Friday, 6 July 2018

मंडल पर जाति और पूँजी के गठजोड़ का हमला



विद्या भूषण रावत

७ अगस्त १९९० का ऐतहासिक दिन जब भारतीय संसद के अन्दर तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन की अनुसंशाओ को स्वीकारते हुए भारत सरकार की नौकरियों में पिछड़ी जातियों के लिए  २७% आरक्षण की घोषणा की थी. भारत की राजनीती में इससे बड़ा भूचाल कभी नहीं आया जब देश की सारी सवर्ण जातीया और उनका ‘संभ्रांत’ बुद्धिजीवी वर्ग इसके विरुद्ध खडा हो गया. देश भर में सवर्ण छात्रो ने इसके विरुद्ध आन्दोलन किया और मनुवादी मीडिया ने कोशिश की के सरकार इसको वापस ले ले. वी पी सिंह, शरद यादव और राम विलास पासवान की तिकड़ी ने इस सन्दर्भ में सबसे ज्यादा गालिया खाई. स्थान स्थान पर उनके पुतले फूंके गए और उनको भद्दी भद्दी गालियों और उपाधियो से नवाजा गया. सबसे बड़ी बात ये थी के मंडल के समर्थन में अम्बेद्कर्वादियो ने जो आन्दोलन खड़ा किया था उसे मीडिया ने पुर्णतः नज़रअंदाज कर दिया. उस दौर में दलित पिछड़े, आदिवासियों, और मुस्लिम समुदाय के पिछड़े तबको के बीच जो सहमती बनी वो बहुत बड़ी थी और उसके नतीजे अगले चुनावो में दिखाई दिए.

सरकार के एक बहुत बड़े फैसले ने भारत के राजनितिक पटल को बदल दिया. दलितों, पिछडो, आदिवासियों में एक अभूतपूर्व एकता दिखाई दी और स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहिली बार ऐसा लगा के कोई सरकार बहुजन समाज के प्रश्नों पर गंभीर है. बाबा साहेब संसद में आ चुके थे, उन्हें भारत रत्न प्रदान किया जा चूका था, उनकी स्वर्ण जयंती के अवसर पर अनेको कार्यक्रम थे लेकिन प्रमुख था उनके साहित्य को विभन्न भारतीय भाषाओं में पहुँचाना. सरकार इन डॉ आंबेडकर प्रतिष्ठान को मज़बूत किया और नव बौधो को भी आरक्षण के दायरे में लाने का काम किया. इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण था वो घोषणा के यू पी एस सी में अनुसूचित जातियों, जन जातियों की भर्ती का बैकलॉग उन्होने जातियों द्वारा भरा जाएगा क्योंकि इससे पहले ये बहुत चालाकी से कर दिया जाता था के अनुसूचित जाति जनजाति के अभ्यर्थियों को इंटरव्यू में फ़ैल करके ये कहकर के ‘योग्य अभ्यर्थियों के अभाव’ में तथाकथित जनरल से बैकलॉग भर दिया जाता था. यही कारण है आरक्षण के बावजूद भी कई वर्षो तक सरकारी सेवाओं में सवर्ण एकाधिकार बना रहा.

१९९० में इस घटनाक्रम् के बाद से ही पुरोहितवादी-पूंजीवादी ताकते इकठा हो गयी और अनेक प्रकार से षड्यंत्र करने लगी. भाजपा ने राममंदिर का जो कार्ड खेला वो दलित पिछडो को सत्ता से दूर करने का एक सबसे बड़ा षड़यंत्र था लेकिन इसके लिए उसने न केवल दलितों, आदिवासियों अपितु बड़ी संख्या में पिछड़ी जाति के नेताओं की भी एक अच्छे फेहरिश्त तैयार की ताकि उनको आगे कर लोगो को भ्रमित किया जा सके. कांग्रेस का रवैय्या भी उनसे ज्यादा खतरनाक रहा क्योंकि राजीव गाँधी के समय से ही कांग्रेस ने खुले तौर पर मंडल का विरोध कर भाजपा से ज्यादा  बड़ी भूमिका लेने की कोशिश की. बहुजन समाज पार्टी उस समय तक इतनी ताकतवर नहीं थी के इस प्रतिरोध में कुछ भूमिका निभाती लेकिन उसका काडर तो शुरू से ही अम्बेडकरवादी आन्दोलन से जुड़ा रहा इसलिए वे तो शुरूआती दौर से ही आनुपातिक हिस्सेदारी के पक्षधर रहे. समाजवादी पार्टी उस समय तक बनी नहीं थी और चंद्रशेखर की पार्टी तो उसके विरोध में थी. चंद्रशेखर एक ‘समाजवादी’ नेता जरुर होंगे लेकिन उनके अन्दर की ठकुरात कभी गयी नहीं. सामंती सोच के कारण ही उन्होंने कभी भी सूरजदेव सिंह और अन्य बड़े मफ़िआओ के साथ अपने संबंधो को नाकारा नहीं हालाँकि वो इस सन्दर्भ में बेहद साफ़ थे और अपनी बात को रखने से भी नहीं डरते.

