Sunday, 15 December 2013

कैसे बने एक निर्भय समाज



विद्या भूषण रावत 

एक वर्ष पूर्व दिल्ली में  चलती बस में हुई दरिंदगी ने महिलाओ के  मसले पर लोगो को सोचने का मौका दिया लेकिन पूरी बहस कहीं न कहीं सरकार की आलोचना तक सीमित रह गयी और असली मुद्दे से हमारा धयान  हट गया. दरअसल आज दिल्ली में जो अराजकता पैदा हुई है वो पिछले तीन वर्षो में  हुए विचारविहीन आंदोलन हैं जिन्हे हम 'बदलाववादी' बताने कि कोशिश कर रहे हैं।  आज आप अपने आपको भाजपा और संघ से अलग दिखने की कोशिश कर रहा है लेकिन हम जानते हैं के संघ इस प्रकार के 'नैतिक' मुद्दो पर आधारित विभिन्न संघठन खड़े करता है और उनका समर्थन भी करता है. आप विचारधारा में कैसे संघ से भिन्न है ये अभी दिखाई नहीं दिया और केवल राजनीतिज्ञों और राजनीती को टारगेट कर आप करना क्या चाहता है ? 

 आप की राजनीती में फासीवादी रास्ट्रवाद झलकता है. ये नौटंकी कहने में अच्छी लगती है लेकिन भीड़ केवल बाबरी मस्जिद गिरा सकती है कोई भला काम नहीं कर सकती और  जब वो उन्माद में हो तो अपने नेता के नियंत्रण से बहार होती है। क्या संसद और विधानसभाओ की महत्वपूर्ण बहस गांवसभा में बदल जाए? 

हम सभी जानते हैं के संसद और विधानसभाओ में अभी सही तरीके से बहस नहीं होती और लगातार अडजर्नमेंट होते रहते हैं लेकिन उसको सुधरने की आवश्यकता है न के उसको खत्म करने की ? हर एक मर्ज की दवा केजरीवाल और किरणबेदी द्वारा सुझाया  लोकपाल करेगा तो साफ़ है के ब्राह्मणवाद के यह खतरनाक पुजारी और खिलाडी उन सभी बातो में बहस नहीं करना चाहते जिस कारण से आज देश में संकट है. भ्रस्ताचार एक बड़ी बिमारी है लेकिन आज के युग में केवल सरकार और राजनीती पर अंकुश लगाकार हम उसको ख़त्म कर देंगे ? अरविन्दजी और उनकी पार्टी ने कितनी आर टी आई भारत के 'संभ्रांत' उद्योगपतियों  पे लगाईं हैं ? चलिए मुकेश अम्बानी के ५००० करोड़ रुप्पिया के आलिशान बिल्डिंग पर कितना आंदोलन आप करेंगे। हाँ ये उनके बाप की कमाई है जो उन्होंने साम दाम दंड  भेद से कमाई। चारे के लिए आप लालू को जैल भेज सकते हैं लेकिन किसी अम्बानी या बिरला पर जब ग़ाज़ गिरेगी तो तंत्र हिल जाएगा। लालू या मुलयाम को सजा जनता दे सकती है लेकिन इन बड़े कुटिल लोगो को कौन सजा देगा जो देश का माल अपना समझ कर खा रहे हैं ? कोयला आवंटन से लेकर ३ जी तक में राजनेता तो जैल जा रहे हैं लेकिन एक भी उधोगपति पर आंच नहीं आयी और जब बिरला पर ग़ाज़ गिरी तो व्यवस्था की चूले हिल गयी.

आप एक तानाशाह व्यवस्था चाहते हैं ताकि लोकतान्त्रिक प्रणाली हिलके रहे और घबराहट में काम करे. इस देश को अब स्थिर सरकारो के जरुरत है न के रोज रोज मर मरके जीने वाले तंत्र की. व्यस्था की अव्यवस्था से पुरे देश को नुक्सान हो रहा है. पिछले तीन वर्षो से तंत्र ने काम करना बंद कर दिया है. विकास का काम ठप पड़ा है क्योंकि अधिकारी फैसले नहीं लेते। आप पत्थर फेकना तो जानता है लेकिन उस व्यवस्था के बाहर के रहकर। इस देश को समझना बहुत जरुरी हैं और इसके लिए केवल उनका नेतृत्व मत करो जिनकी जड़ो से भ्रस्टचार निकलता हो। 

इस देश की मौलिक समस्या है ब्राह्मणवादी कुटिलता और यह हर एक उस व्यक्ति में भी घुश गयी है जो उसके विरूद्ध लड़ने का दावा  भी करता है. प्रशाशन में , राजनीती में, पुलिस में सभी जगह ईमानदारी से काम करने वाले व्यक्ति को हम हिकारत के नज़र से देखते हैं।  दफ्तरों में हम अपने बिरादरियों के अधिकारी के पास जाते हैं. कोर्ट में वकील लोग लम्बे टीका और ढाढी रखकर जाते हैं ताकि उनकी 'पहचान' पता चल सके उनको भारतीय होने में गर्व नहीं अपितु अपनी जातीय और धार्मिक पहचान से ज्यादा मतलब है।हम आज भी उसी विरोधाभास में जी रहे हैं जिसके बारे में बाबा साहेब आंबेडकर ने हमें आगाह किया था. हमने अपने सामाजिक मूल्य नहीं बदले और उन्ही को हम अपनी राजनीती में लाना चाहते हैं।  देश के राजनीती रिपब्लिकन नहीं हो पायी। यह खापो की राजनीती बन गयी इसलिए जब हम वोट लेने जाते हैं तो हर एक बिरादरी 'महान' बन जाती है. जब जाट वोट चाहिए तो खाप की आलोचना क्यों करोगे। क्या आप मुजफ्फरनगर ने जो हुआ उस पर कुछ कहेगे। मैं आपको इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि दुसरो से भिन्न और बेहतरीन होने का वे दम्भ भर रहे हैं। पुरे सिस्टम को ख़राब कहना आसान है लेकिन हम किसको मज़बूत कर रहे हैं यह भी जरुरी है ? क्या आपकी टीम सेकुलरिज्म और संविधान की सर्वोच्चता को मानेगी या रामलीला ग्राउंड में बनिया ब्रह्मणो की रैली को जनता का  फैसला कह देगी। आपका गाँव सभा का विचार खाप पंचायत है और ये केवल भीड़ का न्याय करेगा न की न्याय का न्याय और इसके लिए कानूनो की जरुरत नहीं क्योंकि जो केजरीवाल कहेंगे वो ही सही होगा क्योंकि कानून और संविधान की तो वे धज्जिया उखेड़ देंगे। हमने आपके महान देशभक्त कवि महेशाय को देखा है उनकी कवितायें भी सुनी हैं और कह सकते हैं के ऐसे लोग अगर आप कहेंगे तो देश पर निस्चय ही खतरा है। 

इस प्रकार के आंदोलन जहाँ हर मर्ज की दवा सरकार और राजनीती है खतरनाक खेल हैं।  जिसको हम निर्भय बना रहे हैं और जिसके नाम पर कानून और स्कॉलरशिप्स हो गयी हैं उसका नाम तक नहीं पता. मतलब साफ़ है के हम उन्ही परम्परावादी दकियनुसी विचार को मज़बूत कर रहे हैंजो कहता है के लड़की के अस्मिता खत्म हो गयी यदि उसके साथ शारीरिक हिंसा या सेक्सुअल वायलेंस हुई हो ? क्या हम अपने बच्चो को मज़बूत कर रहे हैं या कमजोर ? महिलाओ पे हिंसा हमारे समाज की सदियों पुराणी परंपरा है वो चली आ रही हैं. हम अपने बच्चो को कैसा बड़ा करते हैं और हमारे शादी ब्याह, मौत, ब्रत  त्यौहार आदि सभी तो महिला विरोधी हैं लेकिन उनको कोई चुनौती नहीं देना चाहता। इसलिए मैंने कहा भारत में वर्णवादी व्यस्था से कोई लड़ना नहीं चाहता क्योंकि उससे सभ्य औरसहनशील दिखने वाले समाज की पोल खुलती है. इसलिए वर्णवयस्था के पोशक सभी बातो के लिए संविधान को दोषी ठहराते हैं. 

