचीत की जो यहाँ प्रस्तुत है। 


विद्या भूषण रावत  :      - भंवर जीआज के दौर में दलित आंदोलन की सबसे बड़ी चुनौती क्या है ?

भंवर मेघवंशी  : आज दलित आन्दोलन को कई प्रकार की चुनोतियों को झेलना पड़ रहा है ,यह बाहरी चुनौतियां भी है और भीतरी भी .जिस प्रकार से साम्प्रदायिक शक्तियाँ दलित आन्दोलन को हजम कर रही है वह चिंताजनक स्थिति है ,आज बड़े पैमाने पर दलित नेतृत्व संघ भाजपा द्वारा बिछाये गए जाल में फंस गया है ,सत्ता का झूठा लालच देकर उनकी जुबानें बंद कर दी गई है .दलितों के चुने हुए प्रतिनिधि दलितों की बात नहीं करते ,नौकरशाही ओर सत्ता में बैठे लोग दलित आवाजों के दमन में लगे हुये है .अभी संघ का एक एजेंडा चल रहा है कि या तो अपने साथ ले लो ,अगर नहीं आये ,उन्हें फंसा दो . इस तरह हम देख रहे है कि दलितों का दमन और तीव्र होता जा रहा है . दलित आन्दोलन अपनी स्वाभाविक उग्रता को खो रहा है ,वह कई बार भ्रमित नजर आता है ,उसे समझ नहीं आता है कि वो किनके साथ खड़ा हो ,उसे अपने दोस्तों और दुश्मनों की शिनाख्त करने में आज काफी मुश्किल हो रही है .समुदाय के बीच में पनप आये दलाल लोगों ने आन्दोलन की मूल भावना को ही विकृत कर दिया है .अधिकांश दलित लीडर उम्र के थका देने वाले पड़ाव पर पंहुच गए है .चुनौतियां बेहद नई है ओर समाधान पुरातन है .नई पीढ़ी का दलित आन्दोलन कुछ अलग चाहता है ,पर उसे दिशा नहीं मिल पा रही है .भीतरी चुनौतियां भी उभर रही है ,दलितों के मध्य के जातिय अंतर को अब जातिवाद का रूप दिया जा रहा है .कई दलित जातियां स्वयं को इस हद तक मजबूत करने में लगी है  कि उन्होंने जाति उच्छेद के काम से लगभग मुंह ही मोड़ लिया है .दलित समुदाय के भीतर जातियों को मजबूती देने का काम जाति तोड़ने के बड़े उद्देश्य की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा बनकर उभर रहा है . यह हमारे आन्दोलन को कमजोर बना रहा है .संघ की विघटनकारी राजनीती के लिए यह स्थिति मुफीद है ,इसलिए वो दलितों के मध्य के छोटे मोटे फर्क को दुश्मनी के स्थायी भाव में बदलने की कोशिस में लगा रहता है .

विद्या भूषण रावत ;  रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद लगा के अम्बेडकरी  और वामपंथी ताकते साथ आएँगी लेकिन JNU के चुनावो ने दोनों के बीच में खायी को और बड़ा बना दिया है।  आप क्या सोचते हैं इस सन्दर्भ में। 

 भंवर मेघवंशी : हां यह बात सही है कि रोहित वेमुला के सांस्थानिक मर्डर के बाद अम्बेडकरी और वामपंथी ताकतें एक साथ आई .जय भीम ओर लाल सलाम का नारा एक साथ गुंजायमान हुआ .उम्मीद जगी कि यह जुगलबंदी आगे बढ़ेगी .यह समय की मांग भी रही .यह संतोष का विषय रहा कि भारत के वामपंथियों ने जाति के सवाल को स्वीकारना शुरू किया और वे अम्बेडकरवादी आन्दोलन के साथ खड़े दिखाई देने लगे .मगर हाल ही में जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में लेफ्ट यूनिटी और बाप्सा के आमने सामने आने से लोगों को लगा कि रोहित के मामले में बना एका ख़त्म हो गया है ,जिस पर कई लोगों ने चिंता व्यक्त की है ,लेकिन मैं थोडा अलग तरह से इस पूरे घटनाक्रम को देखता हूँ .

हमें समझना होगा कि भारत के वामपंथी कभी भी अम्बेडकरवादी समूहों के स्वाभाविक दोस्त नहीं रहे है ,सदैव ही ये दो धाराएँ रही है .रोहित के मुद्दे पर ये सडकों पर संघर्ष में एकसाथ थे ,इसका मतलब यह तो नहीं कि उनके मध्य कोई वैचारिक एकता बन गई .मेरे ख्याल से वह एक मुद्दे पर तात्कालिक एकता थी ,जिसे एक न एक दिन ख़त्म होना ही था .फिर ऐसे मुद्दे आयेंगे तो ऐसी क्षणिक एकता फिर से बनेगी ओर बिगड़ेगी भी .रही बात जेएनयू चुनाव की तो इसे विचारधाराओं के संघर्ष के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगी .इससे वामपंथियों को अपने भीतर देखने का मौका मिलेगा .बाप्सा और लेफ्ट यूनिटी को न्यूनतम सांझे मिलन बिंदु ढूंढने चाहिए .चुनावी संघर्ष दोस्त ओर दुश्मन की विभाजक रेखा नहीं बननी चाहिए.

 विद्या भूषण रावत :  वामपंथियो ने तो बहुत गलतिया की है।  न केवल जाति की स्वीकार्यता के विषय में बल्कि वर्ग चरित्र में भी उनका नेतृत्व कभी भी गरीबो के हाथ में नहीं था।  लेकिन जब हम राजनैतिक आंदोलन करते है तो हर एक आंदोलन की एक स्वस्थ आलोचना होनी चाहिए क्योंकि अगर हम सभी में कमिया नहीं होती तो ब्राह्मणवाद कभी इतना मज़बूत नही होता।  इसलिए ये भी जरुरी है के अम्बेडकरवादी या दलित आंदोलनों के जो विभिन्न ध्रुव है उनकी भी कमियों और अवसरवाद पर बोला जाये।  आज का समय केवल कम्युनिस्टो की कमी निकालने से नहीं होगा बल्कि स्वस्थ रूप से सभी सम्बंधित आंदोलनों के कमियों को समझकर एक नए आंदोलन की रुपरेखा बनाने का होना चाहिए 

भंवर मेघवंशी : आपकी बात से मेरी सहमती है कि आज का वक़्त सिर्फ वामपंथियों की कमियां निकालने का नहीं है ,पर सवाल जरुर उठाये जाने चाहिए .इसका जवाब कौन देगा कि वामपंथियों ने जाति के सवाल को कालीन के नीचे क्यों दबाये रखा आज तक ,उनके यहाँ नेतृत्व में दलित आदिवासी लोग क्यों नहीं आगे आ पाए .आप वर्ग की बात तो करेंगे लेकिन वर्ण की बात को नहीं स्वीकारेंगे यह नहीं चल सकता है .आप गरीबी का ढोल तो पीटेंगे मगर जाति की तरफ से आँख मूंद लेंगे ,यह नहीं चल सकता है .भारतीय  वामपंथ को ईमानदारी से इस देश के परिप्रेक्ष्य में उसी तरह से ब्राह्मणवाद से भी लड़ना होगा ,जिस तरह वे पूंजीवाद और साम्राज्यवाद से लड़ने की बात करते है .

मुझे भी लगता है कि दलित बहुजन आन्दोलन को भी अपने भीतर झांकना होगा ,अगर वह अपनी स्वस्थ आलोचना स्वयं कर सके तो उसके हक़ में यह बहुत अच्छा होगा ,अम्बेडकरी आन्दोलन को भी अपने जातिवादी चरित्र से छुटकारा पाना होगा तथा उसे ब्राह्मणवाद से भी बचना होगा .

विद्या भूषण रावत :  दलित बहुजन आंदोलन की बहुत चर्चा होती है लेकिन उसका मेल बिंदु केवल गैर ब्राह्मणवाद है।  दोनों ध्रुवो को साथ आने के लिए क्या कोई सकारात्मक कार्यक्रम की जरूरत नहीं है।  जैसे कम्युनिस्तो ने जाति को नहीं माना वैसे ही अगर हम ये सोच ले के बहुजन ध्रुवीकरण के अंदर सारे तत्त्व एक से हैं तो बहुत बड़ी भूल होगी।  बाबा साहेब ने जातियो के वर्गीकरण के बारे में साफ़ कहा था के ये 'ग्रेडेड इनएकवलिटीहै हर एक जाति एक एक ऊपर चढ़ी है और अपने को दूसरे से बड़ी मानती है।  अपने आपसी संबंधों के बारे में जब हमारी समानता का कोई सिद्धांत नहीं बनेगा तो एकता कैसी ?

भंवर मेघवंशी :  दलित बहुजन एकता के सारे तत्व एक से नहीं है ,सिर्फ मंचीय ध्रुवीकरण परिलक्षित होता है जो गाहे बगाहे ब्राह्मणवाद को कोसते रहते है .मगर इस मिलन बिंदु से आज कुछ भी उम्मीद नहीं लगाई जा सकती है ,बहुजन विचार में शामिल जो पिछड़ा तबका है ,वह आज मनुवाद का सबसे बड़ा संवाहक बना नजर आता है .पाखंड ,पूजा पाठ तथा धर्म कर्म में आकंठ डूबा हुआ .वह जो आज ब्राह्मणवाद का हरावल दस्ता है ,उससे ब्राह्मण से लड़ने की उम्मीद करना बचकानी बात होगी .दलित अत्याचार के प्रकरणों को उठाकर देखिये कई इलाकों में 90 प्रतिशत मामलों के मुख्य अभियुक्त ओबीसी से आते है .जो पिछड़ा रोज दलित को जूता मार रहा है ,उसके साथ कैसी एकता ? धरातल के हालात तो बेहद भयंकर है ओर हमारे आसमानी नेता है जो कभी दलित पिछड़ा एकता ओर कभी मूलनिवासी एकता का राग अलापते रहते है .बहुजन ध्रुवीकरण एक कोरी कल्पना है .अब तो बहुजन के नाम से जाने जाने वाले संगठन ही ब्राह्मण नेता चलाते है .पिछड़े जब तक मनुवाद के अग्रिम मोर्चे पर खड़े दिखेंगे ओर दलितों पर अत्याचार करेंगे तब तब वे हमारे उतने ही बड़े दुश्मन है ,जितने कि कथित उच्च वर्णीय लोग है .


  
विद्या भूषण रावत : रोहित वेमुला के मामले को मीडिया ने बहुत उछाला।  बहुतो को लगा शायद अब मीडिया दलित प्रश्नों पर बहुत संवेदनशील हो गया है लेकिन डेल्टा मामले तो लगभग दबा दिया गया।  अभी गावो में बहुत क्रूर घटनाक्रम होता है और मीडिया भूल जाता है।  भागना के लोग पिछले ४ वर्ष से आंदोलन कर रहे हैं लेकिन अभी भी न्याय के इंतज़ार में हैं और अब उनके पास न दलित संगठन आते न वामपंथी मीडिया तो खैर गया ही नहीं क्यों हो रहा है ऐसा ?

भंवर मेघवंशी : रोहित के मामले को मुख्यधारा मीडिया ने कोई ख़ास तव्वजो दी हो ऐसा मैं नहीं मानता ,हां जब सोशल मीडिया ने इस मुद्दे को बहुत बड़ा बना दिया तब प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक माध्यमों ने अपने जातिवादी चरित्र के मुताबिक नेगेटिव रिपोर्टिंग शुरू की .रोहित की जाति पर भ्रम पैदा किया ,उसे गोमांस भक्षी देश विरोधी तत्व के रूप में निरुपित किया .हर संभव कोशिस यह की कि कैसे भी करके रोहित वेमुला को बदनाम कर दिया जाये ,लेकिन अच्छा यह हुआ कि वैकल्पिक मीडिया ने इस मनुवादी मीडिया को धूल चटा दी ओर वे रोहित के मामले को दबा नहीं पाये .रही बात डेल्टा मेघवाल मामले की ,तो यहाँ भी मीडिया की भूमिका नकारात्मक ही रही .पहले डेल्टा का चरित्र हनन का प्रयास हुआ और बाद में मामले को ठन्डे बस्ते में फेंक दिया .रोहित के मामले में आरोपी सरकारी लोग थे ,मगर डेल्टा के मामले में विज्ञापन देने वाले समुदाय के लोग थे .जिनका अख़बारों ओर टीवी चेनल्स पर मालिकाना हक है ,उन्हीं की जमात के लोग जब आरोपी बने तो मीडिया उनके आगे पूंछ हिलाने लग गया .दलितों पर होने वाले अत्याचार सेक्सी स्टोरी नहीं होते .दलित महिलाओं का बलात्कार जातिवादी मीडिया की संवेदनाओं को नहीं जगाता .भगाना हो चाहे डांगावास ,डेल्टा हो या उना दलित अत्याचार ,सिर्फ सोशल मीडिया ही इन मुद्दों को आगे बढ़ा रहा है .वैसे भी मीडिया ज्ञापन देने वालों से ज्यादा विज्ञापन देने वालों की परवाह करता है .

 विद्या भूषण रावत  :  आप तो राजस्थान के बहुत से आंदोलनों से जुड़े रहे हैं जैसे मज़दूर किसान शक्ति संगठन भोजन का अधिकार अभियानपी यू सी एल  इत्यादि।  क्या तथाकथित मुख्यधारा के आंदोलनों में दलितों के जगह बची है या उनका केवल एक लेबल की तरह इस्तेमाल हो रहा है। 

भंवर मेघवंशी :  मुख्यधारा की किसी भी चीज़ में दलितों के लिए कभी जगह नहीं थी और न ही आज है .सभी जगह दलित सिर्फ दिखाने की वस्तु भर होते है .सामाजिक आंदोलनों का चरित्र भी इससे भिन्न नजर नहीं आता . कहीं पर भी स्वतंत्र दलित नेतृत्व स्वीकारा नहीं जाता .पिछलग्गू दलित सबको प्रिय है ,बोलनेवाले .सवाल उठानेवाले दलित कहीं भी पसंद नहीं किये जाते .मेरा मानना है कि सिविल सोसाइटी को भी लोकतान्त्रिक और समावेशी बनना होगा तथा दलितों को सिर्फ लेबल की तरह इस्तेमाल करने से बचना होगा .

