Wednesday, 5 April 2017

प्यार पर पहरा



ये जाति के झूठे रिवाजो  की दुनिया, ये प्यार के दुश्मन समाजो के दुनिया

विद्या भूषण रावत 

बहुत वर्षो पूर्व गुरुदत्त की फिल्म प्यासा का ये गीत ' ये  दौलत  के झूठे रिवाजो की दुनिया, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो  क्या है,' आज बरबस याद आता है।  साहिर ने जब ये गीत  लिखा तो वो आज़ादी का दौर था , एक नए भारत के निर्माण का सपना भी जहा धर्म, जाति और रश्मो की संकीर्ण दीवारों से उठकर हम इंसानियत और प्यार के पैगाम के साथ आगे बढ़ेंगे। लेकिन जैसे जैसे तकनीक में महारत हासिल करने लगे, दिमागी तौर पर जाति , धर्म, और संकीर्णताओ की दीवारे ढहने के बजाय बढ़ने लगी है। 

अभी कुछ दिन पूर्व नॉएडा में नाईजेरियाई मूल के अश्वेत छात्रों के साथ दुर्व्यवहार का मामला सामने आया।  एक भारतीय छात्र की संदिग्थ परिस्थितियों में हुई और उसके परिवार ने पहले इन अफ़्रीकी मूल के छात्रों पर आरोप लगाया के वो 'नरभक्षी' हैं और उनके इस आरोप पर पुलिस ने इन छात्रों के घरो पर छापेमारी की, फ्रीज़ भी देखा तो कुछ नहीं मिला। कुछ छात्रों को गिरफ्तार भी किया।  नॉएडा के उस इलाके के लोगो ने पुलिस थाने पर प्रदर्शन भी किया लेकिन कुछ समय बाद वो छात्र मिल  गया लेकिन अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया।  अब परिवार  वालो का आरोप बदल गया और उन्होंने आरोप लगाया के इन अफ्रीकी छात्रों ने ही उनके  बेटे की हत्या की है।  पुलिस इससे पहले कुछ करती, नॉएडा की भीड़ ने इन छात्रों के घर पर  तोड़ फोड़ की और उन पर कई किस्म के आरोप लगाए।  हिंसा इतने अधिक थी के अफ़्रीकी छात्र सदमे में थे।  उनमे से बहुत से छात्र इसलिए भारत आते है क्योंकि उन्हें लगा के हमने भी औपनिवेशवाद के दौर में उनके तरह ही नस्लभेद झेला। ये सब भारत के विषय में एक बिलकुल अलग किस्म की राय के साथ यहाँ आये थे।  मेरे एक मित्र जो अफ़्रीकी मूल के अमेरिकी हैं दिल्ली विश्विद्यालय में पी एच डी के लिए आये. भारत आने से पहले उनके दिमाग में गाँधी की इमेज थी लेकिन दिल्ली आकर उन्हें पता चल  गया के हम रंग, नस्ल और जाति के प्रश्नों पर कितने संवेदनशील हैं।  उन्होंने अपना शोध कर जल्दी से जल्दी यहाँ से निकलने में ही भलाई समझी. 

अफ़्रीकी मिशन के राजदूतों ने नॉएडा में हुई घटना पर गहरी आपत्ति जताई और मामला सयुंक्त राष्ट्र संघ की ह्यूमन राइट्स कौंसिल में हैं। उनका कहना था हे भारत में नस्लभेद होता  है और अफ़्रीकी मूल के लोगो के साथ ये आम बात है लेकिन भारत सरकार इस मामले से निपटने में गंभीर नहीं है।  उनका कहना था के ये बहुत गंभीर बात है क्योंकि अफ्रीका में बहुत भारतीय रहते हैं और अधिकांश कारोबारी हैं और इस प्रकार की घटनाएं उनको सीधे प्रभावित करती हैं। असल में सवाल इस बात का नहीं था के यहाँ नस्लभेद या जातिभेद नहीं था लेकिन सरकार का रवैयया निहायत ही निराशाजनक रहा।  भारत सरकार ने इस प्रश्न को नस्लभेद की तरह न लेकर एक साधारण अपराध की तरह लिया हैं जो उसके पुरे एप्रोच को पर सवालिया निशान खड़ा करता है।  

हम अपने अफ्रीकी दोस्तों से कहना चाहते हैं के एक भारतीय होने के नाते हम रंगभेद, जातिभेद , नस्लभेद और लिंगभेद आदि सभी प्रकार के भेदभाव के विरुद्ध हैं और बाबा साहेब आंबेडकर के निर्देशन में बने हमारे संविधान ने सभी को एक व्यक्ति एक वोट के आधार पर बराबरी का अधिकार दिया लेकिन ७७ वर्षो बाद भी भारत में नस्लवाद और जातिवाद के पुजारी इस संविधान की मर्यादाओ को लगातार ध्वस्त करने का प्रयास कर रहे हैं।  हाँ, भारत नस्लवादी या जातिवादी नहीं है क्योंकि वो तो स्वयंम ही इन विभिन्न प्रकार के भेदभावों का शिकार है।  यहाँ की ९० प्रतिशत बहुजन आबादी जातिवाद, रंगभेद, लिंगभेद और अन्यप्रकारो के विभिन्न भेदभावों से ट्रस्ट है जिनके विरूद्ध समाज में समय समय पर संघर्ष भी हुए।  बुद्ध से लेकर कबीर , नानक, रैदास, फूले , आंबेडकर, पेरियार, श्रीनारायणगुरु, राहुल सांकृत्यायन, भगत सिंह आदि सभी ने तो इस बीमारी जिसका श्रोत भारत का वर्णाश्रम धर्म है , उसको बताया  और उसके विरूद्ध विद्रोह का बिगुल हमारे समाज में फूंका. सभी का मानना था का भारत की एकता और ताकत वर्णव्यस्था के खात्मे से होगा क्योंकि तभी यहाँ बराबरी वाला समाज बन पायेगा। 

आज़ादी के बाद ये संविधान उनलोगों की आँखों की किरकिरी है जो भारत  को  वर्णाश्रम धर्म के जातिवादी सिद्धांतो पर झोंक देना चाहते हैं क्योंकि जैसे जैसे जाति, धर्म की दीवारे टूटेंगी धंधेबाज़ों के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी इसलिए हम देख रहे हैं के इस देश में जाति की पवित्रता को बचाये रखने के सारे प्रयास हो रहे हैं चाहे उसके कारण हमारी एकता और संविधान मज़बूत न रहे। जातिव्यस्था की सर्वोच्चता की रक्षा के लिए ही आज हमारे युवाओ को असमय बलिदान देना पड़ रहा है।  उत्तर प्रदेश में एंटी रोमियो स्क्वाड बना है जो युवको को सरेआम पीट रहा है और उत्तर प्रदेश पुलिस जिसके बारे में  इलाहाबाद उच्च न्यायलय के एक न्यायाधीश ने बहुत पहले कहा के वर्दीवाला गुंडा है , अब ईरान और सऊदी अरब  धार्मिक पुलिस की तरह दिखाई दे रही है।  महिलाओ की सुरक्षा हम सब का कर्तव्य है और पुलिस अगर महिलाओ को सुरक्षा दे पाए तो यह  बहुत बड़ी बात होगी लेकिन उसकी आड़ में नौजवानों को एक दूसरे से मिलने से रोकना, उनकी सरे आम बुरी तरह से पिटाई करने सीधे सीधे सुप्रीम कोर्ट के आदेशो की अवहेलना भी है और लोगो की व्यक्तिगत स्वन्त्रता का भी हनन है।  लेकिन पुलिस यहाँ पर एक संवैधानिक तंत्र की तरह नहीं एक धार्मिक सामाजिक व्यस्था की वाहक नज़र आ रही है जो बेहद खतरनाक है। हम उम्मीद करते हैं के पुलिस निहत्थे प्रेमियो पर अपने जुर्म न कर प्रदेश में कानून व्यवस्था  पर ध्यान देगी  क्योंकि नैतिकता के निर्लज़्ज़ ठेकेदार कानून अपना हाथ में लेकर लोगो को परेशान कर रहे है और उन पर कोई कार्यवाही नहीं हो रही है। 

एक हफ्ते पहले तेलंगाना राज्य में मधुकर  नमक एक नवयुवा के नृशंश हत्या कर दी गयी। पुलिस ने इसे आत्महत्या का मामला बनाकर रफा दफा करने की कोशिश की जबकि मधुकर का क्षत विक्षिप्त शव जिसमे उसके गुप्तांगो को तक काट डाला गया था, पुलिस ने बरामद किया।  साफ़  जाहिर था के मधुकर को प्यार करने की सजा मिली।  वो इसलिए के वो दलित था और प्यार करने वाली लड़की वहां की एक ताकतवर जाति कापू से थी।  एक्टर चिरंजीवी इसी जाति से आते  हैं और जातियो के वोटबैंक होने के कारण पूरा प्रशासन इस घटना पर पर्दा डालना चाहता है।  लेकिन तेलंगाना में लोग खड़े हुए हैं इस क्रूर अपराध के विरुद्ध. 

 एक बहुत ही ह्रदय विदारक घटना उत्तर प्रदेश में हुई जो एक टीन ऐज जोड़े ने आत्म हत्या कर ली क्योंकि उन्हें कही से भी कोई उम्मीद  नहीं थी. उन्हें भय था का मौजूदा दौर में उनके प्यार के कारण उनके माँ बाप नैतिकता के ठेकेदारो की गुंडागर्दी का शिकार न हो जाए क्योंकि वे बेलगाम घूम रहे हैं और उन्हें प्रशासन की पूर्ण सह मिली हुई है।  टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक फिरोज और गूंझ एक दूसरे से प्यार करते थे और उम्र कोई १८ वर्ष के आस पास।  फिरोज ने पहले गूंझ को गोली मारी और फिर अपने आपको भी ख़त्म कर दिया।  स्थिति इतनी भयावह के किसी के परिवार वाले अपने बच्चो के शव लेने भी नहीं आये।  

उसी अख़बार की खबर बताती है के लगभग ५ अन्य जोड़ो इन इसी दौरान आत्महत्याये की हैं  अंतर्धार्मिक और अंतरजातीय नहीं है।  कुछ ऐसे भी मामले जो जाति के अंदर के हैं।  बात साफ़ है के हमारा समाज हमारे युवाओ को इतना परिपक्व तो मान रहा है के वे प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बना सके लेकिन अपनी जिंदगी के फैसले लेने के लिए वह योग्य नहीं है।  ये कैसा समाज है जो अपनी इज्जत की खातिर अपने बच्चो को मारने के लिए तैयार है और उसके लिए नए कारण ढूंढ रहा है। 

ये बीमारी के लक्षण हैं जो हमारे समाज को ग्रसित कर चुकी है।  करीब दो दशक पहले उत्तर प्रदेश के एक इलाके में प्रेमी जोड़े को जिन्दा जला दिया गया. वो मामला एक गुजर और नाइ जाति के युवक युवती का था।  जब मैं एक अन्य साथी के साथ उस गाँव पहुंच तो ज्यादातर का कहना था के उन्हें नहीं पता के क्या हुआ जबकि उन दोनों प्रेमी युगल को पुरे बाजार में घुमाया गया था।  जब मैंने लड़की बहिन से जिनके बीच दो तीन वर्ष का फर्क था पूछा के वो क्या कहना चाहेगी इस घटनाक्रम में तो बहिन का कहना था के  जो हुआ वो ठीक था क्योंकि घर की मान मर्यादा भी तो कुछ होती है। मेरे साथ गयी एक विदेशी पत्रकार इस बात से स्तब्ध रह गयी। 

कही न कही हमारे समाज में इन बातो को स्वीकार्यता है क्योंकि हम अपनी झूठी शान और मर्यादाओ की खातिर अपने बच्चो की जिंदगी लेंगे में भी दुक्खी नहीं होते। ऐसा बहुत से देशो में हो रहा है जैसे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान , सऊदी अरब, जोर्डन जहाँ इज्जत के नाम पर हत्याओ को धर्म का चोगा पहनाकर कातिल साफ़ तौर पर बच रहे हैं लेकिन क्या ऐसा समाज कही आगे बढ़ेगा, क्या उसका कोई बौद्धिक विकास होगा। 

जब हमने संविधान बनाया तो सदियो के गैर बराबरी को ख़त्म करके एक प्रबुद्ध भारत के निर्माण सपना भी देखा था ताकि जाति के दलदल में फंसा ये समाज आधुनिकता और मानववाद के रास्ते में चलकर दुनिया को एक नयी दिशा देगा। लोकतंत्र के जरिये हमने पुराने जातिवादी किलो को ध्वस्त करने का सोचा, लेकिन आज लोकतंत्र इन्ही जातिवादी ताकतों को सबसे बड़ा हथियार बन गया है। हर वक़्त ये जातिवादी ताकते व्यक्तिगत आज़ादी की सबसे बड़ी दुश्मन है और जाति के खात्मे के लिए हो रहे सारे प्रयासों को समाप्त करने की कोशिशें करती रहती हैं।  जाति पंचायते, खाप  पंचायते सभी अपनी अपनी जातियो की महानता और पवित्रता का गुणगान करती रहती हैं. क्या आपने आई एस और तालिबान के अलावा कोई और सभ्य समाज देखा है जहाँ इज्जत के लिए लडकिया मार दी जाए और समाज पर कोई असर नहीं पड़े ? 

