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Thursday, 20 April 2017

गौ रक्षा के नाम पर अत्याचार और लूट को रोके सरकार

 

विद्या भूषण रावत 

एक अप्रेल को राजस्थान के 'गौभक्तो'' ने अपनी 'देशभक्ति'' का परिचय देते हुए एक निरपराध किसान को राष्ट्रीय राजमार्ग  अलवर बहरोड़ रोड में बेरहमी से मार डाला।  उसका कसूर सिर्फ इतना के वह गाय पालने वाला मुसलमान था और जयपुर से दो नयी गाये खरीदकर अपने दूध के कारोबार को बढ़ाना चाहता था। मेवात के नूह ब्लॉक के जैसिंघपुर गाँव में पहलू खान की दूध डेयरी में लगभग १५ भैंसे और ४- गाय हैं।  रमजान से पूर्व दूध की जरूरतों को दूर करने के लिहाज से पहलु अपने  दो बेटो इरशाद, आरिफ और अन्य साथियो अजमत के साथ जयपुर के सरकारी  पशु  हटवाड़े से गाय खरीदकर ला रहे थे और उनके पास खरीद से लेकर अन्य सभी जरुरी बातो की प्रशाशनिक रिसीप्ट थी।  पहलू खान की दूध डेयरी गुडग़ांव  फरीदाबाद में एक दिन में लगभग २ कुंतल दूध सप्लाई करती थी।  शर्मनाक बात यह है के हमलावरों ने उसके ड्राइवर अर्जुन को छोड़ दिया और पहलू खान और उसके सहयोगी अजमत को बर्बरता से पीटा।  अर्जुन को हिन्दू होने के नाते छोड़ दिया गया। पुलिस ने २४ घंटे तक इन्हे थाने में परेशान करके रखा जिसके फलस्वरूप पहलू खान की मौत ३  अप्रेल को  अस्पताल हो गयी और अजमत अपने जीवन को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है।  

राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे सिंधिया ने इस विषय में अपना मुंह तक नहीं खोला है हालाँकि उनके गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया ने कहा के गौ रक्षको को उन्हें मारना नहीं चाहिए था। उन्होंने कहा के पुलिस जांच कर रही है. इधर एक बड़े पुलिस अधिकारी ने कहा के पहलू खान गौतस्कर था।  सबसे पहले तो ये सारी बाते झूठ साबित हो चुकी हैं और दूसरे यह के कौन व्यक्ति गौतस्कर है और कौन ईमानदार इसके लिए एक व्यस्था बनी हुयी है और इसकी जिम्मेवारी गौरक्षको के स्वयंभू ठेकेदारों के ऊपर नहीं है। किसी को सरे आम सड़क चलते बेरहमी से मार डालना धर्म के नाम पर हिंदुत्व के लोगो के तालिबानीकरण की ओर इशारा करता है। यदि पहलू खान गौ तस्कर था तो पूरे केस में उसके साथी ड्राइवर अर्जुन को क्यों छोड़ दिया गया।  बीजेपी नेताओ और सरकार की तरह मीडिया  भी बिना जांच पड़ताल के बेशर्मी से पहलू खान के लिए गौतस्कर शब्द का इस्तेमाल कर रहा है।  एक बात बहुत जरुरी है और वो इसलिए क्योंकि यदि   सड़क पर अफवाहों के चलते हरेक गुंडा मवाली अगर  सड़को पर सही गलत का निर्णय देने लगे तो  देश में लोकतंत्र को बचा के रखना मुश्किल हो जायेगा।  मुझे ये बात कहने में  कोई संकोच  है के यदि पहलू खान और उनके साथियो ने कानून का कोई उल्लंघन किया है तो उन पर  न्यायिक प्रक्रिया के तहत कार्यवाही हो लेकिन उनके हत्यारे और लुटेरे क्यों अभी तक खुले में घूम रहे हैं ? आखिर पुलिस और प्रशाशन किस बात का इंतज़ार कर रहा है ?