विद्या भूषण रावत - राजस्थान में अम्बेडकरवादी या दलित आंदोलनों की क्या स्थिति है। 

भंवर मेघवंशी : राजस्थान पारम्परिक रूप से एक सामन्ती स्टेट रहा है .यहाँ विद्रोह की कोई भी सामाजिक राजनीतिक या सांस्कृतिक धारा नहीं रही है .यहाँ तक कि भक्तिकाल में भी यहाँ कबीर या रैदास जैसे लोग नहीं पैदा हुए .यहाँ तो दास्य भाव शाश्वत रहा है .तो मानसिक दासता सदियों से बरकरार रही है .दलित मुक्ति की लडाई में भी राजस्थान का योगदान नगण्य रहा है .पूना पैक्ट के वक़्त राजस्थान के कतिपय दलित नेता बाबा साहब के विरोध में पर्चे बाँट रहे थे .यहाँ कबीर ,फुले .अम्बेडकर के दलित के बजाय गाँधी के हरिजन और पार्टियों के बंधुआ दलित लीडर ही ज्यादा रहे है .आज़ादी के बाद हेडगेवार –गोलवलकर के भक्त दलित ओर गाँधी नेहरु को पूजने वाले दलितों के हाथ में दलित आन्दोलन की बागडोर रही .फिर समाजवादी किस्म के राजनीतिक दलित आन्दोलन पैदा हुये ,जिन्होंने सामाजिक न्याय के नारे तो लगाये .पर उसके नेतृत्व में वही जातियां प्रमुखता से आगेवान रही जो शोषक जमातें थी .

1992 में कुम्हेर भरतपुर में दलितों के सामूहिक नरसंहार के बाद राजनीती से परे एक दलित आन्दोलन उभरने लगा ,जो बाद में एनजीओकरण का शिकार हो गया .प्रोजेक्ट बेस्ड दलित आन्दोलन ने भी दलित आन्दोलन की स्थितियां ख़राब की है . आज राजस्थान का दलित आन्दोलन बिखराव का शिकार है .व्यक्तिवादी अहम् की लडाइयों के चलते कई छोटे छोटे खेमे बन गये है .कुछ लोग तो दलित के नाम पर सिर्फ अपनी जाति या परिवार का समूह बना बैठे है ,जबकि आज राजस्थान दलित अत्याचार .छुआछुत ओर भेदभाव का सबसे बड़ा गढ़ बन गया है .पर संतोष की बात यह है कि डांगावास दलित संहार के पश्चात दलित युवा पीढ़ी ने स्वतः स्फूर्त आन्दोलन खड़ा किया तथा संघर्ष कर विजय पाई है .राजस्थान के दलित युवा आन्दोलन ने अपने खामोश राजनीतिक नेतृत्व को पूना पैक्ट की खरपतवार करार दिया है तथा जातिवादी समूहों कू भी नकारने का काम किया है .सामाजिक संगठनों के नाम से दशकों से दुकानदारी चला रहे लोगों को भी बहुत सारे सवालों का सामना करना पड़ा है .धीरे धीरे ही सही परन्तु डांगावास से लेकर डेल्टा तक के मामलों में एक आत्मनिर्भर दलित अम्बेडकरवादी आन्दोलन का उभर एक सुखद घटना मानी जा सकती है .

  
विद्या भूषण रावत :  क्या दलित संगठनों  को बिलकुल अलग होकर काम चलना चाहिए  आवश्यकता अनुसार निर्णय लेने चाहिए क्योंकि ---जब वामपंथी शक्तिया साथ न दे तो क्या विकल्प हैया दलित बहुजन अल्पसंख्यको को अब एक नयी पहल करनी होगी ताकि उनकी बुनियाद मज़बूत हो और वे राजनैतिक तौर पर अपनी ताकत का एहसास करवा सके .

भंवर मेघवंशी : दलित संगठनों को अलगाव के साथ काम करने की जरूरत नहीं है .उन्हें स्वतंत्र ओर आत्मनिर्भर होने की जरूरत है .उन्हें अपने फैसले खुद लेने ही चाहिए .वामपंथी हो या अन्य किसी प्रगतिशील धारा के लोग हो ,अगर वे साथ नहीं दे तब भी दलित संगठनों को अपने बूते सब कुछ कर पाने का माद्दा रखना होगा .दलित ,आदिवासी ,घुमंतू ओर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को एक साथ आ जाना चाहिए ,हमें पिछड़ों को साथ लेने का मोह फ़िलहाल छोड़ देना चाहिए .अभी तमाम उत्पीडित तबको की एकता कायम करने की जरूरत है .अगर हम ऐसा कर पाते है तो हम राजनीतिक रूप से भी बड़ी ताकत निर्मित कर सकते है .


विद्या भूषण रावत : अस्मिताओं  राजनीती जरुरी है या विचारधारा की हालाँकि लोग कहते हैं के अस्मिताओं में भी विचारधारा  होती है -लेकिन ऐसा गलत भी है /क्योंकि अस्मिताओं का इस्तेमाल करने में संघ परिवार सबसे आगे है।  लोग कैसे समझे के सामने वाला आदमी मेरा है. वो सजातीय हो सकता है लेकिन अपने समुदायों के हितो का दलाल भी ?

भंवर मेघवंशी : मुझे लगता है कि दलित आन्दोलन का अस्मितादर्शी राजनीती का काल बीत चुका है .अस्मिता राजनीति का आज सर्वाधिक फायदा संघ गिरोह के लोग उठा ले जाते है .वे अस्मिताओं का हमसे बेहतर इस्तेमाल करना जानते है .हमें आब अपनी राजनीति विचारधारा पर केन्द्रित करनी होगी .अगर हम दीर्घजीवी बदलाव चाहते है तो यह जरुरी हो जाता है कि हम बुद्ध ,फुले .शाहू ,कबीर ,रैदास ओर अम्बेडकर की मानवतावादी समानतावादी विचारधारा को स्थापित करने का काम करना होगा .अब सजातीय से आगे बढ़कर समविचारी से नाता जोड़ना होगा .

  
 विद्या भूषण रावत : आपकी आत्मकथा एक बेहतरीन दस्तावेज है के जहाँ हमें 'अपनोंको समझने की जरुरत होती है।  मैं समझता हूँ हमारे देश में हर एक का अपना राष्ट्रवाद है और उसके ताकतवर लोग उसे इस्तेमाल करते रहते हैं।  हम सब अपने अपने समूहों को नियंत्रित करना चाहते हैं और उसके लिए सिद्धांत गढ़ते हैं जिसमे विलन दुसरी जातिधर्म  या देश होता है। . ये विलन सुविधा के अनुसार बनाये जाते हैं लेकिन ज्यादादर मामलो में हम स्वयं ही विलन रहते हैं ?

 भंवर मेघवंशी : शायद आत्मकथा के लिहाज से यह जल्दबाजी कही जायेगी ,क्योंकि अभी बहुत कुछ करना बाकी है ,लेकिन इस आपबीती को कहना भी बहुत जरुरी है .हालाँकि उसे कोई भी प्रकाशक छापने का साहस नहीं कर पाया .नए दौर के मीडिया ने उसे लोगों तक पंहुचाया है . हिन्दू तालिबान में मैंने अपनों पर भी और अपने पर भी सवाल उठाये है .आपका यह कथन बहुत महत्वपूर्ण है कि हम अपनी सुविधा के अनुसार खलनायक गढ़ लेते है जो कि प्राय किसी अन्य जाति ,धर्म या संप्रदाय के होते है .नियंत्रण की राजनीति जिसे वर्चस्व का संघर्ष कहना मुझे ज्यादा ठीक लगता है ,वह हमारी कमजोरियों तथा महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए किये जाने वाले गलत फैसलों को भी सिद्धांतों का बाना पहना देता है .दलित नेतृत्व ओर दलित संगठनों को अपने आलोचकों का आदर करना सीखना चाहिए .कोई तो होना चाहिए जो हमारे अन्दर के खलनायक पर भी सवाल खड़े कर सके .राष्ट्र की पूरी अवधारणा ही ताकत ओर सत्ता के बेजा इस्तेमाल से जुडी हुयी है ,इसलिए हर दौर में हर समूह का अलग राष्ट्रवाद होगा और उसका उपयोग भी सब अपनी सुविधा के अनुसार ही करेगे .अंततः राष्ट्र .राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद की पूरी बहस ही एक किस्म का फर्जीवाडा ही है .

विद्या भूषण रावत  : आप एक लेखक है और बहुत नया लेखन आ रहा है।  कैसे देखते नए दौर के दलित लेखन को ?

भंवर मेघवंशी- यह ख़ुशी की बात है कि बहुत सारा दलित लेखन आ रहा है ,उसमे अब भी पीड़ा का भाव बेहद घनीभूत है ,आत्मकथाएं अब भी आत्मव्यथाएं ही बनी हुई है .आज प्रतिरोध का साहित्य विपुलता से आ रहा है .कई भाषाओँ में आ रहा है .फिर भी वह कथित मुख्यधारा साहित्य को टक्कर नहीं दे पा रहा है .हमें दलित साहित्य को मानवता का साहित्य बनाना होगा .वह सिर्फ दलितों का ,दलितों द्वारा, दलितों के लिए साहित्य नहीं होना चाहिए .हर भारतीय उसे चाव से पढ़े .सबको लगे कि इसे पढना बेहद जरुरी है .हमें प्रतिरोध के साहित्य को भी लोकप्रिय बनाना होगा और उसकी पंहुच का दायरा विस्तृत करना होगा .हिंदी पट्टी के दलित लेखकों को नवाचार करने चाहिए .आनंद नीलकंठन के पौराणिक उपन्यास असुर तथा अजेय को पढ़िए ,आपको लगेगा कि किसी केडर केम्प में बैठकर आप बात सुन रहे है .नीलकंठन ने रावण .दुर्योधन .कर्ण जैसे पात्रों के ज़रिये ब्राह्मणवाद पर भारी चोट मारी है .यह तो एक उदहारण मात्र है ,मेरा मत है कि हमें दलित साहित्य जो कि वस्तुत समतावादी साहित्य है .उसके स्वरों को मुख्यधारा के स्वरों में तब्दील करना होगा .


 विद्या भूषण रावत :  क्या हम बहुत ज्यादा  'चिंतक 'तो नहीं हो गए क्योंकि भूमिहीन किसानोंमज़दुरों,गांव में मैला धोने वालोबाल श्रमिकोआर्थिक उदारीकरणनिजीकरण के मुद्दे धीरे धीरे हमारे आंदोलनों से गायब हो गए हैं। ये सारे प्रश्न तो आंबेडकरवादियो के एजेंडे में होनी चाहिए ?

भंवर मेघवंशी- हम चिन्तक हो पाते तब भी हम समाज के लिए उपयोगी जीव साबित होते .मगर हम चिंतित प्राणी हो गए है .सदैव रुदन .शाश्वत रुदन करनेवाले .जो बुद्धिजीवी है हमारे समाज के उनको इतना ज्ञानाभिमान हो गया है कि वो किसी और ही लोक में जीते है .आज समाज में क्या हो रहा है .उससे सरोकार रखे बगैर हम कैसे चिंतक है .आज भी अगर हमारे करोड़ों भाई बहन रोटी के अभाव में भीख मांगने पर मजबूर है .लाखों लोग आज भी मैला उठा रहे है .हमारी बहुत बड़ी आबादी घर .खेती या शमशान की भूमि तक से महरूम है .हमारे लाखों बच्चे कचरा बीन रहे है ,सड़कों पर ज़िन्दगी बसर कर रहे है तो हमें सोचना पड़ेगा कि आखिर इस आर्थिक उदारीकरण .वैश्वीकरण और निजीकरण ने हमको क्या दिया है .अगर जनता के ये मुद्दे हमारे विमर्श और आन्दोलनों से गायब है तो मानकर चलिये कि हम किसी और ही युग में जी रहे है .इस देश के तमाम वंचित ,पीड़ित गरीब जन के बुनियादी मुद्दे अम्बेडकरी आन्दोलन के एजेंडे में लाने होंगे तभी हमारा आन्दोलन जन आन्दोलन होगा .


विद्या भूषण रावत :जो बाबा साहेब को सही ढंग से मानता होगा तो उसके लिए मनुवाद और पूंजीवाद सबसे बड़े दुश्मन हैं।  आज दलित खड़ा हुआ है।  नये युवा आ रहे हैं लेकिन आंदोलन एक 'रिएक्शन भी है।  हालाँकि जो हमारे साथ घटित हो रहा है उसका मुंहतोड़ जवाब तो देना होगा और गुजरातहैदरबाद आदि की घटनाओ ने साबित कर दिया है के दलित अब चुप नहीं रहेंगे लेकिन समाज बदलाव की अम्बेडकरवादी मुहीम तो चलती  रहनी चाहिए ताकि एक प्रबुद्ध भारत का निर्माण हो सके। आपको इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण क्या लगता है ?