एक निर्भय समाज ऐसा नहीं हो सकता जो परम्पराओ के टूटने के डर से काम नही  करता।  भारत की एक मात्र निर्भय फूलन देवी थी जिन्होंने अपने अपमान का बदला लिया और अपने प्रति हुए भारी अपमान की आग में जल कर मरना नहहि सिखा अपितु सर उठाकर जिंदगी जी और अपने हिसाब े उसका प्रतिरोध किया। उस पर चर्चा हो सकती है लेकिन सबसे बड़ी बात ये के फूलन ने असहाय होकर, अपनी जिंदगी को ख़त्म कर और गुमनाम जिंदगी नहीं चुनी और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी और आज भारत की हर एक बेटी, बहु, बहिन को ये सोचना है के सेक्सुअल वायलेंस से हमारी अस्मिता और पहचान ख़त्म नहीं होती और हम अपना मुंह छिपकर नहीं सर उठाकर, लोगो के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर इस हिंसा का विरोध करेंगे।अगर भारत को निर्भय समाज बनाना है तो हम सभी को आधुनिक संविधान को अपने जीवन में उतरना होगा और महिला हिंसा से जुडी परम्परावादी सोच को बदलना होगा और फूलन की तरह सर उठाकर चलना सीखना होगा।  हमारी बीमारियां हमारे समाज की दें हैं नाके हमारे संविधान की और इसलिए जरुरत है हमारा दृष्टिकोण बदले और सामाजिक तौर पर हमें आत्मा चिंतन की  है ना कि हर बात के लिए एक नए क़ानून की।  

Wednesday, 30 October 2013

Lessons from anti sikh violence in Delhi




खून की विचारधारा या विचारधारा का खून 


विद्या भूषण रावत 


दिल्ली में ३१ अक्टूबर १९८४ की सुबह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर ही गयी थी और देश भर में अफवाहो का बाज़ार गर्म  था क्योंकि उनके निधन की सूचना आकाशवाणी और दूरदर्शन पर शाम ६ बजे दी गयी. तब तक देश के विभिन्न शहरो में 'सिखो' को सबक सिखाने के 'कार्यक्रम' शुरू कर दिए गए. राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बन चुके थे और देश भर में उनके प्रति  अभूतपूर्व सहानुभूति की लहर चल रही थी. अगर इस 'सहानुभूति' का सही भाषा में अनुवाद करें तो उसके मतलब थे के राजीव गांधी का 'हिन्दू' संस्कार बन रहा था और संघ से लेकर रामनाथ गोयनका तक सभी उनके दीवाने हो गए. सभी ने नए नेता की खूब तारीफ की और अपने प्रथम भाषण में राजीव ने गंगा की सफाई के अभियान की बात भी कही और देश को एक नए युग में ले जाने  की बात भी कही. 

देश भर में दंगे होते रहे या साधारण भाषा में कहें तो 'सिखो' का कत्लेआम जारी था और प्रशाशन कही मौजूद नहीं था. गुंडे और बदमाश 'सबक' सिखा रहे थे लेकिन यह केवल उनका खेल नहीं था. भारतीय समाज का पूरा सम्प्रदायिककरण हो गया था. हिन्दू अस्मिता देश के शाशन और प्रशाशन पर हावी थी और हिन्दू समाज खतरे में थे और उसके लिए राजीव के  हाथ मजबूत करना जरुरी था. इसलिए शायद संघ ने कांग्रेस को समर्थन दिया क्योंकि राजीव और कांग्रेस उस वक़त हिन्दू अस्मिता के प्रतीक बन गए इसलिए उन दंगो के परिपेक्ष्य को देखें तो मतलब साफ़ है के वोह हिन्दू और सिख दंगे बनाये गए जिसको कांग्रेस नेताओ ने राजनीती के लिए आगे बढ़ाया और संघ के लोगो ने छिपे तौर समर्थन किया। दंगे भले ही कांग्रेस के तत्वो ने कराएं हों लेकिन नानाजी देशमुख जैसे 'विचारवान' लोगो ने इन दंगो को सही ठहराया। 

भारत में हिंदुत्व या उग्र सवर्णीय मानसिकता को समझने की जरुरत है क्योंकि यह ही हमारे रास्ट्रवाद की संरक्षक बन जाती है और जब यह मानसिकता हावी होती है तो इसके सामने सारे तर्क बेकार हैं. यह के फासीवादीराष्ट्रवादी विचार के ऊपर चलती है और  राष्ट्र के हित में अलावा कोई नहीं सोचता। इसलिए देश में जब थी दिन तक हिंसा का नंगा नाच होता रहा तो उसको सही ठहराने के लिए बहुत सी बातें आयी. वोह  बिलकुल वैसे ही हैं जैसे हम मुसलमानो के लिए कहानियां बनाते हैं. कहा गया के इंदिरा गांधी के मरने पर सिखो ने लड्डू बनते और खुशियां मनाई। फिर कहा गया के दो सिखों ने इंदिरा गांधी की हत्या कि है, इन्होनें भारत माँ को मारा है इसलिए सारे सिख मारे जाने चाहिए। 

वो दौर देश का सबसे खतरनाक दौर था जब  हर एक सिख शक के दृस्टि से देखा जा रहा था और उसकी पहचान और अस्मिता खतरे में थी. यह भारतीय राजनीती और प्रशासन के हिन्दुकृत होने की कहानी भी थी. यह वो दौर था जब सिख विरोध को प्रशासन और राजनीती की सह थी और हकीकत यह है के जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर को छोड़ दे तो स्वर्ण मंदिर पर सेना के हमले को पुरे भारत के 'मुख्यधारा' यानि सवर्ण मीडिया और सवर्ण पार्टियों का समर्थन था और इसमें हिंदुत्व और उनके सारे तत्त्व सबसे आगे थे. स्वर्ण मंदिर पर सेना भेजने के लिए तो पंजाब केसरी जैसा हिन्दू अख़बार सबसे आगे बहस कर रहा था. चंद्रशेखर ने इंदिरागांधी के कदम कि आलोचना की और इसे देश के एकता के लिए खतरनाक कहा. 

सिख विरोधी हिंसा और मानसकिता इंदिरा गांधी की हत्या के एक वर्ष बाद भी ख़त्म नहीं हुई. सभी आरोपितो को लोकसभा और विधानसभाओ के टिकट दिए गए और वे नेता १९८४ कि सिख विरोधी आंधी में भारी मतों से चुनाव जीत के आये और एक बार हमारे नेता चुनाव जीतते हैं तो वे क़ानूनी अड़चनो को आराम से दूर कर लेते हैं क्योंकि 'जनता' की अदालत ने उनको चुनाव जिता दिया तो इसका मतलब ये के उनके सौ खून माफ़.इसमे कोई शक नहीं के उस समय जनता में गुस्सा था और उस गुस्से को सांप्रदायिक या रास्ट्रवादी सवरूप देने में राजनैतिक लोग पूर्णतया आगे थे लेकिन सत्ताधारयों से जो सयम और निस्पक्ष रहने की उम्मीद  की जाती है वो कही नज़र नहीं आयी. राजीव गांधी ने इंदिरा गांधी की प्रथम पुण्य तिथि पर कहा के ' जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है' और इस प्रकार के वक्तव्य आग में घी डालने का काम करते हैं और प्रधानमंत्री पद पर रहने वाले व्यक्ति को शोभा नहीं देते।

सिख विरोधी दंगे हो या बाबरी ध्वंश के बाद के दंगे या गोधरा कांड के बाद की परिस्थितियां सब में माइनॉरिटीस को स्टीरियोटाइप बनाकर काम किया गया हैं. अगर इंदिरा गांधी की हत्या के बाद के दंगो में 'मिठाई बांटना' और 'ख़ुशी मानना' एक हथियार बनाया गया तो गुजरात २००२ में 'गोधरा' का कत्लेआम 'जिम्मेवार' बताया गया. बाबरी मस्जिद इसलिए गिरायी गयी क्योंकि वह पर एक 'मंदिर' था. इस प्रकार हज़ारो दंगो में कोई न कोई बहाना बनाकर देश के अकलियतों को डराया धमकाया गया है और प्रशासन ने हिन्दू होने कि भूमिका निभायी है . इंदिरा गांधी कि हत्या के बाद सिख विरोधी दंगे हुए क्योंकि उनको मरने वालो का धर्म सिख था इसलिए 'सबक' सिखाया गया. सवाल यह है राजीव की हत्या की बाद 'हिंसा' क्यों नहीं हुई ? गांधी की हत्या एक चित्पावन ब्राह्मण ने कि तो फिर उन्हें 'सबक' क्यों नहीं सिखाया गया ?तब ब्रह्मणो के ऊपर क्यों कहानिया नहीं बनी ? 