शर्मनाक बात यह है के मृतक के हत्यारो को पकड़ने हेतु न पुलिस ने कोई कार्यवाही की  न ही भारतीय जनता पार्टी के नेताओ ने इस प्रश्न को गंभीरता से लिया क्योंकि संसद में मुख़्तार अब्बास नक़वी ने तो इस घटना के होने तक से इंकार कर दिया।  पुलिस ने पहलू और अजमत के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया है।   गाय के नाम पर डकैती और गुंडागर्दी करने वालो ने उनकी दो गाये और लगभग ७०  हज़ार रुपैये, उनकी गाडी छीन ली और पुलिस ने इस छिनैती के विरद्ध कोई कार्यवाही  नहीं की।  हमारे प्रधानमत्री जी दुनियाभर में आतंक की घटनाओ पर तुरंत ट्वीट करते है लेकिन भारत के अंदर  आतंकवाद पर अपनी चुप्पी साधे हैं जो गौ-रक्षा के नाम पर स्वयंभू संघठनो और संस्थाओ के द्वारा मुसलमानो और दलितों के साथ किया जा रहा है। 

देशभक्ति और देशद्रोह के बीच झूलती बहस में मेवात का जिक्र करना अत्यंत आवश्यक है के आखिर मेवात की स्वाधीनता आंदोलन में क्या भूमिका है।  ऐसा बताया जाता है के पहलू खान का गाँव से ४५० से अधिक लोग आजादी  आंदोलन में शहीद हुए। ऐतिहासिक तथ्य सामने आ रहे हैं के हैं के मेवों के प्रमुख हसन खान मेवाती ने मुग़ल शाशको से मुकाबला करने के लिए राणा सांगा के साथ हाथ मिलाकर अपनी धरती की सुरक्षा की।  १८५७ के पहले स्वाधीनता संग्राम में मेवात के मेवों मुसलमान देश के दूसरे साथियो के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर लड़ रहे थे। सुन्नी मुसलमानो का मेवात सूफी संतो से लेकर मुहर्रम तक मनाता है।  संत चरण दास यहाँ के प्रमुख सूफी संतो में रहे हैं जिनका हिन्दू मुसलमान दोनों में बहुत असर रहा है। कई अन्य सूफी संत जैसे लाल दास, अल्लाह बक्श इत्यादि भी यहाँ प्रसिद्ध रहे हैं।  मेवात की जनता ने अपने सामंती नवाबो को छोड़ देशभक्तो के साथ आज़ादी की लड़ाई को लड़ा था इसलिए उन्हें देशभक्ति का पाठ पढ़ाने वालो को अपना इतिहास देखना होगा के स्वाधीनता आंदोलन में वे और उनके पुरखे क्या कर रहे थे ? दुर्भाग्यवाश जो अंग्रेजो की जी हज़ूरी कर रहे थे वे अब भारतीय राष्ट्रवाद के ठेकेदार बन दूसरो से देशभक्ति का सर्टीफिकेट मांग रहे हैं। 

पहलू खान की अस्सी वर्षीय माँ अंगूरी बेगम आज इन्साफ मांग रही है। पहलू उनका एकमात्र बेटा था और  उनके ८  नाती पोते पोतियो के साथ वो आज दिल्ली में थी।  सुखद ये था के देश भर के किसानो ने पहलू की हत्या को खेती किसानी पर हमला बताया।  भारतीय किसान महासभा , भूमि अधिकार आंदोलन और अन्य कई स्वयंसेवी संघठनो और आंदोलनों के सदस्य दिल्ली में मिले और उन्होंने इस प्रकार के बहशीपन के विरुद्ध आंदोलन करने का ऐलान किया।  सरकार और राजनेताओ ने पहलू खान के परिवार के लिए कुछ नहीं किया लेकिन अखिल भारतीय किसान महासभा ने उनकी माँ को तीन  रुपैया का चेक दिया।  इस अवसर पर घायल अजमत के इलाज़ के लिए भी पचास हज़ार रुपैये का एक चेक अखिल भारतीय किसान महासभा ने दिया।  ये बात  अच्छी लगी के भारत के किसानो को समझ आ रहा है के कुत्ते पालने वाले अचानक गाय माता के नाम पर घृणा क्यों फैला रहे हैं।  ये साफ़ तौर पर किसानो को ख़त्म करने की साजिश है।  आज गौशालाओ पर  कोई सीलिंग कानून लागू नहीं होता और बड़े  बाबाओ और महंतो  पूंजीपतियों के साथ मिलकर साजिश की है ताकि किसान गाय पालना स्वयं ही छोड़ दे।  ऐसी परिस्थितयां पैदा की जा रही हैं।  सरकार बताये के बूढी गाय भेंसो का किसान क्या करे ? अगर वो उसको नहीं दे पाए तो उसको खिलाने के लिए खर्च किसान के पास नहीं है।  गाँव के गौचर, चरागाह तो सरकार और दबंगो ने या तो कब्ज़ा किये हुए हैं और या वो बड़ी कंपनियों को दिए जा रहे हैं।  गाय भैंसो के लिए चारे पर भी कोई छूट नहीं है। सरकार बताये के गाय भैंसो को बचाने और उपयोगी बनाने के लिए वो किसानो की क्या मदद करेगी।  क्या सरकार का एजेंडा दूध की पूरी ठेकदारी अम्बानी और अडानी को देने की तो नहीं है ?