भंवर मेघवंशी : प्रतिक्रिया भी जरुरी है ओर तात्कालिक जवाब देना भी कभी कभार बहुत आवश्यक हो जाता है .इसलिए उना और हैदराबाद के मुद्दों पर हुयी त्वरित प्रतिक्रियाओं का मैं तहेदिल से इस्तकबाल करता हूँ.यह संकेत है कि दलितों की नई पीढ़ी बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करेगी .लेकिन इसके पीछे कि साजिश को भी समझना होगा कि कहीं वे हमें अत्याचारों के चक्रव्यूह में तो नहीं फंसा रहे है ताकि हम अपनी सारी उर्जा सिर्फ इसी के विरोध में खर्च करते रहे ओर वे लोग आराम से हम पर राज करते रहे . मनुवाद और पूंजीवाद एक दूसरे के पूरक है .दोनों ही हमारे दुश्मन है .हम मनुवाद से तो लडाई करते है और पूंजीवाद का समर्थन करते है ,तब लडाई भौंथरी हो जाती है .बाज़ार और ब्राहमणवाद एक दूसरे से जुड़े हुए है ,किसी भी एक का साथ देना दूसरे को प्राण वायु पंहुचाने जैसा है .हमें प्रबुद्ध और समृद्ध भारत बनाना है सिर्फ आर्थिक समृद्धि मात्र नहीं .हर तरह से सक्षम और आत्मनिर्भर ,प्रगतिशील एवं वैज्ञानिक चेतना से लेश भारत बनाना होगा ,जो मनु और पूंजी के गुलामों से पूर्णत मुक्त भारत होगा .इसके लिए हमें सांस्कृतिक एवं आर्थिक मोर्चों पर अपनी भागीदारी के लिए काम करना होगा ,अभी हमारी सारी लड़्त राजनीतिक बराबरी और सामाजिक समानता के लिए चल रही है पर इस शास्त्रीय गुलामी और आर्थिक गैरबराबरी को ख़त्म करने की दिशा में हमारे प्रयास अभी भी नाकाफी दिखाई पड़ते है .इन मोर्चों पर ध्यान देना होगा .


 विद्या भूषण रावत : आप आर एस एस के संपर्क में कैसे आये. क्या उन्होंने आपको ढूंढा या आप कौतूहलवश उसमे गए ?
भंवर मेघवंशी- बचपन में खेलकूद की इच्छा ने अनायास ही मुझे आर एस एस तक पहुंचा दिया.मैं जब सातवीं कक्षा का विद्यार्थी था, तब हमारे भूगोल के अध्यापक जी ने मेरे गांव में आ कर हम बच्चों को इकट्ठा करके खेल खिलाना शुरू किया. बाद में वे गीत भी सिखाने लगे.थोड़े दिन बाद उन्होंने हर दिन बिठाकर कुछ बातें भी बतानी शुरू कर दी.बाद में भगवा ध्वज भी लगाया जाने लगा.हमने खाकी निकर और काली टोपी पहनना शुरू कर दिया .हमें यह बताया गया कि हम इश्वर की योजना से संघ की शाखा के लिये चुने गये है. हम भाग्यशाली है कि हमें अपनी मातृभूमि की सेवा करने का अवसर मिला है.शुरू में तो कौतुहलवश तथा खेलकूद के लालच में ही मैं उन तक गया ,पर बाद में उन्होंने मेरी क्षमताओं को पहचानते हुये मुख्यशिक्षक ,कार्यवाह बनाते हुये जिला कार्यालय प्रमुख तक बनाया.
विद्या भूषण रावत :   संघ में गैर मुस्लिमो को शामिल करने का एक उत्साह बना रहता है , कुछ इमोशन, कुछ देश भक्ति और कुछ धर्म की रक्षा का नाटक। 

भंवर मेघवंशी : राष्ट्रवाद की भावना तथा धर्मो रक्षति रक्षित: की बातें तो महज दिखावा है,असल में मुस्लिमों का डर दिखा कर तथा इसाईयों के प्रति नफरत का भाव पैदा करके वे लोगों को शामिल कर लेते है.

 विद्या भूषण रावत : मुझे आज भी याद है के बाबरी मस्जिद के ध्वंश से करीब दो दिन पूर्व में एक सज्जन के पास हरयाणा गया था और जो शब्द अपने कहे वही उस वक़्त उन्होंने कहे के ' अब की बार कार सेवा' अच्छे से होगी। क्या आपको पता था के अबकी बार मस्जिद गिरनी ही है। 

भंवर मेघवंशी -बिल्कुल पता था.यह तो पूर्वनियोजित ही था. बाबरी मस्जिद तोडना ही कारसेवा का असली मकसद था.

विद्या भूषण रावत :  संघ आज भी दलितों और आदिवासी गाँवों की और जा रहा है।  राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, उसका उदहारण है।  क्या कारण  है के लोग उनके कार्यक्रमो में भाग लेते हैं। क्या अम्बेडकरवादी, बहुजनवादी, समाजवादी, वामपंधी और कोई वादी लोगो के पास जनता की सांस्कृतिक महत्वाकांक्षा  को लेकर कोई कार्यक्रम नहीं है या हमने लोगो के पास जाना छोड़ दिया है।  ये बात सही है के हिंदुत्व के लोगो के पास पैसो की कमी नहीं है लेकिन उसका जो कर्मठ कार्यकर्ता है, जो दूर दराज से आता है वो तो अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ काम करता है।  
भंवर मेघवंशी : संघ के लोग मिशनरीज लोगों की तर्ज पर आज सुदूर दुर्गम इलाकों तक में फैल गये है.वे शहरों की वाल्मीकि बस्तियों में मौजूद होते है तो जंगल पहाड़ों में आदिवासियों के बीच भी.सेवा के काम के जरिये वे अपनी विचारधारा को स्थापित करते है.लोगों के सुख दुख में साथ दिखाई पड़ते है.वे लोगों की जरूरतों को समझकर उनकी पूर्ति करते है,जबकि हम लोग सिर्फ सिद्धांत बताते है और भाषण पिलाते है.हमारी धरातल पर उपस्थिति निरंतर घट रही है ,जबकि संघ सम्प्रदाय के प्रचारक गण लोगों के बीच घुलमिल गये है.वामपंथ,अम्बेडकवाद,समाजवाद,हुजनवाद तथा अन्य गैरसंघवादी ताकतों के लोगों ने वाकई आम जन के बीच जाना छोड़ दिया.ये लोग या तो चुनावी बहसों में नजर आते है या खोखले बौद्धिक विमर्शों में.बात केवल पैसे की नहीं है, प्रतिबद्धता की भी है.आरएसएस के पास आज पैसे की कमी नहीं है,यह सर्वमान्य सत्य है,मगर हमें यह भी याद रखना है कि चाहिये कि उसके पास समर्पित कैडर का संख्याबल भी है.उसका कैडर कहीं भी जाने के लिये तैयार है.

 विद्या भूषण रावत : म्बेडकरवादी सांस्कृतिक परिवर्तन की धारा आपके राज्यो मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान में कितनी मज़बूत है।  
भंवर मेघवंशी : ग़ुजरात तो अभी बदलाव का संवाहक बना हुआ ही है. मध्यप्रदेश और राजस्थान में अन्दर ही अन्दर बहुत उबाल आया हुआ. सांस्कृतिक परिवर्तन की धारा का तेज बहाव आने को तत्पर है.सही पहल करने वाले ईमानदार नेतृत्व की जरूरत है.
विद्या भूषण रावत :  संघी प्रोपगंडे का मुकाबला कैसे हो , कभी गाय, कभी बीफ, कभी भारत माता , कभी गंगा और पाकिस्तान और मुसलमान तो चौबीस घंटे उनके जुबान पर रहता है।  ज्यादातर ये राष्ट्र और सांस्कृतिक प्रश्न है जिसमे लोग आसानी से बहक जाते हैं क्योंकि लोगो को लगता है देश की और संस्कृति की बात है।  दलित, पिछड़े, आदिवासी इसको कैसे रेस्पोंड  करे .
भंवर मेघवंशी : हम प्रोपेगंडे का मुकाबला तथ्य और सत्य पर आधारित कथ्य से ही कर सकते है. संघ झूठ बनाने तथा उसे सच की पैंकिंग करके फैलाने की विश्व की सबसे बड़ी फैक्ट्री है.गाय,गंगा,गायत्री,गौमाता,भातमाता,बीफ ,राष्ट्रवाद,देशभक्ति, वंदेमातरम् ये सब इनके उपकरण मात्र है.असल मकसद तो इस देश के मेहनतकश गरीब गुरबा का शोषण करते रहना है.उन्होनें संघ और राष्ट्र को एक दूसरे का पूरक बना दिया है.भाजपा को वोट देने को राष्ट्रभक्ति से जोड़ दिया है.गाय जैसे जानवरों की रक्षा को संस्कृति का सवाल बना दिया है. हमें अपने लोगों तक असली बात को पहुंचाना होगा.देश ,समाज और संस्कृति के मूल्यों की गैर साम्प्रदायिक व्याख्या करनी होगी.जनता के मध्य सीधी बहस करनी होगी.मुझे पक्का यकीन है कि इस हिन्दुत्व के जहरीले राजनीतिक विषाणु को मात सिर्फ दलित विचारधारा ही दे सकती है.हमें पूरी शिद्दत से संघ सम्प्रदाय को एक्सपोज करना चाहिये.

 विद्या भूषण रावत : आपने कहा के वामपंथियो ने जाति को कभी समझा नहीं इसलिए उनके और दलितों के बीच में गैप रहेगा।  इस पूरे राजनैतिक परिदृश्य में तो ब्राह्मणवादी फासीवादी ताकतों को हराने के लिए एक समझ तो विकसित करनी होगी।  कई स्थानों पर दलित मुसलमानो की अच्छी संख्या है और कई जगह पर नहीं।  इसलिए वैचारिक तौर पर हमें अपने साथी तो बनाने पड़ेंगे और ये एक लंबी लड़ाई है जो जैसा आपने कहा विचारधारा की मबबूती से आएगी।  लंबे समय में आप दलितों, आदिवासियों की लड़ाई में किस प्रकार के लोगो का साथ चाहते हैं।  

भंवर मेघवंशी : ब्राहमणवादी फासीवाद से मुकाबला करने के लिये कई प्रकार के एलायंस बनाने होंगे. जहां जहां हम न्यूनतम् साझे मिलन बिन्दूओं के जरिये वामपंथ के साथ चल सकते है,हमें बेहिचक वामपंथ के साथ चलना चाहिये.जहां हमारे पास बहुजन विकल्प हो ,उनके साथ जाने में भी कोई बुराई नहीं है.अगर हम कहीं धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ स्वयं को सहज पाते है तो उनके साथ भी चलने पर विचार करना चाहिये.हमारा विचार शत्रु बहुत व्यापक औऱ विशाल है.उससे कई मोर्चों पर कई सारे समूहों के साथ मिलकर लड़ना होगा.
विद्या भूषण रावत :  आपने कहा के दलितों पे अत्याचार के मामलो में पिछड़ी जातियो का ज्यादा रोल है. मैं ये मानता हूँ के ये भी एक सिंपल स्टेटमेंट है के क्योंकि पिछडो की categorisation देखेंगे तो इसमें भूमिहीन तबका वो दलितों का नेचुरल साथी है।  जो थोड़ा जमीन जायदाद के मामले में धनी है वो भले ही ब्राह्मण ठाकुरो को गरियाले लेकिन दलितों के नेतृत्व में काम करने को तैयार नहीं लेकिन ये तो ग्रेडेड इन एक़ुअलिविटी वाली बात है जब हम ऊपर वाले के साथ जुड़ना चाहते है लेकिन नीचे वाले के नेत्रेत्व में आने को तैयार नहीं ?  क्या आप पिछडो में बदलाव की उम्मीद नहीं करते ?
भंवर मेघवंशी : दलितो पर दबंग पिछड़ों का अत्याचार महज सिंपल स्टेटमेंट नहीं है.यह ग्रासरूट की सच्चाई है.आप एट्रोसिटी एक्ट के तहत दर्ज मुकदमों का विश्लेषण कर लीजिये,आप मेरी स्थापना को तथ्यात्मक पायेंगे. मैं हवा में बात नहीं कर रहा हूं.पिछड़ों का भूमिहीन तबका भले ही आर्थिक तल पर दलितों के नजदीक दिखाई देता हो,मगर वह सामाजिक स्तर पर उसी ब्राहम्णवादी ऊंच नीच की मानसिकता से ग्रस्त है.दलितों का नेतृत्व जिस दिन पिॆछड़ों द्वारा स्वीकार लिया जायेगा तथा भेदभाव व अन्याय अत्याचार बंद कर दिया जायेगा,तब ही बदलाव की उम्मीद बलवती होगी.

 विद्या भूषण रावत : जैसे के मैंने कहा, कोई भी राजनैतिक लड़ाई केवल नकारात्मक नहीं हो सकती।  बुद्ध ने अपना रास्ता दिखाया और पूरी दुनिया में बौद्ध धर्म गया और उसने बड़े बदलाव दिखाए।  बुद्ध ने तो दुश्मनो का नाम तक नहीं लिया. बाबा साहेब ने राजनैतिक लड़ाई लड़ी, हमें अधिकार दिलवाये लेकिन आखिर में ये भी समझ आया के सांस्कृतिक परिवर्तनों के बिना हम राजनैतिक लड़ाई भी नहीं जीत सकते।  क्या आप समझते हैं के बौद्ध संस्कृति की और गए बिना हमारी लड़ाई अधूरी है और केवल राजनैतिक परिवर्तन प्रबुद्ध भारत के निर्माण के लिए नाकाफी है। 

भंवर मेघवंशी  : -राजनीतिक बदलावों को स्थाई करने के लिये सांस्कृतिक परिवर्तनों की आवश्यकता पड़ती है.बु्द्ध का मार्ग वैग्यानिक चेतना और शांति का सम्यक मार्ग है.यहीं दलितों के लिये श्रेयकर भी है.इसको अंगीकार किये बिना ब्राह्मणवाद से मुक्ति संभव ही नहीं है.