बहुत वर्ष पूर्व प्रदुम्न महानंदिया दिल्ली के पलिका बाजार के स्थान पर खुले फव्वारे वाली जगह पर रोज लोगो के स्केच  बनाते थे।  उनके एक स्केच  की कीमत १० रुपैया होती थी और ये संन १९७० का दशक था।  उनके पास विदेशी पर्यटको की अच्छी संख्या आती थी।  स्वीडन सी भारत यात्रा पर आये चार्लोट उनके चित्रो और व्यक्तित्व से इतनी प्रभावित हुई के उनसे प्यार करने लगी। दोनों में प्यार हुआ और फिर प्रदुम्न के माँ बाप की उपस्थिति में उनके ओडिशा स्थित गांव में उनकी शादी हुई। प्रदुम्न दलित परिवार से आते थे और ओडिशा के गाँव में उन्होंने छुआछूत को गहरे से देखा था।  प्रदुम्न ने चार्लोट का नाम चारुलता रख दिया और दोनों दिल्ली लौट आये. प्रदुम्न चारुलता के साथ स्वीडन नहीं गए क्योंकि वो चाहते थे के वो अपनी कमाई के पैसो से स्वीडन जाए। ऐसे  मैं कई दिन बीत गए और फिर एक दिन प्रदुम्न ने सोच लिया के जाना है।  उनके पास मात्र ६० रुपये थे जिससे उन्होंने एक साइकिल खरीदी और अपना छोटामोटा सामान पैक कर दिल्ली से स्वीडन की यात्रा शुरू की।  जनवरी १९७०  में शुरू हुई उनकी प्यार के लिए साइकिल यात्रा लगभग ६ महीने बाद स्वीडन पहुंची. उन्हें बहुत दिक्कते हुई।  उन्हें नहीं  पता था के उनकी पत्नी की पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या है और न चार्लोट ने उनसे कुछ पुछा था।  पहली ही मुलाकात प्यार में बदल गयी और जैसे कहा गया है के प्यार में कोई यदि और लेकिन  नहीं होता, कोई शर्त नहीं होती।  चार्लोट और प्रदुम्न आज स्वीडन में प्यार की सबसे बड़ी कहानी है और उन पर कई फिल्मे बन चुक्की हैं।  प्रदुम्न को स्वीडन में जाकर ही पता चला के उनकी पत्नी एक कुलीन परिवार से आती हैं जिसके पास पांच हज़ार एकड़ से बड़ा जंगल और लगभग दस किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई खूबसूरत झील है।  मुझे उनके पास कुछ समय बिताने का मौका मिला और  मैं कह सकता हूँ के उनका परिवार प्यार एक बेहद प्यारा और सौम्य परिवार है। इस कहानी को जिसे मैं व्यक्तिगत तौर पर जनता हूँ , को सुनाने का उद्देश्य केवल इतना के क्या ऎसी कोई कहानी भारत में संभव है जहाँ सबसे पहले व्यक्ति की पारिवारिक और जातीय पृष्ठभूमि पूछी जाती है।  और अगर जाति मिल गयी तो माँ बाप की सामाजिक हैसियत का बड़ा होना भी जरुरी है , उनकी जेब कितना खर्च कर सकती है ये पहले ही पता होना आवश्यक है।  अगर माँ बाप  के खिलाफ चले गए तो मधुकर या फिरोज जैसी भयावह स्थिति हो सकती है। 

बड़े अफ़सोस की बात है के जब हम सिनेमा में इनोसेंट टीन ऐज रोमांस की फिल्मे देखते हैं तो 'बॉबी, लैला मजनू, हीर राँझा, सीरी फरहाद, सोनी महिवाल, मैंने प्यार किया, दिल और ऐसी कई फिल्मो को सुपर हिट बनाते हैं. हम सभी की सहनुभूति प्यार करने वाले जोड़े के साथ होती है और हम सभी उनको नियंत्रण करने वाले परिवार के सदस्यो को बुरा भला कहते हैं।  सिलसिला में तो अमिताभ रेखा के रोमांस का जादू लोगो के सर चढ़ा जब सभी जानते थे के उनके और जया के बीच में सम्बन्ध मधुरतम नहीं थे लेकिन लोगो के सहानुभूति अमिताभ और रेखा की जोड़ी के साथ थे।  ऐसा क्या है के असल जिंदगी में हम क्रूर हो जाते हैं और मार काट पर उत्तर आते हैं जबकि परदे में कलाकारों को रोमांस करते  देख हमारे दिल की धड़कने भी बढ़  जाती हैं। 

रश्मे और रिवाज समय के अनुसार बदलने चाहिए और इसलिए संवैधानिक मूल्यों की नैतिकता ही भारत को एक रख पायेगी।  क्योंकि धर्म, जाति  और इलाको की नैतिकताएं अपनी अलग अलग होती हैं लेकिन जब एक राष्ट्रीय नैतिकता की बात आएगी तो हमारे लिए संवैधानिक नैतिकता को ही अपने जीवन का हिस्सा बनाना पड़ेगा। ये बात विशेषकर सरकारी और सार्वजानिक सेवाओ के व्यक्तियों के लिए आवश्यक है ताकि वो समस्याओ का हल ईमानदारी से निकाल सके। 

कोई नहीं कहता के समाज में सुरक्षा का भाव न आये या महिलाओ की सुरक्षा नहीं  होनी चाहिए लेकिन इसको किस प्रकार किया जाए वो जरुरी है।  क्या महिलाओ की सुरक्षा के नाम पर उन्हें घर से बाहर निकलने की छूट मिलेगी या नहीं।  क्या उन्हें या किसी पुरुष को आपस में बात करने, घूमने और काम करने और प्यार करने की आज़ादी के लिए बार बार नैतिकता के ठेकेदारो  से अनुमति लेनी पड़ेगी।  सरकार के अच्छे निर्णय भी अगर गलत तरीके से लागु हुए तो वो भला करने के बजाय बुरा करेंगे।  कानून जो करे वो करे लेकिन समाज में वैचारिक बदलाव की जरुरत है।  भारत की एकता और मज़बूती धर्मो को केवल निहायत व्यक्तिगत स्तर पर रखकर हो सकती है।  प्रेम पर पहरेदारी करके हम केवल जातीयता और सामंतवादी स्त्रीविरोधी मानसिकता को ही मज़बूत करेंगे जो देश और समाज के हित में कतई नहीं है। एक मज़बूत समाज के लिए स्त्री और   पुरुषो के सम्बन्ध बराबरी पर आधारित होते हैं जिसकी गारंटी हमारे संविधान ने दी ही।  देश की मज़बूती और एकता के लिए संविधान की नैतिकता और हमारे निजी जीवन मूल्यों में उसकी उपयोगिता जरुरी है।  २१वी सदी का  प्रबुद्ध भारत बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा स्थापित संवैधानिक नैतिकता से ही बन सकता है और उम्मीद है हमारे राजनैतिक दल और सरकार इस पर प्रतिबद्धता से काम करेंगे। 

Thursday, 30 March 2017

कंधमाल का सच और न्याय प्रक्रिया की हताशा

पुस्तक समीक्षा
विद्या भूषण रावत
उड़ीशा के कंधमाल क्षेत्र में दलित और ईसाई आदिवासीओ के बीच हुए हिंसा में लगभग सौ से अधिक मौते हुई. ये हिंसा पहले दिसंबर २००७ में हुई और उसके बाद ज्यादा भयावह तौर पर अगस्त २००८ में हुई. अगस्त २००८ की हिंसा के पीछे स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या को जिम्मेवार ठहराया गया जिसकी हकीकत यह है के पूरी प्रशाशनिक रिपोर्ट ये बताती है के स्वामी के हत्या के लिए ईसाई मिशनरीज नहीं अपितु नक्सलवादी जिम्मेवार हो सकते हैं लेकिन हिंदुत्ववादी शक्तियों ने ईसाइयो के विरुद्ध अपने जहरीले अभियान से पूरे मसले को ईसाई और गैर ईसाईयो में तब्दील कर दिया।
सरकारी सूचनाओ ने दिसंबर २००८ में वालो की संख्या ३९ बताई जिसमे २ पुलिस कर्मी और ३ दंगाई भी थे लेकिन स्वतंत्र रूप से कार्य करने वाले मानवाधिकार संगठनों ने इसकी संख्या सौ से ऊपर बताई है। ६०० से अधिक गाँवो को ध्वस्त किया गया और ५६०० घरो को लूटा और जलाया गया जिसमे लगभग ५४००० लोग बेघरबार हो गए। २९५ चर्च और अन्य पूजास्थल तोड़ डाले गए। लगभग ३०,००० लोग रिलीफ कैम्पो में रह रहे है और अभी तक विस्थापित ही है। १३ स्कूल, कालेज, स्वयंसेवी संस्थाओ के कार्यालय, लेप्रोसी सेंटर आदि भी नष्ट कर दिए गए। लगभग २००० लोगो को ईसाई धर्म छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया। भय और विस्थापन के चलते १०,००० बच्चे स्कूल छोड़ने पर मज़बूर हो गए।
कंधमाल ओडिशा का एक बेहद पिछड़ा हुआ जिला है जहाँ पर कांध आदिवासियो का बहुतायत है जिनकी आबादी क्षेत्रीय जनसंख्या का ५१% है जो क्षेत्र की ७७ % जमीन के मालिक है। प्रकृति पूजक इन आदिवासियों को ईसाई मिशनरियो और हिन्दू संघठनो ने धर्मांतरण करने के प्रयास किये है जिसके कारण भी यहाँ पर तनाव बढ़ा।
कंधमाल के ऊपर बने नेशनल पीपल ट्रिब्यूनल में जस्टिस ए पी शाह ने कहा : कंधमाल में नरसंहार ईसाई समुदाय, जिसमे बहुसंख्य दलित ईसाई और आदिवासी है, और जिन लोगो ने इसका समर्थन किया और समुदाय के साथ काम किया, के विरुद्ध सांप्रदायिक हिंसा है।
पुस्तक में कंधमाल हिंसा की जाँच के लिए बने जस्टिस पाणिग्रही जांच आयोग और जस्टिस नायडू आयोग की विस्तार पूर्वक समीक्षा की गयी है जिसमे इन जांच आयोगों की क़ानूनी सीमाओ और भविष्य की रुपरेखा पर भी चर्चा की गयी है।
इस पुस्तक में सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा भारत के विभिन्न 'स्वायत्त' संस्थाओ जैसे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय अल्प संख्यक आयोग द्वारा की गयी जांच के विभिन्न पहलुओ को भी छुआ है जिसमे राज्य सरकार की आलोचना की गयी हैं हालाँकि एन एच आर सी की रिपोर्ट के विरोधाभास पर भी टिपण्णी की गयी हैं. स्वायत संघठनो की सीमाओ और उनकी रिपोर्ट का इस सन्दर्भ में खुलकर विश्लेषण पहली बार हुआ है और इसके लिए लेखक द्वय बधाई के पात्र हैं क्योंकि ये बात सामने आयी है के कैसे एन एच आर सी ने कह दिया के ईसाइयो के विरुद्ध हिंसा पूर्वनियोजित नहीं थी जबकि उसके पास इसके पूरे तथ्य थे। इसी प्रकार पुलिस को क्लीन-चिट देना के उनका दंगाईयो के साथ कोई लेना देना नहीं था जबकि उन्ही ही रिपोर्ट यह कहती है के फुलबनी, रायगढ़ और पदमपुर में पुलिस की उपस्थिति में ही हिंसा हुई और पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की जिससे अपराधियो के हौसले बुलंद हो गए.
हमें यह नहीं भूलना चाहिए के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना किन परिस्थितयो में हुई और इसकी क्या सीमायें हैं। बहुत ज्यादा हुए भी मैं यह बात रखना चाहता हूँ के भारत में अधिकांश आयोगों में उनलोगों की नियुक्तियां होती हैं जिनका उन विषयो पे काम का न तो कोई अनुभव रहा है और न ही इस सन्दर्भ में उनका कोई इतिहास। ज्यादातर नियुक्तियां राजनैतिक होती हैं जो लालबत्तियों की खातिर होती हैं हालाँकि गुजरात के दंगो के सिलसिले में मानवाधिकार आयोग ने कुछ अच्छा कार्य किया।इसमें कोई दो राय नहीं के इन आयोगों में एक भी शब्द आने से लोगो में विश्वास जगता है लेकिन आयोग की भूमिका उन मसलो में ज्यादा शक्तिशाली नहीं है जो मामले राजनैतिक दीखते हैं और जहा शक की सुई सत्ताधारी पक्ष पर जाती हो। आयोग उत्तर पूर्व और कश्मीर के मसले पर भी बहुत कुछ नहीं कर पाया है और न ही भारत में जातीय और धर्म आधारित भेदभाव के ऊपर ज्यादा प्रभाशाली बात रखने में सक्षम हुआ है।
पुस्तक के तीसरे अध्याय में पूरी न्यायिक प्रक्रिया का बहुत विस्तार पूर्वक विश्लेषण है जो साम्प्रदायिकता के प्रश्नों और राजनीती से प्रेरित सामूहिक हिंसा के सवालो पर काम करने वाले लोगो और विशेषञो के लिए अत्यन्त आवश्यक है। ऐसा इसलिए भी जरुरी है क्योंकि हिंसा के बाद किसी भी स्थान को एक तीर्थस्थल में तब्दील करदेना हमारे हवाई कार्यकर्ताओ और मीडिया का 'नैतिक'' कार्य बन चूका है लेकिन घटना को लंबे समय तक फॉलोअप करने ले लिए बहुत धैर्य, संघर्ष और सैद्धान्तिक निष्ठा की जरुरत होती है। हमने जो अधिकांश ऐसे मामले देखे है वहां पर क़ानूनी परमर्शदाताओ से लेकर 'सामाजिक कार्यकर्त्ता' अखबारों में छपास टीवी पे दिखने की बीमारी से ग्रस्त नज़र आते हैं लेकिन इस पुस्तक को देखने बाद लगता है के यदि ईमानदारी के साथ तथ्यों को इकठ्ठा किया जाए और जनता के साथ लगातार संवाद की स्थिति हो तो लोगो को न्याय मिल सकता है। जब हम न्याय की बात करते हैं तो मात्र किसी को जेल पहुँचाना या सजा दिलवाना न्याय नहीं है अपितु प्रभावित लोगो को मुआवजा, उनका सम्मानपूर्वक पुनर्वास न्याय प्रक्रिया का बहुत बड़ा हिस्सा होना चाहिए जो भारत के अधिकांश मामलो में नहीं हुआ है क्योंकि मीडिया और पब्लिसिटी में ''फांसी का फंदा'' ज्यादा टी आर पी वाला होता है लिहाज़ा असली बाते छूट जाती हैं।
मुझे पता है के कंधमाल के लोगो को न्याय दिलवाने के लिए मानवाधिकारों के लिए संघर्षरत साथी जॉन दयाल और फादर अजय कुमार सिंह ने बहुत भाग दौड़ की है और लगातार दस्तावेजो को इकठ्ठा करने और गवाहों के साथ मज़बूती से खड़े होने के लिए बहुत संघर्ष किया है और उसी का नतीजा है के ये केस अभी लगातार चल रहा है और लोगो में विश्वाश के भावना जगी है।
हम सभी जानते हैं के दंगे होते नहीं है प्रायोजित करवाये जाते हैं और उन जगहों के ताकतवर लोग उसके पीछे होते हैं जिन्हें भरोषा होता है के उन्हें राजनैतिक प्रश्रय मिलेगा और व्याज सहित राजनैतिक लाभांश भी मिलेगा. १९८४ से लेकर, २००२ से २०१२ गुजरात, फिर आम चुनाव और अब उत्तर प्रदेश साम्प्रदायिकता की फसल लगातार मज़बूत हो रही है और उसका कारण सेक्युलर ताकतों के न केवल कमज़ोरी है अपितु कानून के लेवल पर अंतरास्ट्रीय मापदंडो को पूर्णतः लागू करवाने में हमारी असफलता. बहुत समय से हम कम्युनल वायलेंस बिल की बात कर रहे थे के समूहिंक नरसंहार या हिंसा में मारे जाने पर आज तक देश में एक भी व्यक्ति को सजा नहीं हुई क्योंकि न तो गवाह मिलते और न ही पुलिस और एजेंसिया जो जांच करती हैं उन्हें इन बातो में बहुत दिलचस्पी होती है. बहुत सी बाते केवल कानूनों के बदलने या बदलने से ही नहीं होंगी अपितु हमारे नज़रिये को भी बदलना पड़ेगा. एक जांच अधिकारी यदि जातिवाद या सांप्रदायिक मानसिकता से ग्रस्त है तो क्या हम उम्मीद कर सकते हैं के वह जांच को सही दिशा में ले जाएगा. मास वायलेंस में आज तक गवाह नहीं मिले तो क्या इसका मतलब यह के हिंसा हुई ही नहीं. हिंसा को जस्टिफाई करने के लिए अफवाहों को सच्चाई का जाम पहनाया जाता है और कारण गिनाये जाते हैं और इस प्रकार कानून पीछे और हमारी आपसी मान्यताये और अफवाहे ही हकीकत बन जाते हैं। मीडिया इन अफवाहों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
कंधमाल की हिंसा के गवाह लोगो को तरह तरह की धमकिया मिली जिसके लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सरकार को निर्देश भी दिए। कई लोगो को मौत की धमकी भी मिली और बहुतो को फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के बहार अपहृत कर लिया गया। कुछ गवाहों को उनके वकीलो के चैम्बर और घरो से अपहृत कर लिया गया। कोर्ट के अंदर भी माहौल भी अपराधियो और आरोपियों के समर्थको की भीड़ रहती जो गवाहों को लगातार भयग्रस्त रखता। इन सभी का विस्तारपूर्वक जिक्र इस पुस्तक में है। गवाहों को चुप रहने के लिए दवाब के घटनाओ के बारे में भी इसमें जानकारी दी गयी है। मैं तो केवल ये कह सकता हूँ के देश की राजधानी के पटियाला हाउस कोर्ट में कन्हैया कुमार वाले घटनाक्रम को देखने के बाद तो साफ़ जाहिर है के हमारी न्याय प्रणाली और उसके लिए काम करने वाले लोगो पर किस प्रकार का संकट है और जो दिल्ली में हो सकता है तो कंधमाल और अन्य कस्बो के न्यायालयो में किस प्रकार का माहौल होगा उसकी कल्पना की जा सकती है।
एक नयी बात हो रही है जो इस पुस्तक के अंतिम अध्याय में है के कैसे उत्पीड़ित लोगो को ही आरोपित बनाकर उन्हें झूटे मुकदमो में फ़साने की कोशिश हो रही है। न्याय प्रक्रिया गरीब के साथ में दिखाई नहीं देती और अदालतों में वकीलो के चक्कर काटना उनके लिए उत्पीडन की एक नयी श्रंखला है जिससे बच पाना बहुत मुश्किल है क्योंकि ताकतवर लोगो के पास न्याय को देर कर देने के अनेक साधन हो चुके हैं और गरीब कुछ समय के हरासमेंट से जंग हार जाता है। हर बार कोर्ट के चक्कर लगाने के लिए उसे बहुत मेहनत और पैसे की जरुरत होती है।
इस शोधपूर्ण कार्य के लिए वृंदा ग्रोवर और सौम्या उमा को बहुत शुभकामनाये क्योंकी पूरी पुस्तक में न केवल ह्यूमन राइट्स लॉ के लिहाज़ से उनकी पकड़ नज़र आती है अपितु उनके विस्तृत कार्य और मानवाधिकारों के लिए उनकी निष्ठा भी दिखाई देती है। इसलिए ये पुस्तक मात्र एक अकैडमिक दस्तावेज ही नहीं है अपितु लेखको के मानवाधिकार के जमीनी संघर्षो के साथ जुड़े रहकर कार्य करने की विस्तृत समझ भी दर्शाती है। ये पुस्तक बेहद आवश्यक है और उम्मीद करता हूँ के आज के दौर के सभी साथियो को न केवल जानकारी के तौर पर अपितु नए विचारो के तौर पर भी भविष्य की रणनीतियों को निर्धारित करने के लिए काम आएगी। हम आशा करते हैं के सभी राष्ट्रीय आयोगो के प्रमुख, सदस्य और कानूनविद भी इस पुस्तक को पढ़ेंगे और तदनुसार कार्यवाही करेंगे। सांप्रदायिक हिंसा की चुनौती से निपटने के लिए कानूनों और संबधित संस्थाओ की सीमाओ का जो विश्लेषण इस पुस्तक में है वो सभी के काम आएगा. मैं इस सन्दर्भ में केवल एक बात और जोडूंगा के सांप्रदायिक या सामूहिक हिंसा विरोधी कानून बनाने का समय आ चुका है और इस पर कम से कम बहस तो शुरू हो जानी चाहिए।