समझना पड़ेगा हमारी मानसिकता को जहाँ अल्पसंख्याको के हर बात पर एक स्टीरियोटाइप बनती है, और नए प्रकार की अफवाहे फैलाई जाती हैं और एक गलत व्यक्ति के गलत कार्य को कौम का गलत कार्य बता कर माहौल बनाया जाता है. जब हम इंडियन मुजाहिदीन, पाकिस्तान या दावूद का नाम बार बार लेते हैं तो हम कहीं न कहीं मुसलमानो को कठघरे में खड़ा करते हैं के इनके पापो को हिसाब उनको देना है. संघ या हिंदुत्व के पापो का हिसाब कोई नहीं मांगता।ताकतवर की हिंसा 'रास्ट्रीय' महत्व की होती है वोह देश की एकता और 'अखंडता' के लिए जरुरी होती है. उसको सही ठहराने के लिए हमारे पास पचासो आर्गुमेंट हैं। सिख विरोधी हिंसा इसलिए क्योंकि इंदिराजी को मारा, गुजरात इसलिए क्योंकि गोधरा हुआ, बाबरी इसलिए क्योंकि राम जन्मभूमि को  तोडा,राम मंदिर आंदोलन इसलिए क्योंकि शाहबानो के मामले में सरकार झुकी, बम्बई में दंगे इसलिए क्योंकि मुस्लमान सड़क पर आये, मुजफ्फर नगर इसलिए क्योंकि मुस्लमान लड़के हिन्दू लड़कियों को 'पटा' रहे हैं और यह कहानियां बढ़ती ही जायेंगे। आज भारत के समक्ष मानसिकता का संकट है. आज संकट है इस संविधान को बचाने का क्योंकि मनु के वरद पुत्र नकली पुत्रो से परेशान हो गए हैं और अब वे स्वयं ही इसको बदलने की सोचते हैं. देश के गैर हिन्दू लोगो में दवाब बने के और उनको बदनाम करने की राजीनति से हमको निकला पड़ेगा। उन सभी को सबक सीखने की निति से देश को कुछ नहीं मिलेगा जो चाहते हैं के सभी लोग जो एक खास किस्म के विचारो और तौर तरीको को नहीं मानते हैं. 

एक सभ्य भारत पूर्णतया सेक्युलर और कानून के शासन से चलेगा। इस वक़्त जरुरत है साम्प्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा के विरुद्ध एक सख्त क़ानून की. संसद को इसे तुरंत पास करना चाहिए और किसी भी आड़ में हिंसा को जायज ठहरने वालो से सख्ती से निपटा जाए. सरकार ऐसे विशेष न्यायालयो की स्थापना करे ताकि ऐसे सभी आतंकवादियों को उनकी असली जगह पंहुचा दी जाए. यदि न्याय नहीं मिलेगा तो लोगो के गलत रास्तो पर जाने की सम्भावना रहती है. भारत में  यह हकीकत  है के अल्पसंख्यको पर हिंसा को ताकतवर समाज 'रास्ट्रीय' स्वरुप दे देता है फलसवरूप राजीव, मोदी, कल्याण सिंह, शिव सेना इत्यादि पार्टियां सत्ता पर काबिज होते हैं और अन्याय की स्थिति में भटके नौजवानो को हम आतंकवादी कहते हैं. अल्पसंख्य्को के पास अपने बात को कहने के लिए क्या आप्शन है क्योंकि सत्ताएं उनकी बात तभी सुनती है जब वोट बैंक के तौर पर उसका फायदा हो और यदि नहीं तो कोई मतलब नहीं। मोदी ने मुस्लमान विरोध को इसलिए मज़बूत किया के वो हिन्दू वोट से मतलब रख रहे थे और अब रास्ट्रीय स्तर पर वह जानते हैं के बिना मुसलमानो के लाल किले का उनका सपना धरा का धरा रह जाएगा इसलिए इतनी बड़ी कवायद हो रही है सेक्युलर दिखने की. 

भारत की सियासत और सियासतदानो को देश के गैर हिन्दुओ को शक की दृस्टि से देखने और हिन्दू रास्ट्रवाद में उनको ढालने के किसी भी प्रयास से बचना होगा। हिंदी हिन्दू हिंदुस्तान के खतरनाक जुमलो से बचना होगा और हमारे संविधान की सर्वोच्चता को हमारे नित्य जीवन में लागु करना होगा। संविधान को तोड़ने वाली ताकते देश में हावी होने का प्रयास कर रही हैं और हमारी कोशिश होनी चाहिए के उसकी सर्वोच्चता को हमारे देश में लागु करवाएं। अगर हमारे नेता और अधिकारी ३१ अक्टूबर को अपने कर्तव्यों का सही प्रकार से निर्वहन करते तो देश में इतना बड़ा कत्लेआम नहीं होता, न बाबरी मस्जिद गिरती और न गुजरात की हिंसा होती। देश को बचने के लिए सांप्रदायिक सौहार्द की जरुरत है लेकिन वोह दुसरो को डरा के नहीं अपितु हमारे राजनैतिक, सामजिक और प्रशासनिक जीवन में भागीदारी के बिना सम्भव नहीं है. किसी समुदाय को बदनाम करके, उसको अलग थलग करके और उसकी संस्कृति और अस्मिता को मिटा कर देश कभी आगे नहीं बढ़ सकता और इसके लिए आवश्यक है हम सब में विविधता का सम्मान करने कि और कानून के प्रति इज्जत बढ़ने कि और संविधान को हर स्तर पर लागु करवाने के ताकि फिर कभी ऐसी घटनाओ कि पुनरावर्ती न हो और सभी लोग देश में बिना किसी भय के रह सकें? घृणा आधारित राजनीती पर प्रतिबन्ध लगाया जान चाहिए और कम से कम जो अपने को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं वो तो प्रगतिशील बने और गर्व से अपनी बातो को रखें। गुजरात २००२, या मुजफ्फर नगर २०१३ या बम्बई १९९३ नहीं होता यदि सेक्युलर राजनैतिक दल अपना काम सही से करते लेकिन अफ़सोस उनके दोगलेपन से सांप्रदायिक लोगो को मज़बूती मिली और देश पर एक बार फिर उसी खतरे का सामना कर रहा है. उम्मीद है हम सब पिछली घटनाओ से सबक लेकर आगे बढ़ेंगे। 