विद्या भूषण रावत : उत्तर प्रदेश का चुनाव देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।  क्या कहेंगे इस प्रश्न पर ?
भंवर मेघवंशी : उत्तरप्रदेश का चुनाव इस अंधकार के समय में एक रोशनी ला सकता है .बाज़ार और मनुवाद की ताकतों को अगर वहां से मात मिल सके तो यह हमारे देश की सेहत के लिए बहुत अच्छा होगा .यह सिर्फ चुनाव नहीं है ,इसे जनमत संग्रह के रूप में लेना चाहिए. यह बडबोले पंतप्रधान के आधे कार्यकाल के प्रति रायशुमारी भी हो सकता है .इसलिए इस चुनाव का अपना एक महत्व है .सारी पार्टियाँ भी इसे युद्ध की तरह लड़ रही है .इसे राजनीतिक दलों के मध्य चुनावी संघर्ष से ज्यादा विचारधाराओं के बीच का संघर्ष बनाना होगा .मुझे तो लगता है कि नफरत की राजनीति करनेवालों को इसमें हारना ही चाहिये .
 विद्या भूषण रावत : त्तर प्रदेश के चुनावो को आप नरेंद्र मोदी और हिंदुत्व के लिए रेफेरेंडम मान रहे है।  वह बसपा और समाजवादी पार्टी आमने सामने हैं।  आप किस और लोगो को वोट के लिए कहेंगे।  मैं जानता हूँ ये एक कठिन प्रश्न हो सकता है लेकिन जैसा मेरा मानना है लोगो को '' बीजेपी'को हराने वाली पार्टी को वोट देने के लिए कहने का मतलब है उनको भ्रमित करना।  इसलिए हम सभी साथियो से साफगोई से अपीलकरने को कह रहे हैं।  लोग किसको चुने और क्यों ?

भंवर मेघवंशी : -इसमें कोई कठिनाई नहीं है.पहला लक्ष्य तो बीजेपी हराना होना चाहिये,दूसरा जीतने वाली गैरभाजपाई पार्टी को वोट देना होना चाहिये. सपा और बसपा आमने सामने है,हालांकि भाजपा बार बार यह कह रही है कि उसका मुकाबला समाजवादी पार्टी से है.सारे मीडिया हाउसेज की नजर मे भी यूपी के मुख्य प्लेयर सपा,भाजपा और कांग्रेस है. उनकी नजर में बसपा कहीं है ही नहीं. क्या यह आकलन ठीक है. मैं तमाम अंतर्विरोधों व असहमतियों के बावजूद उत्तरप्रदेश की जनता से अपील करना चाहता हूं कि वह बहन मायावती को राज में लाने के लिये हाथी पर बटन दबायें.ऐसा इसलिये कह रहा हूं ,क्योंकि सपा अपनों की वजह से इस बार अपने आप ही हार रही है. कांग्रेस की खटिया तो बिछ गई है.राहुल गांधी मेहनत भी कर रहे है ,पर बहुत ज्यादा हासिल होने वाला है नहीं. भाजपा को जीतने नहीं देना है,ऐसे में फिलहाल बसपा ही अंतिम विकल्प बचता है

Wednesday, 25 November 2015

सहिष्णुता के अहंकार में डूबा समाज



विद्या भूषण रावत 

आमिर खान की पत्नी के विदेश में बसने की खबर से हर 'भारतीय' सदमे में है और उनको शाहरुख़ खान के साथ पाकिस्तान भेजने की बात कह  रहा है।  आमिर के पुतले जलाये जा रहे हैं और देश की विभिन्न अदालतों में उनके खिलाफ मुकदमे किये गए हैं जिनमे देशद्रोह का मुकदमा भी शामिल है।  सबसे मज़ेदार बात यह है के विदेशो में रहने वाले भारतीय इस अभियान को बहुत हवा दे रहे हैं वैसे भारत में रहने वाले लोग भी कह रहे हैं के आमिर ने गद्दारी की है और उनको इसके परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। है न कितनी अच्छी बात के हम पश्चिमी लोकतान्त्रिक देशो में रहकर पुरे अधिकार  के साथ भारत माता की जय बोलना चाहते हैं , मंदिर बनाना  चाहते है , मोदी  की बड़ी बड़ी रैलियां करना चाहते हैं लेकिन अपने देश में हम पूर्ण दबंगई दिखाना चाहते हैं।  अगर यही बात अमिताभ करते तो  क्या उन्हें कही भेजने की बात होती या नहीं ?

हम फ़िल्मी कलाकारों को भगवान बनाकर न देखे।   व्यक्तिगत तौर पर मैं आमिर खान को ढकोसलेबाज़ मानता हूँ क्योंकि उनकी सत्य  की जीत 'रिलायंस' के चंदे से होती है और भारत में अगर हम भ्रस्टाचार को लेकर लालू को इतना गरियाते है तो अम्बानी तो उस बिमारी के जनक थे।  क्या अर्नब गोस्वामी से भारत में 'ईमानदारी' का राग अलापने  वाले मसीहा लोग अम्बानी  और अडानी के बारे में बात करेंगे।  जब करप्शन की बात हो तो राजनेताओ का ही हिसाब किताब क्यों हो, उद्योगपतियों का क्यों नहीं, क्योंकि भ्रष्टाचार की गंगा उनकी ही दुकानो से निकलती है।  इसलिए आमिर ने जो कहा वो सोच बहुत रिहर्सल के बाद कहा और वो उनका व्यू पॉइंट है और उसे रखने की उनको छूट होनी चाहिए।  उनको पाकिस्तान भेजने और उनको गाली  देकर हिंदुत्व के लठैत आमिर की ही बात को सही साबित कर रहे हैं। 

मैं आमिर की बातो से कत्तई इतेफाक नहीं रखता।  पहले ये के आमिर का यह कहना के भारत में असिहष्णुता अचानक  बढ़ गयी बिलकुल गलत है।  हमारा देश असल में असभ्य  और क्रूर है जहाँ दहेज़ के लडकिया रोज जलती हैं , जहाँ प्रेम विवाह करने पर माँ बाप अपने ही बच्चो की निर्ममता से हत्या करने से नहीं घबराते , जहाँ किसी भी लड़की का शाम को घर से बाहर निकलना मुश्किल होता है , जहाँ सती का आज भी महिममंडन होता हो और विधवा होने पर औरतो  की जिंदगी नरक बना दी जाती हो, जहाँ आज भी मंदिरो में दलितों  के प्रवेश पर उनकी हत्या कर दी जाती हो , जहाँ किसी  के घर में क्या बन रहा हो उस पर समाज नियंत्रण करना चाहता ,हो , जहाँ स्कूलों में बच्चे इसलिए निकल जाते हो के खाना किसी दलित महिला ने बनाया हो , उस देश की महानता और संस्कृति का क्या कहे जहा  एक समाज को पढ़ने का हक़ नहीं और दूसरे को केवल मलमूत्र उठाने की जिम्मेवारी दी गयी हो , जिसके छूने भर से लोग अछूत हो जाए।  लेकिन भारत की महान सभ्यता का ढोंग करने वालो ध्यान इधर  कभी नहीं गया। ऐसा नहीं के इस विषय में लिखा नहीं गया हो या बात नहीं  की गयी हो। 

असहिषुणता का इतिहास लिखे तो शर्म आएगी लेकिन क्यों है के आमिर खान से इतनी नाराज़गी ? मतलब साफ़ है।  भारत के इलीट मुस्लिम सेकुलरिज्म के खेल में भारत की सहिष्णुता के सबसे बड़े 'ब्रांड' एम्बेसडर हैं।  और जो व्यक्ति 'अतुलनीय भारत ' की नौटंकी करता रहा हो वो अचानक पाला क्यों बदल बैठा। आमिरखान और अन्य कलाकारों ने भारत के 'सहिष्णु' होने के सबूत दिए और साथ ही दलितों या पसमांदा मुसलमानो की हालातो पर चुप रहकर उन्होंने हमेशा ही 'सहिष्णु' परम्परा का 'सम्मान' किया है।  शायद रईसी परंपरा में केवल बड़े बड़े लोगो  की बड़ी बड़ी बाते सेकुलरिज्म होती है लेकिन हलालखोर , कॅलण्डर , नट या हेला भी कोई कौम है इसका पता शायद इन्हे पता भी नहीं होगा।  हमें पता है के अभी तक मैला ढोने के प्रथा के विरुद्ध आमिर ने कभी निर्णायक बात नहीं की वो केवल टीवी शो में आंसू  बहाने तक सीमित थी। 

तो फिर क्या बदला।  लोग कहते हैं कांग्रेस के ज़माने में भी सेंसरशिप लगी और फिल्मे प्रतिबंधित हुई।  बिलकुल सही बात है।  हम इमरजेंसी के विरुद्ध खड़े हुए लेकिन अब ऐसा लगता है के सत्तारूढ़ दल का मुख्य आदर्श संजय गांधी और चीखने चिल्लाने वाले मुल्ले हैं जो किसी भी उदार विचार को या उनसे विपरीत विचार को डंडे और धमका डरा के रुकवाना चाहते है।  फ़िल्मी लोगो को उतनी ही तवज्जोह मिलनी चाहिए जितना चाहिए जिसके वे हक़दार हैं।  पिछले कुछ वर्षो में बम्बइया फ़िल्मी लोग हिंदुत्व और  एजेंडा लागु करने में सबसे  प्रमुख  रहे हैं और उनकी प्रसिद्धि ने चुनाव  भी जितवाया है लेकिन उनमे कोई भी ऐसे नहीं हैं जो शाहरुख़, आमिर या अमिताभ का दूर दूर तक मुकाबला कर सके।  अमिताभ हालाँकि गुजरात  या अन्य सरकारी विज्ञापनों में आते हैं लेकिन वो भी राजनैतिक हकीकतों से वाकिफ हैं इसलिए चुप रहते हैं हालाँकि देर सवेर उन्हें मुह खोलना पड़ेगा।  आज के हिंदुत्व कॉर्पोरेट के दौर में भारत की अग्ग्रेस्सिव मार्केटिंग  चल रही हैं इसलिए आमिर या शाहरुख़ जो वाकई में भारत के सवर्णो की 'सहनशीलता' के 'प्रतीक' है इसलिए उनसे ये 'उम्मीद' ये की  जाती है के वे डॉ ए पी जे कलाम की तरह अपने 'भारतीय' होने का सबूत दे।  कोई मुसलमान यदि अपने दिल की बात रख दे तो वो 'देशद्रोही' है।   जिन लोगो को सुनकर हम बड़े हुए साहिर , दिलीप कुमार, मोहम्मद रफ़ी ,  बेगम अख्तर आज उन्हें धर्म के दायरे में डाला जा रहा क्योंकि वे अपनी रे रखती हैं।  कई बार फिल्म स्टार, गायक या खिलाडी लोग वो बात कह देते हैं जो  उनके कई प्रशंषको नहीं जचती उसमे कोई बुरी बात नहीं है।  हम आमिर खान से साम्प्रदायिकता और सहिष्णुता का ज्ञान नहीं लेते अपितु उनकी फिल्म इसलिए देखते हैं के वो साफ सुथरी फिल्म बनाते है। क्या हम रवीना टंडन, अशोक  अशोक पंडित, गजेन्द्र चौहान या मनोज तिवारी से ज्ञान ले।  हाँ फिल्मो में बहुतसे  लोग रहे हैं जिन्होंने गंभीर विषयो पर बोला है और उनकी समझ समझ है।  बाकि हमको कोई कलाकार इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि हमें उसकी एक्टिंग अच्छी लगती है या फिल्म अच्छी लगती है।  अगर आप आमिर या शाहरुख़ की फिल्मोंी का बॉयकॉट इसलिए करना चाहते हैं के उनकी कोई बात आपको अच्छी नहीं लगी तो फैसला आपका है क्योंकि  फिर आपको  मनोज तिवारी, अनुपम खेर, अशोक पंडित, गजेन्द्र चौहान  आदि की फिल्मे देखनी पड़ेंगी क्योंकि उनके विचार आपको अच्छे लगते हैं।  

 आमिर खान ने जो कहा वो उनका हक़ था और शायद देश का बहुत बड़ा तबका वैसे ही सोच रहा है।  अपने दिल की बात को अगर वो कह दिए तो हमारा क्या फ़र्ज़ है  ? उसको गालियो से लतियाये या भरोषा दिलाएं।  आमिर ने जो गलत कहा वो के असिषुणता बढ़ रही है क्योंकि वो पहले से ही हैं।  इस देश के लोगो ने उनको प्यार दिया है।  जो लोग इस वक़्त दबंगई कर रहे है वो हमें एमेजेन्सी के संजय गांधी के गुंडों की याद दिला रहे हैं। आमिर को कहना चाहिए कौन लोग ऐसा तमाशा कर रहे हैं।  ये पुरे देश के लोग नहीं हैं ये एक पार्टी विशेष और जमात विशेष के लोग हैं जिन्होंने उन सभी को गरियाने  और धमकाने का लाइसेंस लिया हुआ है जो इनकी विचारधारा से मेल नहीं खाते।  इसलिए आमिर साहेब सबको न गरियाये।  साफ़ बोलिए वो कौन हैं जो असहिषुणता फ़ैला रहे हैं।  एमर्जेन्सी का विरोध करने वालो का सबसे बड़ा मॉडल इमरजेंसी का दौर ही है और वही व्यक्तिवादी राजनीती आज हावी है केवल फर्क इतना है के उस दौर में दूरदर्शन और रेडियो पर समाचार सरकार सेंसर करती थी और आज सरकार और सरकारी पार्टी के दरबारी पत्रकार पूरी ताकत से ये काम कर रहे हैं।  आज अर्नब गोस्वामी और सुधीर चौधरी का दौर है जिसमे सरकार से मतभेद रखने वालो की खबरे सेंसर होंगी अपितु उनको अच्छे से गरियाया जायेगे आखिर ९ बजे के प्राइम टाइम शोज का यही उद्देश्य है। हकीकत यह है के हम वाकई में एक भयानक दौर से गुजर रहे हैं जिसमे तिलिस्मी राष्ट्रवादी नारो की गूँज में हमारे मानवाधिकारों और अन्य संविधानिक अधिकारों की मांग की आवाज़ो को दबा दिया जा रहा है।  पूंजीवादी ब्राह्मणवादी  लोकतंत्र से आखिर आप उम्मीद भी क्या कर सकते हैं वो तो सन्देश वाहक को ही मारना चाहता है ताकि खबर ही न रहे और खबरे बनाने और बिगाड़ने के वर्तमान युग में मीडिया निपुण होता जा रहा है जो वहुत ही शर्मनाक है। 