Kandhamal : Introspection of Initiative for Justice 2007-2015
Authors : Vrinda Grovar and Saumya Uma

कंधमाल : न्याय के लिए २००७- २०१५ तक किये गए प्रयासों का आत्मावलोकन
लेखक : वृंदा ग्रोवर और सौम्या उमा
Jointly published by : United Christian Forum and Media House
Price : Rs 595 or USD 20

Monday, 27 March 2017

उत्तर प्रदेश : नए राज की नयी नैतिकताएं




विद्या भूषण रावत 

योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से दिल्ली के मीडिया का पूरा धयान उत्तर प्रदेश की और आ गया है।  मोदी मोदी कहने वाला मीडिया अब जोगी जोगी कर रहा है।  दोनों में बहुत समानताये दिखाई दे रही हैं जैसे मोदी जी ने बचपन में मगरमच्छ पकड़ा था वैसे ही योगी जी ने भी शेरो को दूध पिलाया है वैसे लखनऊ के चिड़ियाघर से खबर ये है के जंगल के राजा को अब चिकन खिलाया जा रहा है।  उसकी हालात भी दयनीय हो गयी है क्योंकि संतो का क्या कहे वो तो शेरो से भी शाकाहारी बनने की उम्मीद कर रहे हैं।  

योगी जी ने शपथ ग्रहण के बाद से अभी तक बिना कैबिनेट की मीटिंग बुलाये लगभग ५० बड़े फैसले लिए हैं जिसमे 'अवैध' बूचड़खाने बंद करवाना, कैलाश  मानसरोवर के लिए सब्सिडी की सीमा पचास हज़ार से बढाकर एक लाख रुपये करना, सचिवालय में पान मसाला, खैनी बंद, सरकारी कार्यालयों में बायोमैट्रिक लगवाना , उत्तर प्रदेश की सड़को को गड्ढा मुक्त बनवाना, नवरात्र और अन्य हिन्दू धर्म के आयोजनो में सम्पूर्ण प्रदेश में २४ घंटे  विद्युत् सप्लाई, एंटी रोमियो 
 दस्ते की स्थापना, भ्रस्टाचार के विरुद्ध सख्ती, प्रशाशन में चुस्ती और लड़कियों के विवाह के लिए आर्थिक अनुदान. वैसे उनके एक मंत्री मोहसिन रजा ने बड़े मुसलमानो से हज सब्सिडी का इस्तेमाल न करने की बात कही है। 

उत्तर प्रदेश एक विशाल प्रदेश है जो अपने आप में यदि एक देश होता तो शायद दुनिया के पांच देशो में गिना जाता।  लगभग २० करोड़ के प्रदेश की खासियत  यहाँ की जातीय , धार्मिक और भौगोलिक विविधता है। प्रदेश में अधिकांश आबादी ग्रामीण इलाको में रहती है और असंगठित क्षेत्र में काम करती है।  अगर पिछले ७० वर्षो में लोगो ने बिना सरकार के सहारे रहे अपनी जिंदगी का गुजर बसर किया है तो ये इस असंगठित क्षेत्र की बदौलत हुआ है जिस पर आज पुंजिपतियो का हमला है जो क्वालिटी के नाम पर पुरे क्षेत्र पर अपना कब्ज़ा जमाना चाहता है।  रेहड़ी वाले, ठेले वाले , खोमचे वाले, सब्जी, फल , दूध, मीट, साइकिल रिपेयर, मोटर, स्कूटर  रिपेयर और मेंटीनेन्स इत्यादि काम करने वाले अधिकांश लोग हासिये के समाज के लोग हैं।  गाँव में भूमिहीन और जातीय पूर्वाग्रहों का शिकार ये लोग शहर की और रोजगार की तलाश में आते हैं. ऐसा नहीं है के इन सड़क किनारे बैठने वालो में कोई क्वालिटी नहीं होती।  मार्किट प्राइस से बहुत सस्ता और अच्छी क्वालिटी यहाँ  मिलती है।  दुनिया भर से आने वाले टूरिस्ट भारत के स्ट्रीट फ़ूड को बहुत सराहते हैं।

लखनऊ शहर के टुंडे के कवाब दुनिया में मशहूर है और जितने लोगो ने खाये बस तारीफ़ ही करते रह गए लेकिन आज वो सूना पड़ा है क्योंकि बीफ नहीं है।  पहले गाय को लेकर संवेदना थी और उसको लोगो ने स्वीकार भी कर लिया लेकिन अब बाकी मीट खाने पर भी सवाल खड़े किये  जा रहे हैं जो बेहद चिंताजनक और खतरनाक है।  क्योंकि गौ माता अभियान से किसान का जितना नुक्सान हुआ है उतना  किसी का नहीं।  वो गाय और भैंस दोनों पालता है लेकिन शहरो को छोड़ दे तो आज व्यवस्था ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है के जानवर पालन घाटे का सौदा है।  गाय भैंस के दूध से उतना पैसा नहीं मिलता जितना उसकी देखभाल  खानपान के लिए चाहिए क्योंकि गौचर और गाँव समाज की अन्य जमीने चरने के लिए रहती थी तो किसान का खर्च चलता था।  उसके ऊपर साल भर में जो गाये या भैंसे बूढी हो जाते उन्हें बेच कर अपना खर्च निकलता।   कोई भी किसान कोई जानवर क्यों पालेगा यदि उसका लाभ नहीं है।  योगी जी के पास बहुत गाये हैं और मठ भी इसलिए उनका कार्य आसान है।  आज भी गौशालाएं धर्म के नाम पर ही चल रही हैं जिनको पूंजीपति खूब चन्दा देते हैं।  इसलिए यदि किसान  गाय नहीं पालेगा तो इस देश में दूध की कमी को कैसे पूरा किया जाएगा ? तो पूंजीपति  धार्मिक प्रयोजनों के जरिये किसानों के संशाधनो और उनकी आय के साधनो को ख़त्म  कर देंगे।  क्या योगी जी के पास कोई रास्ता है के यदि मेरी गाय या भैंस जो दूध नहीं देती या बुजुर्ग हो चली है तो  उसका क्या करें ? मैंजानता हूँ भक्त जान कहेंगे गौशाला को दान कर दो लेकिन किसान को क्या उसकी मेहनत और उसके पालने का मुआवजा नहीं मिलना चाहिए। 
दूसरी बात, यदि गाय और भैंस मरते हैं तो क्या किया जाए।  क्या उनको दफनाया जाए या उनका क्रिया कर्म किया जाए।  यदि क्रिया कर्म करना है तो क्या आने वाले समय में हमारे पास इतनी लकड़िया या बिजली है के हम ये कर सके और यदि दफनाना है तो क्या हमारे पास उसके लिए इतनी जगह है क्योंकि अभी तो ये देश शमशान और कब्रिस्तान के चक्कर में फंसा है लेकिन यदि गाय और भैंस भी हिन्दू और मुसलमान हो गए तो मैं  खुले आम यह कह सकता हूँ के देश की संस्कृति खतरे में है और देश की बायोडायवर्सिटी को भी खतरा पैदा होने वाला है। 

हमें ये समझना पड़ेगा के खान पान लोगो की व्यक्तिगत चॉइस है और ये धर्म से ज्यादा भौगोलिक कारणों से होता है।  दुनिया के सबसे बड़े देश नेपाल में दशहरा और दिवाली में चले जाईये तो आपको काठमांडू के प्रमुख बाज़ारो से नाक में खुशबु आनी  शुरू हो जाएगी। नेपाल, श्री लंका , थाईलैंड, म्यांमार आदि देशो में बीफ आसानी से उपलब्ध है।  मैंने पाकिस्तान, बांग्लादेश और मुस्लिम या पच्छिम देशो का नाम नहीं लिया जिनके बारे में ये आसानी से प्रचलित है लेकिन हिन्दू और बुद्धिस्ट देशो में भी कोई रोक टोक नहीं।  क्या बंगाल में जाकर भाजपा और हिंदुत्व के लोग मच्छी खाने को बंद कर देंगे ? क्या केरल में बीफ रोक सकते हैं।  गोवा और नार्थईस्ट में भाजपा ने खुद कहा के ऐसा करना मुश्किल है। 

लोगो की भावनाओ का सम्मान होना चाहिए लेकिन वो तब जब को जबरदस्ती कर रहा हो।  लोकतंत्र में बुनियादी मापदंडो को ध्यान में रखकर ही बाते की जाती है।  मीट व्यापार में अधिकांश तह दलित और पसमांदा मुसलमान कार्य कर रहे हैं। इतनी बड़ी इंडस्ट्री पे चोट कर क्या हम इन लोगो के रोजगार पर चोट तो नहीं कर रहे।  जस्टिस राजिंदर संचर ने एक बार कहा के बीफ के सबसे ज्यादा एक्सपोर्टर्स तो सवर्ण हिन्दू हैं।  हम तो केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार से ये अनुरोध करते हैं के वे बीफ एक्सपोर्ट पर एक श्वेत पत्र जारी करे और देश को बताये के पिछले तीन वर्षो में भारत दुनिया का सबसे बड़ा बीफ निर्यातक देश कैसे बना और कौन कंपनिया इसमें सबसे आगे हैं और उनके मालिक कौन हैं ? मुझे ये कहने  नहीं के मैं ऐसे मुसलमानो को जनता हूँ जो शाकाहारी हैं हिन्दू जो बीफखाते हैं।  पुनः खान पान व्यक्तिगत आस्थाओ का प्रश्न है और राज्य इससे दूर रहे तो अच्छा।  हाँ, राज्य का कर्त्तव्य  के लोगो को सही वस्तु मिले. 

योगी सरकार का दूसरा बड़ा कदम है 'एंटी रोमियो स्क्वाड' की स्थापना. उत्तर प्रदेश पुलिस तो पूरा काम धाम छोड़ इस ' महान ' यज्ञ में शामिल हो गयी।  खबरे आने लगी के कोई भी दो युवा जो साथ दिखाई दिए उनको पीटा जाने लगा. महिलाओ और नाव युवतियों का तो हाल बुरा हो गया।  पुलिस बलो में कार्य करने वाली अधिकांश महिलाये असल में पुरुषमानसिक्ता का शिकार होती है और उनसे महिलाओ के प्रति सहानुभूति की उम्मीद करना कुछ ज्यादा होगा।  लेकिन क्या ये दो व्यक्तियों के साथ रहने, दोस्त बनाने और साथ घूमने के अधिकारों पे अतिक्रमण तो नहीं है ? सबसे पाहिले बात यह के एक गंभीर प्रश्न को हलके तरीके से लेने के नतीजे ये ही होंगे।  हम जानते हैं के उत्तर प्रदेश में लड़कियों से छेड़ छाड़ की घटनाएं बहुत होती है और उसके लिए सरकार को सख्त कदम उठाने ही चाहिए लेकिन इस की आड़ में यदि दोस्तों के आपस में मिलने , उनके घूमने फिरने पर यदि प्रतिबन्ध लगता है तो ये बहुत भयावह होगा और हमारे  संविधान की मर्यादाओ के खिलाफ होगा।  टीवी और अखबारों की रिपोर्ट बताती हैं के कैसे पुलिस ने युवक युवतियों के  बदतमीजी की है।  ऐसा लग रहा है के पलिस और प्रशाशन को जनता का मालिक बनाया जा रहा है और  नव् युवा घबराये हैं। पुलिस अधिकारी 'नैतिकता' का ज्ञान बाँट रहे हैं।  उम्मीद है कि  यह  गीता प्रेस गोरखपुर की नैतिकता न हो जो महिलाओ को घर की चारदीवारियों में रहने के लिए प्रेरित करती है और जिसके लिए 'पति' देवता होता है जिसकी मर्जी के बिना कुछ संभव नहीं है। 