मंडल की पहली हार २००४  के चुनावो में पुर्णतः हो गयी और कांग्रेस के ब्राह्मणवादी नेतृत्व ने इतनी दिक्कतों के बाद सत्ता मिलने पर भी अपने गलतियों को नहीं सुधारा. कांग्रेस में अर्जुन सिंह जैसे लोग थे जिन्होंने शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की बात की और उसे लागू करने के प्रयास किये लेकिन मनमोहन-चिदंबरम-मोंटेक अहलुवालिया के ‘उदारीकरण’ और सोनिया गाँधी के ‘मनरेगा’ ब्रांड समाजवाद ने कांग्रेस को दरअसल कही का नहीं छोड़ा. कांग्रेस ने इस पूरे १० वर्षीय दौर में पिछड़ी जातियों या किसानो की तरफ देखने तक के प्रयास नहीं किये. उसके पास कृषि क्षेत्र को मज़बूत करने के लिए कोई ठोस योजना नहीं थी और न ही उसके पास पिछड़े जातियों के किसी भी विश्वसनीय नेता का नाम. २००९ में कांग्रेस जब दोबारा सत्ता में आई तो उसके हौसले असमान पर थे और मंत्री अब कार्यकरताओ की और तक नहीं देख रहे थे. चिदंबरम जैसो ने कांग्रेस की जीत को अपने उदारिकरण की जात माना और फिर जो देश के विभिन्न हिस्सों में पार्टी की अधिग्रहण जैसी नीतियों के खिलाफ घमासान हुआ उसने उसकी कमर तोड़ दी. २०१३ आते आते कांग्रेस ने कई बेहतरीन कानून बनाये लेकिन तब तक उसके विरुद्ध माहौल बहुत बन चूका था. राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी ने कांग्रेस के अजेंडे को बदलने के प्रयास किये और उसमे दलित पिछडो की भागीदारी की कोशिश की लेकिन कांग्रेस के सशक्त ब्राह्मण लॉबी सब फ़ैल कर दी. दलित पिछडो के नेतृत्व ने पार्टी के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. जब राजनैतिक शक्तिया लोगो के सवाल उठाने में असमर्थ होते है तो फिर लोग स्वयं ही अपने हाथ में सत्ता लेलेते है. पिछड़ी जातियों, खासकर किसानो और अन्य तबको में भयानक असंतोष था, दलित में वही बात थी, मुसलमानों में तो पिछड़ी और दलितों के प्रश्न उनके ही नेता नहीं उठाने देते थे लेकिन सचर आयोग की रिपोर्ट ने सबकी आँखे खोल दी और कई राज्य सरकारों ने पिछड़े जातियों के आरक्षण में मुसलमानों को भी जगह देदी हालाँकि अभी भी मुस्लिम दलित के नाम पर आरक्षण नहीं है जो उन तबको के साथ घोर अन्याय है जो आज भी छुआछूत और अन्य किस्म के जातीय भेदभाव झेल रहे है.

लेकिन जैसे ही दलित पिछडो आदिवासियों और मुसलमानों के पसमांदा तबको ने अपने अधिअरो के लिए बाते उठाना शुरू की, पुरोहितवादी पूंजीवादी गठजोड़ ने भी उनको पुर्णतः अशक्त करने के तरीके ढूंढ लिए. जल जंगल जमीन पर अब सामुदायिक हको से ज्यादा निजी मल्कियातो का कब्ज़ा होने लगा. लेकिन जनता के दवाब में जैसे ही भूमि अधिग्रहण बिल २०१३ पास हुआ वो पूंजीवादी शक्तियों ने सीधे अपने पर हमला समझा.संघ परिवार जानता है के सीधे वह लड़ाई में कभी भी जीत नहीं पायेगा इसलिए भ्रष्टाचार का प्रश्न बनाकर अन्ना का आन्दोलन खड़ा करा गया जिसे इसे देश के पूंजीवादी पुरोहितवादी समूह का पूरा समर्थन था. और यहाँ भी वैसे ही हुआ जैसे मंडल के दौर में हुआ था. देश का ‘प्रगतिशील’ वामपंथी भी अन्ना की हवा में बह गया जैसे वह मंडल विरोध में १९९० में उतर गया था. आखिर क्या कारण था देश के गाँधीवादी, मार्क्सवादी, संघी सभी अन्ना जैसे निहायत ही पुरातनपंथी और ढकोसलेबाज व्यक्ति में क्रांति देखने लग गए. रामदेव से लेकर स्वामी अग्निवेश तक और सामाजिक आन्दोलनों के बड़े बड़े नाम इस पूरी ‘आंधी’ में नेस्तनाबूद हो गए. गलती उनकी नहीं थी, अपितु सत्ता से जुड़ने का जो प्रभाव या प्रभामंडल है, वो ही इसके पीछे था. नेता चाहे कुछ बोले लेकिन जंतर मंतर और रामलीला मैदान पर इकठ्ठा हुई वो भीड़ दलित और आरक्षण विरोधी थी. मेरी नज़र में वो संविधान के विरुद्ध भी एक संकट था जो केवल ये कह रहा था के रामलीला मैदान में उपस्थित ये कुछ हज़ार लोग ही ‘देश’ है और ‘आम’ है और उनके हाथ खड़ा कर देने मात्र से संविधान में बदलाव आ जाना चाहिए. हम ऐसे खतरनाक मंसूबो को समझना होगा.