जिस बीफ को लेकर इतना हंगामा है भारत उसका सबसे बड़ा  एक्सपोर्टर है।  सरकार को भारत की बीफ उद्योग पर एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए के इस उद्योग में शामिल मुख्य उद्योगपति कौन हैं. क्या सरकार  तीस हज़ार करोड़ की इस इंडस्ट्री को ऐसे ही चलती रहेगी और क्या बीफ निर्यात से हिन्दुओ और हिन्दू धर्मगुरुओ की कोई भावना आहत नहीं होती ? क्या भावनाये तभी आहत  होती हैं जब  इससे जुड़ा हो ? 

मेवात के मेव किसान अन्य साथियो के साथ मिलकर आंदोलन का मन बना चुके हैं।  वे कह रहे हैं अपने सारे मवेशियों के साथ जिला कलेक्टर के घर पर आंदोलन करेंगे और न्याय मांगेंगे।  जिन लोगो  गाय भेंसो की सेवा में लगी है उन्हें अपराधी बनाकर दोषियों को बचाने की खुलेआम कोशिश भारतीय संविधान की अवमानना है।  चाहे वो झज्जर  के दलितों की हत्या का मामला हो, या ऊना का , अख़लाक़ की हत्या हो पहलू खान की,  इससे शर्मनाक बात क्या होगी के अफवाहों को बाजार गर्म कर निर्दोषो को एक घृणित मानसिकता के तहत मारा गया है और बेहद चालाकी से बहस बदलने के लिए निर्दोषो को तस्कर बना दिया जाता है या पुलिस इस बात की जांच करती है के अख़लाक़ के फ्रिज में क्या था जबकि हत्यारे खुले मैं घूमकर देशभक्ति की 'राजनीती' कर रहेहैं। 

हिन्दुओ और मुसलमानो को साथ जन्मजन्मांतर का है।  दोनों ने एक दूसरे से बहुत कुछ सीखा है।  भला भी और बुरा भी।  दोनों आज़ादी की लड़ाई में साथ भी थे और विभाजन के वक़्त दोनों ने एक दूसरे का कत्लेआम भी किया है।  लेकिन ये भी  हकीकत है के मुसलमानो  की बड़ी तंजीमो ने विभाजन के खिलाफ बात की।  विभाजन एक बहुत बड़ी त्रासदी थी जिसने लाखो परिवारों को बर्बाद किया और उससे यही सीखा जा सकता है के हिन्दू और मुसलमानो का विभाजन असंभव है।  जब कोई बात असंभव है तो फिर क्या होना चाहिए।  दोनों के पास साथ रहकर, एक दूसरे से साथ प्यार मोहब्बत के अलावा रहने के कोई चारा नहीं।  दोनों बड़ी राजनीती का शिकार हुए और अभी भी दोनों धार्मिक धंधेबाज़ों का शिकार होते हैं और धर्म की पट्टी आँख में बांधकर अफवाहों को फ़ैलाने और उन पर विश्वास करने में माहिर हैं। भारत और पाकिस्तान की सरकारे अपने यहाँ पनप रहे इस धार्मिक अल्पसंख़्यको के विरोधी मानसकिकता को रोकने में नकायमब रही हैं।  धर्म का धंधा करेने वाले अफवाहों का बाजार गर्म कर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकते हैं लेकिन जनता को अब सावधान रहने की जरुरत हैं. 

