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Sunday, 13 May 2018

जातीय दंभ छोड़े बिना नहीं बढ़ सकता आगे समाज





विद्या भूषण रावत


सहारनपुर शहर में फिर से तनाव व्याप्त है. पिछले वर्ष शब्बिरपुर के में ठाकुरों के जातीय उत्पीडन के बाद हुए भीम आर्मी के विद्रोह से सहारनपुर शहर को दलितों की ताकत का अहसाश हुआ था. हालाँकि ऐसा नहीं है के उन्हें इसका पता नहीं था लेकिन जहाँ दलितों की राजनितिक शक्ति में उत्तर प्रदेश में पिछले २० वर्षो से लगातार इजाफा होता जा रहा है वही अधिकांश लोग ये भी मानते थे के राजनितिक सत्ता को तो शीर्ष नेतृत्व को विश्वास में लेकर या राजनितिक बैलेंसिंग को करने के लिए, आसानी से मैनिपुलेट किया जा सकता है लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर तो दलितों के विद्रोह का सीधे सीधे उदहारण फिलहाल उत्तर प्रदेश में नहीं था. इसका कारण यह भी था के बसपा की राजनीती के कारण दलितों के बहुत बड़े तबका का राजनीतिकरण हुआ और उसकी संवैधानिक मूल्यों में आशा बढ़ी और उसने हिंसा के रास्ते को कभी नहीं अपनाया लेकिन पिछले कुछ वर्षो में जब दलित में नए युवा अपनी बात रख रहे है, अपनी योग्यता का परिचय दे रहे है और इसलिए अब अपने अपमान को सहने के लिए तैयार नहीं है,

सहारनपुर में भीम आर्मी के प्रदर्शन से उत्तर प्रदेश में सत्ताधारियो और विपक्ष के नेताओं की राजनैतिक ‘असुरक्षा’ को बढ़ा दिया है क्योंकि जहाँ पर उन्हें अपनी परिपक्वता का परिचय देना चाहिए था उसका जवाब वे नए आरोपों और सधी  चुप्पी से दे रहे है जो बेहद दुखद है. इस सवाल के विभिन्न पक्षों को हम बारी बारी से विश्लेषित करने की कोशिश करेंगे.

सबसे पहले तो उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को हिसाब देना होगा जिसने सहारनपुर में शब्बिरपुर के लोगो को न्याय देने के बजाय धमकाने का काम किया और दलितों के लड़ रहे लोगो के उपर ही ऍफ़ आई आर कर डाली. भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद अभी भी जेल में हैं और इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो मामलो में उन्हें जमानत दिए जाने के बावजूद भी प्रदेश सरकार ने उन पर रास्ट्रीय सुरक्षा कानून की विभिन्न धाराओं में मुक़दमे ठोके है और उन्हें रिहा नहीं होने दिया. उनके अन्य साथी और भीम आर्मी के वर्तमान अध्यक्ष कमल वालिया भी जेल में हैं और दो दिन पूर्व ही उनके छोटे भाई सचिन वालिया की भी उनके घर के सामने गोली मार कर हत्या कर दी गयी. शब्बिरपुर के दलितों ने महाराणाप्रताप जयंती पर ठाकुरों के जलूस को निकालने के विरुद्ध प्रशासन से अनुमति मांगी थी लेकिन प्रशासन ने जानते हुए भी ऐसा किया और एक निर्दोष को उसके घर के सामने गोली मार दी गयी. प्रशासन का कहना है के मामला संदिग्थ है लेकिन प्रश्न इस बात का है के जिस तरीके के विडियो और सचिन की मौत पर अपने को ठाकुर कहने वालो ने विडियो बनाये है वे शर्मनाक है.

पिछले कुछ वर्षो में जब से भाजपा का हिंदुत्व का अजेंडा चला है उसका सबसे अधिक लाभ चाहे ठाकुर युवाओं को मिला हो या नहीं लेकिन उनके नेताओं की तो मानो चांदी हो गयी. उत्तर प्रदेश के अन्दर २०१४ के ‘देशभक्ति’ के अभियान ने ब्राह्मण ठाकुर नेताओं को पुनर्जीवित किया. मुजफ्फरनगर के परिक्षण से ठाकुरों ने इस क्षेत्र में जाटो और गुजरो की राजनीती को भी किनारे कर दिया और शायद उनके नेताओं को ये लग रहा है के आगे भी इसी प्रकार की ध्रुवीकरण की राजनीती करेंगे तो वो सत्ता की और ले जायेगी लेकिन आज के इस राजनैतिक युग में जब दूसरी जातीया भी अपने अधिकारों के प्रति सतर्क है तो वे भी देर सवेर सवाल करेंगी और अपनी हिस्सेदारी मांगेगी. लेकिन कुछ समय से पूरे देश में खासकर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि प्रदेशो में राजपूतो के युवाओं का अपनी ‘अस्मिताओ’ को लेकर प्रदर्शन दिखाई दिया. राजस्थान में महारानी पद्मावती को लेकर उन्होंने खूब तोड़फोड़ की और कुछ लोगो ने ये माना भी था के व्यावसायिक लाभ के लिए अक्सर बम्बई के निर्माता निर्देशक ऐसा खेल खेलते है लेकिन उन्नाव के बलात्कार के आरोपित विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को लेकर जैसे उनकी बिरादरी ने प्रदर्शन किया वो शर्मनाक था. इसलिए क्योंकि जो प्रताड़ित महिला थी वह भी राजपूत जाति की बताई जा रही थी तो फिर उसका सम्मान कहाँ है. क्यों नहीं राजपूत युवाओं का खून उस महिला की इज्जत के खौला जिसको आरोपित विधायक ने अपनी दबंगई के चलते तार तार किया. अब तो सी बी आई ने भी स्वीकारा है के विधायक ने महिला के साथ बलात्कार किया लेकिन उत्तर प्रदेश के सरकार या भारत के केंद्रीय मंत्री अथवा उनके संस्कारी समर्थको ने बजाये इसके के मंत्री ओर नेता से सवाल करें, उलटे उनके समर्थन में आना शुरू कर दिया.