Sunday, 27 October 2013

फासीवादी ताकतों को बेनकाब करें




विद्या भूषण रावत 

झूठ को अति आत्मविश्वास के साथ बोलना और न केवल बोलना अपितु  लगातार बोलना फासीवादी राजनीती का हिस्सा है. इतिहास में 'स्वर्णिम काल' ढूढना और अपनी संस्कृतिक सर्वोच्चता को बोध कराना और दूसरो को नीच और कुत्सित दिखाना उसका एक हिस्सा है. अपने को ' नायक' के तौर पर प्रदर्शित करना और दसूरे नायको को असम्मानित करके देखना, उनकी योग्यता का मज़ाक उडाना और उनकी भाषा शैली और तौर तरीको को सरे बाज़ार मज़ाक करके बोलना फासीवादी जातिवादी अहंकारी राजनीती का  हिस्सा है जो न केवल नरेन्द्र मोदी अपितु उनके भक्तो में भी दिखाई दे रही है जो अधिकाँशतह विदेशो में और सोशल मीडिया की दुनिया का हिस्सा हैं और जो मोदी के जरिये साम्प्रदायिकता, हिंदुत्व की श्रेष्ठता, मुसलमानों, दलितों, पिछडो को उनके 'स्थान' पर खदेड़ने का सपना देख रहे हैं, जिन्हें लगता है के मोदी के जादुई चराग से  भारत दुनिया की महाशक्ति बन जाएगा और जो ये समझते हैं के मोदी एक ही दिन में मुसलमानों को देख लेंगे और पाकिस्तान को दुनिया के नक़्शे से ही गायब कर देंगे।

नरेन्द्र मोदी और हिंदुत्व भारत की जातिवादी वर्णव्यस्था को मजबूत करने वाली ताकतों का नाम है और त्रासदी देखिये के जिस मंडल के विरोध में हिन्दुत्व की राजनीती चली और जिस जातिवाद को लोकतंत्र का दुश्मन बताया गया उसी जाति और उनकी महानता के दुहाई देकर यादवो के वोट लेने के प्रयास किये जा  रहे हैं. हर स्थान पर दलित, पिछडो को उनके भगवानो के लिंक देकर हिंदुत्व के साथ जोड़ने के प्रयास हो रहे हैं. सवाल यह है के क्या भारतीय फासीवाद संस्कृति और शुद्रो के कंधो के सहारे लाने की तैय्यारी चल रही है ? सवाल यह है के क्या आरक्षण विरोधियों को शुद्र दलित माफ़ कर देंगे ? क्या जिन्होंने मंडल की जगह  कमंडल लाया उनका समूचा सफाया नहीं करना चाहिए ? दलित पिछडो के साथ धोखेबाजो को क्या माफ़ कर् दोगे ? हिंदुत्व की पूरी राजनीती ब्राह्मणवादी सल्तनत को मज़बूत करने की राजनीती है ? ये बाबाओं की राजनीती, पुरोहितो की राजनीती, पूंजीपतियों की राजनीती है ? क्या इन ठगों को माफ़ कर् दोगे ? २०१४ बहुत महत्वपूर्ण है. उत्तर प्रदेश और बिहार की जनता पर बड़ी जिम्मेवारी है ? 

वंशवादी राजनीती का विरोध करने वाले ये बताएं के राम किस आधार पर अयोध्या के राज बने ? वोह ये बताएं के राजस्थान के महारानी के अन्दर कौन सी योग्यता है ? वोह यह बताएं के हिंदुत्व और हिन्दू धर्म की कोई ऐसी परम्परा जहाँ वंश न रहा हो ? क्या भारत का कोई व्यापारिक घराना बिना वंश के चल रहा है ? क्या भारत का कोई फिल्म स्टार बिना वंश के है ? वंशवाद राजनीती में नहीं चल सकता क्योंकि कौन अच्छा है और कौन बुरा यह मोदी के झूठ और हिटलरी अहंकार नहीं अपितु  भारत की जनता बताएगी। हम जानते हैं के कांग्रेस ने इतने वर्षो में   हिंदुत्व के विरूद्ध कार्यवाही नहीं की है और बहुत ही ढुलमुल रवैया अपनाया है. उन्होंने प्रशाशनिक मसलो में राजनीती डालकर हिंदुत्व के आताताइयों को बचाया है. ऐसे में हिंदुत्व के सभी धुरंधर इस वक्त बडबोले हो गए हैं और उनका अहंकार सातवे आसमान पर है . 

सबसे बड़ी चुनौती सामाजिक न्याय की शक्तियों के सामने है ? वे कहाँ हैं और क्या कर रही हैं कुछ पता नहीं ? आज आरक्षण पर हमला है, जमीनों और जंगल पर हमला है और पूंजी और बाबाओ के गठबंधन ने ये हमला बोला  है और हिंदुत्व के प्रहरी उसके सबसे बड़े एजेंट हैं. झूठ को बार बार दोहर्कार सच बनाने का षड़यंत्र और मीडिया के जरिये सूचनाओं पर नियंत्रण और उसका प्रवाह आज की सबसे बड़ी चुनौती हैं . इस चुनौती को स्वीकार करें और मात्र पिछड़ा या अपनी जाति  का होने भर से गारंटी न ले क्योंकि उसकी विचारधारा और सामाजिक न्याय के प्रति उसकी निष्ठा और इतिहास को जरुर जाँच ले. मीडिया के जरिये हमें भुत को भूलने और केवल 'आर्थिक' नजरिये से चीजो को देखने की हिदायत मिल रही है क्योंकि पूंजीवादियों के कलम घसीट अब जनता को गुमराह करने में नेताओं से भी आगे निकल चुके हैं इसलिए ऐसे लोगो और अफवाहों से सावधान। हिंदुत्व का अजेंडा अफवाहों को फैलाकर दलित पिछडो, आदिवास्सियों और मुसलमानों में संदेह का वातावरण पैदा करना है. उन्हें इस कला में महारत हासिल है अब हमें देखना है के इन पुरातनपंथी दकियानूसी ताकतों का कैसे मुकाबला करें और वो लोकतंत्र में केवल वोट है. इसलिए २०१४ में हमें अपनी बातो को तक अधिक से अधिक लोगो तक पहुंचाए के धार्मिक कठमुल्ला किसी भी तरीके से संसद में बहुमत में न रहे. उन्हें छोड़ जिसकी सरकार बने मुझे कोई दुःख नहि. घिसी पिटी  बने, मायावती, मुलायम, नितीश या किसी और की बने कोई बात नहीं। एक दो साल चले, कोई समस्या नहीं लेकिन ब्राह्मणवादी शातिर हिंदुत्व को हराना हमारा राष्ट्र धर्मं है. 

Saturday, 26 October 2013

Lokaayat: राजनीती का हिंदुत्विकरण या हिंदुत्व की राजनीती

Lokaayat: राजनीती का हिंदुत्विकरण या हिंदुत्व की राजनीती: विद्या भूषण रावत  गुजरात में २००२ में मुसलमानों की मौत के सौदागर अक्सर  १९८४ के चुनावो का जिक्र करते हैं के राजीव गाँधी सिखों की लाश...

Friday, 25 October 2013

राजनीती का हिंदुत्विकरण या हिंदुत्व की राजनीती



विद्या भूषण रावत 

गुजरात में २००२ में मुसलमानों की मौत के सौदागर अक्सर  १९८४ के चुनावो का जिक्र करते हैं के राजीव गाँधी सिखों की लाशो पर देश के प्रधानमंत्री बने. मैं अपने कई विश्लेषणों में कह चूका हूँ के राजीव जिस मैंडेट से प्रधानमंत्री बने थे वह हिंदुत्व का मैंडेट था  पूर्णतया सांप्रदायिक था, वह चुनाव परिणाम असल में  सिखों को सबक सिखाने के लिए ही था और राजीव हिन्दुओ के नायक बनकर उभर रहे थे, इंदिरागांधी एक हिन्दू बन चुकी थी जिनकी हत्या 'सिख आतंकवादियों' ने की थी. देश भर में सिखों के विरूद्ध जो हिंसा थी उसमे कांग्रेस के बड़े नेता जरुर शामिल थे लेकिन उनके लोगो ने इसको हवा नहीं दी यह कहने का कोई कारण  नही है क्योंकि जो दंगे हुए थे वे कांग्रेस और सिखों के बीच नहीं हुए थे अपितु 'हिन्दुओ' ने इस हिंसा को अंजाम दिया और कांग्रेस हिन्दू राष्ट्रवाद की मुख्या पुरोधा बनकर उभरी जिसने भाजपा को मात्र २ सीटो पर ही सिमटा के रख दिया। 