Monday, 12 October 2015

Temple Entry movement : Mental slavery or a human rights issue

दलितों का मंदिर प्रवेश आंदोलन : दिमागी गुलामी या मानवाधिकारों का प्रश्न 


विद्या भूषण रावत 

दो वर्ष पूर्व बर्मिंघम में घूमते हुए हमारे मित्र देविन्दर चन्दर जी ने बताया के कैसे इंग्लैंड के कई पुराने और ऐतिहासिक चर्च अब खाली पड़े हैं और सिख उन्हें खरीद रहे हैं।  इन गिरजो में अब कोई क्यों नहीं जाता ये समझना जरुरी है और क्या 'सिखो द्वारा गुरुद्वारा बना लेने से कोई अंतर उसमे आ जायेगा क्योंकि ये केवल धनाढ्य सिख धार्मिक नेताओ को ही मजबूत करेंगे और उसके अलावा उस समाज के किसी भी सेक्युलर सेक्युलर तबके को आकर्षित नहीं कर पाएंगे।   जैसे जैसे कोई समाज सभ्यता और स्वतंत्र सोच की और अग्रसर होता है उसे भगवानो, पुजारियों और पूजास्थलों की आवश्यकता नहीं रहती क्योंकि वह अपनी स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए अपनी मनपसन्दीदा साहित्य और मनोरंजन को ढूंढता है और धर्म और उसके किताबे उसे अपनी आज़ादी पर बंदिश लगाने वाली नज़र आती हैं.  सिख समाज जरूर पैसे से मजबूत है लेकिन धार्मिक नेतृत्व  के चलते उनका बहुत नुक्सान भी हुआ है और अभी भी सिख अपने धार्मिक कठमुल्लाओं के खिलाफ बहुत मज़बूती से नहीं बोल पाये हैं।  पश्चिम में समाज ने आर्थिक, सामाजिक सांस्कृतिक तरक्क़ी की है इसलिए व्यक्ति अपने जीने के लिए पुस्तको और प्रकृति की और ज्यादा दौड़ता है बजाये पूजास्थलों की और जाने के। 

ये बात लिखने का आशय इसलिए के भारत में मंदिरो में प्रवेश को लेकर कई प्रकार के आंदोलन चल रहे हैं। बहुत से 'संतो' और 'क्रांतिकारियों ' ने दलितों के मंदिर प्रवेश के लिए कई स्थानो पे आंदोलन किये लेकिन इन सभी में नेतृत्व करने वाले 'महात्मा' तो पुरुस्कृत और महान हो गए लेकिन दलितों को अपमान और हिंसा ही सहनी पड़ी क्योंकि अधिकांश आंदोलन संकेतात्मक थे और उनसे बहुत बदलाव की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि जब धार्मिक विचारधारा और उसमे व्याप्त कुरीतियां, अन्धविश्वाश, जातिवाद, छुआछूत पर हमला नही होगा तो मंदिर प्रवेश ब्राह्मणवाद और हिन्दुवाद को ही मज़बूत करेगा। 

 पिछले महीने मैं जौनसार (उत्तराखंड) क्षेत्र में था जहाँ दलितों को कई स्थानीय मंदिरो में प्रवेश पर प्रतिबन्ध है। इस इलाके में दलित अल्पसंख्यक हैं और विकास की धरा से यह क्षेत्र अभी कोसो दूर है।  वैसे यहाँ पर राजनैतिक नेतृत्व ने हमेशा से लोगो की अज्ञानता का आनंद उठाया है क्योंकि अविघाजीत उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड बनने तक आदिवासी नेतृत्व के नाम पर पर इस क्षेत्र का एक मंत्री अवश्य बनता है लेकिन उनको भी यहाँ की असमानता और भेदभाव नज़र नहीं आता।  जब हमने वहां मौजूद लोगो से बात की तो अधिकांश साथियो को आंबेडकर नाम का पता तो था लेकिन उनके विचार क्या थे उसका दूर दूर तक अंदाज नहीं था।  एक अम्बेडकरवादी कमसे कम अपनी गरीबी के बावजूद भी विद्रोह का झंडा बुलंद रखता है लेकिन  यहाँ नौजवानो में मैं मंदिर प्रवेश के लिए उतावलापन देख रहा था ना के वर्ण व्यस्था के लिए कोई घृणा.  इसलिए जन समस्याओ को लेकर एक मित्र ने जब  बड़ा सम्मेल्लन बुलाया था तो उसमे  कई स्थानीय मुद्दे सामने आये लेकिन सभी ने शराबबंदी और मंदिर प्रवेश को मुख्य मुद्दा बताया।  मेरी दृष्टि में ये प्रश्न ही नहीं हैं और दलितों को शाकाहारी ब्राह्मणवादी चालो में घसीटने की कोशिश है क्योंकि सांस्कृतिक और स्थानीय आदतो पर हम अपने वैष्णवादी सोच लागु कर असली समस्याओ से ध्यान भटका देते हैं। 

 जौनसार का सम्पूर्ण  इलाका अनुसूचित जनजाति क्षेत्र  घोषित है।  देहरादून से करीब ७० किलोमीटर आगे चकराता, कलसी, विकशनगर आदि के इलाके जौनसार कहलाता है। पूरा इलाके में दलितों पे अत्याचार होता है और मंदिरो पर उनके प्रवेश पर पाबंदी है।  सबसे खतरनाक बात यह है के अनुसूचित जाति जनजाति अधिनियम यहाँ लागू नहीं होता क्योंकि पूरा इलाका आदिवासी क्षेत्र माना जाता है लेकिन ये आज से नहीं  अपितु उस समय से है जब उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा था और राज्य सरकारों ने कभी कोशिश नहीं की के इसे ठीक से समझा जाए और इसमें बदलाव लाया जाए.  क्योंकि इलाका आदिवासियों का था इसलिए मांग उठी थी के इसे आदिवासी इलाका  लेकिन अधिकारियो और राजनेताओ की चाल बाजी का नतीजा था के उन्होंने इस कमी की और ध्यान नहीं दिया और लिहाज़ा दलितों और आदिवासियों को इसका नुक्सान भुगतना पड़ रहा है क्योंकि आरक्षण का लाभ इस क्षेत्र के सवर्ण उठा रहे हैं लेकिन  छेत्र के आदिवासी नेता मंत्री कभी इस प्रश्न को नहीं उठाते।   इसीलिए मैं हमेशा से कहता रहा हूँ के समस्याओ के अति सामान्यीकरण से बहुत नुक्सान होता है।  जौनसार क्षेत्र का राजनैतिक नेतृत्व अपने को आदिवासी कहता है लेकिन यहाँ के दलितों पर हो रहे अत्याचार और इलाके में मौजूद अन्धविश्वास को अपनी संस्कृति बनाकर इस्तेमाल कर रहा है। पूरे क्षेत्र को आदिवासी जनजाति घोषित करने के अर्थ ये है के यहाँ रहने वाले हिन्दू सवर्ण सभी संवैधानिक तौर पर आदिवासी घोषित हो गए और वो सारे लाभ ले रहे हैं जो अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष तौर पर संविधान में बनाये गए है। दुखद और खतरनाक बात यह है के सवर्णो के अत्याचार पर दलित अनुसूचित जाति जनजाति अधिनियम का सहारा नहीं ले सकते लिहाज़ा दलितों पर अत्याचारों की कोई रिपोर्टिंग भी नहीं होती। वैसे एक सुचना के मुताबिक एक संसदीय समिति ने पूरे इलाके को आदिवासी घोषित कर सभी लोगो को आरक्षण का लाभ देने का विरोध किया है लेकिन न उस रिपोर्ट का कुछ पता ना ही सरकार  की उसमे कोई दिलचस्पी दिखाई देती है। 

जब मैं युवाओ से बात कर रहा था तो मैंने उनसे पूछा के मंदिर प्रवेश क्यों बड़ा  मुद्दा है ? भाई, अगर सवर्णो को अपने मंदिरो में गर्व है और वो दलितों को अपने मंदिरो में नहीं आने देना चाहते तो वो एहि साबित कर रहे हैं के दलित  हिन्दू नहीं है क्योंकि आप यदि हिन्दू हैं तो आपको मंदिर प्रवेश का अधिकार है।  मैं इस सवाल को दो तरीको से देखता हूँ।  एक तो व्यक्ति के अधिकार का मामला क्योंकि आधिकारिक तौर पर दलित हिन्दू हैं और भारत के संविधान ने छुआछूत को गैरकानूनी घोषित किया है इसलिए दलितों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को साफतौर पर क़ानूनी सहमति है और उसे कोई ताकत रोक नहीं सकती क्योंकि धर्मस्थल सार्वजानिक सम्पति हैं और लोगो को पूजा के उनके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।  ये एक मानवाधिकारों की लड़ाई है  और भारतीय संविधान  की पूरी ताकत उनके साथ है.  लेकिन एक अम्बेडकरवादी नज़रिये से जब हम इन चीजो को देखते हैं तो बाबा साहेब के मिशन का धयान आता है जब उन्होंने लोगो से गुलामी की जंजीरो को तोड़ने के लिए कहा था, बाइस प्रतिज्ञाएँ करवाई थी और लाखो लोगो के साथ बुद्ध धर्म ग्रहण किया था इसलिए बहुत बड़ी जिम्मेवारी लोगो के ऊपर भी है के वे अपनी मानसिक गुलामी को तोड़ने में कामयाब होते हैं या नहीं।   हम अगर सारी उम्मीदे राज्य सत्ता के ऊपर लगाकर चैन की नींद सोना चाहते हैं तो ये समझना होगा के मनुवादी सोच के मठाधीशो को मानववादी सोच के संविधान की 'रक्षा' का दायित्व है इसलिए दलितों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को सरकार असहायता से देख रही है क्योंकि सारे जौनसार के हिन्दू अब दलितों के मंदिर प्रवेश को रोकना चाहते हैं। 

सवाल इस बात का है के क्या वाकई हिन्दू दलितों के मंदिर प्रवेश को रोकना चाहते हैं ?  मैं ये मानता हूँ के हिन्दू दलितों को भिखारी के तौर पर देखना  चाहते हैं नाकि इज्जत और बराबरी का हक़ लेकर अपनी शर्तो वाले व्यक्ति को लेकर इसलिए अगर झुककर, छुपकर आप मंदिर में घुश गए तो कुछ समस्या नहीं है लेकिन यदि अपनी पहचान के साथ इज्जत के साथ जाओगे तो वर्णव्यस्था को खतरा है।  खतरा असल में मंदिर प्रवेश से नहीं अपितु दलितों में बढ़ रही जातीय अस्मिता से है क्योंकि ये जानते  हैं के दलितों और पिछडो के गए बिना हिन्दुओ के मंदिर खाली पड़ जायेंगे और उनमे जाने वाले नहीं मिलंेगे। आज दलित हिन्दू केवल उनकी आबादी बढ़ने के लिए हैं अन्यथा हिन्दू व्यवस्था में उनका  कोई सम्मान नहीं है इसीलिए बाबा साहेब आंबेडकर ने उन्हें बुद्ध की शरण में जाने की  सलाह दी क्योंकि उस जगह जबरन घुश्ने का कोई मतलब नहीं जहाँ दिल के दरवाजे बंद हैं और दुनियाभर का छलकपट मौजूद हो।  आज भी हिन्दू समाज और उनके राजनैतिक संघठनो ने समाज बदलने का कोई प्रयास नहीं किया और न ही छुआछूत  विरुद्ध कोई आंदोलन किया।  दलितों के घर में एक दिन आकर मेला लगाने और तथाकथित रोटी  खा लेने भर से समाज में व्याप्त कुरीतियां नहीं जाने वाली क्योंकि जातियों को  वोट बटोरने तक ही सिमित कर दिया गया है। अभी भी हमारे नेता खाप पंचायतो के विरुद्ध बात करने को तैयार नहीं है।  आखिर हिन्दुओ को अगर दलितों के साथ रहने में दिक्कत है  तो दलित उनके साथ रहने को क्यों लालायित रहे ? 