राजपूत नेताओं के ये समर्थक आज सड़को पर उतर कर लठैती कर रहे है, भद्दी भद्दी गालिया दे रहे है और जय राजपुताना या भारत माता की जय के साथ अपनी मूंछो को मरोड़ रहे है. कोई भी प्रश्न पर राजपूत नेता अपने समाज की आन मान मर्यादा के प्रश्न खडा कर दे रहे है लेकिन ये प्रश्न भी समझ में आना चाहिए के आखिर राजपूतो के आर्थिक हालत कैसे हैं ? क्या किसी नेता ने सवाल किया के उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है, उनके बच्चे नौकरियों में है न नहीं, खेती के क्या हाल है आदि आदि. आज़ादी के बाद से ही राजपूतो को बड़े राजाओं और अपनी जाति पर गौरव करने के अलावा कुछ नहीं सिखाया. ज्यादातर जमीन जमींदारी उन्मूलन के समय चली गयी. बचे खुचे जमींदार पार्टियों के नेता बन गए. राजाओं की जमीनों पर तो कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन बाकि गरीबो के हालात ख़राब होते चले गए. नौकरी करने को तौहीन समझा गया इसलिए राजपूतो का भारत सरकार की नौकरियों में प्रतिशत बहुत कम है. अयोध्या के राम मंदिर आन्दोलन में में इतनी बड़ी संख्या में राजपूतो का संप्रदायीकरण नहीं हुआ जो आज है. बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश में ऐसे राजपूत नेता थे जो हमेशा से सामाजिक न्याय और समाजवादी आन्दोलनों से जुड़े रहे. ये तो नहीं कहा जा सकता के सबने जाति छोड़ दी लेकिन ये जरुर था के सभी आग उगलने वाले और गाली गलौज की राजनीती वाले नहीं थे. उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर जैसे लोग भी थी जिनकी भाषा और दोस्ती दबंगई वाले लोगो से थी लेकिन राजनीती में उन्होंने संवेदनशीलता से ही बात की. भाजपा में भैरों सिंह शेखावत, जसवंत सिंह जैसे नेता थे और उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह जो वर्तमान में ठाकुरों के नाम पर नेतागिरी कर रहे लोगो से न केवल कद में अपितु व्यवहार और विचार में भी बहुत बड़े थे.
सामाजिक न्याय की राजनीती में विश्वनाथ प्रताप सिंह का नाम बहुत अदब से लिया जाता है. अपने छोटे से कार्यकाल में जिस ईमानदारी के साथ उन्होंने सामाजिक न्याय का प्रश्न राजनीती की मुख्यधारा बना दिया वो इतिहास में मील का पत्थर है. हालाँकि मंडल कमीशन की रिपोर्ट को स्वीकार करने के बाद उनकी जाति और अन्य सवर्णों ने उन्हें सिर्फ गालिया ही दी लेकिन इसके बावजूद जब भी भारत के बहुजन समाज के हितो का प्रश्न आएगा, विश्वनाथ प्रताप सिंह की राजीनीतिक क़ुरबानी को भी याद किया जाएगा. मंडल दो को लागू करवाने में कांग्रेस सरकार में अर्जुन सिंह की भूमिका को भी हमेशा याद किया जाएगा. केंद्रीय मानव संशाधन विकास मंत्री के तौर पर शिक्षा को साम्प्रदायिकता से मुक्त करने के उनके प्रयास भी सराहनीय रहे है. मध्य प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह चाहे मीडिया में कितना ही बदनाम होते रहे हों लेकिन अपने मुख्यमंत्रित्व काल में उन्होंने मध्य प्रदेश में डाइवर्सिटी के अजेंडा को लागू करने की कोशिश की. कांग्रेस पार्टी के अन्दर सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ खुलकर बोलने वालो में दिग्विजय सिंह प्रमुख रहे है. बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख नेता रघुवंश प्रसाद सिंह भी सामाजिक न्याय और समाजवादी आन्दोलन के प्रमुख हिस्सा रहे है. इनमे से किसी भी नेता ने खुले तौर पर अपने जातीय वर्चस्व की बात नहीं कही. चुनावो में अपने क्षेत्रो में जरुर जातिगत खेल होते रहे हों लेकिन न तो गाली गलोज की भाषा और न ही अपने मूल समाजवादी सेक्युलर चरित्र को इन सभी लोगो ने नहीं छोड़ा. लेकिन २०१४ के चुनावो के बाद से ही  भाजपा ने राजपूतो में उस तबके को प्रश्रय दिया जो अपनी जातीय अस्मिता के अलावा और कुछ नहीं देखे. योगी आदित्यनाथ, संगीत सोम और उन जैसे आग उगलने वाले ठाकुर नेताओं को आगे करके भाजपा ने दरअसल ब्राह्मणवाद का बड़ा सुरक्षा कवच ढूँढा क्योंकि आज उत्तर प्रदेश में बाकी जातिया ठाकुरों की इस दबंगई के खिलाफ कड़ी होंगी.

चुनावो में वोट के लिए राजपूतो के अन्दर छद्म राष्ट्रवाद और फर्जी बड़प्पन की बात कर उनके असली सवालो को गौण कर दिया गया है . सवाल ये है के आज के २१वे सदी में बड़ी कौम कौन मानी जायेगी ? उसका उत्तर बहुत सिंपल है . कोई कौम इस सन्दर्भ में बड़ी कही जायेगी के उसका शिक्षा, स्वस्थ्य, विज्ञानं, कानून, राजनीती, सिनेमा, खेल और  साहित्य में क्या योगदान है. वंशवादी मनुवादी राजशाही के चलते अपनी मूछो पर ताव् रखने वाले अपनी कौम का सर्वे कराकर देखे के उसकी हालत क्या है. उसके कितने अधिकारी है, कितने जज है, कितने पत्रकार है और फिर अपने पे गर्व करे . इन सभी क्षेत्रो में राजपूत बहुत पीछे है और उनके युवा अपने बदलाव के लिए कोई आन्दोलन भी करने को तैयार नहीं है. भ्रष्ट नेता इन युवाओं को कोई भी नया भविष्य नहीं दे सकते है इसलिए उन्हें संघ परिवार का सिपाही बनाकर इस्तेमाल किया जा रहा है जिसके बहुत लाभ नहीं होने वाले. आज जब युवा नए क्षितिज की और जा रहे है, राजपूत युवा केवल नेताओं के लठैत की भूमिका निभाएंगे तो कही के नहीं रहेंगे.

राजा महांराजाओ, तिलिस्मो, मिथ आदि में गर्व करना तो बहुत आसान है क्योंकि जो लोग इनके सहारे ही हमें जीने के तरीके बता रहे है वे जानते है के अगर समाज का कोई ‘महान’ राजा नहीं भी है तो ‘खबर’ और ‘इतिहास’ बनाने की व्हात्सप फैक्ट्री में वे इसे आसानी से तैयार कर सकते है जिससे वो युवा जिसे अपने रोजगार और साधनों के लिए रोजगार मांगना चाहिए था वो हिंदुत्व, जय श्री राम, जय राजपुताना और ऐसे ही नारे लगाता फिरता है.

करीब चार वर्ष पहले मै बेहमई गाव गया था. वहा मै पहले भी गया था क्योंकि मै फूलन देवी के गाँव शेखुपुरा, कालपी भी गया था. बेह्मही ठाकुरों का वह गाँव है जहाँ ऐसा बताया जाता है के डकेतो ने जो ठाकुर थे ,फूलन का अपहरण करके यहाँ रखा था और फिर उनके साथ बलात्कार किया गया था और बताया जाता है के गाँव के एक भी व्यक्ति ने उन्हें बचाने की कोशिश नहीं की जिसके फलस्वरूप ही फूलन बहुत आक्रोशित हुई थ  और फिर यही १४  फरवरी १९८१ में उन्होंने और उनके साथियो ने अपने साथ हुए अत्याचार का बदला लेते हुए २० राजपूतो की हत्या कर दी थी.  देश भर में इन हत्याओं को लेकर बेहद शोर हुआ था. यहाँ की २० विधवाओं को लेकर अखबारों में कई कहानिया लिखी गयी लेकिन एक महिला के साथ बातकर मुझे इस समाज की दकियानूसी परम्परा पर बोलने की इच्छा हुई .