अभी अप्रेल १३ को पाकिस्तान के मरदान शहर में अब्दुल वली खान विश्विद्यालय में पत्रकारिता के एक होनहार छात्र मशाल खान को उसके दोस्तों ने बेरहमी से पीट पीट कर मार डाला। विश्विद्यालय के गेट पर इकठा हुए छात्रों को  लगा के मशाल ने इस्लाम और मोहम्मद साहेब की तौहीन की है जब के मशाल खुद  को एक मानववादी कहता था और वो कहता के आप हमें दूसरे सम्प्रदाय के प्रति घृणा करने वाला न बनाओ।  वो पाकिस्तान  की उन औरतो को सलाम करता हो तमाम मुश्किलों के बावजूद अपने वज़ूद की लड़ाई लड़ रही है। ऐसा व्यक्ति जो इंसान के हको के लिए परेशान हो उससे धर्म के नाम पर धंधे बाज़ तो परेशान होंगे ही।  भारत और पाकिस्तान में ऐसे पाखंडी एक दूसरे के खिलाफ आग उगलकर अपनी राजनीति को मज़बूत करते है  इनके कारण निर्दोष मारे जाते हैं। मशाल की बेरहम हत्या के बाद विश्विद्यालय ने उन्हें ईशनिंदा के आरोप में विश्विद्यालय से निष्काषित कर दिया। ऐसा उन ताकतों के दवाब में जो  पूरी बहस को आरोपियो से हटाकर केस ख़त्म करदेना चाहते हैं। 

हिन्दू  मुसलमान खतरे में नहीं हैं।  खतरा इंसानियत को है क्योंकि धर्म के नाम पर सियासत करने वाले लोग आम जनता के सवालो पर कुछ नहीं बोलेंगे।  दिल्ली के जंतर मंतर पर पिछले  महीने से 
तमिलनाडु की किसान धरना प्रदशन कर रहे हैं लेकिन सरकार को फुर्शत नहीं है।  किसान की हालत ख़राब है और हर दिन कोई न कोई आत्म हत्याएं हो रही हैं लेकिन हम चुप हैं , हमारे सामने सैकड़ो सवाल खड़े हैं जिस पर हमारे हुक्मरानो को सोचना चाहिए लेकिन मंदिर  मस्जिद, हिन्दू मुसलमान की कबड्डी खेलकर वे अपनी राजनीती को चमका रहे हैं। अख़लाक़ के साथ अभी   तक न्याय नहीं  हुआ है और ऐसे कई और घटनाये हो चुकी हैं।  गौ सुरक्षा कानून पूरे देश में लागु हो चूका है और जैसे के गुजरात के कानून से पता चल रहा है अब सजा भी आजीवन कारावास और पांच लाख का जुरमाना यानी किसी के भी बहार निकलने  का कोई मौका नहीं। 

पाकिस्तान में तानाशाह जिआउल हक़ ने ईश निंदा कानून के तहत सजाये मौत का इंतज़ाम कर दिया और आज यही कानून वहा पर अल्प संख्यंकों हिन्दू, ईसाई, समलैंगिक, शिया और अहमदी लोगो के विरुद्ध इस्तेमाल हो रहा है।  अंतरास्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून की  आलोचना हो रही है क्योंकि सरकार की आलोचना करने वालो को ये कानून आसानी से चपेट में ले रहा। है।  सरकार के राजनैतिक विरोधियो और अकलियतों की जमीन और सम्पदा हड़पने  के लिए भी इस कानून के नुस्खे अपनाये जा रहे हैं. ऐसा लगता है  भारत में इस हिन्दू पुनर्जागरण काल के राष्ट्रवादी गौरक्षा के नाम पर पाकिस्तानी ईशनिंदा कानून यहाँ लगाना चाहते है ताकि पाकिस्तान की ही तरह हम भी अपनी अकलियतों को कानून की आड़ में परेशान कर सके।  स्वतंत्र भारत का संविधान बाबा साहेब आंबेडकर ने बनाया जिसमे सभी को उनकी जाति  धर्म से ऊपर हटकर बराबरी का अधिकार मिला है।  आज आवश्यकता इस बात की है हम न केवल अपना संविधान बचाये अपितु भारत को पाकिस्तान होने से भी बचाये क्योंकि  की ताकत उसकी रहन, सहन, भाषायी और धार्मिक विविधिता के कारण ही है।  धर्म  की आड़ में किसी भी व्यक्ति पर हिंसा या प्रताड़ना सीधे सेक्युलर सविधान पर हमला है।  उम्मीद है सरकार, राजनैतिक दल, मीडिया और आम जन अपनी जिममेवारी ठीक से निभाकर समझदारी का परिचय देंगे।  निर्दोष को समय पर न्याय मिल सकेगा तो ये लोकतंत्र मज़बूत होगा और यदि हमले जारी रहे तो स्थित बहुत भयवाह हो सकती है. पूरी दुनिया हमारी और देख रही है और एक भी गलत कदम भारत की अंतरास्ट्रीय साख पर भी बट्टा लगा सकती है इसलिए असामाजिक तत्वों से कठोरता से निपटने का समय आ गया है। 