आज जौनसार का दलित आरक्षण का लाभ भी नहीं ले पा रहा लेकिन मुझे दुःख हुआ जब मैंने कुछ नौजवानो से कहा के उन्हें मंदिर में जाने के बजाये संविधान को  पढ़ना चाहिए ताकि वे अपनी लड़ाई लड़ सके।  मनुवादियों की शरण में जाकर दलितों का उद्धार नहीं हो सकता।  भगवान और पुरोहितवाद बराबरी  और मानवता के दुश्मन हैं और वे अब बदलने वाले नहीं हैं और डंडे के बल पर आप मंदिर चले भी गए तो क्या करोगे जब पूरा साहित्य और धर्म ग्रन्थ आपको गरियाते नहीं थकते।  इसलिए अगर आप हिन्दू हैं तो आपके मंदिर जाने  के हक़ का मैं समर्थन करता हूँ और यदि नहीं तो आप अब चिंता छोड़िये।  मंदिरो, मस्जिदो, गुरुद्वारों या चर्चो में दलितों की आज़ादी नहीं छिपी है।  अगर दलितों की आजादी कही है तो वो है बाबा साहेब के तर्कवादी मानववदी दर्शन में और उनके बनाये संविधान में जो  मनुवादी समाज की आँख का कांटा बना हुआ है इसलिए उसको बचाने की हमारी जिम्मेवारी कहीं बड़ी है।  याकि मानिये आप मंदिर प्रवेश करके अपने इमोशन को तो बचा पाएंगे लेकिन आप मनुवाद को ही मज़बूत कर रहे है जो दिल से कभी बराबरी नहीं चाहता।  यदि उत्तराखंड के जौनसार या किसी  भी हिस्से के हिन्दू दलितों को मंदिर प्रवेश के लिए आंदोलन करें तो हम कहेंगे के बातो पर विचार करो लेकिन दलितों को अपने मंदिर प्रवेश के लिए खुद ही लड़ाई लड़नी पड़े और फिर मनुवादी ताकते उनको मार काटने के लिए तैयार खड़ी  हों तो ऐसे लड़ाई का कोई लाभ नहीं क्योंकि ये तो ब्राह्मणवाद के हाथो में खेलना है।  याद रहे आपका जीवन महत्वपूर्ण है और उसको सही दिशा में लेजाइये।  मंदिरो या पूजास्थलों में जाना बंद करें और चढ़ावे को अपने बच्चो की शिक्षा में लगाये तो भला होगा।  यकीं मानिये दलित जिस दिन पोंगा पंडितो और मंदिरो के पास जाना बंद  करदेंगे इन मंदिरो पे ताले पड़  जायेंगे और वे ज्यादा आज़ाद ख्याल रहेंगे और उनपर कोई अत्याचार भी नहीं होगा। 


 उत्तराखंड की सरकार और दो सवर्णवादी पार्टियो से मैं यही कहूँगा  के वे दोगली राजनीती बंद करें।  वो साफ़ करें के एक नागरिक  क्या अपने धर्मस्थल में नहीं जा सकता ? यह सरकार का दायित्व  है कि  लोगो को भयमुक्त प्रशाशन दे ताकि सभी अपनी इच्छा अनुसार पूजा अर्चना कर सके।  सरकार लोगो को पुजस्थल में प्रवेश करने से न तो रोक सकती है और ना ही उन्हें धार्मिक गुंडों के हवाले छोड़ सकती है।  यदि ६० वर्ष बाद भी एक व्यक्ति अपने पूजा अर्चना के अधिकार से वंचित है तो धिक्कार है इस व्यवस्था का और हमारे राजनेताओ पर। राज्य सरकार का यह उत्तरदायित्व है के पुरे प्रदेश में छुआछूत और जातिवाद के विरुद्ध एक बड़े एक बड़े कार्य्रकम की घोषणा करे ताकि ऐसी घटिया मानवविरोधी मानसिकता समाज में न पनपे और सभी लोग सम्मान के साथ जीवन यापन कर सके। हरियाणा में भगाना के लोगो ने मानसिक उत्पीड़न से तंग आकर  हिन्दू  धर्म का परित्याग किया।  कई बार उनलोगो को धमकी भी मिली लेकिन लोग डिगे नहीं और उन्होंने अपना रास्ता अख्तियार किया क्योंकि वहां की सरकार दलितों को सम्मान और सुरक्षा देने में पूरी तरह  विफल रही।  हम केवल इतना कहना कहना चाहते हैं के स्वतंत्र भारत का संविधान दलितों को मंदिर प्रवेश की आज़दी देता है और उनकी सुरक्षा और आपसी भाईचारा बनाने की जिम्मेवारी सरकार की है न के दलितों की अतः उनको अपनी जायज मांग रखने का हक़ है। 

Friday, 2 October 2015

हिंदुत्व की अराजकता का दौर






विद्या भूषण रावत 


उत्तर प्रदेश में पिछले बीस वर्षो में नॉएडा सभी सरकारों के लिए 'धन उगाही ' का एक बेहतरीन अड्डा बन गया है।  देश के सभी बड़े टीवी चैनल्स के बड़े बड़े स्टूडियोज और दफ्तर यहाँ है, कई समाचार पत्र भी यहाँ से प्रकाशित हो रहे हैं और बड़ी बड़ी कम्पनियो के कार्यालय भी यहाँ मौजूद है।  शॉपिंग माल्स, सिनेमा हॉल्स, बुद्धा इंटरनेशनल सर्किट , आगरा एक्सप्रेस हाईवे और क्या नहीं, नॉएडा, उत्तर प्रदेश के 'समृद्धता' का 'प्रतीक' बताया जाता है, ठीक उसी प्रकार से जैसे गुडगाँव की ऊंची इमारते और लम्बे चौड़े हाइवेज देखकर हमें बताया जाता है के हरयाणा में बहुत तरक्क़ी हो चुकी है।  लेकिन महिलाओ और दलितों पर हो रहे अत्याचार बताते हैं के मात्र नोट आ जाने से दिमाग नहीं बदलता  और आज भारत को आर्थिक बदलाव से अधिक सामजिक और सांस्कृतिक बदलाव की  जरुरत है।  बिना सांस्कृतिक बदलाव के कोई भी राजनैतिक और आर्थिक बदलाव एक बड़ी बेईमानी है और हम उसका नतीजा भुगत रहे हैं। 

अभी स्वचछ भारत और सशक्त भारत के नारे केवल विदेशो में रहने वाले भारतीयों और देशी अंग्रेजो को खुश करने की जुमलेबाजी हैं हालाँकि प्रयास पूरा है के 'भारतीय' नज़र आएं और इसलिए संयुक्त रास्त्र महासभा को भी बिहार की चुनाव सभा में बदलने में कोई गुरेज नहीं है।  जुमलेबाजी केवल इन सभाओ में नहीं है अपितु दुनिया भर में इवेंट मैनेजमेंट करके उसको 'बौद्धिकता' का जाम पहनाया जा रहा है ताकि जुमलों को ऐतिहासिक दस्तावेज और आंकड़ों की तरह इस्तेमाल कर अफवाहों को बढ़ाया जाए और मुसलमानो को अलग थलग किया जाए ताके दलित पिछड़े सभी हिन्दू बनकर  ब्राह्मण-बनिए नेतृत्व के अंदर समां जाये। 

मोदी के सत्ता सँभालने पर हिंदुत्व के महारथी अब खुलकर गालीगलौज पर उत्तर आये हैं और इसके लिए उन्होंने कई मोर्चे एक साथ खोल लिए हैं।  उद्देश्य है अलग अलग तरीके से विभिन्न जातियों को बांटा जाए और जरुरत पड़े तो उन्हें मुसलमानो के खिलाफ इस्तेमाल किया जाए।  मीडिया का भरपूर इस्तेमाल किया जाए और पाकिस्तान, इस्लाम आदि के नाम पर मुसलमानो पर दवाब डाला जाए. दूसरी और आरक्षण को लेकर दलितों और पिछडो को बदनाम करने वाली बाते और आलेख टीवी और प्रिंट मीडिया में छापे जाएँ।  जातिगत आंकड़ों की बात करने वालो को जातिवादी घोषित कर दिया जाए ताकि 'ब्राह्मणवादी' 'सत्ताधारी अपनी जड़े मज़बूत कर सके। सत्ता में आने पर संघ ने दलित पिछडो के दो चार नेताओ को कुछ दाना तो फेंका पर सत्ता पर ब्राह्मण, बनियो का बर्चस्व इतना पहले कभी नहीं था  जितना आज है। 

सबसे पहले चालाकी थी जनसँख्या के आंकड़ों को धार्मिक आधार पर प्रकाशित करना और उसके जरिये मुस्लिम आबादी के बढ़ने को दिखाकर गाँव गाँव उस पर  बहस चलाने की कोशिश करना जब के पुरे देश में दलित पिछड़े और आदिवासी जनसंख्या के आंकड़ों को  जातीय आधार पर प्रकाशित करने की बात कर रहे थे और उसके विरूद्ध आंदोलन कर रहे थे ? आखिर जनसँख्या के आंकड़े जातीय आधार पर न कर धार्मिक आधार पर क्यों किये गए ? मतलब साफ़ है , संघ के ब्राह्मण बनिए अल्पसंख्यक धर्म के आधार पर ही बहुसंख्यक होने का दावा कर दादागिरी कर सकते हैं क्योंकि जाति के आधार पर उनकी गुंडई हर जगह पर नहीं चल पाएगी और बहुसहंक्यक होने के उनके दावे की पोल खुल जायेगी। इसलिए मैं ये बात दावे से कह रहा हूँ के भारत के हिन्दू रास्त्र बनाने से सबसे पहले शामत इन्ही जातियों की आ सकती है इसलिए वे हिन्दू रास्त्र का शोर मुसलमानो के खिलाफ ध्रुवीकरण और ब्राह्मण बनिए वर्चस्व को बरक़रार करने के लिए करेंगे। 

हकीकत यह है के मुसलमानो पर हमले होते रहेंगे ताकि उनके दलित विरोधी, आदिवासी विरोधी और पिछड़ा विरोधी नीतियों और कानूनो पर कोई बहस न हो।  संघ प्रमुख ने आरक्षण पर हमला कर दिया है और ये कोई नयी बात नहीं है के साम्प्रदायिकता के अधिकांश पुजारी सामाजिक न्याय के घोर विरोधी है और उनका ये चरित्र समय समय पर दिखाई भी दिया है।  १९९० के मंडल विरोधी आंदोलन को हवा देने वाले लोग ही राम मंदिर आंदोलन के जनक थे। आखिर ये क्यों होता है के संघ परिवार का हिन्दुवाद दलितों, पिछडो और आदिवासियों के अधिकारों को लेकर हमेशा से शक के घेरे में रहा है।  ये कब हुआ के संघ के लोगो ने छुआछूत, जातिप्रथा, दलितों पे हिंसा, महिला उत्पीड़न, दहेज़, आदिवासियों के जंगल पर अधिकार और नक्सल के नाम पर उनका उत्पीड़न के विरुद्ध कभी कोई आवाज उठाई हो।  उलटे इसके आरक्षण उनके दिलो को कचोटता रहता है आज तक मोहन भगवत ने ब्राह्मणो के लिए मंदिरो में दिए गए आरक्षण को  ख़त्म करने की बात नहीं की है।  क्या सारे ब्राह्मण संस्कृत के  प्रकांड विद्वान है ? क्या मंदिरो में पुजारी होने के लिए उनका ज्ञानवान होना जरुरी है या ब्राह्मण होना।  मेरिट का आर्गुमेंट ब्राह्मणो पर क्यों नहीं लगता।  लेकिन क्योंकि ब्राह्मणो को मंदिरो में आरक्षण और अन्य ऐताहिसिक सुविधाएं ब्रह्मा जी की कारण मिली हुई है इसलिए भारत का कानून उसके सामने असहाय नजर आता है. दूसरी और दलितों, आदिवासियों और पिछडो को आरक्षण भारतीय संविधान ने दिया है इसलिए ब्रह्मा के भक्त इस संविधान से खार खाए बैठे हैं। दलितों, पिछडो और आदिवासियों को केवल 'गिनती' के लिए हिन्दू माना जा रहा है। 

हम सवाल पूछते है के भूमि अधिग्रहण बिल को क्यों इतनी जोर शोर से लागु करना चाहती है।  क्या सरकार इतने वर्षो  हुए आदिवासी उत्पीड़न और बेदखली पर कोई श्वेत पत्र लाएगी ? क्या ये  बताएगी के नक्सलवाद के नाम पर कितने आदिवासियों का कत्लेआम हुआ है और कितने लोग अपने जंगल और जमीन से विस्थापित हुए है।  उस सरकार से क्या उम्मीद करें जो सफाई के नाम पर इतनी बड़ी नौटंकी कर रही है लेकिन मैला धोने वाले लोगो के साथ हो रहे दुर्व्यवहार, अत्याचार, छूआछूत पर मुंह खोलने को तैयार नहीं।  क्या सफाई अभियान भारत में व्याप्त व्यापक तौर पर हो रहे  मानव मल ढोने के कारण हिन्दू समाज के वर्णवादी नस्लवादी दैत्य रूप को छुपाने की साजिश तो नहीं है। भगाना के दलितों ने अत्याचार से परेशान होकर इस्लाम कबूल कर लिया लेकिन वो रास्ता भी अधिकांश स्थानो पर बंद कर दिया गया है।  धर्मान्तरण के कारण न तो दलितों को नौकरी में आरक्षण मिलेगा और न ही  अन्य सरकारी योजनाओ में उनके लिए कोई व्यवस्था होगी।  ऊपर से संघ के ध्वजधारी धर्मान्तरण को लेकर अपना हिंसक अभियान जारी रखेंगे। 

इसलिए जब भी आप इन प्रश्नो का  उत्तर ढूंढने का प्रयास करेंगे तो हमें एक अख़लाक़ की लाश मिलेगी।  क्योंकि आज दलितों, पिछडो और आदिवासियों के हको की लड़ाई से ध्यान बटाने के लिए हमें मुसलमानो के संस्कृति और उनकी संख्या का भय दिखाया जाएगा और यह बड़ी रणनीति के तहत हो रहा है।  छोटे कस्बो और गाँव में अफवाहों के जरिये दलितों और पिछडो को मुसलमानो के  खिलाफ खड़ा करो।  दादरी की घटना कोई अकेली घटना नहीं है और ये अंत भी नहीं है।   जिस संघ परिवार ने अफवाहों के जरिये दुनियाभर में गणेश जी को दूध पिलवा दिया वो आज फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सऐप के जरिये अपनी अफवाहों को फ़ैला रहा है।  दादरी में अखलाक़ के मरने को हादसा बताकर वहाँ के सांसद  और केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा ने प्रशाशन को पहले ही आगाह कर दिया के हिंदुत्व के आतताइयों के विरूद्ध कोई कदम उठाने की कोशिश न करें।  और याद रहे इस प्रकार की अफवाहे फैलाकर दंगे फ़ैलाने का कार्यक्रम  चलता रहेगा। 