लेकिन राजीव की इस विशाल जीत में सेकुलरिज्म और संविधान की हार हुई. सम्प्रदायिक्ता के मुख्या श्रोतो का इस्तेमाल कर कांग्रेस ने जीत तो हासिल की लेकिन लम्बी लड़ाई लड़ने वाले संघ परिवार के लिए तो ये कर्णप्रिय संगीत था और कांग्रेस गलतियों  पे गलतियाँ कर रही थी. यह सभी सांप्रदायिक लोगो को खुश करने की निति ने शाहबानो मामले पर भाजपा को मौका दिया लेकिन इससे पहले कांग्रेस पर मुस्लिम तुस्थिकरण का आरोप लगता माननीय अरुण नेहरु जी ने अयोध्या मामले में नयी पहल शुरू कर दी और जहाँ ५० वर्षो से ताला लगा था वहां अब 'राम मंदिर ' बन गया और फिर देश ने जो देखा उसको भुलाना  मुश्किल है. राजीव ने राम राज लाने  का वादा किया और जाने अनजाने में हिंदुत्व की जो मजबूती दी उसको केवल और केवल मंडल की ताकतों ने रोका।

हिंदुत्व की ताकतों ने ब्राह्मणवादी अन्तर्विरोधो की राजनीती को अछे से समझा और इसलिए राम मंदिर के आन्दोलन को और मज़बूत किया क्योंकि फिर 'मुस्लिम' विरोध के नाम पर बाकि गैर मुसलमानों का एकीकरण हो जाए. जो जातियां सामाजिक न्याय की बाते करती और अपने लिये अधिकार मांगती वो मुस्लिम विरोध पर एक हो जाती. हालाँकि उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा की सरकारे बनी लेकिन हकीकत में वैचारिक तौर पैर वे ब्राह्मणवाद से समझौता करके ही काम चलाते रहे और हिंदुत्व की लम्बी दुरी के निशाने पर रहे. अब उत्तर प्रदेश में माया और मुलायम कभी एक नहीं हो सकते और ये क्यों हुआ इसके लिए हमे बहुत कुछ अलग से कहने की जरुरत नहीं। किसकी गलती है और कौन कैसा है यह तो भविष्य के आँगन में है लेकिन सच्चाई यह के इसने हिंदुत्व को और मज़बूत कर दिया।   

मह्त्वाकंषाएं ख़राब नहीं होती लेकिन एक शर्मनाक हालत में मंडल शक्तियों के बीच संप्रदायीकरण,और जातियों की किलेबंदी  के चलते २००९ तक इन ताकतों की हार हो चुकी थी और हिंदुत्व का विषाक्त फन देश को डसने के लिए तैयार खड़ा था. आज सभी मंडल की ताकते अलग थलग और छितराइ खड़ी हैं और किसी से भी समझौता करने को तैयार बैठी हैं. दलितों का इन शक्तियों पर ज्यादा भरोषा नहीं  है क्योंकि किसानो के नाम पर जो लठैती दलितों के हितो पर हुयी है वोह भी सर्वव्याप्त है. लेकिन यह भी हकीकत है के गाँव में भुमिसुधार और उसके पुन्रवितरण के बगैर सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं है और इसके लिए हमारे  मंडलीय नेता तैयार नहीं है क़्योकी उनकी  गाँव की राजीनति जाति के झूठे अहंकारो पर कड़ी है जिसका मुख्या धेयाय दलित विरोध है क्योंकि जातियों के बड़प्पन का सिद्धांत दलितों को बराबर बैठने का हक़ नहीं देता और इसीलिये गाँव में हिंदुत्व की राजनीती की धुरी में पिछड़े नेता हैं.

मंदिर की पिछड़ी राजनीती ने कल्याण सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्या मंत्री बनाया और उनके हौसले इतने बुलंद हो गये के उन्होंने अपनी संवैधानिक निष्ठां को भुलाकर बाबरी मस्जिद को गिरने दिया। हालाँकि उत्तर प्रदेश में उसके बाद भाजपा का सफाया हो गया लेकिन लम्बी दुरी चलने वाले संघ का पूरा पत्ता नहीं कटा था और पिक्चर अभी बाकी है. अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ध्वंश और उसके बाद मुसलमानों पर हुई हिंसा का परिणाम  महारास्त्र में हुआ जहाँ शिव सेना को चुनाव में सरकार बनाने का मौका मिला। राजीव के पद्चिन्हो पर चलकर ही मोदी भी मुसलमानों को मरवाकर गुजरात में एकछत्र राज करते रहे. यानी अल्पसंख्यको के खिलाफ आग उगल कर और उनकी देशभक्ति को हमेशा संदेह के घेरे में रखकर हम देश में शासन कर सकते हैं. कांग्रेस ने तो सिख विरोधी दंगो के लिए माफ़ी भी मांगी लेकिन मोदी तो हर चुनाव में एक मिया मुशारफ ढूंढते रहे ताकि मुसलमान पूर्णतया अलग थलग रहे और गुजरात उसका उदहारण है जहाँ उन्होंने मुसलमानों को  साफ तौर पर इतना अलग कर दिया है के वे खुल के कुछ कह सकने की स्थिथि में नहीं हैं .   

देश के सबसे बड़ी पार्टी का हिन्दुत्वीकरण इंदिरागांधी के समय से शुरू हुआ. नेहरु की कांग्रेस ने तो सांप्रदायिक ताकतों से और पुरोहितवाद से दुरी रखी लेकिन इंदिरा गाँधी ने समय समय पर बाबाओं और धर्मगुरूओ का कंग्रेस्सिकरण कर उनको मजबूती प्रदान की और हिन्दू साम्प्रदायिकता को हवा देने के लिए  आपरेशन ब्लू स्टार किया गया क्योंकि जब कांग्रेस पे यह आरोप लगे के वो सिख साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दे रही है तो हिन्दुओ की 'भावनाओं' का आदर करने के लिए लिए स्वर्ण मंदिर में सेना भेजनी पड़ी. 

सोनिया की कांग्रेस कई मामलो में भिन्न है. यह साझा सरकारों का समय है और भारत अब बदल भी चूका है इसलिए पहले की तरह हाथ हिलाकर यहाँ वोट भी नहीं मिलते। फिर भी सोनिया गाँधी को बहुत सी बातो के लिए श्रेय देना जरुरी है . कांग्रेस में लोकतान्त्रिक  प्रक्रिया  बढ़ी है, मुख्यमंत्री दिल्ली से आसानी से नहीं बदले जाते और पार्टी ने कुछ बेहतरीन  कानून भी पारित करवाए हैं चाहे मनरेगा हो या खाद्य सुरक्षा कानून, भूमि कानून हो या सुचना का अधिकार यह सभी ऐतिहासिक हैं हालाँकि इनमे कमियां अपनी जगह व्याप्त हैं . सोनिया के कांग्रेस असल में सरकार के आगे असहाय हो गयी और राज्य सभा के जरिये  की जुगाद्बाजी का शिकार हो गयी. पार्टी के ऊपर सरकार के हावी होने से जिस बेतरबी से सरकार ने सेज और अन्य कार्यो के लिए भूमि अधिग्रहण किया वो देश में भारी असंतोष का कारण बना. सरकार की आर्थिक नीतियाँ वो लोगो बना रहे थे जो पूर्णतया पूंजीवादी व्यस्त में यकीं करते थे और उनका हिंदुत्व से कोई बहुत बड़ा वैचारिक भेद नहीं था इसीलिए प्लानिंग कमीशन ने बार बार नरेन्द्र मोदी के गुजरात को अच्छा राज्य बताया और राजीव गाँधी फाउंडेशन के कई लोग आज मोदी की 'फाउंडेशन' बनाने में लगे हैं. 