१४  फ़रवरी के हत्याकांड में लाल सिंह नामक युवक की मौत भी हुई थी जिसके उम्र करीब १२-१३ वर्ष की रही होगी उसकी सगाई पास के गाँव के मुन्नी से हुए थी जिसकी उम्र ९ वर्ष की थी. लाल सिंह की मौत के बाद, मुन्नी के भाइयो ने अपनी बहिन को विधवा बनाकर बेहमई गाँव भेजा. इतने वर्षो के बाद मुन्नी को देखकर मुझे इस समाज की दकियानुसी परम्परा पर इतना क्षोभ हुआ के व्यक्त नहीं कर सकता. बेहमई के आस पास के ८४ गाँव ठाकुरों के है और शादिया इन गाँवों में आपस में होती है. किसी ने विद्रोह किया तो उसे सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ेगा. मुन्नी अपनी पूरी उम्र विधवा बन कर रही. क्या करे ऐसे भाइयो का जिन्हें रीती रिवाज ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है लेकिन अपनी बहिन की ख़ुशी नहीं.

राजपूत समाज में अभी भी महिलाओं की स्थिति बहुत ख़राब है. जो भी समाज रिजिड होगा और केवल पुरानी परम्पराओं में ही अपने शान समझता होगा तो वह औरतो की स्थिति बहुत ख़राब होगी. शायद यही कारण है के उन्नाव के विधायक ने जिस राजपूत लड़की के साथ बलात्कार किया उस लड़की के समर्थन में एक भी राजपूत महासभा या उनका नेता खड़ा नहीं हुआ. इससे अधिक शर्मनाक बात कुछ नहीं हो सकती.

तलवार और लम्बे टीका लगाकर या गाली गलोज कर आप समुदाय के अंदरूनी हालातो को छुपा नहीं सकते हो. राजपूतो को चाहिए के ब्राह्मण, बनिया, कायस्थ, भूमिहार आदि से अपनी तुलना करें और देखे के विकास के इंडेक्स में वे कहाँ है.संघ के  चालाक  ‘इतिहासकार’ उनके बच्चो का ध्यान बटाने के लिए दलितों और पिछडो के आरक्षण को इसके लिए दोषी ठहरा देंगे लेकिन इससे बड़ा झूठ कुछ नहीं हो सकता. आज राजपूतो की पुरानी शान का मोहरा बनाकर संघ परिवार में उनके पिछलग्गू नेता मात्र ब्राह्मणवाद की सेवा में समर्पित है और समाज के ज्वलंत प्रश्नों का उन्हें पता भी नहीं है. किसी भी समाज के नायक वो होते है जिन्होंने समाज में गरीब से गरीब तबके को बराबरी पर लाने के लिए संघर्ष किया हो या समाज बदलाव में कोई योगदान किया हो. इतिहास से हम सबक सीख सकते है उसमे रहते नहीं है. याद रहे के जितने भी राजा महारजा थे वे अपनी लड़ाई लड़ रहे थे और अपने हितो के अनुसार ही मुगलों के दोस्त और दुश्मन बने. खानदान में एक उनके साथ रहा तो दूसरे मुगलो के साथ खड़ा रहा और सबके अपने हित थे इसलिए उस दौर के राजाओं के आपसी खींचतान को आप वर्त्तमान परिपेक्ष्य में हिन्दू मुसलमान की लड़ाई में बदलकर अपना राजनैतिक एजेंडा तो चला लोगे लेकिन ये बहुत समय तक चलने वाला नहीं है. जैसे अपना इतिहास आप बना रहे है वैसे ही और भी जातिया अपने अपने नायक गढ़ रही है और इन सबसे केवल कुछ लोगो का अजेंडा काम कर रहा है जिन्हें हम पुरोहितवादी पूंजीवादी शक्तिया कह सकते है क्योंकि इसकी आड़ में उन्होंने अपने परम्परागत और पुश्तैनी धंधो को मज़बूत कर दिया है. दलितों ने तो व्यवस्था से सवाल पूछना शुरू किया और ब्राह्मणवादी परम्पराओं को नकार कर अपना रास्ता अपना लिया. पिछड़े भी अब सीख रहे है और अपनी राजनीती स्वयं कर रहे है, तो आप क्यों नहीं इतिहास और मिथ को चुनौती देते. क्यों आज परशुराम जयंती मनाई जा रही है जिसने क्षत्रियो की २१ पीढियों को समूल नष्ट कर देने की बात कही ? आज सड़ी गली परम्पराओं को महिमामंडन किया जा रहा है क्योंकि बदलाव से डर लग रहा है.

नेताओं का क्या वे तो ऐसे खेल खेलेंगे. नौकरिया ख़त्म है लेकिन अपने समाज के हाथ में एक छुन्छूना पकड़ा देंगे के सरकारी नौकरिया देंगे और फिर वोट की खातिर समाज को सडको पे उतार देंगे. आज के बदलते युग में ये घिसी पिटी बाते हो चुकी है जिससे समाज का भला होने वाला नहीं. समय है के युवा लोग अपने में बदलाव लायें और सामाजिक न्याय की शक्तियों के साथ जुड़े. जनतंत्र की सफलता विभिन्न जातियों, धर्मो आदि में केवल राजनैतिक सहयोग की नहीं अपितु सामाजिक गठबंधन में भी निहित है. पुराने राजे महाराजे आधारित वंशीय और जातीय दंभ समुदाय के नेताओं को भी कुछ समय तक ही ताकत देगा, लम्बे दौर में ऐसे नेता बेकाम रहेंगे और समाज ने अगर अभी से ये दंभ छोड़ कर अन्य मुख्य प्रश्नों में दूसरे लोगो के साथ राफ्ता कायम नहीं किया तो एक समय आएगा जब सारी दूसरी जातीया आपके खिलाफ खड़ी दिखाई देंगी और वो सबसे भयावह स्थिति होगी. सत्ताधारियो की जातीय उदंडता के विरुद्ध उत्तर प्रदेश की जनता ने हमेशा विद्रोह किया है, इसलिए भलाई इसी में है के मानवीय मूल्यों के लेकर समाज में सामंजस्य बनाया जाए और स्थानीय स्तर पर राजनैतिक गठबंधन बने लेकिन वो किसी समुदाय के विरुद्ध न हो. राजनैतिक लड़ाई लड़ते वक़्त आपसी रिश्ते इतने न ख़त्म कर दो के मिलने में दिक्कत हो. आप अपने पडोसी को नहीं बदल सकते और उनके साथ अच्छे रिश्ते बनाकर ही आप सुरक्षित रह सकते है. ये सोच कर की अपनी ताकत दिखाकर पडोसी को झुकाकर या भागकर आप चैन से रह पायेंगे तो ये ग़लतफ़हमी में कोई समाज न रहे. इस देश में साथ रहने और एक जुट रहने की एक ही गारंटी है के संविधानिक मूल्यों का ईमानदारी से पालन हो और ईमानदारी बिना भागीदारी के नहीं आ सकती लेकिन कोई ये सोचे के एक समाज को समाप्त कर या अपमानित कर उनकी जिंदगी आसान हो जायेगी तो उस पर कोई भी समझदार व्यक्ति हंस ही सकता है.