कांग्रेस के खिलाफ लोगो के गुस्से को बहुत धूर्तता और चालाकी से पुरोहितवादी पूंजीपरस्त ताकतों ने अपने नियंत्रण में ले लिया और आज देश में जो इन ताकतों ने राजनैतिक तौर पर प्राप्त किया उसे वे अब खोने के लिए तैयार नहीं है. सवर्ण जातियों को अब समझ आ चूका है के दलित, पिछडो, आदिवासियों में अपने साथ हुए ऐतहासिक अन्याय को अब आगे सहन करने की सहनशक्ति नहीं है और इसलिए वे इस ‘स्वर्णिम’ अवसर के जरिये इन समुदायों के लिए प्रदान किये सभी अवसरों को साम दाम दंड भेद सभी के जरिये समाप्त कर देना चाहते है. संघ परिवार और भाजपा इस मसले को मुख में राम बगल में छुरी वाले तरीके से ख़त्म कर देना चाहते है. संघ परिवार, भाजपा का आई टी सेल हिन्दू मुसलमान, भारत पाकिस्तान, राम जनम भूमि बाबरी मस्जिद की बाते करते रहेंगे और नरेन्द्र मोदी जी बाबा साहेब आंबेडकर, कबीर और हो सके तो रैदास जी का गुणगान करते रहेंगे और इन सभी के नाम कर अरबो फूंक डालेंगे, दलित और पिछडो के अंतर्व्द्वन्दो का इस्तेमाल करेंगे, दलित की अन्य जातियों को चमारो और जाटवो के खिलाफ खड़ा करेंगे, पिछडो की अन्य जातियों को यादवो के विरूद्ध करेंगे और मोटे तौर पर सभी को हिन्दू बोलकर मुसलमानों के खिलाफ लड़ाएँगे. देश का मीडिया ऐसे सभी मसलो पर बाते करता रहेगा जिसमे सवर्णों के बढ़ चढ़कर न केवल भागीदारी होती है अपितु उनका नेतृत्व भी होता है.

पिछले चार वर्षो में इस सरकार ने बड़ी धूर्तता से ब्राह्मणवादी पूंजीवादी ताकतों की मजबूती का काम किया है और दलित, पिछड़े, आदिवासियों और मुसलमानों को पुर्णतः शक्तिहीन करने के प्रयास किये. एक तरफ दलितों और मुसलमानों पर स्थान स्थान पर गाय, गौमांस, पाकिस्तान, और राष्ट्रभक्ति के नाम पर हमले होते रहे जिसमे सरकार ने दोषियों पर कार्यवाही करने के बजाय उत्पीडित लोगो को ही और तंग किया. शुरुआत में ही विश्विद्यालयो में छात्रो पर हमला किया गया. रोहित वेमुला की मौत के लिए जिम्मेवार लोग अभी भी पुरुस्कृत हो रहे है. जे एन यू जैसे संसथान में प्रसाशन जिस घटिया भूमिका में है वो आश्चर्य करती है. देश भर में विश्विद्यालयो में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, पिछड़ी जातियों के लिए जो आरक्षण निर्धारित था उसको ख़त्म करने के लिए बेहद बेशर्मी से आरक्षण को डिपार्टमेंट वाइज कर दिया गया. मतलब ये के पहले एक विश्विद्यालय में यदि १०० सीटें होती थी तो १७% दलितों, ७% आदिवासियों और २७% पिछडो को आरक्षण मिलने की सम्भावना होती थी लेकिन भाजपा ने सत्ता में आने के बाद से ही इसको ‘क़ानूनी’ तरीके से ख़त्म करने के इंतज़ाम किये ताकि ये भी न लगे के संविधान का उलंघन है और सवर्णों को खुश भी किया जा सके. अब विभागों की सीटो के हिसाब से आरक्षण मिलेगा. यदि किसी विभाग में एक ही सीट है तो आरक्षण की कोई गुंजाइश नहीं है. इस प्रकार की व्यवस्था से सभी विश्विद्यालयो से चुपचाप आरक्षण ख़त्म कर दिया गया है.