कांग्रेस आज की जरुरत है क्योंकि देश में दलित आदिवासियों मजदूरों की अभी कोई एक जुट आवाज नहीं दिखती जो हिंदुत्व को हरा सके. देश का यह कर्तव्य है के हिंदुत्व की इन जातिवादी ताकतों को नेस्तनाबूद करें लेकिन उसके लिए कांग्रेस के सेक्युलर होनी की गारंटी चाहिए और उसमे सभी वर्गों, दलितों, पिछडो, मुस्लिम और अन्य तबको की भागीदारी देनी होगी। कांग्रेस को सॉफ्ट हिंदुत्व से साफ़ अपनी दुरी बनानी होगी और चिदंबरम, मोंटेक, मनमोहन की आर्थिक सोच को पूर्णतया तिलांजलि देनी होगी। 

इसलिए राहुल जो बात कहे हैं वो महत्वपूर्ण है . जब न्याय नहीं मिलता तो व्यक्ति कुछ भी कर सकता है . साम्प्रदायिकता का सबसे बड़ा पहलों यह है के वो लोगो में जहर घोलता है और जब इस देश के अन्दर मुसलमानों को न्याय नहीं मिलेगा तो कई लोग हिंसा का सहारा ले सकते हैं. आज देश के अधिकांश जेलो में मुस्लिम युवा हैं. आतंकवाद के नाम पर उनको घसीटा जा रहा है. परिवार बर्बाद हो चुके हैं और हम हिंदुस्तान पाकिस्तान की बात करते हैं. कांग्रेस के नेता यह समझ ले के इंडिया केवल भारत है न के हिंदुस्तान। भारत को गोलवलकर और सावरकर के हिंदुस्तान की तरफ न धकेले कांग्रेस। और उसके लिए जरुरी है के सरकार अपना  राजधर्म निभाए और पार्टी पूर्णतया संवैधानिक तंत्रों को मज़बूत करे . हिन्दू साम्प्रदायिकता के आगे घुटने टेक कर कांग्रेस ने पहले ही देश के धर्मनिरपेक्ष समाज को निराश किया है. आज भारत को बचाने की लड़ाई है. राहुल की बात के जो  मतलब  निकले लेकिन एक बात की पुष्टि इतिहास ने की के भारत की राजनीती इस वक़्त पूर्णतया हिंदूवादी है और सभी पार्टियाँ उसमे ही अपने उत्तर ढूंढ रही है और यही कारण है के मुंबई के दंगो से पीड़ित मुसलमानों को न्याय तो नहीं मिलता लेकिन शिव सेना सत्ता में आती है, दाऊद और उसके साथी तो भाग गए और इसलिए पुलिस हजारो निर्दोष मुस्लिम युवाओं को जेल में ठूंसती है लेकिन हिंदुत्व के दंगाई कभी नहीं पकडे जाते, जब  निर्दोष मुसलमान जेल में जाते हैं तो समाज पर उसका  असर होता है और असहायता की स्थिथि होती है यह बहुत गंभीर है .  चुनाव व्यवस्था ये के हज़ारो मुसलमानों या सिखों , दलितों का कत्लेआम से आप देश के शाशक बन जाते हैं या लाइन पे लगे हैं लेकिन उनलोगों को कभी न्याय नहीं मिलता जो हिन्दू साम्प्रदायिकता के शिकार रहे हैं . क्या कांग्रेस पार्टी एक साफ़ लाइन लेने को तैयार है ? क्या हरयाणा के दलितों को न्याय मिलेगा ? क्या महारास्ट्र के  १९९३ के दंगा पीडितो को इन्साफ मिलेगा . दाऊद या आई एस आई  को खत्म करने के लिए मुसलमानों को न्याय और सत्ता समाज में भागीदारी और इज्जत चाहिए न की जुमलेबाजी और लफ्फाजी। राहुल ने स्वीकार किया के न्याय नहीं मिलेगा तो मुस्लिम युवा भटक सकते हैं लेकिन प्रश्न यह है के क्या केंद्र की उनकी पार्टी की सरकार और विभिन्न राज्यों में उनके मुख्यमंत्री ऐसा करेंगे के मुसलमानों का उन पर भरोषा आये ? हिंदुत्व की चुनौती बड़ी है लेकिन केवल भय से काम नहीं चलेगा अब अपनी मानसिकता को भी साफ़ करना पड़ेगा . 

Thursday, 24 October 2013

सुर न सजे क्या क्या गाउ मैं …



विद्या भूषण रावत 

आज सुबह मन्ना डे के निधन की खबर से दुःख तो हुआ लेकिन इसके लिए हम तैयार भी थे. अपने जिंदगी को भरपूर तरीके से अपनी शर्तो पर जीते मन्ना दा  चले गए और उनके इतने वर्षो की सुर साधना की खास बात यह रही के उन्होंने उसूलो से कभी समझौता नहीं किया। उनको 'एक आँख मारू तो रास्ता रुक जाए' या अन्य इसी प्रकार के सड़क छाप गाने गाना मंज़ूर नहीं था. बम्बई अच्छी नहीं लगी तो बंगलोर का रुख कर लिया और जब फिल्मो में उनके मतलब की बाते नहीं आ रही थी तो 'मधुशाला' जैसे महान कविता संग्रह को उन्होंने और अमर बना दिया।

मन्नाडे उस दौर में आये जब सिनेमा के पटल पर राज कपूर, दिलीप कुमार और देवानंद का राज चलता था और इन तीनो महान अदाकारों की अपनी विशेष छवि थी जिसके अनुसार ही उनके प्लेबैक सिंगर्स मशहूर हुए और संगीत भी तैयार हुआ क्योंकि यह लोग संगीत की भी अच्छी समझ रखते थे. राज कपूर तो मुकेश-शैलेन्द्र-हसरत जयपुरी और  
शंकर जयकिशन के साथ जोड़ी बना लिए तो दिलीप कुमार की अधिकांश फिल्मो के लिए गायन  मोहम्मद रफ़ी का था और संगीत नौशाद और गीत अक्सर शकील बदायुनी के होते थे. देवानंद के लिए सचिन देव बर्मन ने धुनें तैयार की और मजरूह के खुबसूरत गानों को किशोर कुमार ने और हसीं बना दिया। इन सभी महान कलाकारों के चलते मन्ना डे ने अपना एक ऐसा मुकाम बनाया जो उनके इन सबसे  अलग करता है और महान भी बनता है. मन्ना डे ने उन गानों को सुर दिया जिसे शायद दूसरा वैसा सुर नहीं दे पाता। 

अगर १९५० के समय से संगीत के दौर को देखें तो पता चलेगा के जिस विविधता से मन्ना डे ने अपने गानों में रंग भरा वो किसी के लिए दोहराना मुश्किल है इसलिए उनके गानों के नकली कसेट आपको कम मिलेंगे। नदी में चलते माझी के गानों को क्या उनसे अच्छा कोई गा पायेगा। हरेक स्वर में सुन्दरता है और दिल की पुकार है . नदिया चले चले  रे धारा ( फिल्म सफ़र ), या अपनी कहानी छोड़ जा कुछ तो निशानी छोड़ जा ( दो बीघा जमीन ) को शायद ही कोई भुला पाए . फिल्म सीमा का बलराजसाहनी पर फिल्माया गया यह बेहतरीन गाना ' तू प्यार का सागर है, तेरी एक बूँद के प्यासे हम', आज भी हमारे दिलो को सीधे असर करता है. काबुलीवाला  फिल्म में ' ऐ मेरे प्यारे वतन तुझपे दिल कुर्बान' या उपकार का ' कसमे वादे प्यार वफ़ा सब बाते हैं बातो का क्या' आज भी दिलो को झकझोरते हैं. 