सहारनपुर के घटनाक्रम ने जहाँ सत्ताधारी दल और सरकार की असफलता को उजागर किया है वही इसने सामाजिक न्याय और अम्बेडकरवाद का झंडा उठाने वालो को भी सोचने पर मजबूर किया है. आखिर ये पार्टिया इस प्रश्न पर सहारनपुर के दलितों के साथ क्यों खड़ी नहीं दिखाई देती. बहुत से लोग सोशल मीडिया पर कह रहे हैं के योगी आदित्यनाथ साल के आखिर में चंद्रशेखर आज़ाद को रिहा कर देंगे ताकि वह बहिनजी के खिलाफ चुनाव लडे या बसपा को नुक्सान पहुचाये. ये बहुत ही निराशाजनक बात है क्योंकि चुनाव लड़ने की बात तो बाद में आएगी आखिर चंद्रशेखर के खिलाफ जो आरोप लगे है वे तो पूरे फर्जी है और उसके साथ अन्याय हुआ है. भीम आर्मी के लोग जेल में भेजे जा रहे है इसलिए जो भी राजनितिक पार्टियाँ है उन्हें समझदारी दिखाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर दवाब डालना चाहिए के वे सारे मुकदमे वापस ले. 

समाजवादी पार्टी ओर कांग्रेस भी इस मामले में चुप रहे है शायद इसलिए के भाजपा का चालाकी का दांव में नहीं फंसे. लेकिन ये राजनितिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं की असफलता है यदि हम ऐसे प्रश्नों पर इमानदार बहस नहीं कर सकते. दलितों पर हो रहे अत्याचार का प्रश्न मात्र दलितों का सवाल नहीं है, ये मात्र राजन्तैतिक हिसाब किताब का सवाल भी नहीं है अपितु मानवाधिकारों और संविधान की सर्वोच्चता का प्रश्न भी है क्या इस देश में कानून का शासन चलेगा या मनुवाद चलेगा.

भाजपा और संघ परिवार ने इस देश के ताने बाने को और नकारात्मक किया है और राजनितिक दलों पर बहुत दवाब डाला है. उनकी लगातार कोशिश रही है एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ खड़ा करके विभाजन का राजनैतिक फायदा उठाया जाए. उनके पास ऐसे दबंगों के फौज है चाहे वह बिकाऊ मीडिया हो या तथाकथित बुद्धिजीवी. हम जानते है के दूसरी पार्टिया उनके इस विभाजनकारी सवालो का जवाब देने में असफल रहे है. सहारनपुर में पार्टियों को सवर्णों के वोट का खतरा है लेकिन हम उनसे ये कहना चाहते है अपनी पार्टियों के सभी जातियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को बैठाकर इन प्रश्नों पर चर्चा कीजिये. अगर भाजपा तोडती है तो आप जोडिये और सभी पक्षों को सामाजिक तौर पर साथ ला कर बात कीजिये लेकिन इसकी एक ही शर्त होगी के छुआछूत और जातीय सर्वोच्चता में यकीं करने वालो के साथ तो कोई बात नहीं हो सकती.


सहारनपुर के घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र में दबंगों की बढ़ती ताकत की कहानी भी है. ऐसी घटनाएं जानबूझकर फैलाकर पूरे प्रदेश में अराजक दबंको को राजनीती में घुसाने की तैय्यारी है और इसका दूसरा इलाज़ केवल सामाजिक न्याय की शक्तियों को आपस में साथ रहकर, अपनी लड़ाई मिलजुलकर लड़ने में ही है. विभाजनकारी ताकतों को आंबेडकर, फुले, पेरियार के सांस्कृतिक परिवर्तनवादी ताकते ही शिकस्त दे सकती है. उत्तर प्रदेश में राजनैतिक तौर पर तो इन ताकतों ने अपनी मौजूदगी का एहसास करवाया है लेकिन सांस्कृतिक और सामाजिक परिवर्तन में जब ऐसी शक्तिया सभी दबी कुचली जातियों को एक कर देंगी तो ब्राह्मणवादी बर्चास्व्वादी ताकते अपने आप ही नेस्तनाबूद हो जाएँगी और तभी उनसे प्रताड़ित सभी लोगो सामाजिक और सांस्कृतिक लोकतंत्र की खुली हवा में सांस ले पायेंगे. लड़ाई बहुत लम्बी है लेकिन असंभव नहीं है, केवल आवश्यकता बौधिक ईमानदारी की है. सहारनपुर में दलितों पर हुए अपराधो की जाँच हो और मुझे ये बात कहते हुए कोई गलत नहीं लगता के भीम सेना के सभी कार्यकर्ताओं को रिहा किया जाए और उनपर ठोके गए फर्जी मुकदमे सब वापस लिए जाएँ और ये बात की मांग करने में अगर राजनैतिक दलों को झिझक हो रही है तो फिर इससे बड़ी शर्मनाक बात कोई नहीं हो सकती.






Thursday, 11 May 2017

राजनीती की बिसात पर चढ़ी सहारनपुर की शांति



विद्या भूषण रावत 

पच्छिमी उत्तर प्रदेश के एक समृद्ध जनपद सहारनपुर को लगता है राजनैतिक रोटियां सेकने वालो ने घेर लिया है। मुजफ्फरनगर, हरद्वार, देहरादून, यमुनानगर, शामली से घिरा हुआ जनपद सहारनपुर उत्तर प्रदेश को उत्तराखंड और हरयाणा से जोड़ने का काम भी करता है।  हालाँकि पच्छिमी उत्तर प्रदेश के सभी जनपद सांप्रदायिक दंगो के चलते संवदेनशील माने जाते है लेकिन सहारनपुर अपनी लाख खामियों के बावजूद अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण और व्यापारिक दृश्टिकोण से बेहतर जिला रहा  है। सौहार्द की ऐसी मिसाल की बाबरी मस्जिद ध्वंस  के बाद भी यहाँ दंगे नहीं हुए। लेकिन पिछले तीन वर्षो में सांप्रदायिक और जातीय राजनीती ने सहारनपुर को निशाना बनाया है जिसके नतीजे भयावह है और प्रदेश की सरकार को चाहिए के वो इसको समाप्तः करने के लिए ईमानदार प्रयास करे लेकिन क्या वो ऐसा कर पायेगी जब दंगो के बाद उनकी पार्टी को ब्याज सहित थोक के भाव वोट मिल रहे हैं।  मुजफ्फरनगर घटना के बाद भाजपा नेताओ के लगातार बयानबाजी और आक्रामकता के चलते उनका राजनैतिक ग्राफ ताकतवर हो गया।  ध्रुवीकरण की राजनीती का चरम मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या के बाद बढ़ गया जब उत्तर प्रदेश सरकार ने अख़लाक़ के फ्रीज़ की ही जाँच शुरू कर दी और केंद्र के मंत्रियो ने अख़लाक़ की हत्या में आरोपित एक व्यक्ति की मौत के बाद उसके शव को तिरंगे में लपेटकर राजनीती शुरू की।  नतीजा यह हुआ के उत्तर प्रदेश में इस समय पूरा ध्रुवीकरण है हालाँकि दलित पिछड़े और मुसलमान इन बातो को साफ़ तौर पर समझ भी चुके हैं और ये सरकार २०१९ के चुनावो की इतनी आसानी से ना ले क्योंकि मुसलमान विरोध पर खड़ी की गयी पूरी ईमारत में दलितों और पिछडो को नीव की ईंट बनाया गया जिसका पटाक्षेप शीघ्र ही होना है। 