हम जानते हैं खाप के चाहने वाले, जातीय पंचायतो के यकीं करने वाले, लव जिहाद का जुमला ढूंढने वाले सभी इस वक़्त ऐसे कानूनों की आड़ में लोगो को अपनी  जातियो,धर्मो और क्षेत्रो के अंदर की घुटन भरी दम घोटू जिंदगी में ही कैद करदेना चाहते हैं। जातियो की पवित्रता का सिद्धांत यही से निकालता है के हम दूसरे से श्रेष्ठ हैं और श्रेष्ठता हमारी ही जातियो और धर्मो में है।  राहुल संरकृत्यायन जी ने कहा था का भारत की एकता और ताकत धर्मो की मज़बूती से नहीं अपितु धर्मो की चिताओ पे होगी। नौजवान लड़के लड़कियों को आपस में मिलने से रोकना, प्यार का इजहार करने से रोकना , अपनी अपनी खाप पंचायतो को मज़बूत करने के लिए किया जा रहा है।  सदियो से ये देश जातीय पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों का शिकार रहा है और यही इस समाज के अंदर गैर बराबरी का कारण है जिसको ख़त्म करने के लिए बाबा साहेब आंबेडकर को कहना पड़ा के जातियो का पूर्णतया उन्मूलन बहुत जरुरी है लेकिन अफ़सोस हिंदुत्व के प्रवक्ता इन बातो पर चुप्पी साधते हैं।  मुसलमानो के विरोध करदेने मात्रा से हिन्दू धर्म की ताकत नहीं बन सकती वो वैसे है जैसे मुसलमानो  की ताकत हिन्दुओ के विरोध से नहीं अपितु अपने अपने समाजो में आत्मावलोकन से होगी। 

आज के युग में 'शुद्धिकरण' जैसे शब्दो का प्रयोग अनुचित और अलोकतांत्रिक होगा लेकिन मुख्यमंत्री आवास में प्रवेश से पहले उसका 'शुद्धिकरण' सुनकर सहज ही कमलापति त्रिपाठी की याद आयी जिन्होंने ने गांधीजी की मूर्ति को गंगाजल धुलवाया जिसका अनावरण बाबु जगजीवन राम ने किया लेकिन कमलापति कहाँ हैं और बाबूजी कहाँ ये सब जानते हैं।  वैसे भी छुआछूत भारतीय संविधान के अनुसार कानूनी है।  वैसे घर में एक व्यक्ति के जाने और दूसरे के आने पर सफाई व्यवस्था  से कोई शिकायत नहीं और हर व्यक्ति अपने अनुसार अपने घर तैयार करता है लेकिन इसके लिए शुद्धिकरण शब्द का प्रयोग नहीं होता।  

अभी पाकिस्तान से खबर आ रही है के एक ब्लॉगर अयाज  निज़ामी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।  उनपर आरोप है के उन्होंने इस्लाम की तौहीन की है।  पाकिस्तान में ईश-निंदा कानून है जिसके मुताबिक इस्लाम और उससे सम्बंधित किसी बात पर सवाल नहीं हो सकता।  निज़ामी एक सेक्युलर एक्टिविस्ट हैं और पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरपंथी उन्हें सजाये मौत की मांग कर रहे हैं। हम जब पाकिस्तान में ऐसी घटनाओ  को देखते हैं तो हमें भारत में रहने पर गर्व होता है।  क्या धर्मो की सार्थक आलोचना नहीं हो सकती।  क्या हम अपने समाज में धर्मो के कारण हो रहे दुष्प्रभाव और कुरीतियो के खिलाफ नहीं बोल सकते।  लेकिन आज हम जिस भारत में रहे रहे हैं उसकी राजनीती का पाकिस्तानीकरण हो गया है जहाँ ताकतवर, पैसेवाले और धर्म के नाम पर राजनीती करने वाले लोगो की संख्या बढ़ गयी है जो किसी भी प्रकार की आलोचना सुनने को तैयार नहीं है। हमें अपने बच्चो में वैज्ञानिक चिंतन, पर्यावरण के प्रति जागरूकता और एक दूसरे के प्रति संवेदनशीलता पैदा करनी चाहिए और हमारे स्कूल और कालेजो में ऐसी व्यस्था होनी चाहिए ताकि बच्चे जागरूक नागरिक बन सके। 

सरकारों का काम है है जनता की सुरक्षा और उनको बेहतर जीवन देने हेतु प्रयास।  उनकी प्रमुख नैतिकता होती है कानून की रक्षा और संविधान का शासन. धार्मिक नैतिकताएं सबकी अलग अलग होती है लेकिन वे क़ानूनी तौर पर लागु नहीं की जा सकती। व्यक्तिगत पसंद नापसंद , खान पान, रहन सहन, ये सभी वैयक्तिक नैतिकताओ में आते हैं और सरकार यहाँ तभी हस्तक्षेप करे जब उससे दूसरे की स्वतंत्रता का हनन हो या कानून का उलंघन हो। प्रदेश में रहने वाली यदि १५-२०% आबादी ये महसूस करे के उसको जानबूझकर प्रताड़ित किया जा रहा है या उसके आर्थिक संशाधनो को विशेष अभियान के तहत ख़त्म करने की साजिश की जा रही है तो फिर शाशन को सोचना पड़ेगा. ये देश के विकास, स्थिरता, स्थायित्व और एकता के लिए खतरा हो सकता  है।  इस देश के कानून के अनुसार रहने वाले हर नागिरक के सुरक्षा सरकार का फ़र्ज़ है और इसके लिए जरुरी है के बड़बोले धम्कीबाज़ नेताओ और छुटभैयों पर कड़ी नकेल कसी जाए ताकि प्रदेश में सौहार्द बना रह सके। 

Saturday, 18 March 2017

बहुजन समाज के एकजुट होने के लिए ऐतहासिक समय



विद्या भूषण रावत 



योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री होंगे। गोरखनाथ मठ के महंत योगी भाजपा की भविष्य की राजनीती के लिए बहुत जरुरी हैं इसीलिए उनकी ताजपोशी केवल इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण नहीं है के एक उग्र हिन्दू को राज सौंपा जा रहा है अपितु ये भी के अंदर ही अंदर संघ मोदी के विकल्प भी तैयार कर रहा है।  योगी अभी मात्र ४५ वर्ष के हैं और उनके आग उगलने वाले भाषण उनके भक्तो के लिए अमृत  की तरह है।  

योगी की ताजपोशी करके भाजपा ने संकेत दिया है के उनका विकास की राजनीती से कुछ लेना देना नहीं है और इसका इस्तेमाल वो समय समय पर अपने उन भक्तो को खुश करने के लिए करते रहेंगे जो मध्यवर्गीय है , प्राइवेट कंपनियों में काम करते हैं और अमेरिका जाना जिनका आदर्श रहा है ताकि ओपिनियन मेकिंग क्लास उनके साथ खड़ा रहे।  अन्यथा संघ और भाजपा को पता चल चूका है के उत्तर प्रदेश के लोग क्या चाहते हैं और जो चाहते हैं उन्हें मिल चूका है। आज लगता है के मार्क्स ने धर्म के बारे में  जो लिखा वो गलत नहीं था।  धर्म की अफीम में मदमस्त जनता अपने 'निर्वाण' के लिए ढोंगी पाखंडी बाबाओ की शरण में जा रही है।  जिस सरकार से विकास के प्रश्नों पर सवाल किये जाने चाहिए थे वो पूरी बहस को कब्रिस्तान और शमशान में ले गयी।  अब संघ और भाजपा ने योगी को उत्तर प्रदेश की गद्दी सौंपकर अपना अजेंडा तय कर दिया है। 

जातिगत बैलेंसिंग करने के लिए एक ब्राह्मण और एक पिछड़े को उप मुख्यमंत्री का पद सौंप दिया गया है।  अभी बाकी लोगो को भी उनकी जातीय अहमियत के हिसाब  से पद  मिलेगा। वैसे भाजपा के पास दलित पिछडो के नेताओ की लंबी लाइन है जिनको पता है के उनको कुर्सी मिलकर ही जनता तृप्त हो जायेगी और इसलिए काम हो न हो जातीयता को तो अवसर मिलेगा ही।  सामाजिक समरसता और दलित पिछडो को मुसलमानो के खिलाफ करने का क्या हस्र हुआ है ? इसका सामाजिक विश्लेषण करने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।  आज भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडा से  लगभग १२५ विधायक ( शायद ६३ ब्राह्मण और ६२ ठाकुर ) चुनाव जितने में कामयाब रहे।  ये वोट किसका था ? उत्तर प्रदेश की राजनीती को समझने के जरुरत है।  जातीय राजनीती पर धर्म का मुलम्मा यदि चढ़ गया तो सबसे बड़ा लाभ सवर्णो को होता है और भाजपा एवं संघ ये जानते हैं इसलिए वह बार बार हिन्दू मुसलमान, भारत पाकिस्तान की बात करते हैं ताकि पुरे हिन्दू समाज की ठेकेदरी उनको मिल जाए और वो ऐसा करने में कामयाब हुए। हैं  मुसलमानो के सामाजिक आर्थिक पिछड़ेपन का सवाल उठाना जरुरी है।  अब जातीय मतगड़ना के प्रश्न को  उठाना भी आवश्यक है।  मात्र मुस्लिम विरोध पर पैदा हुई राजनीती के खतरों के और वैचारिक धयान दिलाना पड़ेगा। लेकिन मुसलमाओं में भी अंदरूनी बदलाव को समर्थन, महिलाओ  पर प्रश्न और मुस्लिम धार्मिक नेताओ को राजनीती में सर पर चढ़ा कर हम इन सवालो के उत्तर नहीं ढूंढ सकते।  आम मुस्लिम जो समाजहिट में संघर्षरत हैं , उनको आगे बढ़ाने का समय आ गया हैं. हिन्दू जातिवाद या  मुकाबला मुस्लिम साम्प्रदायिकता या किसी और किस्म के पृथकतावाद से नहीं दिया जा सकता। इसके लिए बुद्ध की सम्यक और मानववादी विचारधारा ही विकल्प बन सकती हैं जहाँ दबे कुचले समुदायों से नेतृत्व उभारा जाए और जो समुदाय के बीच काम कर रहा हो। 

 क्या उनके ऐसे प्रश्नों का उत्तर राजनैतिक 'विकास ' के मुद्दे उछाल कर किया जा सकता हैं. अखिलेश यादव ने विकास का मुद्दा उठाया लेकिन बहुजन समाज की सोच, उसकी अस्मिताओं की चाहत और उसके महापुरुषों के इतिहासबोध शायद उन्हें नहीं था।  जो समाज और नेता अपने इतिहास से परिचित नहीं हैं वो ब्राह्मणवाद की कुटिलताओं को कभी समझ नहीं पाएंगे।  मुझे अखिलेश पसंद थे लेकिन मेरी परेशानी यही थी के अपने पिता  की भांति उन्होंने बाबा साहेब आंबेडकर को एक बिरादरी के नेता के तौर पर देखा और लोहिया को उनकी काट के तौर पर।  ये बिलकुल झूट और गलत बात है।  लोहिया खुद चाहते थे  बाबा साहेब उस आर पी आई के नेता बने जिसमे वह और उनके अन्य कई समाजवादी साथी शामिल हों। समाजवादी पार्टी ने ऐसा कोई कार्य नहीं  जिसमे पिछड़े वर्ग के लोग उनसे जुड़ सके।  ऐसा जुड़ाव केवल जातीय नहीं हो सकता।  सामाजिक तौर पर बहुजन अस्मिता की मजबूती के लिए उन्होंने कोई कार्य किया हो ऐसा हमें नहीं दीखता।  पार्टी की कोशिश सवर्णो में खासकर ब्राह्मण ठाकुरो में स्वीकार्यता प्राप्त करने की थे लेकिन वे ये नहीं जानते के जाति की राजनीती करने वाले  ब्राह्मण ठाकुर कायस्थ या बनिया तभी तक उनके साथ है जब तक उन्हें सत्ता मिल रही है।  अतः जब लगा के हिंदुत्व और कॉर्पोरेट का जादू चल रहा है तो ये तबका सबसे पहले खिसक लिया। 

बसपा से हमें बहुत उम्मीदे थी।  हम उत्तर प्रदेश में तमिलनाडु के तरह का दो पार्टी राजनीती देखना चाहते थे जो बहुजन पार्टियों के बीच में लोकतान्त्रिक झड़प हो ताकि ब्राह्मणवादी तकते हासिये पे रहे।  बहुजन समाज पार्टी का इतिहास संघर्ष का रहा है।  मान्यवर कांशीराम ने अपने जनसंपर्कों और जनसंघर्षो से इसको सींचा लेकिन पार्टी ने जान संघर्ष का रास्ता कभी छोड़ दिया।  पार्टी को अति  दलित अति पिछड़ी जातियो में नेतृत्व विकसित करना करना होगा और बहुजन सांस्कृतिक आंदोलन को प्रगतिशील बहुजन वामशक्तियो के साथ जोड़कर संघ के ब्राह्मणवादी पूंजीवादी चरित्र का पर्दाफास करना होगा।  साथ ही साथ लोगो को अन्धविश्वाश से दूर करने और उनके अंदर वैज्ञानिक चिंतन पैदा करने लिए साधारण भाषा में कार्यक्रम तैयार करने होंगे। मुसलमानो में से भी पसमांदा मुसलमानो में नेतृत्व पैदा करना होगा और केवल जाती और धार्मिक नेतृत्व से मतलब नहीं , जरुरी ये के व्यक्ति वैचारिक तौर पर बहुजन समाज के प्रति, जिसमे पसमांदा मुसलमान भी शामिल  हैं, के प्रति समर्पित हो।  

आज का दौर सूचना और बौद्धिकता का दौर है इसलिए पुराने ढर्रे की मशीहाई राजनीती का दौर चला गया है।  मोदी के जुमलो  को उनकी ही भाषा में जवाब केवल लालू यादव दे सकते हैं। नए युवा बहुत बेहतर बोल रहे हैं इसलिए राजनीती में उनको यदि समय पर इस्तेमाल नहीं करेंगे तो कोई लाभ नहीं।  चुनाव प्रचार केवल एक ही नेता के इर्द गिर्द न हो इसके लिए बढ़ी संख्या में युवा, महिलाये, कलाकार, बुद्धिजीवियों का साथ लेना होगा।  नए दौर के युवाओ  को नेतृत्व में लाने के लिए बुद्ध, आंबेडकर, फुले, भगत सिंह , राहुल सांकृत्यायन लोहिया, पेरियार, मार्क्स, नेहरू, विवेकानंद, नरेंद्र देव, रामसरूप वर्मा , शहीद जगदेव प्रसाद,  आदि की विचारधारों का अध्ययन करना जरुरी है. मतलब यह नहीं  हम इनके मतभेद ढूंढ कर इस्तेमाल करें अपितु इन सभी ने पूंजीवाद, ब्राह्मणवाद, साम्रज्य वाद के बारे में क्या कहा है वो समझे. सभी लोगो को संघ के इतिहास की जानकारी होना जरुरी है के गोलवलकर, हेडगेवार, श्यामा प्रसाद मुख़र्जी. अब समय आ गया है गाँधी  नेहरू की आलोचनाओ पर हम अपना समय न व्यर्थ करें क्योंकि अभी संघ उसका इस्तेमाल अपने लाभ के लिए कर रहा है।  आवश्यकता इस बात की है के मौजूदा सरकार और उसके सांस्कृतिक विंग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ क्या हैं चाहते हैं ये जानना जरुरी हैं.  संघ और भजपा के इंटरनेट विशेषज्ञओ ने पूरी बहस को नेहरू गाँधी परिवार परिवार के इर्द गिर्द रखा ताकि उन पर चर्चा न हो।  धयान रखिये लोहिया का गैर कांग्रेसवाद के अब कोई मतलब नहीं जब संघ परिवार देश की सत्ता पर काबिज हो और पूरे देश में में ब्राह्मणवादी ताकते पूंजीवादी ताकतों के साथ मिलकर यहाँ के बहुजन समाज के खिलाफ साम दाम दंड भेद से अपनी लड़ाई लड़ रही हो।  संघ द्वारा प्रायोजित मीडिया बहसों में व्यर्थ समय न गवाये अपितु गाँव गाँव अपने सांस्कृतिक अभियान को  बढाए।   सवाल पूछिये के सबको शिक्षा ,सबको स्वास्त्य का क्या हुआ।  विश्विद्यालयों में बहुजन छात्रों के साथ जो हो रहा है उसको उठाए।  सोशल मीडिया और वैकल्पिक मीडिया को मज़बूत करिये लेकिन भक्तो से दूरी बनाइये क्योंकि ये आपको कभी सही स्थिति की जानकारी नहीं देंगे। 