कल हमीरपुर की घटना में एक ९० वर्षीया दलित को मंदिर प्रवेश करने पर जिन्दा जला दिया गया और  शंकराचार्य और हिंदुत्व के ध्वजधारी शासक चुप हैं।  जो व्यक्ति सेल्फ़ी और ट्विटर के बगैर जिंदगी नहीं जी सकता वो दलितों पर बढ़ रहे हिन्दू अत्याचार पर लगातार खामोश रहा रहा है।  एक भारतीय नागरिक को जिसका बेटा एयरफोर्स में कार्यरत है लोग उसके घरके अंदर मार देते हैं और हमारे संस्कृति के ध्वजवाहक हमसे कहते हैं  इसका 'राजनीतिकरण' न करें  . खाप पंचायते देश भर में अंतर्जातीय विवाहो के विरोध में हैं क्योंकि इसके कारण से जातीय विभाजन काम होंगे और ब्राह्मणीय सत्ता मज़बूत रहेगी इसलिए संघ और उसके कोई भी माननीय बाबा या दार्शनिक ने कभी भी छुआछूत और जातीय उत्पीड़न के विरुद्ध कुछ नहीं कहा अपितु उन्होंने  ऐसी बातो को सामजिक परम्पराओ के नाम पर सही साबित करने के प्रयास  किये हैं। 

आज देश आराजकता की और है और हिंदुत्व के ये लम्बरदार साम दाम दंड भेद इस्तेमाल करके भारत में धार्मिक विभाजन करना चाहते हैं ताकि उनकी जातिगत सल्तनत बची रहे।  मुसलमान इस वक़त ब्राह्मणवाद को बचाने और बनाने के लिए सबसे बड़ा हथियार हैं।  उनके नाम पर अफवाहे फैलाओ और राजनीती की फसल काटो लेकिन ये देश के लिए बहुत खतरनाक हो सकती है।  इन्हे नहीं पता के इन्होने देश और सामाज का कितना बड़ा नुक्सान कर दिया  है।  सैकड़ो सालो से यहाँ रहने वाले लोगों ने जिन्होंने इस देश को अपनाया आज अपने ही देश में बेगाने महसूस कर रहे हैं।  समय आ गया है के हम अपने दिमाग की संकीर्णताओं से बाहर निकले और ये माने के हमारे खान, पान, रहन सहन, प्रेम सम्बन्ध इत्यादि हमारी अपनी व्यक्तिगत चाहत है और सरकार और समाज को उसमे दखलंदाजी का कोई हक़ नहीं है।  मतलब ये के यदि अख़लाक़ बीफ भी खा रहा था तो उसको दण्डित करने का किसी  की अधिकार नही क्योंकि अपने घर के अंदर हम क्या खाते  हैं और कैसे रहते है ये हमारी इच्छा है।  क्या हिंदुत्व के ये ठेकेदार तय करेंगे के मुझे क्या खाना है और कहाँ जाना है , कैसे रहना है।  सावधान, ऐसे लोगो के धंधे चल रहे हैं और उन पर लगाम कसने की जरुरत है।  भारत को बचाने की जरुरत है क्योंकि ये घृणा, द्वेष देश को एक ऐसे गली में ली जाएगा जिसका कोई अंत नहीं। अखलाक़ को मारने के लिए दस बहाने ढूंढ निकाले  गए और कहा गया राजनीती न करें परन्तु ये जातिवादी सनातनी ये बताएं हमीरपुर में एक दलित के मंदिर प्रवेश पर उसे क्यों जिन्दा जला दिया गया, उसका कोई बहाना है क्या ? 

ऐसा लगता है के हिंदुत्व के महारथियों के लिए तालिबान, इस्लामिक स्टेट और साउदी अरब सबसे अच्छे उदहारण हैं जो विविधता में यकीं नहीं करते और जिन्होंने असहमति को हिंसक कानूनो के जरिये कुचलने की नीति अपनायी है।  भारत जैसे विविध भाषाई,  धार्मिक और जातीय राज्य में इस प्रकार की रणनीति कब तक चलेगी ये देखने वाली बात है लेकिन ये जरूर है के लोकतंत्र में ब्राह्मणवाद के जिन्दा रहने के लिए मीडिया और तंत्र की जरुरत है और वह उसका साथ भरपूर तरीके से दे रहा है इसलिए इन सभी कुत्सित चालो का मुकाबला हमारे संविधान के मुलचरित्र को मजबूत करके और एक प्रगतिशील सेक्युलर वैकल्पिक मीडिया के जरिये ही किया सकता है. ये सूचना का युग है और हम ऐसे पुरातनपंथी ताकतों का मुकाबला उनकी वैचारिक शातिरता को अपनी बहसों और वैकल्पिक प्लेटफॉर्म्स के जरिये ही कर सकते हैं और इसलिए जरुरी है के हम चुप न रहे और गलत को गलत कहने की हिम्मत रखे चाहे उसमे हमारी  जाति बिरादरी या धर्म का व्यक्ति क्यों न फंसा हो।  वैचारिक अनीति का मुकाबला  वैचारिक ईमानदारी से ही दिया जा सकता है जो हमारे समाज के अंतर्विरोधों को समझती हो और उन्हें हल करने का प्रयास करे न के  उनमे घुसकर अपनी राजनीती करने का।   ये सबसे खतरनाक दौर है और हर स्तर  पर इसका मुकाबला करना होगा।  अफवाहबाजो से सावधान रहना होगा और संवैधानिक नैतिकता को अपनाना होगा क्योंकि केवल जुमलेबाजी से न तो बदलाव आएगा और न ही पुरातनपंथी ताकतों की हार होगी। दलित पिछड़ी मुस्लिम राजनीती के लम्बरदारो को एक मंच पर आने के अलावा कोई अन्य रास्ता अभी नहीं है क्योंकि इस वक़त यदि उन्होंने सही निर्णय नहीं लिए और जातिवादी ताकतों के साथ समझौता किया तो भविष्य की पीढ़िया कभी माफ़ नहीं करेंगी। 

Thursday, 29 May 2014

ये चुप रहने और सहने का वक़्त नहीं




विद्या भूषण रावत 

बदायूं की दो बहिनो की अमानवीय और क्रूर हत्याओ ने भारत के 'सभ्य समाज ' पोल खोल के रख दी है. शर्मनाक घटना पे वादे, मुहावजे और कार्यवाही होती रहेगी लेकिन क्या हम  प्रश्न के मूल तक जायेंगे और सरकार से जवाब मांगेगे के ऐसा क्यों हो रहा है और कब तक सरकार इनके बंद होने की  गारंटी देगी। ये केवल बलात्कार और हत्या नहीं है. इस घटना ने हमारे प्रशाशन और  उसकी जातिवादी निष्ठा को भी उजागर किया है और बताया है क्यों हम मूल प्रश्नो से हटकर सत्ता चाहते हैं और नेता चुनते हैं. 

लोकतंत्र में सरकार की न जाति होती न धर्म। उसे सबके हितो के लिए काम करना होता है।  भारत का हर एक व्यक्ति सुरक्षा और इज्जत का हकदार है. लेकिन क्या वाकई में गाँव से उपजी राजनीत में ऐसा है. सत्ता हमारे गाँव में अपनी झूटी शान और ताकत का हथियार बन चुकी है. भारत की सरकार दिल्ली से नहीं चलती बल्कि भारत के जातिवादी गाँव से चलती हैं इसीलिए मुजफ्फरनगर के हत्यारे घूमते हैं और दंगे मंत्री बन जाते हैं. बलात्कार के आरोपी आराम से इज्जत से हैं. हरयाणा की खापें वैसे ही सत का मज़ा ले रही हैं और दलितों की हत्या और उनकी महिलाओ पर दुष्कर्म सरकार के लिए मायने नहीं रखता। उत्तर प्रदेश में भी यही हाल है और  मध्य प्रदेश , राजस्थान , महाराष्ट्र, आंध्र , तमिलनाडु, कर्नाटका आदि भी पीछे नहीं है क्योंकि जाति की राजनीती में दलित मानवाधिकार का मुद्दा गौण हो के रह गया है. 

भारत के गाव् मनुवाद का सबसे बड़ा अड्डा हैं।  उत्तर प्रदेश में बदायूं की दो दलित  बहिनो की बलात्कार के बाद जघन्य हत्या ने भारत में लोकतंत्र की हकीकत को उजागर कर दिया है. ये कृत्या किसी तालिबानी कृत्या से कम नहीं है. शर्मनाक इसके लिए बहुत छोटा सा शब्द है. क्या इतने जघन्य अपराधो पर हम खामोश रहेंगे। उत्तर प्रदेश की सरकार में  जाति का नंगा नाच चल रहा है. लोहिआ ने कभी सोचा भी नहीं होगा के जिस समाज की हम परिकल्पना कर रहे हैं वहां उनके शिष्यों की सरकार में गुंडे और अपराधी जाति की नाम पर अपनी चौधराहट दिखाते रहेंगे। भारत में अगर लोकतंत्र को जिन्दा रखना है  ब्राह्मणवादी व्यवस्था का खत्माँ करना होगा जिसने हमारी संवैधानिक व्यवस्था को बिलकुल कमजोर कर दिया है. क्या ऐसे समाज से हम दुनिया में सबसे बड़े लोकतंत्र का नाटक करते रहेंगे। ये घटनाएं जाति की वर्चस्व को साबित करती हैं और दलित अस्मिता और आत्म सम्मान को कुचलना चाहती हैं. आज लोकतंत्र को मनुवाद ने गुलाम बनाके रखा है और दुर्भाग्यवश शूद्र प्रभुत्ववाद ब्राह्मणवाद का ही हिस्सा  है. दुखद बात यह है के हमारे गाव में जाति की इस घिनौनी कुकृत्य को भी सही ठहराने वाले लोग मिलते हैं इसलिए जातियों की अस्मिताओं का धंधा चलता है. आज जरुरत इस बात की है के गलत को गलत कहने की हिम्मत हम रखें  चाहे वो गलती मैंने की  हो,मेरी जाति की हो या उस बिरादरी के नेता की हो या मेरे परिवार की ही क्यों न हो. अब जातियों के नाम पर गलत को सही ठहरने वालो के खिलाफ खड़े होने का है. ये चुप रहने का समय नहीं है. ऐसी घिनौनी अपराध करने वालो को माफ़ नहीं किया जा सकता।

ये लोकतान्त्रिक देश है जहाँ दलित लोकतंत्र में वोट के समीकरण में पिस रहा है. हरियाणा में जाट आतंक ने अभी तक दलितों को कोई छोड़ा नहीं है और सरकार चुप है. उत्तर प्रदेश में अब भी एहि प्रभुत्ववाद जारी है।  कश्मीरी पंडितो के लिए हम यू एन में जाने को तैयार हैं, उन्हें दिल्ली में बसने दिया जाता है लेकिन लाखो दलितों को कोई व्यवस्था नहीं है. भारत सरकार ने भूमि सुधारो के कानून ईमानदारी से कभी लागू नहीं किये और इसलिए हर एक राज्य में दो चार बड़ी जातियां दलित अस्मिता के साथ खिलवाड़ करते रहती हैं, जमीनो पर कब्ज़ा करके रहते रहती है और उन्हें सम्मान पूर्वक जिंदगी भी नहीं जीने देती।  भारत के जातिवादी गाँव दलितों को रखना नहीं चाहते और यदि रखना चाहते हैं तो अपने अस्मिता को कुचल कर और गुलामी की जिंदगी जी कर. कश्मीरी ब्राह्मणो की चिंता करने वाली सरकार और वो सभी रही हैं दलितों की अस्मिता और आत्मा सम्मान के लिए उन्हें क्यों नहीं पुनर्वासित करती। क्यों नहीं सरकार दलितों को  दिल्ली, बम्बई, कलकत्ता, बंगलोर, चेन्नई, लखनऊ, हैदराबाद आदि जगहों पर इज्जत के साथ बसाती। अगर ऐसा हुआ तो दलितों को गांवो से बाहर खदेड़ने वालो के मुंह पर सबसे बड़ा तमाचा होगा। लेकिन मनुवादी तंत्र में ऐसा शायद ही संभव हो  फिर भी हम चुप नहीं रह सकते। 

बाबा साहेब का समुदाय अब लड़ने को तैयार है,  वो मरने के लिए तैयार है  लेकिन अपने अस्मिता पे ऐसे क्रूर हमले नहीं सहन करेगा। भारत की तमाम सरकारे पूर्ण तौर पर असफल हो चुकी हैं  क्योंकि मनुवाद के शिष्य सत्ता के हर गलियारे पर कब्ज़ा किये बैठे हैं और जब तक ऐसा रहेगा भारत में लोकतंत्र लूटता रहेगा क्योंकि उनकी निष्ठाएँ अपनी जातियों से हैं न की भारत के संविधान से. इस प्रश्न पर हमें अब अंतिम लड़ाई के लिए तैयार रहना पड़ेगा। राजनैतिक दल अपनी अपनी रोटी सकेंगे और नफा-नुक्सान के हिसाब से बाते करेंगे। कुछ अभी चुप रहेंगे और 'समय' पे बोलेंगे। ऐसे सभी लोगो की जितनी निंदा की जाए काम है.  आज में खुल के कहता हूँ लानत है ऐसे देश और ऐसे समाज पर जहाँ ऐसे दुष्कृत्यों के बावजूद भी हम घरो पे बैठे रहे.  जब तक एक भी महिला के ऊपर ऐसे जघन्य कृत्या होते रहेंगे हम भारत को असभ्य संस्कृति का अड्डा कहते रहेंगे जहाँ चुनाव की राजनीती आपके सारे पाप धो देती है और इसलिए दलितों को आज तक न्याय नहीं मिल पाया है. 