सहारनपुर की राजनीती में बसपा एक महत्वपूर्ण कड़ी है।  साम्रदायिक ध्रुवीकरण से पहले बसपा, सपा और कांग्रेस यहाँ की राजनीती को नियंत्रित करती थी हालाँकि शहर क्षेत्र में भाजपा के सवर्ण समर्थको की संख्या कम नहीं थी।  जातीय समीकरणों के हिसाब से भी सवर्णो के लिए यह सीट बहुत मज़बूत नहीं थी।  मुसलमानो की संख्या ४५% से अधिक होने के कारण जब तक पूर्णतः ध्रुवीकरण नहीं होता भाजपा का क्षेत्र में कोई दवाब नहीं बनता।  इसलिए २६%  आबादी के इमोशंस को टारगेट करना जरुरी था और इसलिए ही बाबा साहेब डॉ आंबेडकर को इतना याद किया जा रहा था।  दलितों ने १४ अप्रेल को हर साल की तरह पूरे जोश खरोश के साथ आंबेडकर जयंती मनाई।  बसपा के राजनैतिक आगमन का सबसे बड़ा असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुआ जहाँ दलितों में खासकर चमार जाति में आत्मस्वाभिमान का जबरदस्त आंदोलन विकसित हुआ. आंबेडकर जयंती एक प्रकार से दलित अस्मिता और स्वाभिमान का सबसे बड़ा त्यौहार बन गया। १९८९ से पूर्व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित वोट ईमानदारी से डल भी नहीं पाता था क्योंकि दबंग जातिया पहले ही वोट डाल चुकी होती थी लेकिन बसपा के उदय से दलितों का जो उभार उठा उसने इस क्षेत्र की दबंग जातियों के नेतृत्व को संकट में डाल दिया और दलित पिछडो और पसमांदा मुसलमानो का गठबंधन इस क्षेत्र की राजनीती में अभेद्य किले की तरह होता इसलिए उसको ख़त्म करने के लिए जरुरी था के दबंग जातियों का साम्प्रदायिकरण किया जाए।  इस क्षेत्र में जातिवाद भले ही घनघोर रहा हो लेकिन गाँव देहात में हिन्दू मुसलमानो के रिश्तो में उतनी कड़वाहट नहीं थी जो अब पैदा हो चुकी है।  हम लोग साम्प्रदायिकता को शहरी लोगो का राजनितिक और बर्चस्व का कार्यक्रम कहते थे।  लेकिन अब स्थितियाँ बदली हैं और दलित पिछडो और पसमांदा मुसलमानो की राजनीती उत्तर प्रदेश की एक हकीकत है जिसने कम से कम राजनीती में सवर्ण वर्चस्व को पूर्णतः ख़त्म तो नहीं किया लेकिन उसकी चौदराहट को चुनौती तो दे दी। इसलिए, सपा  बसपा की राजनीती को ख़त्म करने के लिए जरुरी था के दलित पिछडो और मुसलमानो के बीच में फुट डाली जाए और अलग अलग लेवल पर प्रयोग किये जाए।  हालाँकि पच्छिमी उत्तर प्रदेश जाट गुर्जर बहुल क्षेत्र है और हरयाणा में जिस प्रकार से भाजपा ने गैर जाट को मुख्यमंत्री बनाया था और जाट आरक्षण के मसले पर जैसे राजनीती की उससे पच्छिमी उत्तर प्रदेश में जाटो में असंतोष था लेकिन उस सारे असंतोष को मुस्लिम विरोध की राजनीती में बहुत चतुराई से ख़त्म कर दिया गया।  पूरे प्रदेश में भाजपा की 'राष्ट्र्वादी' ध्रुवीकरण की राजनीती से ठाकुरो, ब्राह्मणो के नेताओ के तो बल्ले बल्ले हो गयी।  मंडल के बाद हासिये पे आयी इन जातियों को तो इस राष्ट्रवाद के चलते इनका राजनैतिक पुनरुत्थान हो गया।  भाजपा ने भी पिछडो और दलितों के अनेको अंतर्द्वंदों से  खेलकर सवर्णो के दबंग जातियों के वर्चस्व को और मज़बूत कर दिया. पच्छिमी उत्तर प्रदेश में पूरे ध्रुवीकरण का सबसे बड़ा लाभ राजपूत नेतृत्व को हुआ।  

उत्तर प्रदेश के चुनावों में भारी जीत के बाद भाजपा के हौसले बुलंद है लेकिन उसकी समस्या यह है के अब स्थानीय निकायों के चुनाव सामने हैं।  नरेंद्र मोदी ने आम चुनावो से पूर्व अपने अभियान की शुरुआत कांग्रेस मुक्त भारत के नारे से की लेकिन हम सब जानते हैं के ब्रह्मवादी संघी नेतृत्व ऐसा होने नहीं देगा क्योंकि असल लड़ाई तो देश के बहुजन समाज और अल्पसंख्यक सवर्ण समाज का है इसलिए अमित शाह ने कहा था के अब समय आ गया है विपक्ष विहीन भारत का।  ये एक खतरनाक स्टेटमंट है लेकिन भाजपा विपक्ष को नेतृत्व विहिन कर देना चाहती है।  भारत के लोकतंत्र के लिए मज़बूत विपक्ष की आवश्यकता है और उसको ख़त्म करने की बात करना संविधान विरोधी है।  अमित शाह पुरे भारत में पंचायत से लेकर संसद तक भाजपा का नेतृत्व चाहते हैं शायद वो इसलिए के एक बार देश में उनका पूरा नियंत्रण हो जायेगा तो संविधान बदलने की उनकी मंशा फिर पूरी हो सकती है। स्थानीय निकायों में जीतने के लिए दलितों का साथ भी चाहिए और उनके अंदर अधिकारों के लिए हो रहे जाग्रति को धमकाना भी है इसलिए ही अनेको प्रकार के षड्यंत्र हो रहे हैं। आंबेडकर के नाम लेने भर से ही परेशान होने वाले लोग जब उनके नाम से यात्रा निकलना चाहते हैं तो उसकी परिणीति कैसे होगी जगजाहिर है।  जब आंबेडकर जयंती सभी जगह १४ अप्रेल को मना ली गयी तो २० अप्रेल को जबरन जलूस निकालने के क्या मायने।  दलित और मुसलमनो के बीच जबरन झगड़ा लगाने की कोशिश कर असंतोष खड़ा करने के हर प्रयास की निंदा होनी चाहिए।  कोई भी जलूस समाज में व्याप्त शांति और सद्भाव से बड़ा नहीं हो सकता। 