अभी भी सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है।  उत्तर प्रदेश  में बिहार की तर्ज पर गठबंधन की आवश्यकता है।  सपा -बसपा गठबंधन वक़्त की आवश्यकता है लेकिन उस और विस्तृत करना होगा ताकि वोट के विभाजन का लाभ दोबारा से जातिवादी लोगो को न मिले इसलिए कांग्रेस इस गठबंधन में जरुरी है ताकि देश के दूसरे हिस्से में जहाँ वो मौजूद हो , उसे कुछ लाभ मिले. ये गठबंधन एक शर्त पे मज़बूत हो सकता है।  यदि मायावती जी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाए, राहुल गाँधी गठबंधन के संयोजक बने और अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए खुले तौर पर घोषित किया जाए. मैं जानता हूँ के जो मैं लिख रहा हूँ वो असंभव नहीं है।  आज देश पर बहुत बड़ा संकट है और अगर बहुजन ताकते साथ नहीं आयी तो देश पर मनुवादी ताकतों का पूर्णतया नियंत्रण होगा और जो थोड़ी बहुत उपलब्धिया पिछले साथ सत्तर वर्ष में बाबा साहेब आंबेडकर की कुर्बानियो से हमें मिली वो सब मटियामेट कर दी जाएंगी।  मैं केवल ये कहना चाहता हूँ के गठबंधन लंबे समय के लिए हो और जिनकी वैचारिकता में थोड़ा भी संदेह हो उन्हें फिलहाल गठबंधन से बाहर रखे. संघ के उग्र ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आप मात्र विकास की जुमलेवाली सर्वजन राजनीती से नहीं कर सकते।  उसके पर्दाफास के लिए बहुजन नायको और सामजिक न्याय के लिए संघर्ष करने वाली सभी शक्तियों और नायको  के संघर्ष और उनके विचारो को साथ लेकर समाज में विचार और सांस्कृतिक बदलाव के संघर्ष की शुरुआत करनी होगी।  आंबेडकर, भगत सिंह, जोतिबा फुले ,  बिरसा, राहुल सांकृत्यायन , पेरियार आदि की सांस्कृतिक विरासत को जनता की बीच खुद्दारी और ताकत के साथ रखना होगा तभी हम एक सभ्य और प्रबुद्ध भारत के बाबा साहेब के सपने को पूरा कर पाएंगे। ये दौर बहुत खतरनाक जरूर है लेकिन विचारो की मज़बूती और व्यक्ति के वैचारिक प्रतिबद्धता तभी पता चलती है जब ऐसे कठिन दौर आते हैं।  अभी नयी पार्टियों का समय नहीं है अपितु जो हमारे पास उपलब्ध हैं उन्हें लोकतान्त्रिक और वैचारिक तौर पर मज़बूत करने का समय है।


Friday, 30 September 2016

हिंदुत्व की राजनैतिक ताकतों को हराने के लिए उत्तर प्रदेश में बसपा ही अभी अंतिम विकल्प : भंवर मेघवंशी








भंवर मेघवंशी राजस्थान के प्रगतिशील दलित आंदोलन के एक प्रमुख स्तम्भ है और आज के हालातो पर उनकी लेखनी बेबाक जारी है। उन्होंने देश भर के जनांदोलनों के साथ लगातार हिस्सेदारी की है और गाँव गाँव साम्प्रदायिकता, जातिवाद, महिला हिंसा, वैश्वीकरण, विस्थापन आदि के प्रश्नों पर जनजागरण किया है.  राजस्थान में भीलवाड़ा जिले के एक छोटे से गाँव सिरडीयास  में 25 फरवरी 1975 को दलित बुनकर परिवार में जन्मे भंवर मेघवंशी को महज 13 साल की उम्र में ही कट्टरपंथी आर एस एस जैसे संगठन ने अपने साथ जोड़ लिया ,जिसके साथ उन्होंने तकरीबन पांच साल तक सक्रिय रूप से काम किया .वे अपने गाँव की शाखा के मुख्य शिक्षक रहे ,बाद में कार्यवाह बने और अंततः जिला कार्यालय प्रमुख के पद तक भी पंहुचे .उन्होंने बाबरी मस्जिद तोड़ने के लिए हुई पहली कारसेवा में भी शिरकत की ,मगर अयोध्या पंहुचने से पहले ही गिरफ्तार हुए तथा 10 दिन आगरा की जेल में रहे .बाद में एक घटना से उनका आर एस एस की दलित विरोधी सोच और नफरत एवं कट्टरता की विचारधारा से मोहभंग हो गया और उन्होंने संघ से अपना नाता तोड़ लिया और खुलकर आर एस एस का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया .

आर एस एस छोड़ने के बाद मेघवंशी ने एक फुल टाइम कार्यकर्ता के रूप कौमी एकता ,भाईचारे और शांति एवं सदभाव के लिए काम शुरू किया जो आज तक जारी है .उन्होंने 2002 में गुजरात में हुए अल्पसंख्यकों के नरसंहार के विरुद्ध जमकर आवाज उठाई ,गुजरात पीड़ितों के लिए बने पीपुल्स ट्रिब्यूनल के सदस्यों के साथ दस्तावेजीकरण किया और लेख लिखे .साम्प्रदायिकता और जातिवाद के खिलाफ जमकर संघर्ष करते हुए उन्होंने 2000 से वर्ष 2012 तक डायमण्ड इंडिया नामक मासिक पत्रिका का संपादन एवं प्रकाशन किया .

भंवर मेघवंशी ने एक स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सदैव अपनी कलम शांति ,आपसी सदभाव ,भाईचारे और सोहार्द्र के लिए काम किया। उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय के बारे में व्याप्त स्टीरियो टाईप मिथ्स को तोड़ने और सच्चाई को सामने लाने का काम किया है . भंवर जी से आज के ज्वलंत प्रश्नों पर मैंने विस्तारपूर्वक बातचीत की जो यहाँ प्रस्तुत है। 


विद्या भूषण रावत  :      - भंवर जीआज के दौर में दलित आंदोलन की सबसे बड़ी चुनौती क्या है ?

भंवर मेघवंशी  : आज दलित आन्दोलन को कई प्रकार की चुनोतियों को झेलना पड़ रहा है ,यह बाहरी चुनौतियां भी है और भीतरी भी .जिस प्रकार से साम्प्रदायिक शक्तियाँ दलित आन्दोलन को हजम कर रही है वह चिंताजनक स्थिति है ,आज बड़े पैमाने पर दलित नेतृत्व संघ भाजपा द्वारा बिछाये गए जाल में फंस गया है ,सत्ता का झूठा लालच देकर उनकी जुबानें बंद कर दी गई है .दलितों के चुने हुए प्रतिनिधि दलितों की बात नहीं करते ,नौकरशाही ओर सत्ता में बैठे लोग दलित आवाजों के दमन में लगे हुये है .अभी संघ का एक एजेंडा चल रहा है कि या तो अपने साथ ले लो ,अगर नहीं आये ,उन्हें फंसा दो . इस तरह हम देख रहे है कि दलितों का दमन और तीव्र होता जा रहा है . दलित आन्दोलन अपनी स्वाभाविक उग्रता को खो रहा है ,वह कई बार भ्रमित नजर आता है ,उसे समझ नहीं आता है कि वो किनके साथ खड़ा हो ,उसे अपने दोस्तों और दुश्मनों की शिनाख्त करने में आज काफी मुश्किल हो रही है .समुदाय के बीच में पनप आये दलाल लोगों ने आन्दोलन की मूल भावना को ही विकृत कर दिया है .अधिकांश दलित लीडर उम्र के थका देने वाले पड़ाव पर पंहुच गए है .चुनौतियां बेहद नई है ओर समाधान पुरातन है .नई पीढ़ी का दलित आन्दोलन कुछ अलग चाहता है ,पर उसे दिशा नहीं मिल पा रही है .भीतरी चुनौतियां भी उभर रही है ,दलितों के मध्य के जातिय अंतर को अब जातिवाद का रूप दिया जा रहा है .कई दलित जातियां स्वयं को इस हद तक मजबूत करने में लगी है  कि उन्होंने जाति उच्छेद के काम से लगभग मुंह ही मोड़ लिया है .दलित समुदाय के भीतर जातियों को मजबूती देने का काम जाति तोड़ने के बड़े उद्देश्य की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा बनकर उभर रहा है . यह हमारे आन्दोलन को कमजोर बना रहा है .संघ की विघटनकारी राजनीती के लिए यह स्थिति मुफीद है ,इसलिए वो दलितों के मध्य के छोटे मोटे फर्क को दुश्मनी के स्थायी भाव में बदलने की कोशिस में लगा रहता है .

विद्या भूषण रावत ;  रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद लगा के अम्बेडकरी  और वामपंथी ताकते साथ आएँगी लेकिन JNU के चुनावो ने दोनों के बीच में खायी को और बड़ा बना दिया है।  आप क्या सोचते हैं इस सन्दर्भ में। 

 भंवर मेघवंशी : हां यह बात सही है कि रोहित वेमुला के सांस्थानिक मर्डर के बाद अम्बेडकरी और वामपंथी ताकतें एक साथ आई .जय भीम ओर लाल सलाम का नारा एक साथ गुंजायमान हुआ .उम्मीद जगी कि यह जुगलबंदी आगे बढ़ेगी .यह समय की मांग भी रही .यह संतोष का विषय रहा कि भारत के वामपंथियों ने जाति के सवाल को स्वीकारना शुरू किया और वे अम्बेडकरवादी आन्दोलन के साथ खड़े दिखाई देने लगे .मगर हाल ही में जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में लेफ्ट यूनिटी और बाप्सा के आमने सामने आने से लोगों को लगा कि रोहित के मामले में बना एका ख़त्म हो गया है ,जिस पर कई लोगों ने चिंता व्यक्त की है ,लेकिन मैं थोडा अलग तरह से इस पूरे घटनाक्रम को देखता हूँ .

हमें समझना होगा कि भारत के वामपंथी कभी भी अम्बेडकरवादी समूहों के स्वाभाविक दोस्त नहीं रहे है ,सदैव ही ये दो धाराएँ रही है .रोहित के मुद्दे पर ये सडकों पर संघर्ष में एकसाथ थे ,इसका मतलब यह तो नहीं कि उनके मध्य कोई वैचारिक एकता बन गई .मेरे ख्याल से वह एक मुद्दे पर तात्कालिक एकता थी ,जिसे एक न एक दिन ख़त्म होना ही था .फिर ऐसे मुद्दे आयेंगे तो ऐसी क्षणिक एकता फिर से बनेगी ओर बिगड़ेगी भी .रही बात जेएनयू चुनाव की तो इसे विचारधाराओं के संघर्ष के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगी .इससे वामपंथियों को अपने भीतर देखने का मौका मिलेगा .बाप्सा और लेफ्ट यूनिटी को न्यूनतम सांझे मिलन बिंदु ढूंढने चाहिए .चुनावी संघर्ष दोस्त ओर दुश्मन की विभाजक रेखा नहीं बननी चाहिए.

 विद्या भूषण रावत :  वामपंथियो ने तो बहुत गलतिया की है।  न केवल जाति की स्वीकार्यता के विषय में बल्कि वर्ग चरित्र में भी उनका नेतृत्व कभी भी गरीबो के हाथ में नहीं था।  लेकिन जब हम राजनैतिक आंदोलन करते है तो हर एक आंदोलन की एक स्वस्थ आलोचना होनी चाहिए क्योंकि अगर हम सभी में कमिया नहीं होती तो ब्राह्मणवाद कभी इतना मज़बूत नही होता।  इसलिए ये भी जरुरी है के अम्बेडकरवादी या दलित आंदोलनों के जो विभिन्न ध्रुव है उनकी भी कमियों और अवसरवाद पर बोला जाये।  आज का समय केवल कम्युनिस्टो की कमी निकालने से नहीं होगा बल्कि स्वस्थ रूप से सभी सम्बंधित आंदोलनों के कमियों को समझकर एक नए आंदोलन की रुपरेखा बनाने का होना चाहिए 

भंवर मेघवंशी : आपकी बात से मेरी सहमती है कि आज का वक़्त सिर्फ वामपंथियों की कमियां निकालने का नहीं है ,पर सवाल जरुर उठाये जाने चाहिए .इसका जवाब कौन देगा कि वामपंथियों ने जाति के सवाल को कालीन के नीचे क्यों दबाये रखा आज तक ,उनके यहाँ नेतृत्व में दलित आदिवासी लोग क्यों नहीं आगे आ पाए .आप वर्ग की बात तो करेंगे लेकिन वर्ण की बात को नहीं स्वीकारेंगे यह नहीं चल सकता है .आप गरीबी का ढोल तो पीटेंगे मगर जाति की तरफ से आँख मूंद लेंगे ,यह नहीं चल सकता है .भारतीय  वामपंथ को ईमानदारी से इस देश के परिप्रेक्ष्य में उसी तरह से ब्राह्मणवाद से भी लड़ना होगा ,जिस तरह वे पूंजीवाद और साम्राज्यवाद से लड़ने की बात करते है .

मुझे भी लगता है कि दलित बहुजन आन्दोलन को भी अपने भीतर झांकना होगा ,अगर वह अपनी स्वस्थ आलोचना स्वयं कर सके तो उसके हक़ में यह बहुत अच्छा होगा ,अम्बेडकरी आन्दोलन को भी अपने जातिवादी चरित्र से छुटकारा पाना होगा तथा उसे ब्राह्मणवाद से भी बचना होगा .

विद्या भूषण रावत :  दलित बहुजन आंदोलन की बहुत चर्चा होती है लेकिन उसका मेल बिंदु केवल गैर ब्राह्मणवाद है।  दोनों ध्रुवो को साथ आने के लिए क्या कोई सकारात्मक कार्यक्रम की जरूरत नहीं है।  जैसे कम्युनिस्तो ने जाति को नहीं माना वैसे ही अगर हम ये सोच ले के बहुजन ध्रुवीकरण के अंदर सारे तत्त्व एक से हैं तो बहुत बड़ी भूल होगी।  बाबा साहेब ने जातियो के वर्गीकरण के बारे में साफ़ कहा था के ये 'ग्रेडेड इनएकवलिटीहै हर एक जाति एक एक ऊपर चढ़ी है और अपने को दूसरे से बड़ी मानती है।  अपने आपसी संबंधों के बारे में जब हमारी समानता का कोई सिद्धांत नहीं बनेगा तो एकता कैसी ?