Saturday, 3 May 2014

हरियाणा में निराशा के विरुध जलती आशा की एक किरण




विद्या भूषण रावत 

आशा एक उम्मीद का नाम है. आज जब हम हरियाणा में दलित महिलाओ पे  लगातार  बढ़ रही हिंसा एवं बलात्कार की बड़ी घटनाओ पर विचार कर रहे हैं तो घनघोर निराशा में भी ऐसे लोग दिखाई देते हैं जिनसे आशा की किरण जलती दिखाई देती है. जो अपने दुःख भूलकर दुसरो  को हिम्मत बढ़ाने का कार्य करते हैं.  सितम्बर २०१२ में उनके गाँव से दबंगो ने उनका अपहरण कर दुष्कर्म किया और छोड़ के भाग गए. हिम्मती आशा किसी तरह से अपनी नानी के घर आई, लेकिन इतने बड़े दुराचार के बाद उसके अंदर कोई  हिम्मत नहीं थी की किसी को कुछ बता पाती। ऐसा लगा सब समाप्त हो गया क्योंकि किसी का भी सामना करने की हिम्मत नहीं बची. उसका स्वस्थ्य ख़राब हो गया. बहुत हिम्मत करके उसने एक हफ्ते बाद उसने अपने माता पिता को यह बात बताई। गाँव में गरीबी में भी अपनी बेटी को डाक्टर  बनाने का सपना देखने वाले पिता के लिए यह बहुत असहनीय था क्योंकि उन पर रिपोर्ट न करवाने और मामले को रफा दफा करने का दवाब पड़ रहा था इसलिए  अत्यंत दवाब में उन्होंने आत्महत्या कर ली. पिता के असामयिक मृत्यु के बाद आशा ने अपने साथ दुष्कर्म करने वालो से लड़ने की ठान ली और ऍफ़ आई आर दर्ज करवाई। मुश्किलो से झूझ रही आशा को उसकी माँ और भाई का पूरा सहयोग रहा. आज वह अपने  गम और तकलीफ भुलाकर हरयाणा में जातिवादी हिंसा का शिकार हो रही दलित लड़कियों के लिए लड़ रही है. पिछले दिनो में वह भागना के लड़कियों के संघर्ष में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली आई और गृह मंत्री से भी मिली। आशा से मैंने विस्तार से बात की उसके संघर्शो को लेकर और  भविष्य की रणनीतियों को लेकर. एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर मैं   यह मानता हूँ के सेक्सुअल हिंसा का शिकार कोई भी महिला अपना वजूद नहीं  खोती लेकिन  भारत के कानूनो में महिला का नाम देना अपराध माना जाता है. मैं आशा की दिलेरी को सलाम करता हूँ लेकिन मुझे भी उनका असली नाम छुपाना पड रहा है. मुझे उम्मीद है के हरियाणा की ये बहादुर बेटी अपनी बहुत से बहिनो के लिए एक रोल मॉडल  है और  सबको इज्जत के साथ जिंदगी जीने की प्रेरणा देगी।  आशा के साथ प्रस्तुत है मेरी बातचीत :

प्रश्न :  अपने विषय मैं बताएं ? आपका बचपन कहाँ गुजरा और पिता क्या करते थे  ?

उत्तर : मेरा बचपन गाँव में गुजरा क्योंकि मेरे पिता खेती  करते थे. हम पूर्णतया भूमिहीन  परिवार थे और जीविकोपार्जन के लिए जाटो के खेतो में काम करना पड़ता था।  

प्रश्न :  आपके पिता ने मुशिकल हालातो में आपको पढ़ाया ? क्या सोचते थे वह आपके बारे में ? खासकर आपके भविष्य को लेकर ?

उत्तर : हाँ, मेरे पिता की माली हालत बहुत ख़राब थे लेकिन उन्होंने मुझे पढ़ाया। वो मुझे डाक्टर बनाना चाहते थे.


प्रश्न :  आप लोग पूरी  तरह से भूमिहीन परिवार थे. गाव् में दलित भूमिहीनों की क्या स्थिति है और उन्हें किस प्रकार की मुसीबते झेलनी पड़ती हैं ?

उत्तर : क्योंकि लगभग सभी दलित परिवर भूमिहीन हैं तो उनकी निर्भरता ऊँची जाती  के किसानो पर हैं जिनके यहाँ वे खेती करने जाते हैं। 

प्रश्न :  हरियाणा के गाव् में एक लड़की की जिंदगी कैसे है. गाँव् वाले महिलाओ को किस नज़र से देखते हैं ? किस प्रकार के असुरक्षा लड़कियों को देखनी पड़ती है ? क्या तुम्हारे पापा ने तुम्हारे इधर उधर जाने पर कभी रोक  टॉक लगाईं ?

उत्तर : हरियाणा में दलित लड़की होना पाप है क्योंकि ये लोग उसे कुछ समझते ही नहीं हैं और किसी भी हद तक जा सकते हैं। 

प्रश्न : आपके साथ जो हादसा हुआ वो कैसे हुआ ? उस वक़्त आप क्या  कर रही थी ? क्या आपने शोर किया ? क्या किसी ने आपको लेजाते देखा ?

उत्तर : ९ सितम्बर २०१२ का दिन था. लगभग २३० बजे  मैं अपनी नानी के यहाँ जा रही थी तभी रस्ते में मुझे अपहृत कर लिया गया. उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा और खींचकर कार  में डाल  दिया। मैंने शोर मचाया लेकिन आस पास कोई नहीं था इसलिए कोई मदद भी नहीं हो सकी. मैं इतना जानती थी के वे लोग मेरे गाँव के ही थे.

 प्रश्न :  क्या आपको पहले से कोई धमकी मिल रही थी ? क्या उन लोगो से आपके या परिवार की कोई रंजिश थी ? कौन थे वे लोग जिन्होंने आपके ऊपर अत्याचार किया ?

उत्तर : नहीं मुझे पहले से कोई धमकी नहीं थी और न ही हमारा उनसे कोई लेना देना लेकिन वे गाँव की बड़ी जाती के लोग थे. हाँ हादसे के बाद उन्होंने पैसे के लें दें कर मामला दफ़न करने की कोशिश की और फिर सीधे  धमकी देना शुरू किया। उन्होंने सीधे सीधे  हमारे घर आकर हमें जान से मारने की धमकी दी. हरयाणा में दलितों के साथ ये अब  आम हो गया है.उनको लगता है के ये लोग कुछ नहीं कर पाएंगे।

प्रश्न : आपके साथ घटना के बाद आप अपनी नानी के यहाँ गयी।  क्या आप थोड़ा जानकारी दे सकते हैं। किस वक़्त ? क्या किसी ने आपको मदद की या आप अपने आप पैदल या गाड़ी ऑटो से घर गयी ?
 
उत्तर : मैं शाम को ७ बजे के समय नानी के यहाँ पहुंची। उन लोगो ने मुझे एक सुनसान जगह पे छोड़ दिया। मैंने किसी से लिफ्ट मांगी और स्कूटर पे पीछे बैठकर घर आ गयी.


प्रश्न : आपने अपने माता पिता को कब जानकारी दी के आपके साथ ऐसी घटना हुई है ? उनका क्या कहना था ? 

उत्तर : मैंने अपनी माँ को १८ तारीख को बताया और १९ को मेरे पिता ने  आत्म हत्या कर ली.

प्रश्न :  क्या पुलिस ने आपकी मदद की ? आपने मेडिकल कब करवाया ? डाक्टरों का रवैय्या कैसे था ? 

उत्तर : पुलिस का रवैय्या बिलकुल ही सहयोग वाला नहीं था. मेरे पिता की मौत के बाद ही मैंने  मेडिकल करवाया।


प्रश्न :  आपको हरियाणा सरकार की तरफ से क्या सहायता मिली ? क्या क्या वायदे किये गए थे ? क्या आप ने शासन को इस सन्दर्भ में लिखा ?

उत्तर : हरियाणा सरकार ने वायदे तो बहुत किये लेकिन हकीकत में कुछ भी नहीं किया। उन्होंने मुझे और मेरे भाई को नौकरी का वादा किया। हिसार में २०० गज का प्लाट और २५ लाख रुपैये की आर्थिक मदद की बात भी कही लेकिन कोई भी वादा पूरा नहीं हुआ. मैं और भाई नौकरी के वास्ते नेताओ के चक्कर लगाते  रहते हैं लेकिन उन्हें कोई मतलब नहीं। हरयाणा में दलितों के स्थिति बहुत ख़राब है और न कोई सुनने वाला है इसलिए अब लोगो को मदद करनी चाहिए। 


प्रश्न : अपने तरह की हिंसा का शिकार लड़कियों से आप क्या कहना चाहेगी ? ऐसे हादसों को रोकने में समाज के क्या भूमिका हो सकती है ? आपके साथ समाज और आपके साथियों का रवैय्या कैसे रहा ?

उत्तर : ऐसे हादसे किसी के साथ भी  सकते हैं लेकिन हमें अपना हौसला नहीं खोना खोना है और इस लड़ाई को बीच में नहीं छोड़ना है. हमें बनना होगा। समाज की भूमिका बहुत बड़ी है यदि हम दुष्कर्म की शिकार लड़कियों को गलत नज़रो से ना देखें। मेरा परिवार मेरे साथ खड़ा है और यह मेरी बहुत बड़ी ताकत है. हरियाणा में अधिकांश लडकिया जिनके साथ ऐसी घटना हुई है वे गरीब परिवार की है जिनका कोई सुनने वाला नहीं है क्योंकि समाज और परिवार भी उनके साथ खड़ा नहीं होता इसलिए उनकी तकलीफ ज्यादा होती है.  मैं उनकी आवाज बनना चाहती हूँ. हालाँकि ज्यादातर मामलो में समाज साथ है लेकिन कमेंट करने वालो की कमी नहीं है. 

मैं एक गर्ल्स कॉलेज में पढ़ती हूँ. मेरी कॉलेज की कुछ सहेलियां  तो दिन भर मेरे साथ रहती हैं लेकिन सभी तो अच्छे नहीं होते। शुरुआत में कुछ लड़कियों ने मुझ पर कमेंट किये तो मैंने अपने कालेज की प्रिंसिपल से शिकायत की और उनके तुरंत एक्शन लेने के कारण ऐसी घटनाएं बंद हो गयी.

प्रश्न : आपकी माँ और भाई आपके साथ खड़े हैं ? क्या कहना चाहेगी आप ऐसे माँ बापो को जिनके बच्चे इस प्रकार की हिंसा का शिकार होते हैं ?

 उत्तर : मैं खुशनसीब हूँ के मेरी माँ और भाई मेरे साथ खड़े हैं. मैं सभी से अनुरोध करुँगी के अपनी लड़कियों को जरूर पढ़ाएं और आगे  बढ़ने के  लिए प्रोत्साहित करें। अपने बच्चो को खासकर लड़कियों को मज़बूत करें और निराश न करें। मुझे दुःख है के मेरे पिता ने आत्महत्या की।  मैं कहना चाहती हूँ के कोई  भी जंग मर के नहीं जीती जाती। मैं ऐसे माबाप से कहना चाहती हूँ के वे अपने बच्चो को पूरा सपोर्ट करे और उन पर कोई नकारात्मक या व्यंगात्मक कमेंट न करे. मैं  मीडिया से भी कहना चाहती हूँ के वे ऐसे मामले उठाये और उन्हें मुकाम तक पहुंचाए। आज मुझे मीडिया  ने सपोर्ट किया तो मुझे ताकत मिली नहीं तो एक क्षण तो ऐसा था के मैं  हादसे के बाद पूरी तरह से टूट चुकी थी. 

प्रश्न : देश दुनिया में लोग आपको  पढ़ रहे हैं , क्या कोई अपील करना चाहेगी लोगो से ? 

उत्तर : अब जागने की जरुरत है ताकि और कोई लड़की इस प्रकार की  घटना का शिकार न हो. हरियाणा में दलितों की खासकर दलित महिलाओ की हालत बहुत  भयावह हैं और उन्हें किसी प्रकार की कोई सहायता नहीं है. अधिकांश दलित परिवार भूमिहीन हैं इसलिए उनकी बड़ी जातियों खासकर जाटो के ऊपर निर्भरता है।  प्रशाशन दलितों की मदद नहीं करता और जाट दलित महिलाओ को कुछ नहीं समझते इसलिए केवल सरकार पे निर्भरता से काम नहीं चलेगा। दुनिया भर के दलितों के  लिए लड़ने वाले लोगो से मेरी अपील है के हरियाणा की दलित लड़कियों और दलित समाज की आत्मसम्मान की लड़ाई को मज़बूत करें और उन्हें हर प्रकार की मदद उपलब्ध करवाएं। 

प्रश्न : आप भगाना की लड़कियों को न्याय दिलाने के लिए कड़ी हैं ? क्या कहेंगी इन लड़कियों और उनके माता पिता से ?

उत्तर: भगाना की लड़कियां मज़बूत है.हमें ये जंग जितनी है. मैं हरयाणा सरकार से अनुरोध करती हूँ की दलितों की भावनाओ को महसूस करे. मेरी प्रार्थना  है के इन लड़कियों को  न्याय मिले।


प्रश्न :  क्या आप हिसार कोर्ट के निर्णय से संतुष्ट हैं या चाहती हैं के पुलिस अपनेकेस को और मज़बूती से लड़े ?

उत्तर: कोर्ट के निर्णय से मैं बिलकुल संतुष्ट नहीं हूँ. मैं तो क्या कोई भी ऐसे निर्णय से संतुष्ट नहीं होगा। ऐसे निर्णय दर्द देने वाले होते हैं. पुलिस को अपना काम ठीक से करना चाहिए था. पुलिस अगर ठीक से काम करती तो ऐसे निर्णय नहीं आता. यदि आप डिसीज़न की कॉपी पढ़ेंगे तो आप को लगेगा के किस बिला पे छोड़ा गया है. वैसे कल कोर्ट ने दुबारा नोटिस जारी किया के ४ लोगो को बेल कैसे  देदी गयी. अब मुझे लग रहा है के न्याय होगा।

प्रश्न : आपका सपना।

उत्तर : मैं वकील बनना चाहती हूँ और साथ ही साथ सामाजिक आंदोलनों से जुड़ना चाहती  हूँ  ताकि मेरी जैसे लड़कियों को मदद मिल सके और उनका कोई शोषण न कर सके. मैं चाहती हूँ ऐसे अपराध न हो और इसके लिए हमें लड़कियों और समाज को  जागरूक करने की जरुरत है ताकि वे पढ लिख सके और अपना जीवन इज्जत से जी सकें। मेरा सपना  हिंसा की शिकार इन लड़कियों के लड़ाई लड़ना है ताकि वे अपने जिंदगी अच्छे से जी सके और उन्हें न्याय मिल सके.