सहारनपुर से भाजपा के सांसद राम लखन पाल शर्मा ने पुलिस प्रशाशन की परवाह किये बगैर जो शोभा यात्रा  निकाली वो पूर्णतः गैर क़ानूनी थी  लेकिन बजाय शर्मा के खिलाफ कोई कार्यवाही के सहारनपुर के नौजवान एंड बहादुर पुलिस अधिकारी लव् कुमार सिंह का तबादला कर दिया गया।  ये सुचना अब गुप्त नहीं है के लव कुमार के शासकीय आवास पर सांसद के समर्थको ने हमला किया लेकिन सरकार ने सांसद को समझाने के बजाय अधिकारी को 'अनुशासित' कर दिया।  अखबारों की खबर के मुताबिक जो नए अधिकारी लव कुमार सिंह की जगह पे आये वह सुभाष चंद्र दुबे मुजफ्फरनगर के दंगो के दौरान वहा के एसएसपी थे और पत्रिका अख़बार के मुताबिक न्यायमूर्ति विष्णु सहाय  की रिपोर्ट ने उन्हें भी जांच में दंगो को न रोक पाने का दोषी पाया था।  सहारनपुर के इस दंगे तरह छोटे बड़े किस्म के दंगो की संख्या लगातार बढ़ रही है।  केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के मुताबिक २०१५ में १५५ और २०१६ में १६२ मामले उत्तर प्रदेश में हुए हैं। आंबेडकर शोभा यात्रा का पूरा मामला दलित मुसलमानो को आपस में लड़ाने का था क्योंकि न तो दलितों के तरफ से कोई शोभायात्रा की बात कही गयी थी न ही प्रशाशन ने इसकी अनुमति दी थी लेकिन दंगे कराने की साजिश थी और अखबारों ने अपनी भूमिका निभा दी।  सहारनपुर में अखबारों ने दलित मुस्लिम दंगा करवा दिया जो कही था ही नहीं क्योंकि पूरी 'शोभा यात्रा' की मांग दलितों की तरफ से नहीं भाजपा के सांसद की और से थी। 

पिछले तीन वर्षो से सरकार बाबा साहेब आंबेडकर के जन्म दिवस या महापारिनिरवाण दिवस को बहुत बड़े स्तर पर मनवा रही है।  प्रधानमंत्री मोदी डॉ आंबेडकर का बड़ा गुणगान कर रहे हैं।  अपनी पूरी विदेश यात्राओं में मोदी जी अपने को बुद्ध की धरती से आया हुआ कहते हैं हालाँकि बोध गया बुद्धिस्ट लोगो को मिल जाए इसका कभी उन्होंने प्रयास नहीं किया और घर में उन्हें शिष्य राम मंदिर का आंदोलन मज़बूत कर रहे हैं चाहे इसके कारण देश में अमन चैन रहे या नहीं।  खैर भाजपा के स्वर्ण नेताओ और उनके स्वर्ण कार्यकर्ताओ को लगता है के दलितों के वोट लेने के लिए आंबेडकर नाम का जाप किसी भी कीमत पर करना पड़ेगा लेकिन वे भूल गए के कांशी राम की राजनैतिक क्रांति ने दलितों को यह भी बताया के ''वोट हमारा राज तुम्हारा' नहीं चलेगा।  भाजपा इस नारे को ''वोट तुम्हारा राज हमारे' में बदलने के लिए कटिबद्ध है और इसलिए लोगो की भावनाओ को समझे बगैर वो ये कर रही है। सवाल यह है के यदि आप बाबा साहेब आंबेडकर से प्यार करते हो या उनका सम्मान करते हो तो क्या अभी तक जाति उन्मूलन के लिए आपने क्या किया. यदि आप बाबा साहेब के संविधान का सम्मान करते हो तो ' द ग्रेट चमार' लिखने में क्या आपत्ति क्यों ? यदि आपकी पार्टी सामाजिक न्याय को मानती है तो फिर डॉ आंबेडकर की प्रतिमा का हर वक़त अपमान क्यों और वो दलितों की बस्ती में ही क्यों लगे गाँव के बीच मोहल्ले में क्यों नहीं ?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आने के वाद से हिन्दू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओ के जोश में होश चला गया है।  वैसे पूरी वाहिनी  राजपूत सेना  नज़र आती 
है. जब प्रदेश में एक लोकतान्त्रिक सरकार है तो ऐसी वाहिनियों को क्यों नहीं ख़त्म किया जाता।  क्योंकि ऐसा यदि नहीं होगा और पुलिस और प्रशाशन का ब्राह्मणीकरण होगा तो इस प्रकार की वाहिनियों के मुकाबले में भी जातियों की सेनाये तैयार होंगी।  पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भीम आर्मी की ताकत का अंदाजा पुलिस को भी नहीं था लेकिन सहारनपुर में कल के हादसे के बाद प्रशाशन के हाथ पाँव फूल गए हैं।  सवाल इस बात का है के यदि प्रशाशन को ईमानदारी से काम करने की छूट नहीं होगी, संविधान भावनाओ का सही प्रकार से पालन नहीं होगा और  गाँव देहात में मनुवादी सामंतवाद अभी भी चलेगा तो फिर लोग अपने बचाव और सम्मान के लिए अपनी अपनी  जातीय सेनाओ या पार्टियों  का सहारा लेंगे। 