Monday, 27 March 2017

उत्तर प्रदेश : नए राज की नयी नैतिकताएं




विद्या भूषण रावत 

योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से दिल्ली के मीडिया का पूरा धयान उत्तर प्रदेश की और आ गया है।  मोदी मोदी कहने वाला मीडिया अब जोगी जोगी कर रहा है।  दोनों में बहुत समानताये दिखाई दे रही हैं जैसे मोदी जी ने बचपन में मगरमच्छ पकड़ा था वैसे ही योगी जी ने भी शेरो को दूध पिलाया है वैसे लखनऊ के चिड़ियाघर से खबर ये है के जंगल के राजा को अब चिकन खिलाया जा रहा है।  उसकी हालात भी दयनीय हो गयी है क्योंकि संतो का क्या कहे वो तो शेरो से भी शाकाहारी बनने की उम्मीद कर रहे हैं।  

योगी जी ने शपथ ग्रहण के बाद से अभी तक बिना कैबिनेट की मीटिंग बुलाये लगभग ५० बड़े फैसले लिए हैं जिसमे 'अवैध' बूचड़खाने बंद करवाना, कैलाश  मानसरोवर के लिए सब्सिडी की सीमा पचास हज़ार से बढाकर एक लाख रुपये करना, सचिवालय में पान मसाला, खैनी बंद, सरकारी कार्यालयों में बायोमैट्रिक लगवाना , उत्तर प्रदेश की सड़को को गड्ढा मुक्त बनवाना, नवरात्र और अन्य हिन्दू धर्म के आयोजनो में सम्पूर्ण प्रदेश में २४ घंटे  विद्युत् सप्लाई, एंटी रोमियो 
 दस्ते की स्थापना, भ्रस्टाचार के विरुद्ध सख्ती, प्रशाशन में चुस्ती और लड़कियों के विवाह के लिए आर्थिक अनुदान. वैसे उनके एक मंत्री मोहसिन रजा ने बड़े मुसलमानो से हज सब्सिडी का इस्तेमाल न करने की बात कही है। 

उत्तर प्रदेश एक विशाल प्रदेश है जो अपने आप में यदि एक देश होता तो शायद दुनिया के पांच देशो में गिना जाता।  लगभग २० करोड़ के प्रदेश की खासियत  यहाँ की जातीय , धार्मिक और भौगोलिक विविधता है। प्रदेश में अधिकांश आबादी ग्रामीण इलाको में रहती है और असंगठित क्षेत्र में काम करती है।  अगर पिछले ७० वर्षो में लोगो ने बिना सरकार के सहारे रहे अपनी जिंदगी का गुजर बसर किया है तो ये इस असंगठित क्षेत्र की बदौलत हुआ है जिस पर आज पुंजिपतियो का हमला है जो क्वालिटी के नाम पर पुरे क्षेत्र पर अपना कब्ज़ा जमाना चाहता है।  रेहड़ी वाले, ठेले वाले , खोमचे वाले, सब्जी, फल , दूध, मीट, साइकिल रिपेयर, मोटर, स्कूटर  रिपेयर और मेंटीनेन्स इत्यादि काम करने वाले अधिकांश लोग हासिये के समाज के लोग हैं।  गाँव में भूमिहीन और जातीय पूर्वाग्रहों का शिकार ये लोग शहर की और रोजगार की तलाश में आते हैं. ऐसा नहीं है के इन सड़क किनारे बैठने वालो में कोई क्वालिटी नहीं होती।  मार्किट प्राइस से बहुत सस्ता और अच्छी क्वालिटी यहाँ  मिलती है।  दुनिया भर से आने वाले टूरिस्ट भारत के स्ट्रीट फ़ूड को बहुत सराहते हैं।