भंवर मेघवंशी :  दलित बहुजन एकता के सारे तत्व एक से नहीं है ,सिर्फ मंचीय ध्रुवीकरण परिलक्षित होता है जो गाहे बगाहे ब्राह्मणवाद को कोसते रहते है .मगर इस मिलन बिंदु से आज कुछ भी उम्मीद नहीं लगाई जा सकती है ,बहुजन विचार में शामिल जो पिछड़ा तबका है ,वह आज मनुवाद का सबसे बड़ा संवाहक बना नजर आता है .पाखंड ,पूजा पाठ तथा धर्म कर्म में आकंठ डूबा हुआ .वह जो आज ब्राह्मणवाद का हरावल दस्ता है ,उससे ब्राह्मण से लड़ने की उम्मीद करना बचकानी बात होगी .दलित अत्याचार के प्रकरणों को उठाकर देखिये कई इलाकों में 90 प्रतिशत मामलों के मुख्य अभियुक्त ओबीसी से आते है .जो पिछड़ा रोज दलित को जूता मार रहा है ,उसके साथ कैसी एकता ? धरातल के हालात तो बेहद भयंकर है ओर हमारे आसमानी नेता है जो कभी दलित पिछड़ा एकता ओर कभी मूलनिवासी एकता का राग अलापते रहते है .बहुजन ध्रुवीकरण एक कोरी कल्पना है .अब तो बहुजन के नाम से जाने जाने वाले संगठन ही ब्राह्मण नेता चलाते है .पिछड़े जब तक मनुवाद के अग्रिम मोर्चे पर खड़े दिखेंगे ओर दलितों पर अत्याचार करेंगे तब तब वे हमारे उतने ही बड़े दुश्मन है ,जितने कि कथित उच्च वर्णीय लोग है .


  
विद्या भूषण रावत : रोहित वेमुला के मामले को मीडिया ने बहुत उछाला।  बहुतो को लगा शायद अब मीडिया दलित प्रश्नों पर बहुत संवेदनशील हो गया है लेकिन डेल्टा मामले तो लगभग दबा दिया गया।  अभी गावो में बहुत क्रूर घटनाक्रम होता है और मीडिया भूल जाता है।  भागना के लोग पिछले ४ वर्ष से आंदोलन कर रहे हैं लेकिन अभी भी न्याय के इंतज़ार में हैं और अब उनके पास न दलित संगठन आते न वामपंथी मीडिया तो खैर गया ही नहीं क्यों हो रहा है ऐसा ?

भंवर मेघवंशी : रोहित के मामले को मुख्यधारा मीडिया ने कोई ख़ास तव्वजो दी हो ऐसा मैं नहीं मानता ,हां जब सोशल मीडिया ने इस मुद्दे को बहुत बड़ा बना दिया तब प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक माध्यमों ने अपने जातिवादी चरित्र के मुताबिक नेगेटिव रिपोर्टिंग शुरू की .रोहित की जाति पर भ्रम पैदा किया ,उसे गोमांस भक्षी देश विरोधी तत्व के रूप में निरुपित किया .हर संभव कोशिस यह की कि कैसे भी करके रोहित वेमुला को बदनाम कर दिया जाये ,लेकिन अच्छा यह हुआ कि वैकल्पिक मीडिया ने इस मनुवादी मीडिया को धूल चटा दी ओर वे रोहित के मामले को दबा नहीं पाये .रही बात डेल्टा मेघवाल मामले की ,तो यहाँ भी मीडिया की भूमिका नकारात्मक ही रही .पहले डेल्टा का चरित्र हनन का प्रयास हुआ और बाद में मामले को ठन्डे बस्ते में फेंक दिया .रोहित के मामले में आरोपी सरकारी लोग थे ,मगर डेल्टा के मामले में विज्ञापन देने वाले समुदाय के लोग थे .जिनका अख़बारों ओर टीवी चेनल्स पर मालिकाना हक है ,उन्हीं की जमात के लोग जब आरोपी बने तो मीडिया उनके आगे पूंछ हिलाने लग गया .दलितों पर होने वाले अत्याचार सेक्सी स्टोरी नहीं होते .दलित महिलाओं का बलात्कार जातिवादी मीडिया की संवेदनाओं को नहीं जगाता .भगाना हो चाहे डांगावास ,डेल्टा हो या उना दलित अत्याचार ,सिर्फ सोशल मीडिया ही इन मुद्दों को आगे बढ़ा रहा है .वैसे भी मीडिया ज्ञापन देने वालों से ज्यादा विज्ञापन देने वालों की परवाह करता है .

 विद्या भूषण रावत  :  आप तो राजस्थान के बहुत से आंदोलनों से जुड़े रहे हैं जैसे मज़दूर किसान शक्ति संगठन भोजन का अधिकार अभियानपी यू सी एल  इत्यादि।  क्या तथाकथित मुख्यधारा के आंदोलनों में दलितों के जगह बची है या उनका केवल एक लेबल की तरह इस्तेमाल हो रहा है। 

भंवर मेघवंशी :  मुख्यधारा की किसी भी चीज़ में दलितों के लिए कभी जगह नहीं थी और न ही आज है .सभी जगह दलित सिर्फ दिखाने की वस्तु भर होते है .सामाजिक आंदोलनों का चरित्र भी इससे भिन्न नजर नहीं आता . कहीं पर भी स्वतंत्र दलित नेतृत्व स्वीकारा नहीं जाता .पिछलग्गू दलित सबको प्रिय है ,बोलनेवाले .सवाल उठानेवाले दलित कहीं भी पसंद नहीं किये जाते .मेरा मानना है कि सिविल सोसाइटी को भी लोकतान्त्रिक और समावेशी बनना होगा तथा दलितों को सिर्फ लेबल की तरह इस्तेमाल करने से बचना होगा .

विद्या भूषण रावत - राजस्थान में अम्बेडकरवादी या दलित आंदोलनों की क्या स्थिति है। 

भंवर मेघवंशी : राजस्थान पारम्परिक रूप से एक सामन्ती स्टेट रहा है .यहाँ विद्रोह की कोई भी सामाजिक राजनीतिक या सांस्कृतिक धारा नहीं रही है .यहाँ तक कि भक्तिकाल में भी यहाँ कबीर या रैदास जैसे लोग नहीं पैदा हुए .यहाँ तो दास्य भाव शाश्वत रहा है .तो मानसिक दासता सदियों से बरकरार रही है .दलित मुक्ति की लडाई में भी राजस्थान का योगदान नगण्य रहा है .पूना पैक्ट के वक़्त राजस्थान के कतिपय दलित नेता बाबा साहब के विरोध में पर्चे बाँट रहे थे .यहाँ कबीर ,फुले .अम्बेडकर के दलित के बजाय गाँधी के हरिजन और पार्टियों के बंधुआ दलित लीडर ही ज्यादा रहे है .आज़ादी के बाद हेडगेवार –गोलवलकर के भक्त दलित ओर गाँधी नेहरु को पूजने वाले दलितों के हाथ में दलित आन्दोलन की बागडोर रही .फिर समाजवादी किस्म के राजनीतिक दलित आन्दोलन पैदा हुये ,जिन्होंने सामाजिक न्याय के नारे तो लगाये .पर उसके नेतृत्व में वही जातियां प्रमुखता से आगेवान रही जो शोषक जमातें थी .

1992 में कुम्हेर भरतपुर में दलितों के सामूहिक नरसंहार के बाद राजनीती से परे एक दलित आन्दोलन उभरने लगा ,जो बाद में एनजीओकरण का शिकार हो गया .प्रोजेक्ट बेस्ड दलित आन्दोलन ने भी दलित आन्दोलन की स्थितियां ख़राब की है . आज राजस्थान का दलित आन्दोलन बिखराव का शिकार है .व्यक्तिवादी अहम् की लडाइयों के चलते कई छोटे छोटे खेमे बन गये है .कुछ लोग तो दलित के नाम पर सिर्फ अपनी जाति या परिवार का समूह बना बैठे है ,जबकि आज राजस्थान दलित अत्याचार .छुआछुत ओर भेदभाव का सबसे बड़ा गढ़ बन गया है .पर संतोष की बात यह है कि डांगावास दलित संहार के पश्चात दलित युवा पीढ़ी ने स्वतः स्फूर्त आन्दोलन खड़ा किया तथा संघर्ष कर विजय पाई है .राजस्थान के दलित युवा आन्दोलन ने अपने खामोश राजनीतिक नेतृत्व को पूना पैक्ट की खरपतवार करार दिया है तथा जातिवादी समूहों कू भी नकारने का काम किया है .सामाजिक संगठनों के नाम से दशकों से दुकानदारी चला रहे लोगों को भी बहुत सारे सवालों का सामना करना पड़ा है .धीरे धीरे ही सही परन्तु डांगावास से लेकर डेल्टा तक के मामलों में एक आत्मनिर्भर दलित अम्बेडकरवादी आन्दोलन का उभर एक सुखद घटना मानी जा सकती है .

  
विद्या भूषण रावत :  क्या दलित संगठनों  को बिलकुल अलग होकर काम चलना चाहिए  आवश्यकता अनुसार निर्णय लेने चाहिए क्योंकि ---जब वामपंथी शक्तिया साथ न दे तो क्या विकल्प हैया दलित बहुजन अल्पसंख्यको को अब एक नयी पहल करनी होगी ताकि उनकी बुनियाद मज़बूत हो और वे राजनैतिक तौर पर अपनी ताकत का एहसास करवा सके .

भंवर मेघवंशी : दलित संगठनों को अलगाव के साथ काम करने की जरूरत नहीं है .उन्हें स्वतंत्र ओर आत्मनिर्भर होने की जरूरत है .उन्हें अपने फैसले खुद लेने ही चाहिए .वामपंथी हो या अन्य किसी प्रगतिशील धारा के लोग हो ,अगर वे साथ नहीं दे तब भी दलित संगठनों को अपने बूते सब कुछ कर पाने का माद्दा रखना होगा .दलित ,आदिवासी ,घुमंतू ओर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को एक साथ आ जाना चाहिए ,हमें पिछड़ों को साथ लेने का मोह फ़िलहाल छोड़ देना चाहिए .अभी तमाम उत्पीडित तबको की एकता कायम करने की जरूरत है .अगर हम ऐसा कर पाते है तो हम राजनीतिक रूप से भी बड़ी ताकत निर्मित कर सकते है .


विद्या भूषण रावत : अस्मिताओं  राजनीती जरुरी है या विचारधारा की हालाँकि लोग कहते हैं के अस्मिताओं में भी विचारधारा  होती है -लेकिन ऐसा गलत भी है /क्योंकि अस्मिताओं का इस्तेमाल करने में संघ परिवार सबसे आगे है।  लोग कैसे समझे के सामने वाला आदमी मेरा है. वो सजातीय हो सकता है लेकिन अपने समुदायों के हितो का दलाल भी ?

भंवर मेघवंशी : मुझे लगता है कि दलित आन्दोलन का अस्मितादर्शी राजनीती का काल बीत चुका है .अस्मिता राजनीति का आज सर्वाधिक फायदा संघ गिरोह के लोग उठा ले जाते है .वे अस्मिताओं का हमसे बेहतर इस्तेमाल करना जानते है .हमें आब अपनी राजनीति विचारधारा पर केन्द्रित करनी होगी .अगर हम दीर्घजीवी बदलाव चाहते है तो यह जरुरी हो जाता है कि हम बुद्ध ,फुले .शाहू ,कबीर ,रैदास ओर अम्बेडकर की मानवतावादी समानतावादी विचारधारा को स्थापित करने का काम करना होगा .अब सजातीय से आगे बढ़कर समविचारी से नाता जोड़ना होगा .

  
 विद्या भूषण रावत : आपकी आत्मकथा एक बेहतरीन दस्तावेज है के जहाँ हमें 'अपनोंको समझने की जरुरत होती है।  मैं समझता हूँ हमारे देश में हर एक का अपना राष्ट्रवाद है और उसके ताकतवर लोग उसे इस्तेमाल करते रहते हैं।  हम सब अपने अपने समूहों को नियंत्रित करना चाहते हैं और उसके लिए सिद्धांत गढ़ते हैं जिसमे विलन दुसरी जातिधर्म  या देश होता है। . ये विलन सुविधा के अनुसार बनाये जाते हैं लेकिन ज्यादादर मामलो में हम स्वयं ही विलन रहते हैं ?

 भंवर मेघवंशी : शायद आत्मकथा के लिहाज से यह जल्दबाजी कही जायेगी ,क्योंकि अभी बहुत कुछ करना बाकी है ,लेकिन इस आपबीती को कहना भी बहुत जरुरी है .हालाँकि उसे कोई भी प्रकाशक छापने का साहस नहीं कर पाया .नए दौर के मीडिया ने उसे लोगों तक पंहुचाया है . हिन्दू तालिबान में मैंने अपनों पर भी और अपने पर भी सवाल उठाये है .आपका यह कथन बहुत महत्वपूर्ण है कि हम अपनी सुविधा के अनुसार खलनायक गढ़ लेते है जो कि प्राय किसी अन्य जाति ,धर्म या संप्रदाय के होते है .नियंत्रण की राजनीति जिसे वर्चस्व का संघर्ष कहना मुझे ज्यादा ठीक लगता है ,वह हमारी कमजोरियों तथा महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए किये जाने वाले गलत फैसलों को भी सिद्धांतों का बाना पहना देता है .दलित नेतृत्व ओर दलित संगठनों को अपने आलोचकों का आदर करना सीखना चाहिए .कोई तो होना चाहिए जो हमारे अन्दर के खलनायक पर भी सवाल खड़े कर सके .राष्ट्र की पूरी अवधारणा ही ताकत ओर सत्ता के बेजा इस्तेमाल से जुडी हुयी है ,इसलिए हर दौर में हर समूह का अलग राष्ट्रवाद होगा और उसका उपयोग भी सब अपनी सुविधा के अनुसार ही करेगे .अंततः राष्ट्र .राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद की पूरी बहस ही एक किस्म का फर्जीवाडा ही है .

विद्या भूषण रावत  : आप एक लेखक है और बहुत नया लेखन आ रहा है।  कैसे देखते नए दौर के दलित लेखन को ?

भंवर मेघवंशी- यह ख़ुशी की बात है कि बहुत सारा दलित लेखन आ रहा है ,उसमे अब भी पीड़ा का भाव बेहद घनीभूत है ,आत्मकथाएं अब भी आत्मव्यथाएं ही बनी हुई है .आज प्रतिरोध का साहित्य विपुलता से आ रहा है .कई भाषाओँ में आ रहा है .फिर भी वह कथित मुख्यधारा साहित्य को टक्कर नहीं दे पा रहा है .हमें दलित साहित्य को मानवता का साहित्य बनाना होगा .वह सिर्फ दलितों का ,दलितों द्वारा, दलितों के लिए साहित्य नहीं होना चाहिए .हर भारतीय उसे चाव से पढ़े .सबको लगे कि इसे पढना बेहद जरुरी है .हमें प्रतिरोध के साहित्य को भी लोकप्रिय बनाना होगा और उसकी पंहुच का दायरा विस्तृत करना होगा .हिंदी पट्टी के दलित लेखकों को नवाचार करने चाहिए .आनंद नीलकंठन के पौराणिक उपन्यास असुर तथा अजेय को पढ़िए ,आपको लगेगा कि किसी केडर केम्प में बैठकर आप बात सुन रहे है .नीलकंठन ने रावण .दुर्योधन .कर्ण जैसे पात्रों के ज़रिये ब्राह्मणवाद पर भारी चोट मारी है .यह तो एक उदहारण मात्र है ,मेरा मत है कि हमें दलित साहित्य जो कि वस्तुत समतावादी साहित्य है .उसके स्वरों को मुख्यधारा के स्वरों में तब्दील करना होगा .


 विद्या भूषण रावत :  क्या हम बहुत ज्यादा  'चिंतक 'तो नहीं हो गए क्योंकि भूमिहीन किसानोंमज़दुरों,गांव में मैला धोने वालोबाल श्रमिकोआर्थिक उदारीकरणनिजीकरण के मुद्दे धीरे धीरे हमारे आंदोलनों से गायब हो गए हैं। ये सारे प्रश्न तो आंबेडकरवादियो के एजेंडे में होनी चाहिए ?