अभी का ताजा घटनाक्रम मई ५ का है जब  शब्बीरपुर गाँव में ठाकुरो के हमले में पुलिस के अनुसार दलितों के २५-३० घर जला दिए गए हालाँकि दलितों का कहना है के ५५ से अधिक घर जले हैं और एक दर्जन से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक  ४००० हज़ार की आबादी वाले इस गाँव में ठाकुरो की आबादी २५०० और चमारो की ६०० से करीबन है। मामला महाराणाप्रताप की जयंती मनाने से शुरू हुआ जब लोउडस्पीकर की आवाज़ को दलितों ने काम करने को कहा।  असल में हमारे गाँवों में झगड़ो के लिए बहाने चाहिए होते हैं।  उसके लिए लोग कारण ढूंढते हैं और दिन तय करते हैं। महाराणाप्रताप की जयंती पहले नहीं मनाई जाती थी लेकिन अब गाँवों में अपने अपने पूर्वजो को मनाने के नाम पर हर काम हो रहे हैं।  उससे भी कोई दिक्कत नहीं लेकिन समस्या तब होती है जब जानबुझकर उन इलाको से जलूस निकाला जाता है जहाँ आपको दंगा फसाद करना है।  साम्प्रदायिक और जातीय दंगो के महारथी हमेशा ऐसा करते हैं और जब वे इन इलाको से गुजरते हैं जहाँ उन्हें लगता है के लोग  उनके 'दुश्मन' हैं वहां उनकी नारेबाजी भयावह रूप धारण करती है।  मसलन अगर जलूस मुसलमानो के इलाको से जाए तो ' तेल लगा दो डाबर का, नाम मिटा तो बाबर का ' या ' राम लला हम आएंगे मंदिर वही बनाएंगे' और यदि भारत में रहना होगा वन्दे मातरम कहना होगा' के नारे लगेंगे और वो ऐसे लगाए जाते हैं जैसे किसी को चिढ़ाने के लिए किया जा रहा हो।  ये बात  हकीकत है के त्योहारों और पर्वो पर जलूस निकलना भारत के शहरों और गाँवों के लिए अब नासूर बन गए हैं क्योंकि ये जलूस या झांकिया अब जनजागरण के लिए नहीं अपितु अपनी ताकत दिखाने के लिए हैं और भारत के विभिन्न हिस्सों में हो रहे दंगो का कारण बन चुके हैं।  घनी आबादी वाले इलाको, खासकर जो मिश्रित आबादी के क्षेत्र हैं किसी भी हिंसा को रोकना प्रशाशन के लिए नामुनकिन हैं. इन दंगो के कारण हिंसा में अक्सर पुलिस प्रशाशन भी सांप्रदायिक हो जाता है। पुलिस के जातीय और सांप्रदायिक चरित्र को कभी भी ठीक करने की कोशिश नहीं की गयी। 

दंगो में लोग बर्बाद होते हैं और प्रशाशन की और से मुआवजा भी नाम मात्र का होता है।  बड़े लोगो के व्यावसायिक प्रतिष्ठान तो बीमित होते हैं और  वे इस प्रकार की घटनाक्रम से सरकार की सहायता के बिना भी बीमा क्लेम कर लेते हैं लेकिन अब समय आ गया है के  अन्य सभी लोगो को बचाव में अपना बीमा करवाना चाहिए खासकर मुस्लिम और दलित समुदाय के व्यवसायियों को ताकि इस प्रकार की हिंसा में उनके व्यवसायिक हितो को नुक्सान न हो अन्यथा उनके नष्ट होने में तो देर नहीं लगती और इससे कई मेहनतकश लोगो की जिन्दगिया ख़त्म हो गयी है। मुजफ्फरनगर के २०१३ के दंगो की स्याही अभी सूखी नहीं है क्योंकि जिनके घर बार नष्ट हुए उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला।  सरकार की उसमे कोई दिलचस्पी भी नहीं दिखाई देती।  ऐसा लगता है के प्रशाशन तो लोगो को रिलीफ कैंपो में भी नहीं रखना चाहता।  एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के मुताबिक मुजफ्फरनगर की हिंसा में  ७  महिलाओ के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ जिसमे से एक की मौत हो गयी है और बाकी अपनी जिंदगी को सँभालने की कोशिश कर रही है  लेकिन उन पर जान का खतरा लगातार मँडरा रहा है।  अभी तक सही प्रकार से मुकदमे शुरू भी नहीं हुए हैं।  गवाहो को धमकिया हैं और खुले आम धमकी देने वाले अब सत्ता का हिस्सा है और खुले में घूम रहे हैं। 

लोकतंत्र की त्राश्दी है के जनता का फैसला सर्वमान्य होता है लेकिन जब कानून का शाशन चलाने की बात करते हैं तो आरोपियों पे मुकदमा चलना चाहिए और एग्जीक्यूटिव को ईमानदारी  कार्य करना चाहिए।  अमेरिका का उदहारण हमारे सामने है जहाँ मीडिया और सरकार के दूसरे अंगो जैसे एफबीआई ने अभी तक सरकार की हाँ में हाँ नहीं मिलाई है और जहाँ लगा के मंत्री या राष्ट्रपति गलत हैं वहा उन्होंने उसका विरोध किया है लेकिन भारत में मीडिया  का साम्प्रदायिक और जातीय स्वरूप जगजाहिर है।  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के  आने से अब अफवाहे आसानी से फ़ैल रही हैं।  मीडिया किसी भी खबर को अपने स्टूडियो और दफ्तरों में तैयार कर रहा है जिसके फ़लस्वरूप गाँवो में तनावबढ़ रहा है। मीडिया और लोगो को यह बात  जान लेनी चाहिए के कोई  व्यक्ति यदि वो कानून की नज़र में आरोपित है या अपराधी है तो उसके अपराध चुनाव जीतने से ख़त्म नहीं हो जाते।  लालू यादव उदहारण है।  उन्हें आज भी कोर्ट के चक्कर लगाने पड रहे हैं।  शाहबुद्दीन जीतने के बावजूद भी जेल में हैं।  मतलब यह के चुनावी जीत आपके अपराधों को नहीं धोती और देर सवेर उन  पर कार्यवाही होती ही है।  इसलिए भाषणों में नेता लोग यदि जनता की अदालत की आड़ में अपने कार्य को सही ठहराए तो समझ लीजिये के कोर्ट के फैसले का भय उनके दिमाग में घूम रहा है। 

सत्तारूढ़ पार्टी ने दलित पिछडो और मुसलमानो के अंतरद्वन्द  को अपना हथियार बनाया लेकिन ये भी आवश्यक है के सवर्णो  और दलितों के अंतर्द्वंद केवल राजनैतिक एडजस्टमेंट से ख़त्म नहीं होने वाले।  बाबा  साहेब आंबेडकर ने जातियों के सम्पूर्ण विनाश की बात कही और संविधान की सर्वोच्छ्ता को लागु करने की बात कही लेकिन आज संविधान की ताकत से सबसे बड़ी चुनौती मनुवाद को है जिसने हमारे गाँवों में अभी भी अपना राज्य कायम रखा है जहाँ द ग्रेट चमार के बोर्ड लग जाने मात्र से जातिप्रथा की सर्वोच्चता को चुनौती लगने लगती है।  आंबेडकर की सीधी खड़ी मूर्तिया सवर्ण प्रभुत्व के लिए चुनौती हो गयी है जिन्हे ऐसा लगता है के उनका संविधान और उनके विचार दलितों को 'बिगाड़' रहे हैं क्योंकि अब वो सवाल कर रहे हैं. आरक्षण की सीटों के नाम पर भी दलित पिछडो ने बहुत बदनामी झेली।  ऐसा प्रचारित किया गया के आरक्षित श्रेणी में सभी दोयम दर्जे के लोग आते हैं लेकिन टीना डाभी, कल्पित वीरवाल और अब रिया सिंह ने दिखा दिया है के तथाकथित सवर्ण मेरिट को अम्बेडकरवादी युवाओ की न केवल कड़ी टक्कर मिलेगी अपितु आने वाले दिन अम्बेडकरवादी  मेहनतकशो के ही होंगे। सवाल ये नहीं की किसी को नीचा या किसी को ऊंचा दिखाना है आखिर ये जंग तो हमेशा नहीं चल सकती क्योंकि भारत का भविष्य एक बराबरी वाले समाज में ही है न के ऐसे सामाजिक व्यवस्था में जो जन्म आधारित कार्य के सिद्धांतो पर चली है। 