मन्ना डे टाइप्ड गायक नहीं थे. उन्होंने ऐसे गीत गाये जो गाने में बहुत मुश्किल थे इसलिए आज भी आसान नहीं है उनकी नक़ल करना या उनको दोहरा देना। जहाँ वह राजेश खन्ना के लिए आनंद में 'जिंदगी कैसी है पहेली' गा रहे थे तो वहीँ प्राण के लिए फिल्म जंजीर में गायी उनकी कव्वाली का आज भी जवाब नहीं। आज भी ' यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी' एक मास्टरपीस है  जिसने प्राण को अमर कर दिया। महमूद के लिए भी मन्ना दा ने बेहतरीन गीत दिए. 

जिस समय राज कपूर मुकेश को अपनी आत्मा की आवाज कह रहे थे वहीँ उन्होंने मन्ना डे की प्रतिभा को पहचाना और बात ऐसे बनी की राजकपूर की फिल्मो के बहुत से अविस्मरणीय गीत दिए.  दिल का हाल सुने दिल वाला, फिल्म श्री ४२० का ऐसा गाना है के आज भी हमें नाचने पर मजबूर करता है. फिल्म मेरा नाम जोकर का प्रसिद्द गीत, ' ऐ भाई जरा देख के चलो', या फिल्म दिल ही तो है का ', लागा चुनरी में दाग' आज भी बहुत चाव और सम्मान से सुने जाते हैं. बलराज साहनी पर फिल्माया 'वक़्त ' फिल्म में उनका यह  चुलबुला गीत आज भी बेमिशाल है और उतना ही जवान है जैसे उस वक़्त था ', ऐ मेरी जोहरा जबी, तुझे मालूम नहीं, तू अभी तक हैं हसीं और मैं जवान, तुझपे कुर्बान मेरी जान मेरी जान. शायद आज भी इन गीतों के मुकाबले न तो गीत आये न संगीत पैदा हुआ क्योंकि मन्ना डे के लिए संगीत साधना थी एक धंधा नहीं था. 

जब सुरों में साधना होती  है और इमानदारी होती है तो सुर खुबसूरत बन जाते हैं और यही बात मन्ना दा के सुरों के साथ थी. आज भी ' ये रात भीगी भीगी, ये मस्त बिघायें, उठा धीरे धीरे वोह चाँद प्यारा प्यारा, या आजा सनम मधुर चांदनी में हम, तुम मिले तो वीराने में भी आ जायेगी बहार,  झुमने लगेगा आसमा, आदि गीत हमारे दिलो पर राज करते हैं और सबसे बेह्तरीन रोमांटिक गीतों में शुमार किये जाते हैं.
 
 मन्ना डे ने सही समय पर बम्बई को टाटा कर दिया था नहीं तो रफ़ी, किशोर, आदि की तरह उन्हें भी आँख मारने वाले या लड़की पटाने वाले  गाने गाने पड़ते जो उनके लिए मुश्किल था. मन्ना डे खुद बताते हैं के कैसे उन्होंने किशोर कुमार के साथ 'एक चतुर नार गाया' जिसमे उनको किशोर से हारना था और किशोर कुमार के कहने पर उन्होंने यह गाना स्वीकार किया जिसे हम सब बहुत मस्ती से  सुनते हैं. जो हुआ वो अवश्यम्भावी था लेकिन ये जरुर है के मन्ना डे के बात एक पूरी पीढ़ी ने  बम्बई की फिल्मो से विदाई ले ली है. मुकेश, रफ़ी, किशोर की पीढ़ी और जज्बे के इस महान कलाकार के जाने से एक युग का अंत है लेकिन जैसे के मैंने पहले भी कहा लेजेंड्स कभी मरते नहीं हैं, वे हमेशा जिन्दा रहते हैं अपने कला के साथ, अपनी साधना के साथ लोगो को सन्देश देते हैं बेहतरीन करने का और कर्णप्रिय संगीत देने का. जब जब सुरों की बात होगी, संगीत की धुन बजेगी मन्ना डे की मधुर आवाज हमेशा याद की जायेगी क्योंकि संगीत एक बहता दरिया है जो रुकता नहीं है, चलता रहता है अनवरत। 

Saturday, 19 October 2013

देश के विकास के लिए चमत्कारों का भंडाफोड़ जरुरी


विद्या भूषण रावत 

उन्नाव जिले का डोंदिया खेड़ा गाँव पिछले एक हफ्ते में  देश भर में प्रसिद्द  हो गया. बंगाली बाबा शोभन सरकार ने सपना देखा और भारत सरकार में उनके परम शिष्य चरण दास महंत ने देश की प्रतिष्ठित संस्था पुरातत्व विभाग को जांच पर लगा दिया। बाबा ने एक हज़ार टन सोने के सपना देखा और सोचा के देश के आर्थिक हालात बहुत ख़राब हैं इसलिए वोह यह नेक  काम कर रहे हैं ताकि देश के खजाने में पैसा आये और उसके हालात सुधरे . वैसे बाबा तो मीडिया की चकाचौंध से दूर रहे लेकिन उनके 'हनुमान' ओमी बाबा बहुत 'पहुंचे' हुए नज़र आ रहे है और उनके अन्दर  'गज़ब' का आत्मविशवास झलक रहा था. जब भी मीडिया से मुखातिब होते ओमी बाबा अपनी चौधराहट झाड़ते और बताते के कैसे दिवाली के बाद रुपैया डॉलर और यूरो और यहाँ तक के पौंड से भी उपर आ जायेगा। मतलब साफ़ था, बाबा को पता था के रुपैये के एक्सचेंज वैल्यू क्या है और वोह इस बात से अच्छी तरह से परिचित थे. उन्होंने आगे कह दिया के अभी तो यह शुरूआत  है आगे और भी सोना है जो कानपूर और फतेहपुर में भी छुपा पड़ा है. फतेहपुर में तो कुछ लोग स्वयं ही खुदाई करने चले गए. मैं तो यह भी सोच रहा हूँ के यदि उत्तर प्रदेश के धरती पर इतना सोना गदा हुआ है तो नेता लोगो अब संसद और विधान सभाओं के चुनाव लड़ने के बजाय हर एक किले और खंडहर के अन्दर खुदाई कर रहे होंगे। वैसे भी लोगो में सब्र नहीं है वे सोना देखना चाहते हैं और अगर जल्दी कुछ नहीं निकला तो दो चार लोग पिट जाएँ तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि माहौल ही ऐसे बना दिया गया है . 

प्रश्न यह है के क्या सोना निकलेगा और क्या नहीं ? यह प्रश्न अक्सर मुझे टीवी पर पैनल वार्तालाप में पुछा गया. जब प्रस्तुतकरता और पत्रकार बड़े बड़े रामनामी दुपट्टा ओढे इन बाबाओ से हाथ दिखाते फिरते हैं तो उनसे आप बहुत तार्किक होने की उम्मीद तो न कीजिये। इसलिए के पुरातत्व विभाग देश में सोने की खुदाई के लिए नहीं अपितु देश के ऐतिहासिक धरोहरों को जानने और उनको बचने के लिए बना है इसलिए अगर सोना मिल गया तो भी वोह पुरातत्व विभाग की सम्पति हो जाएगा और नेशनल म्यूजियम में रखा जाएगा लेकिन नहीं मिला तो क्या होगा  ?
क्या लोग बाबाओं पर विश्वास करना छोड़ देंगे ? ऐसा होना वाला नहीं है क्योंकि लोगो को तो लुटने और पिटने की आदत पड़ चुकी है और वोह तो किस्मत, समय काल पर ही दोष मढेंगे न की बाबा के सपने पर. 