लखनऊ शहर के टुंडे के कवाब दुनिया में मशहूर है और जितने लोगो ने खाये बस तारीफ़ ही करते रह गए लेकिन आज वो सूना पड़ा है क्योंकि बीफ नहीं है।  पहले गाय को लेकर संवेदना थी और उसको लोगो ने स्वीकार भी कर लिया लेकिन अब बाकी मीट खाने पर भी सवाल खड़े किये  जा रहे हैं जो बेहद चिंताजनक और खतरनाक है।  क्योंकि गौ माता अभियान से किसान का जितना नुक्सान हुआ है उतना  किसी का नहीं।  वो गाय और भैंस दोनों पालता है लेकिन शहरो को छोड़ दे तो आज व्यवस्था ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है के जानवर पालन घाटे का सौदा है।  गाय भैंस के दूध से उतना पैसा नहीं मिलता जितना उसकी देखभाल  खानपान के लिए चाहिए क्योंकि गौचर और गाँव समाज की अन्य जमीने चरने के लिए रहती थी तो किसान का खर्च चलता था।  उसके ऊपर साल भर में जो गाये या भैंसे बूढी हो जाते उन्हें बेच कर अपना खर्च निकलता।   कोई भी किसान कोई जानवर क्यों पालेगा यदि उसका लाभ नहीं है।  योगी जी के पास बहुत गाये हैं और मठ भी इसलिए उनका कार्य आसान है।  आज भी गौशालाएं धर्म के नाम पर ही चल रही हैं जिनको पूंजीपति खूब चन्दा देते हैं।  इसलिए यदि किसान  गाय नहीं पालेगा तो इस देश में दूध की कमी को कैसे पूरा किया जाएगा ? तो पूंजीपति  धार्मिक प्रयोजनों के जरिये किसानों के संशाधनो और उनकी आय के साधनो को ख़त्म  कर देंगे।  क्या योगी जी के पास कोई रास्ता है के यदि मेरी गाय या भैंस जो दूध नहीं देती या बुजुर्ग हो चली है तो  उसका क्या करें ? मैंजानता हूँ भक्त जान कहेंगे गौशाला को दान कर दो लेकिन किसान को क्या उसकी मेहनत और उसके पालने का मुआवजा नहीं मिलना चाहिए। 
दूसरी बात, यदि गाय और भैंस मरते हैं तो क्या किया जाए।  क्या उनको दफनाया जाए या उनका क्रिया कर्म किया जाए।  यदि क्रिया कर्म करना है तो क्या आने वाले समय में हमारे पास इतनी लकड़िया या बिजली है के हम ये कर सके और यदि दफनाना है तो क्या हमारे पास उसके लिए इतनी जगह है क्योंकि अभी तो ये देश शमशान और कब्रिस्तान के चक्कर में फंसा है लेकिन यदि गाय और भैंस भी हिन्दू और मुसलमान हो गए तो मैं  खुले आम यह कह सकता हूँ के देश की संस्कृति खतरे में है और देश की बायोडायवर्सिटी को भी खतरा पैदा होने वाला है। 

हमें ये समझना पड़ेगा के खान पान लोगो की व्यक्तिगत चॉइस है और ये धर्म से ज्यादा भौगोलिक कारणों से होता है।  दुनिया के सबसे बड़े देश नेपाल में दशहरा और दिवाली में चले जाईये तो आपको काठमांडू के प्रमुख बाज़ारो से नाक में खुशबु आनी  शुरू हो जाएगी। नेपाल, श्री लंका , थाईलैंड, म्यांमार आदि देशो में बीफ आसानी से उपलब्ध है।  मैंने पाकिस्तान, बांग्लादेश और मुस्लिम या पच्छिम देशो का नाम नहीं लिया जिनके बारे में ये आसानी से प्रचलित है लेकिन हिन्दू और बुद्धिस्ट देशो में भी कोई रोक टोक नहीं।  क्या बंगाल में जाकर भाजपा और हिंदुत्व के लोग मच्छी खाने को बंद कर देंगे ? क्या केरल में बीफ रोक सकते हैं।  गोवा और नार्थईस्ट में भाजपा ने खुद कहा के ऐसा करना मुश्किल है। 