उत्तर  प्रदेश के चुनावो के वक़्त कई अखबारों ने एक खबर छापी थी।  बहुत से साथियो को दुःख भी हुआ था।  हाथरस की एक सुरक्षित विधान सभा सीट से वाल्मीकि समाज के एक भाजपा प्रत्याशी प्रचार के वक़्त अपना गिलास अलग से लेकर चलते थे क्योंकि जब वो जाटो के इलाको में जाते तो जमीन पर बैठते और लोग उनको चाय उनके गिलास पे देते।  वो घर के अंदर भी नहीं घुसते थे और गाँव के छोटे बच्चे भी उनका नाम लेते।  जब उन महाशय से यह पूछा गया के आप इसका विरोध क्यों नहीं करते तो उन्होंने अपनी सदियों पुरानी परम्पराओ का हवाला दिया। उनकी सुरक्षित सीट जाट बाहुल्य वाली थी और क्योंकि उन्हें चुनाव जीतना था इसलिए अगर अपने आत्मसम्मान की कीमत पर आप संसद या विधायक बन गए तो क्या दिक्कत। वह चुनाव जीत भी गए।  मैंने उनका बायो डाटा पढ़ा तो पता चला के उनके पिता बहुत समय से विधायक थे और एक टर्म के लिए सांसद भी रहे।  क्या ये आश्चर्य की बात नहीं के एक राजनैतिक परिवार से आने वाला व्यक्ति  पद के लिए अपने स्वाभिमान या अपने स्वाभिमान की रक्षा नहीं कर सकते तो क्या  वे विधान सभा या सांसद में  वाकई  अपने या अपने जैसे समाजो पे हो रहे अत्याचारों के बारे में कुछ  पाएंगे?  बाबा साहब आंबेडकर ने इसी लिए पृथक या आनुपातिक चुनाव प्रणाली की बात कही थी।  असल में संघ की समरसता का सिद्धांत यही के आप को मनुस्मृति ने जिस जगह पर रखा है वो बिलकुल 'वैज्ञानिक' है और सभी अपनी अपनी जातियों के हिसाब से काम करे और 'प्यार' से रहे तो 'सामनजस्य बना रहेगा। आंबेडकर का युवा इस सामंजस्य को अब सहने को तैयार नहीं है।  विधायकी और सांसदी या प्रधानी के लिए भी वे लड़ेंगे लेकिन अपने स्वाभिमान को रखकर। सामाजिक बराबरी लाने के लिए 'ऐतिहासिक गलतियों' को स्वीकार करना पड़ेगा।  बाबा साहेब आंबेडकर की लड़ाई एक नए समाज को बनाने की लड़ाई थी, ये भारत के मानवीयकरण और उसे प्रबुद्ध भारत बनाने की लड़ाई है और उसके लिए आवश्यक है के सड़ी गली परम्पराओ को ठुकराकर एक समतावादी समाज की स्थापना जो मनु के विधान से नहीं हमारे ऐतिहासिक संविधान से चले।  समाज में आपने जातीय वर्चस्व को कायम रखने वाली शक्तिया केवल दूसरे को गिरा हुआ और निम्न देखना चाहती है जो हमें हर प्रकार से कमज़ोर करेगा. दुनिया बदल चुकी ही और जो अपने को जातीय आधार पर बड़ा मानने की जिद में हैं उन्हें सोच लेना चाहिए के २१वे सदी में उनका फायदा भी इसमें है के वे बदले और सामाजिक बदलाव की दिशा में सोचे जिसकी शुरुआत बुद्ध ने की और जिसके सबसे बड़े प्रणेता बाबा साहेब आंबेडकर रहे। एक समतावादी समाज का फायदा केवल दलितों को हो ऐसा  नहीं हो सकता।  भारत के सम्पूर्ण विकास और ताकत के लिए यहाँ सामाजिक बदलाव और सामाजिक न्याय की शक्तियों के साथ में समाज को जुड़ना पड़ेगा।  अगर ऐसा नहीं हुआ तो जैसे डॉ आंबेडकर ने कहा, दबे कुचले लोग अपना रास्ता खुद तय कर लेंगे। 

पश्चिम  उत्तर प्रदेश एक खुशहाल क्षेत्र है।  यहाँ के किसान राजनैतिक तौर पर बड़े ताकतवर थे।  आज  यहाँ से  खेती खतरे में है लेकिन किसानो के मुद्दे गायब हैं।  ऐसा नहीं है के किसानो को इसका पता नहीं है।  उनके मुद्दों को साम्प्रदायिकता और जातीय वर्चस्व की चाशनी में चालाकी से मिला दिया गया है।  जरुरी है के नेता और उनके छुटभैये इस क्षेत्र को अपने राजनैतिक लाभ के लिए आग में न ढकेले क्योंकि ये क्षेत्र ऐसा है के आग लगने पर बुझाना आसान नहीं है। इस क्षेत्र ने मेरठ, मुरादाबाद, अलीगढ ,,आगरा , बरेली  बिजनौर, मलियाना आदि के भयावह दंगे देखे हैं और उनसे होने वाले नुक्सान को भी भुगता है।   नफ़रत की आग इस देश को ध्वस्त कर सकती है इसलिए सरकार को  चाहिए के वो कड़ा सन्देश भेजे खासकर सभी राजनैतिक कार्यकर्ताओ को के वे कोई ऐसी बात न कहे जो हिंसा को सही ठहराए।  ये भी जरुरी है के लोगो में विश्वास जगाने के लिए स्थानीय सदभावना समितिया बने।  सबसे बड़ा अनुरोध लोगो से है के वे व्हाट्सप्प और सोशल मीडिया , स्थानीय अखबारों की खबरों से उद्वेलित न हो।  चिंता करना वाजिब है और अपने अधिकारों के लड़ना भी आवश्यक है लेकिन अफवाहों के चलते केवल उसकी राजनीति करने वालो की चांदी है। मुख्यमंत्री ने डीजीपी को भेजा है लेकिन हमारे विपक्ष के नेता नदारद है।  सहारनपुर और मुजफ्फरनगर की हिंसा और उसके कारणों की विस्तारपूर्वक जांच होनी चाहिए।  क्या हमारी संसद या विधानसभा इस पर कोई समिति का गठन कर सकती जिसमे विपक्ष के लोग भी हों ताकि ईमानदारी से इन घटनाओ की जाँच हो और भविष्य में ऐसा न हो उसके लिए प्रयास हो।  क्या ऐसा हो सकता है के जिन नेताओ का नाम दंगा फ़ैलाने में आये उन्हें टिकट न मिले ? सहारनपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खुशहाली के जरुरी है के वह शांति हो और सभी लोग बिना भय और रागद्वेष के रहे ताकि जिंदगी दोबारा से पटरी  पे आ सके।