भंवर मेघवंशी- हम चिन्तक हो पाते तब भी हम समाज के लिए उपयोगी जीव साबित होते .मगर हम चिंतित प्राणी हो गए है .सदैव रुदन .शाश्वत रुदन करनेवाले .जो बुद्धिजीवी है हमारे समाज के उनको इतना ज्ञानाभिमान हो गया है कि वो किसी और ही लोक में जीते है .आज समाज में क्या हो रहा है .उससे सरोकार रखे बगैर हम कैसे चिंतक है .आज भी अगर हमारे करोड़ों भाई बहन रोटी के अभाव में भीख मांगने पर मजबूर है .लाखों लोग आज भी मैला उठा रहे है .हमारी बहुत बड़ी आबादी घर .खेती या शमशान की भूमि तक से महरूम है .हमारे लाखों बच्चे कचरा बीन रहे है ,सड़कों पर ज़िन्दगी बसर कर रहे है तो हमें सोचना पड़ेगा कि आखिर इस आर्थिक उदारीकरण .वैश्वीकरण और निजीकरण ने हमको क्या दिया है .अगर जनता के ये मुद्दे हमारे विमर्श और आन्दोलनों से गायब है तो मानकर चलिये कि हम किसी और ही युग में जी रहे है .इस देश के तमाम वंचित ,पीड़ित गरीब जन के बुनियादी मुद्दे अम्बेडकरी आन्दोलन के एजेंडे में लाने होंगे तभी हमारा आन्दोलन जन आन्दोलन होगा .


विद्या भूषण रावत :जो बाबा साहेब को सही ढंग से मानता होगा तो उसके लिए मनुवाद और पूंजीवाद सबसे बड़े दुश्मन हैं।  आज दलित खड़ा हुआ है।  नये युवा आ रहे हैं लेकिन आंदोलन एक 'रिएक्शन भी है।  हालाँकि जो हमारे साथ घटित हो रहा है उसका मुंहतोड़ जवाब तो देना होगा और गुजरातहैदरबाद आदि की घटनाओ ने साबित कर दिया है के दलित अब चुप नहीं रहेंगे लेकिन समाज बदलाव की अम्बेडकरवादी मुहीम तो चलती  रहनी चाहिए ताकि एक प्रबुद्ध भारत का निर्माण हो सके। आपको इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण क्या लगता है ?

भंवर मेघवंशी : प्रतिक्रिया भी जरुरी है ओर तात्कालिक जवाब देना भी कभी कभार बहुत आवश्यक हो जाता है .इसलिए उना और हैदराबाद के मुद्दों पर हुयी त्वरित प्रतिक्रियाओं का मैं तहेदिल से इस्तकबाल करता हूँ.यह संकेत है कि दलितों की नई पीढ़ी बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करेगी .लेकिन इसके पीछे कि साजिश को भी समझना होगा कि कहीं वे हमें अत्याचारों के चक्रव्यूह में तो नहीं फंसा रहे है ताकि हम अपनी सारी उर्जा सिर्फ इसी के विरोध में खर्च करते रहे ओर वे लोग आराम से हम पर राज करते रहे . मनुवाद और पूंजीवाद एक दूसरे के पूरक है .दोनों ही हमारे दुश्मन है .हम मनुवाद से तो लडाई करते है और पूंजीवाद का समर्थन करते है ,तब लडाई भौंथरी हो जाती है .बाज़ार और ब्राहमणवाद एक दूसरे से जुड़े हुए है ,किसी भी एक का साथ देना दूसरे को प्राण वायु पंहुचाने जैसा है .हमें प्रबुद्ध और समृद्ध भारत बनाना है सिर्फ आर्थिक समृद्धि मात्र नहीं .हर तरह से सक्षम और आत्मनिर्भर ,प्रगतिशील एवं वैज्ञानिक चेतना से लेश भारत बनाना होगा ,जो मनु और पूंजी के गुलामों से पूर्णत मुक्त भारत होगा .इसके लिए हमें सांस्कृतिक एवं आर्थिक मोर्चों पर अपनी भागीदारी के लिए काम करना होगा ,अभी हमारी सारी लड़्त राजनीतिक बराबरी और सामाजिक समानता के लिए चल रही है पर इस शास्त्रीय गुलामी और आर्थिक गैरबराबरी को ख़त्म करने की दिशा में हमारे प्रयास अभी भी नाकाफी दिखाई पड़ते है .इन मोर्चों पर ध्यान देना होगा .


 विद्या भूषण रावत : आप आर एस एस के संपर्क में कैसे आये. क्या उन्होंने आपको ढूंढा या आप कौतूहलवश उसमे गए ?
भंवर मेघवंशी- बचपन में खेलकूद की इच्छा ने अनायास ही मुझे आर एस एस तक पहुंचा दिया.मैं जब सातवीं कक्षा का विद्यार्थी था, तब हमारे भूगोल के अध्यापक जी ने मेरे गांव में आ कर हम बच्चों को इकट्ठा करके खेल खिलाना शुरू किया. बाद में वे गीत भी सिखाने लगे.थोड़े दिन बाद उन्होंने हर दिन बिठाकर कुछ बातें भी बतानी शुरू कर दी.बाद में भगवा ध्वज भी लगाया जाने लगा.हमने खाकी निकर और काली टोपी पहनना शुरू कर दिया .हमें यह बताया गया कि हम इश्वर की योजना से संघ की शाखा के लिये चुने गये है. हम भाग्यशाली है कि हमें अपनी मातृभूमि की सेवा करने का अवसर मिला है.शुरू में तो कौतुहलवश तथा खेलकूद के लालच में ही मैं उन तक गया ,पर बाद में उन्होंने मेरी क्षमताओं को पहचानते हुये मुख्यशिक्षक ,कार्यवाह बनाते हुये जिला कार्यालय प्रमुख तक बनाया.
विद्या भूषण रावत :   संघ में गैर मुस्लिमो को शामिल करने का एक उत्साह बना रहता है , कुछ इमोशन, कुछ देश भक्ति और कुछ धर्म की रक्षा का नाटक। 

भंवर मेघवंशी : राष्ट्रवाद की भावना तथा धर्मो रक्षति रक्षित: की बातें तो महज दिखावा है,असल में मुस्लिमों का डर दिखा कर तथा इसाईयों के प्रति नफरत का भाव पैदा करके वे लोगों को शामिल कर लेते है.

 विद्या भूषण रावत : मुझे आज भी याद है के बाबरी मस्जिद के ध्वंश से करीब दो दिन पूर्व में एक सज्जन के पास हरयाणा गया था और जो शब्द अपने कहे वही उस वक़्त उन्होंने कहे के ' अब की बार कार सेवा' अच्छे से होगी। क्या आपको पता था के अबकी बार मस्जिद गिरनी ही है। 

भंवर मेघवंशी -बिल्कुल पता था.यह तो पूर्वनियोजित ही था. बाबरी मस्जिद तोडना ही कारसेवा का असली मकसद था.

विद्या भूषण रावत :  संघ आज भी दलितों और आदिवासी गाँवों की और जा रहा है।  राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, उसका उदहारण है।  क्या कारण  है के लोग उनके कार्यक्रमो में भाग लेते हैं। क्या अम्बेडकरवादी, बहुजनवादी, समाजवादी, वामपंधी और कोई वादी लोगो के पास जनता की सांस्कृतिक महत्वाकांक्षा  को लेकर कोई कार्यक्रम नहीं है या हमने लोगो के पास जाना छोड़ दिया है।  ये बात सही है के हिंदुत्व के लोगो के पास पैसो की कमी नहीं है लेकिन उसका जो कर्मठ कार्यकर्ता है, जो दूर दराज से आता है वो तो अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ काम करता है।  
भंवर मेघवंशी : संघ के लोग मिशनरीज लोगों की तर्ज पर आज सुदूर दुर्गम इलाकों तक में फैल गये है.वे शहरों की वाल्मीकि बस्तियों में मौजूद होते है तो जंगल पहाड़ों में आदिवासियों के बीच भी.सेवा के काम के जरिये वे अपनी विचारधारा को स्थापित करते है.लोगों के सुख दुख में साथ दिखाई पड़ते है.वे लोगों की जरूरतों को समझकर उनकी पूर्ति करते है,जबकि हम लोग सिर्फ सिद्धांत बताते है और भाषण पिलाते है.हमारी धरातल पर उपस्थिति निरंतर घट रही है ,जबकि संघ सम्प्रदाय के प्रचारक गण लोगों के बीच घुलमिल गये है.वामपंथ,अम्बेडकवाद,समाजवाद,हुजनवाद तथा अन्य गैरसंघवादी ताकतों के लोगों ने वाकई आम जन के बीच जाना छोड़ दिया.ये लोग या तो चुनावी बहसों में नजर आते है या खोखले बौद्धिक विमर्शों में.बात केवल पैसे की नहीं है, प्रतिबद्धता की भी है.आरएसएस के पास आज पैसे की कमी नहीं है,यह सर्वमान्य सत्य है,मगर हमें यह भी याद रखना है कि चाहिये कि उसके पास समर्पित कैडर का संख्याबल भी है.उसका कैडर कहीं भी जाने के लिये तैयार है.

 विद्या भूषण रावत : म्बेडकरवादी सांस्कृतिक परिवर्तन की धारा आपके राज्यो मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान में कितनी मज़बूत है।  
भंवर मेघवंशी : ग़ुजरात तो अभी बदलाव का संवाहक बना हुआ ही है. मध्यप्रदेश और राजस्थान में अन्दर ही अन्दर बहुत उबाल आया हुआ. सांस्कृतिक परिवर्तन की धारा का तेज बहाव आने को तत्पर है.सही पहल करने वाले ईमानदार नेतृत्व की जरूरत है.
विद्या भूषण रावत :  संघी प्रोपगंडे का मुकाबला कैसे हो , कभी गाय, कभी बीफ, कभी भारत माता , कभी गंगा और पाकिस्तान और मुसलमान तो चौबीस घंटे उनके जुबान पर रहता है।  ज्यादातर ये राष्ट्र और सांस्कृतिक प्रश्न है जिसमे लोग आसानी से बहक जाते हैं क्योंकि लोगो को लगता है देश की और संस्कृति की बात है।  दलित, पिछड़े, आदिवासी इसको कैसे रेस्पोंड  करे .
भंवर मेघवंशी : हम प्रोपेगंडे का मुकाबला तथ्य और सत्य पर आधारित कथ्य से ही कर सकते है. संघ झूठ बनाने तथा उसे सच की पैंकिंग करके फैलाने की विश्व की सबसे बड़ी फैक्ट्री है.गाय,गंगा,गायत्री,गौमाता,भातमाता,बीफ ,राष्ट्रवाद,देशभक्ति, वंदेमातरम् ये सब इनके उपकरण मात्र है.असल मकसद तो इस देश के मेहनतकश गरीब गुरबा का शोषण करते रहना है.उन्होनें संघ और राष्ट्र को एक दूसरे का पूरक बना दिया है.भाजपा को वोट देने को राष्ट्रभक्ति से जोड़ दिया है.गाय जैसे जानवरों की रक्षा को संस्कृति का सवाल बना दिया है. हमें अपने लोगों तक असली बात को पहुंचाना होगा.देश ,समाज और संस्कृति के मूल्यों की गैर साम्प्रदायिक व्याख्या करनी होगी.जनता के मध्य सीधी बहस करनी होगी.मुझे पक्का यकीन है कि इस हिन्दुत्व के जहरीले राजनीतिक विषाणु को मात सिर्फ दलित विचारधारा ही दे सकती है.हमें पूरी शिद्दत से संघ सम्प्रदाय को एक्सपोज करना चाहिये.

 विद्या भूषण रावत : आपने कहा के वामपंथियो ने जाति को कभी समझा नहीं इसलिए उनके और दलितों के बीच में गैप रहेगा।  इस पूरे राजनैतिक परिदृश्य में तो ब्राह्मणवादी फासीवादी ताकतों को हराने के लिए एक समझ तो विकसित करनी होगी।  कई स्थानों पर दलित मुसलमानो की अच्छी संख्या है और कई जगह पर नहीं।  इसलिए वैचारिक तौर पर हमें अपने साथी तो बनाने पड़ेंगे और ये एक लंबी लड़ाई है जो जैसा आपने कहा विचारधारा की मबबूती से आएगी।  लंबे समय में आप दलितों, आदिवासियों की लड़ाई में किस प्रकार के लोगो का साथ चाहते हैं।  

भंवर मेघवंशी : ब्राहमणवादी फासीवाद से मुकाबला करने के लिये कई प्रकार के एलायंस बनाने होंगे. जहां जहां हम न्यूनतम् साझे मिलन बिन्दूओं के जरिये वामपंथ के साथ चल सकते है,हमें बेहिचक वामपंथ के साथ चलना चाहिये.जहां हमारे पास बहुजन विकल्प हो ,उनके साथ जाने में भी कोई बुराई नहीं है.अगर हम कहीं धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ स्वयं को सहज पाते है तो उनके साथ भी चलने पर विचार करना चाहिये.हमारा विचार शत्रु बहुत व्यापक औऱ विशाल है.उससे कई मोर्चों पर कई सारे समूहों के साथ मिलकर लड़ना होगा.
विद्या भूषण रावत :  आपने कहा के दलितों पे अत्याचार के मामलो में पिछड़ी जातियो का ज्यादा रोल है. मैं ये मानता हूँ के ये भी एक सिंपल स्टेटमेंट है के क्योंकि पिछडो की categorisation देखेंगे तो इसमें भूमिहीन तबका वो दलितों का नेचुरल साथी है।  जो थोड़ा जमीन जायदाद के मामले में धनी है वो भले ही ब्राह्मण ठाकुरो को गरियाले लेकिन दलितों के नेतृत्व में काम करने को तैयार नहीं लेकिन ये तो ग्रेडेड इन एक़ुअलिविटी वाली बात है जब हम ऊपर वाले के साथ जुड़ना चाहते है लेकिन नीचे वाले के नेत्रेत्व में आने को तैयार नहीं ?  क्या आप पिछडो में बदलाव की उम्मीद नहीं करते ?
भंवर मेघवंशी : दलितो पर दबंग पिछड़ों का अत्याचार महज सिंपल स्टेटमेंट नहीं है.यह ग्रासरूट की सच्चाई है.आप एट्रोसिटी एक्ट के तहत दर्ज मुकदमों का विश्लेषण कर लीजिये,आप मेरी स्थापना को तथ्यात्मक पायेंगे. मैं हवा में बात नहीं कर रहा हूं.पिछड़ों का भूमिहीन तबका भले ही आर्थिक तल पर दलितों के नजदीक दिखाई देता हो,मगर वह सामाजिक स्तर पर उसी ब्राहम्णवादी ऊंच नीच की मानसिकता से ग्रस्त है.दलितों का नेतृत्व जिस दिन पिॆछड़ों द्वारा स्वीकार लिया जायेगा तथा भेदभाव व अन्याय अत्याचार बंद कर दिया जायेगा,तब ही बदलाव की उम्मीद बलवती होगी.