लोगो की भावनाओ का सम्मान होना चाहिए लेकिन वो तब जब को जबरदस्ती कर रहा हो।  लोकतंत्र में बुनियादी मापदंडो को ध्यान में रखकर ही बाते की जाती है।  मीट व्यापार में अधिकांश तह दलित और पसमांदा मुसलमान कार्य कर रहे हैं। इतनी बड़ी इंडस्ट्री पे चोट कर क्या हम इन लोगो के रोजगार पर चोट तो नहीं कर रहे।  जस्टिस राजिंदर संचर ने एक बार कहा के बीफ के सबसे ज्यादा एक्सपोर्टर्स तो सवर्ण हिन्दू हैं।  हम तो केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार से ये अनुरोध करते हैं के वे बीफ एक्सपोर्ट पर एक श्वेत पत्र जारी करे और देश को बताये के पिछले तीन वर्षो में भारत दुनिया का सबसे बड़ा बीफ निर्यातक देश कैसे बना और कौन कंपनिया इसमें सबसे आगे हैं और उनके मालिक कौन हैं ? मुझे ये कहने  नहीं के मैं ऐसे मुसलमानो को जनता हूँ जो शाकाहारी हैं हिन्दू जो बीफखाते हैं।  पुनः खान पान व्यक्तिगत आस्थाओ का प्रश्न है और राज्य इससे दूर रहे तो अच्छा।  हाँ, राज्य का कर्त्तव्य  के लोगो को सही वस्तु मिले. 

योगी सरकार का दूसरा बड़ा कदम है 'एंटी रोमियो स्क्वाड' की स्थापना. उत्तर प्रदेश पुलिस तो पूरा काम धाम छोड़ इस ' महान ' यज्ञ में शामिल हो गयी।  खबरे आने लगी के कोई भी दो युवा जो साथ दिखाई दिए उनको पीटा जाने लगा. महिलाओ और नाव युवतियों का तो हाल बुरा हो गया।  पुलिस बलो में कार्य करने वाली अधिकांश महिलाये असल में पुरुषमानसिक्ता का शिकार होती है और उनसे महिलाओ के प्रति सहानुभूति की उम्मीद करना कुछ ज्यादा होगा।  लेकिन क्या ये दो व्यक्तियों के साथ रहने, दोस्त बनाने और साथ घूमने के अधिकारों पे अतिक्रमण तो नहीं है ? सबसे पाहिले बात यह के एक गंभीर प्रश्न को हलके तरीके से लेने के नतीजे ये ही होंगे।  हम जानते हैं के उत्तर प्रदेश में लड़कियों से छेड़ छाड़ की घटनाएं बहुत होती है और उसके लिए सरकार को सख्त कदम उठाने ही चाहिए लेकिन इस की आड़ में यदि दोस्तों के आपस में मिलने , उनके घूमने फिरने पर यदि प्रतिबन्ध लगता है तो ये बहुत भयावह होगा और हमारे  संविधान की मर्यादाओ के खिलाफ होगा।  टीवी और अखबारों की रिपोर्ट बताती हैं के कैसे पुलिस ने युवक युवतियों के  बदतमीजी की है।  ऐसा लग रहा है के पलिस और प्रशाशन को जनता का मालिक बनाया जा रहा है और  नव् युवा घबराये हैं। पुलिस अधिकारी 'नैतिकता' का ज्ञान बाँट रहे हैं।  उम्मीद है कि  यह  गीता प्रेस गोरखपुर की नैतिकता न हो जो महिलाओ को घर की चारदीवारियों में रहने के लिए प्रेरित करती है और जिसके लिए 'पति' देवता होता है जिसकी मर्जी के बिना कुछ संभव नहीं है। 

हम जानते हैं खाप के चाहने वाले, जातीय पंचायतो के यकीं करने वाले, लव जिहाद का जुमला ढूंढने वाले सभी इस वक़्त ऐसे कानूनों की आड़ में लोगो को अपनी  जातियो,धर्मो और क्षेत्रो के अंदर की घुटन भरी दम घोटू जिंदगी में ही कैद करदेना चाहते हैं। जातियो की पवित्रता का सिद्धांत यही से निकालता है के हम दूसरे से श्रेष्ठ हैं और श्रेष्ठता हमारी ही जातियो और धर्मो में है।  राहुल संरकृत्यायन जी ने कहा था का भारत की एकता और ताकत धर्मो की मज़बूती से नहीं अपितु धर्मो की चिताओ पे होगी। नौजवान लड़के लड़कियों को आपस में मिलने से रोकना, प्यार का इजहार करने से रोकना , अपनी अपनी खाप पंचायतो को मज़बूत करने के लिए किया जा रहा है।  सदियो से ये देश जातीय पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों का शिकार रहा है और यही इस समाज के अंदर गैर बराबरी का कारण है जिसको ख़त्म करने के लिए बाबा साहेब आंबेडकर को कहना पड़ा के जातियो का पूर्णतया उन्मूलन बहुत जरुरी है लेकिन अफ़सोस हिंदुत्व के प्रवक्ता इन बातो पर चुप्पी साधते हैं।  मुसलमानो के विरोध करदेने मात्रा से हिन्दू धर्म की ताकत नहीं बन सकती वो वैसे है जैसे मुसलमानो  की ताकत हिन्दुओ के विरोध से नहीं अपितु अपने अपने समाजो में आत्मावलोकन से होगी। 