बाबा के सपने का विश्लेषण करने के लिए हिंदुत्व के बड़े बड़े मठाधिसो से मेरा पाला पड़ा. किसी ने कहाँ के सुबह का सपना सच होता है तो कोई विश्लेषण करते वक़्त पूरी  वैदिक संस्कृति और उसके गुणगान करने लगे. बहुत से राजनैतिक खेल को समझ चुके थे और यह जानते थे के कुछ निकलेगा नहीं और हिंदुत्व और उसके धर्म की फजीहत हो जाएगी अतः अगले दिन से ही उन्होंने रंग बदलने शुरू कर दिए. कहा शुभ मुहूर्त नहीं क्योकि खुदाई ग्रहण के दिन हो रही है इसलिए सम्भावना नहीं लगती, कुछ ने कहाँ के सपने को दुसरो से साझा करने से वो विकृत हो जाते हैं और एक महान  हस्ती ने यह तक कहा के क्योंकि बाबा के हिसाब से काम नहीं हो रहा है इसलिए सोना अपनी जगह बदल देगा और इन बातो को वैज्ञानिक दृष्टिकोण में ढलने के जिम्मेवारी संघ समर्थक 'स्वप्न' विशेषज्ञों को सौंपी गयी. सभी ने पूरी मुस्तैदी से बात रखी और साधू के महानता और सामाजिक कार्यों के कसीदे पढ़े. जब मैंने कहाँ के मोदीजी कह रहे हैं के देश का मजाक उड़ रहा है तो मेरे पैनल के एक विशेषज्ञ मोदी के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर की तरह बात करने लगे. 

सवाल इस बात का है के क्या सरकार हमारे सपनो पर ऐसे बड़े निर्णय ले सकती है और यदि पुरातत्व विभाग का निर्णय पहले से लिया गया है तो क्या उसमे बाबा के सपने को जोड़ना जरुरी था , क्या केंद्रीय मंत्री अपनी मर्ज़ी से कुछ भी कर सकते हैं . लेकिन यहाँ पर हमको भारत के अन्दर पैदा हो रही साम्प्रदायिक राजनीती को समझना होगा जिसमे मोदी अपने को सेक्युलर दखाने का प्रयास कर रहे हैं और कांग्रेस जे जान से ब्राहमणों का आशीर्वाद लेने को आतुर है लेकिन वोह अभी तक मिल नहीं रहा और इन दोनों खेलो में तर्क और मानवता पिट रहा है. अगर सरकार काम नहीं करती तो हिंदुत्व के योद्धा तैयार खड़े थे यह कहने के लिए के हमारी  भावनाओं का आदर नहीं होता। इसलिए इस कार्य को सीधे सीधे हम ब्राह्मण तुष्टिकरण की नीति  सकते हैं जो कांग्रेस को अभी भी आशीर्वाद देने को तैयार नहीं है. 

भारत के संविधान में अनुच्छेद ५१ में साफ लिखा है हम भारत को एक मानववादी नागरिक समाज बनायेगे जहाँ लोगो में तर्क शक्ति का विकास हो और वो वैज्ञानिक चिंतन में यकीं करें न की अन्धविश्वास की गलियों में भटक जाएँ। यह घटना और इसको मीडिया की प्रमुखता यह दर्शाती है के अंधविश्वास को देश के महान  संस्कृति बताकर हम ब्राह्मणवादी एकाधिकारवाद को और मज़बूत कर रहे हैं. मीडिया ने इसमें भूमिका निभाई और इसलिए संस्कृति के नाम पर जितने भी बडबोले टीवी चैनलों पर दिखाई दिए वे सभी ब्राह्मण थे. क्या ऐसी स्थितयों में हम संविधान और उसके  को बढा  सकते हैं. 

सोना अगर नहीं मिला तो शोभन सरकार का कुछ नहीं बिगड़ने  क्योंकि हमारे देश के लोग बाकी सब बातो में तो सवाल कर लेते हैं लेकिन  भाग्य और भगवान को कभी प्रश्न नहीं करते इसलिए सबसे बड़ा खतरा तो पुरातत्व विभाग के लोगो पर है क्योंकि हिंदुत्व के इन कुटिल लोगो के खेल समझने पड़ेंगे और जब इनकी पोल पूरी तरह से खुल जाएगी तो यह वोही बात दोहराएंगे जो इनके ज्ञानवान संत कह रहे हैं. काल, समय, गृह, लगन, दोष आदि के खेल में जनता को  उलझाकर यह सारी असफलता का ठीकरा पुरातत्व विभाग के उपर फोड़ देंगे।

इस सारे खेल में जो सबसे अधिक सोचनीय विषय है वो है मीडिया द्वारा इसको इतना बड़ा बनाने का. ऐसे सवालो पर तो मीडिया को वैज्ञानिक चिंतन देना चाहिए लेकिन हमारा मीडिया उस मामले में पूर्णतया जातिवादी है और ब्राह्मणवादी शक्तियों को खुल्करके समर्थन कर  रहा है और उसमे बैठे ज्यादातर लोग तंत्र मंत्र के पुरे ढकोसले में फंसे पड़े हैं. मैं तो सिर्फ एक प्रश्न पूछता हूँ के क्या एक राष्ट्र इसलिए महान होता के उसके पास लाखों टन सोना है या उसकी सभ्यता उसे महान बनाती है. क्यां इतना सोना मिलने के बाद हम काम करना बंद कर देंगे ? क्या हमें तब विज्ञान और उसकी आवश्यकता नहीं होगी ? क्या हमारे किसानो को कुछ करने की जरुरत नहीं है .

दूसरी बात और भी महत्वपूर्ण है. हम लोग हमेशा उस चीज की तलाश करते है जो हमारे पास नहीं है और जो है उसको प्राप्त करने के प्रयास भी नहीं करते। हमारे सारे पाखंडी बाबा चिल्ला  चिल्ला कर कह रहे थे के शोभन सरकार तो  देश के विकास के लिए १०००टन सोना देश को देना चाहते हैं, वो कोई अपने लिए थोडा सोना मांग रहे हैं .  मेरी केवल एक ही विनती है, कृपया भारत के विभिन्न मंदिरों में रखे २००० टन सोने को वो सरकार को सौंपे जिसकी कीमत ८४ बिल्लियन  डॉलर आंकी गयी है और रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने इन मंदिरों को एक पत्र भी भेज था जिसमे उन्हें मंदिरों में रखे गए सोने की जानकारी देने को कहा गया है लेकिन मंदिरों और उसके शक्तिशाली ट्रस्टियों ने सरकार को यह जानकारी देने से मना कर दिया है क्या यह देश के साथ धोखा और गद्दारी नहीं है ? क्या इस देश के मंदिर या मस्जिद या कोई अन्य धर्म स्थल देश के कानून से बड़े हैं ? क्या भारत में मंदिरों और इनके मठाधिशो की सल्तनत चलती रहेगी या देश का कानून भी काम करेगा ? हम सरकार से मांग करते हैं के सभी धर्मस्थलो के पैसे पर पूरा टैक्स लगाए और उनके अन्दर रखी सम्पति का ब्यौरा  मांगे।अगर यह दो हज़ार टन  सोना हमारे रिज़र्व बैंक में आ जाए तो देश के सकती है और सरकार को हर जगह पुरातत्व विभाग को खड्डे खुदवा कर सोना ढूंढ़वाने के नाम पर अपनी फजीहत नहीं करवानी पडती  
 
भारत को एक महान और विकसित राष्ट्र हम केवल वैज्ञानिक, तर्कवादी और मानववादी चिंतन से बना सकते हैं . उस परम्परा से यह देश महान  बनेगा जो बुद्ध ने शुरू की और जिस बार आंबेडकर, फुले, पेरियार और भगत सिंह चले. तर्क और मानववाद की परम्परा। इस देश को कर्मशील बनाना होगा ताकि लोग भुत, प्रेत, चमत्कार को दूर से प्रणाम कर अपने रस्ते पर चलते रहे हैं . याद रहे के चमत्कारों के जरिये ही अब धर्म और उनके धुरंधर अपनी  दूकान चला रहे हैं इसलिए चमत्कारों के भंडाफोड़ की आज ज्यादा जरुरत है. आइये आज से ही इस नेक काम को अपने घर से शुरू कर दे ताकि धर्म की इस अंधी कमाई को ख़त्म किया जा सके.