 विद्या भूषण रावत : जैसे के मैंने कहा, कोई भी राजनैतिक लड़ाई केवल नकारात्मक नहीं हो सकती।  बुद्ध ने अपना रास्ता दिखाया और पूरी दुनिया में बौद्ध धर्म गया और उसने बड़े बदलाव दिखाए।  बुद्ध ने तो दुश्मनो का नाम तक नहीं लिया. बाबा साहेब ने राजनैतिक लड़ाई लड़ी, हमें अधिकार दिलवाये लेकिन आखिर में ये भी समझ आया के सांस्कृतिक परिवर्तनों के बिना हम राजनैतिक लड़ाई भी नहीं जीत सकते।  क्या आप समझते हैं के बौद्ध संस्कृति की और गए बिना हमारी लड़ाई अधूरी है और केवल राजनैतिक परिवर्तन प्रबुद्ध भारत के निर्माण के लिए नाकाफी है। 

भंवर मेघवंशी  : -राजनीतिक बदलावों को स्थाई करने के लिये सांस्कृतिक परिवर्तनों की आवश्यकता पड़ती है.बु्द्ध का मार्ग वैग्यानिक चेतना और शांति का सम्यक मार्ग है.यहीं दलितों के लिये श्रेयकर भी है.इसको अंगीकार किये बिना ब्राह्मणवाद से मुक्ति संभव ही नहीं है.

विद्या भूषण रावत : उत्तर प्रदेश का चुनाव देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।  क्या कहेंगे इस प्रश्न पर ?
भंवर मेघवंशी : उत्तरप्रदेश का चुनाव इस अंधकार के समय में एक रोशनी ला सकता है .बाज़ार और मनुवाद की ताकतों को अगर वहां से मात मिल सके तो यह हमारे देश की सेहत के लिए बहुत अच्छा होगा .यह सिर्फ चुनाव नहीं है ,इसे जनमत संग्रह के रूप में लेना चाहिए. यह बडबोले पंतप्रधान के आधे कार्यकाल के प्रति रायशुमारी भी हो सकता है .इसलिए इस चुनाव का अपना एक महत्व है .सारी पार्टियाँ भी इसे युद्ध की तरह लड़ रही है .इसे राजनीतिक दलों के मध्य चुनावी संघर्ष से ज्यादा विचारधाराओं के बीच का संघर्ष बनाना होगा .मुझे तो लगता है कि नफरत की राजनीति करनेवालों को इसमें हारना ही चाहिये .
 विद्या भूषण रावत : त्तर प्रदेश के चुनावो को आप नरेंद्र मोदी और हिंदुत्व के लिए रेफेरेंडम मान रहे है।  वह बसपा और समाजवादी पार्टी आमने सामने हैं।  आप किस और लोगो को वोट के लिए कहेंगे।  मैं जानता हूँ ये एक कठिन प्रश्न हो सकता है लेकिन जैसा मेरा मानना है लोगो को '' बीजेपी'को हराने वाली पार्टी को वोट देने के लिए कहने का मतलब है उनको भ्रमित करना।  इसलिए हम सभी साथियो से साफगोई से अपीलकरने को कह रहे हैं।  लोग किसको चुने और क्यों ?

भंवर मेघवंशी : -इसमें कोई कठिनाई नहीं है.पहला लक्ष्य तो बीजेपी हराना होना चाहिये,दूसरा जीतने वाली गैरभाजपाई पार्टी को वोट देना होना चाहिये. सपा और बसपा आमने सामने है,हालांकि भाजपा बार बार यह कह रही है कि उसका मुकाबला समाजवादी पार्टी से है.सारे मीडिया हाउसेज की नजर मे भी यूपी के मुख्य प्लेयर सपा,भाजपा और कांग्रेस है. उनकी नजर में बसपा कहीं है ही नहीं. क्या यह आकलन ठीक है. मैं तमाम अंतर्विरोधों व असहमतियों के बावजूद उत्तरप्रदेश की जनता से अपील करना चाहता हूं कि वह बहन मायावती को राज में लाने के लिये हाथी पर बटन दबायें.ऐसा इसलिये कह रहा हूं ,क्योंकि सपा अपनों की वजह से इस बार अपने आप ही हार रही है. कांग्रेस की खटिया तो बिछ गई है.राहुल गांधी मेहनत भी कर रहे है ,पर बहुत ज्यादा हासिल होने वाला है नहीं. भाजपा को जीतने नहीं देना है,ऐसे में फिलहाल बसपा ही अंतिम विकल्प बचता है

Wednesday, 25 November 2015

सहिष्णुता के अहंकार में डूबा समाज



विद्या भूषण रावत 

आमिर खान की पत्नी के विदेश में बसने की खबर से हर 'भारतीय' सदमे में है और उनको शाहरुख़ खान के साथ पाकिस्तान भेजने की बात कह  रहा है।  आमिर के पुतले जलाये जा रहे हैं और देश की विभिन्न अदालतों में उनके खिलाफ मुकदमे किये गए हैं जिनमे देशद्रोह का मुकदमा भी शामिल है।  सबसे मज़ेदार बात यह है के विदेशो में रहने वाले भारतीय इस अभियान को बहुत हवा दे रहे हैं वैसे भारत में रहने वाले लोग भी कह रहे हैं के आमिर ने गद्दारी की है और उनको इसके परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। है न कितनी अच्छी बात के हम पश्चिमी लोकतान्त्रिक देशो में रहकर पुरे अधिकार  के साथ भारत माता की जय बोलना चाहते हैं , मंदिर बनाना  चाहते है , मोदी  की बड़ी बड़ी रैलियां करना चाहते हैं लेकिन अपने देश में हम पूर्ण दबंगई दिखाना चाहते हैं।  अगर यही बात अमिताभ करते तो  क्या उन्हें कही भेजने की बात होती या नहीं ?

हम फ़िल्मी कलाकारों को भगवान बनाकर न देखे।   व्यक्तिगत तौर पर मैं आमिर खान को ढकोसलेबाज़ मानता हूँ क्योंकि उनकी सत्य  की जीत 'रिलायंस' के चंदे से होती है और भारत में अगर हम भ्रस्टाचार को लेकर लालू को इतना गरियाते है तो अम्बानी तो उस बिमारी के जनक थे।  क्या अर्नब गोस्वामी से भारत में 'ईमानदारी' का राग अलापने  वाले मसीहा लोग अम्बानी  और अडानी के बारे में बात करेंगे।  जब करप्शन की बात हो तो राजनेताओ का ही हिसाब किताब क्यों हो, उद्योगपतियों का क्यों नहीं, क्योंकि भ्रष्टाचार की गंगा उनकी ही दुकानो से निकलती है।  इसलिए आमिर ने जो कहा वो सोच बहुत रिहर्सल के बाद कहा और वो उनका व्यू पॉइंट है और उसे रखने की उनको छूट होनी चाहिए।  उनको पाकिस्तान भेजने और उनको गाली  देकर हिंदुत्व के लठैत आमिर की ही बात को सही साबित कर रहे हैं। 

मैं आमिर की बातो से कत्तई इतेफाक नहीं रखता।  पहले ये के आमिर का यह कहना के भारत में असिहष्णुता अचानक  बढ़ गयी बिलकुल गलत है।  हमारा देश असल में असभ्य  और क्रूर है जहाँ दहेज़ के लडकिया रोज जलती हैं , जहाँ प्रेम विवाह करने पर माँ बाप अपने ही बच्चो की निर्ममता से हत्या करने से नहीं घबराते , जहाँ किसी भी लड़की का शाम को घर से बाहर निकलना मुश्किल होता है , जहाँ सती का आज भी महिममंडन होता हो और विधवा होने पर औरतो  की जिंदगी नरक बना दी जाती हो, जहाँ आज भी मंदिरो में दलितों  के प्रवेश पर उनकी हत्या कर दी जाती हो , जहाँ किसी  के घर में क्या बन रहा हो उस पर समाज नियंत्रण करना चाहता ,हो , जहाँ स्कूलों में बच्चे इसलिए निकल जाते हो के खाना किसी दलित महिला ने बनाया हो , उस देश की महानता और संस्कृति का क्या कहे जहा  एक समाज को पढ़ने का हक़ नहीं और दूसरे को केवल मलमूत्र उठाने की जिम्मेवारी दी गयी हो , जिसके छूने भर से लोग अछूत हो जाए।  लेकिन भारत की महान सभ्यता का ढोंग करने वालो ध्यान इधर  कभी नहीं गया। ऐसा नहीं के इस विषय में लिखा नहीं गया हो या बात नहीं  की गयी हो। 

असहिषुणता का इतिहास लिखे तो शर्म आएगी लेकिन क्यों है के आमिर खान से इतनी नाराज़गी ? मतलब साफ़ है।  भारत के इलीट मुस्लिम सेकुलरिज्म के खेल में भारत की सहिष्णुता के सबसे बड़े 'ब्रांड' एम्बेसडर हैं।  और जो व्यक्ति 'अतुलनीय भारत ' की नौटंकी करता रहा हो वो अचानक पाला क्यों बदल बैठा। आमिरखान और अन्य कलाकारों ने भारत के 'सहिष्णु' होने के सबूत दिए और साथ ही दलितों या पसमांदा मुसलमानो की हालातो पर चुप रहकर उन्होंने हमेशा ही 'सहिष्णु' परम्परा का 'सम्मान' किया है।  शायद रईसी परंपरा में केवल बड़े बड़े लोगो  की बड़ी बड़ी बाते सेकुलरिज्म होती है लेकिन हलालखोर , कॅलण्डर , नट या हेला भी कोई कौम है इसका पता शायद इन्हे पता भी नहीं होगा।  हमें पता है के अभी तक मैला ढोने के प्रथा के विरुद्ध आमिर ने कभी निर्णायक बात नहीं की वो केवल टीवी शो में आंसू  बहाने तक सीमित थी। 

तो फिर क्या बदला।  लोग कहते हैं कांग्रेस के ज़माने में भी सेंसरशिप लगी और फिल्मे प्रतिबंधित हुई।  बिलकुल सही बात है।  हम इमरजेंसी के विरुद्ध खड़े हुए लेकिन अब ऐसा लगता है के सत्तारूढ़ दल का मुख्य आदर्श संजय गांधी और चीखने चिल्लाने वाले मुल्ले हैं जो किसी भी उदार विचार को या उनसे विपरीत विचार को डंडे और धमका डरा के रुकवाना चाहते है।  फ़िल्मी लोगो को उतनी ही तवज्जोह मिलनी चाहिए जितना चाहिए जिसके वे हक़दार हैं।  पिछले कुछ वर्षो में बम्बइया फ़िल्मी लोग हिंदुत्व और  एजेंडा लागु करने में सबसे  प्रमुख  रहे हैं और उनकी प्रसिद्धि ने चुनाव  भी जितवाया है लेकिन उनमे कोई भी ऐसे नहीं हैं जो शाहरुख़, आमिर या अमिताभ का दूर दूर तक मुकाबला कर सके।  अमिताभ हालाँकि गुजरात  या अन्य सरकारी विज्ञापनों में आते हैं लेकिन वो भी राजनैतिक हकीकतों से वाकिफ हैं इसलिए चुप रहते हैं हालाँकि देर सवेर उन्हें मुह खोलना पड़ेगा।  आज के हिंदुत्व कॉर्पोरेट के दौर में भारत की अग्ग्रेस्सिव मार्केटिंग  चल रही हैं इसलिए आमिर या शाहरुख़ जो वाकई में भारत के सवर्णो की 'सहनशीलता' के 'प्रतीक' है इसलिए उनसे ये 'उम्मीद' ये की  जाती है के वे डॉ ए पी जे कलाम की तरह अपने 'भारतीय' होने का सबूत दे।  कोई मुसलमान यदि अपने दिल की बात रख दे तो वो 'देशद्रोही' है।   जिन लोगो को सुनकर हम बड़े हुए साहिर , दिलीप कुमार, मोहम्मद रफ़ी ,  बेगम अख्तर आज उन्हें धर्म के दायरे में डाला जा रहा क्योंकि वे अपनी रे रखती हैं।  कई बार फिल्म स्टार, गायक या खिलाडी लोग वो बात कह देते हैं जो  उनके कई प्रशंषको नहीं जचती उसमे कोई बुरी बात नहीं है।  हम आमिर खान से साम्प्रदायिकता और सहिष्णुता का ज्ञान नहीं लेते अपितु उनकी फिल्म इसलिए देखते हैं के वो साफ सुथरी फिल्म बनाते है। क्या हम रवीना टंडन, अशोक  अशोक पंडित, गजेन्द्र चौहान या मनोज तिवारी से ज्ञान ले।  हाँ फिल्मो में बहुतसे  लोग रहे हैं जिन्होंने गंभीर विषयो पर बोला है और उनकी समझ समझ है।  बाकि हमको कोई कलाकार इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि हमें उसकी एक्टिंग अच्छी लगती है या फिल्म अच्छी लगती है।  अगर आप आमिर या शाहरुख़ की फिल्मोंी का बॉयकॉट इसलिए करना चाहते हैं के उनकी कोई बात आपको अच्छी नहीं लगी तो फैसला आपका है क्योंकि  फिर आपको  मनोज तिवारी, अनुपम खेर, अशोक पंडित, गजेन्द्र चौहान  आदि की फिल्मे देखनी पड़ेंगी क्योंकि उनके विचार आपको अच्छे लगते हैं।  

 आमिर खान ने जो कहा वो उनका हक़ था और शायद देश का बहुत बड़ा तबका वैसे ही सोच रहा है।  अपने दिल की बात को अगर वो कह दिए तो हमारा क्या फ़र्ज़ है  ? उसको गालियो से लतियाये या भरोषा दिलाएं।  आमिर ने जो गलत कहा वो के असिषुणता बढ़ रही है क्योंकि वो पहले से ही हैं।  इस देश के लोगो ने उनको प्यार दिया है।  जो लोग इस वक़्त दबंगई कर रहे है वो हमें एमेजेन्सी के संजय गांधी के गुंडों की याद दिला रहे हैं। आमिर को कहना चाहिए कौन लोग ऐसा तमाशा कर रहे हैं।  ये पुरे देश के लोग नहीं हैं ये एक पार्टी विशेष और जमात विशेष के लोग हैं जिन्होंने उन सभी को गरियाने  और धमकाने का लाइसेंस लिया हुआ है जो इनकी विचारधारा से मेल नहीं खाते।  इसलिए आमिर साहेब सबको न गरियाये।  साफ़ बोलिए वो कौन हैं जो असहिषुणता फ़ैला रहे हैं।  एमर्जेन्सी का विरोध करने वालो का सबसे बड़ा मॉडल इमरजेंसी का दौर ही है और वही व्यक्तिवादी राजनीती आज हावी है केवल फर्क इतना है के उस दौर में दूरदर्शन और रेडियो पर समाचार सरकार सेंसर करती थी और आज सरकार और सरकारी पार्टी के दरबारी पत्रकार पूरी ताकत से ये काम कर रहे हैं।  आज अर्नब गोस्वामी और सुधीर चौधरी का दौर है जिसमे सरकार से मतभेद रखने वालो की खबरे सेंसर होंगी अपितु उनको अच्छे से गरियाया जायेगे आखिर ९ बजे के प्राइम टाइम शोज का यही उद्देश्य है। हकीकत यह है के हम वाकई में एक भयानक दौर से गुजर रहे हैं जिसमे तिलिस्मी राष्ट्रवादी नारो की गूँज में हमारे मानवाधिकारों और अन्य संविधानिक अधिकारों की मांग की आवाज़ो को दबा दिया जा रहा है।  पूंजीवादी ब्राह्मणवादी  लोकतंत्र से आखिर आप उम्मीद भी क्या कर सकते हैं वो तो सन्देश वाहक को ही मारना चाहता है ताकि खबर ही न रहे और खबरे बनाने और बिगाड़ने के वर्तमान युग में मीडिया निपुण होता जा रहा है जो वहुत ही शर्मनाक है।