आज के युग में 'शुद्धिकरण' जैसे शब्दो का प्रयोग अनुचित और अलोकतांत्रिक होगा लेकिन मुख्यमंत्री आवास में प्रवेश से पहले उसका 'शुद्धिकरण' सुनकर सहज ही कमलापति त्रिपाठी की याद आयी जिन्होंने ने गांधीजी की मूर्ति को गंगाजल धुलवाया जिसका अनावरण बाबु जगजीवन राम ने किया लेकिन कमलापति कहाँ हैं और बाबूजी कहाँ ये सब जानते हैं।  वैसे भी छुआछूत भारतीय संविधान के अनुसार कानूनी है।  वैसे घर में एक व्यक्ति के जाने और दूसरे के आने पर सफाई व्यवस्था  से कोई शिकायत नहीं और हर व्यक्ति अपने अनुसार अपने घर तैयार करता है लेकिन इसके लिए शुद्धिकरण शब्द का प्रयोग नहीं होता।  

अभी पाकिस्तान से खबर आ रही है के एक ब्लॉगर अयाज  निज़ामी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।  उनपर आरोप है के उन्होंने इस्लाम की तौहीन की है।  पाकिस्तान में ईश-निंदा कानून है जिसके मुताबिक इस्लाम और उससे सम्बंधित किसी बात पर सवाल नहीं हो सकता।  निज़ामी एक सेक्युलर एक्टिविस्ट हैं और पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरपंथी उन्हें सजाये मौत की मांग कर रहे हैं। हम जब पाकिस्तान में ऐसी घटनाओ  को देखते हैं तो हमें भारत में रहने पर गर्व होता है।  क्या धर्मो की सार्थक आलोचना नहीं हो सकती।  क्या हम अपने समाज में धर्मो के कारण हो रहे दुष्प्रभाव और कुरीतियो के खिलाफ नहीं बोल सकते।  लेकिन आज हम जिस भारत में रहे रहे हैं उसकी राजनीती का पाकिस्तानीकरण हो गया है जहाँ ताकतवर, पैसेवाले और धर्म के नाम पर राजनीती करने वाले लोगो की संख्या बढ़ गयी है जो किसी भी प्रकार की आलोचना सुनने को तैयार नहीं है। हमें अपने बच्चो में वैज्ञानिक चिंतन, पर्यावरण के प्रति जागरूकता और एक दूसरे के प्रति संवेदनशीलता पैदा करनी चाहिए और हमारे स्कूल और कालेजो में ऐसी व्यस्था होनी चाहिए ताकि बच्चे जागरूक नागरिक बन सके। 

सरकारों का काम है है जनता की सुरक्षा और उनको बेहतर जीवन देने हेतु प्रयास।  उनकी प्रमुख नैतिकता होती है कानून की रक्षा और संविधान का शासन. धार्मिक नैतिकताएं सबकी अलग अलग होती है लेकिन वे क़ानूनी तौर पर लागु नहीं की जा सकती। व्यक्तिगत पसंद नापसंद , खान पान, रहन सहन, ये सभी वैयक्तिक नैतिकताओ में आते हैं और सरकार यहाँ तभी हस्तक्षेप करे जब उससे दूसरे की स्वतंत्रता का हनन हो या कानून का उलंघन हो। प्रदेश में रहने वाली यदि १५-२०% आबादी ये महसूस करे के उसको जानबूझकर प्रताड़ित किया जा रहा है या उसके आर्थिक संशाधनो को विशेष अभियान के तहत ख़त्म करने की साजिश की जा रही है तो फिर शाशन को सोचना पड़ेगा. ये देश के विकास, स्थिरता, स्थायित्व और एकता के लिए खतरा हो सकता  है।  इस देश के कानून के अनुसार रहने वाले हर नागिरक के सुरक्षा सरकार का फ़र्ज़ है और इसके लिए जरुरी है के बड़बोले धम्कीबाज़ नेताओ और छुटभैयों पर कड़ी नकेल कसी जाए ताकि प्रदेश में सौहार्द बना रह सके।