इस वर्ष यदि आप छात्रो से पूछे तो एस सी, एस टी, ओ बी सी छात्रो को छात्र्व्रतीया तक नहीं मिली है. प्राथमिक, माध्यमिक, सेकेंडरी की कक्षाओं के हाल और भी ख़राब है. बच्चो को मिल रहा मिड डे माल अधिकांश राज्यों में ख़त्म है या उसमे कोई गंभीरता नहीं है. अभी उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश रोडवेज की बसों में भर्ती का विज्ञापन आया और शर्मनाक बात ये के उसमे पिछड़ी जातियों के आरक्षण की कोई बात नहीं कही गयी है. पिछडो पर तो कई तरीको से हमला है. उनकी खेती पर इतना जानलेवा हमला कभी नहीं था जब चालाकी से ये प्रयास किये जा रहे है के किसान स्वयं ही खेती छोड़ दे ताकि उनकी जमीनों पर कॉर्पोरेट को काबिज कर उनसे खेती करवाए. जब बाज़ार में आटे से लेकर सब्जिय तक पूंजीपतियों की दुकानों पर मिलेगा तो किसान और छोटे दुकानदार तो मरेंगे ही. पूरा गौमाता की जय जयकार का अभियान पिछड़ी जातियों पर हमला है जो अब गायो की खरीद फरोक्त नहीं कर सकते. धीरे धीरे करके भारत के विशालकाय बाज़ार पर पूंजीपति कब्ज़ा करके दूध से लेकर आटा चावल तक बेचेंगे और ये सब होगा किसान की मौत पर. किसानो को ऐसे उलजलूल सवालो में फंसाओ जो उसी तरक्की और अधिकारों से दूर हो और ऐसे आर्थिक सामजिक स्थितिया पैदा कर दो के किसान स्वयं ही खेती छोड़ दे. देश की खाद्यान्न सुरक्षा के लिए भी ये खतरनाक है लेकिन गुजराती प्रवासियों की कंपनियों को फायदा पहुचाने के लिए दालो, चीनी, प्याज आदि का भी आयात किया जा रहा है.छत्र आखिर इससे प्रभावित होने वाला समाज कौन है ?
दिल्ली विश्वविद्यालय के बहुजन अध्यापक कम से कम पिछले तीन महीनो से आरक्षण बचाने के लड़ाई लड़ रहे है. आज आलम ये है विश्विद्यालयो में छात्रो की पढ़ाई की फीस बहुत बढ़ चुकी है. सरकार और विश्विद्यालय अनुदान आयोग अब ये कह रहे है के सभी कालेज और विश्विद्यालय अपने धन की व्यवस्था खुद करेंगे. इसका मतलब क्या है. यदि सरकार शिक्षा से पुर्णतः हाथ खींच लेगी तो क्या होगा ? इसकी मार सब पर पड़ेगी, गरीब सवर्णों पर भी लेकिन जो सबसे ज्यादा प्रभावित तबका होगा वो होगा बहुजन समाज.

अब सरकार ने एक और नयी घोषणा की है. वह है के विश्विद्यालय अनुदान आयोग को ख़त्म कर वह एक उच्च शिक्षा का नया आयोग बनाना चाहती है. जिसमे अध्क्यक्ष, उपाध्यक्ष, और मेम्बर सेक्रेटरी के अलावा १२ अन्य सदस्य होंगे. इनमे एक देश के ‘नामी गिरामी’ उद्योगपति भी होंगे. उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को बनाने के नाम पर लाये जा रहे इस ड्राफ्ट बिल को देखकर तो लगता है के सरकार इस पर कोई बहस नहीं चाहती और वह सीधे यू जी सी को ख़त्म कर अपना पूरण नियंत्रण वाला आयोग बना देना चाहती है. गुणवत्ता के नाम पर स्किल इंडिया का प्रचार होगा. इसके अलावा सरकार के नए आयोग को निजी विश्विद्यालयो को खोलने की अनुमती देने का अधिकार होगा. अभी ये प्रक्रिया विधानसभाओ  या संसद के हाथ में थी. नए कमीशन को विश्विद्यालयो की मान्यता रद्द करने का अधिकार भी होगा और विदेशी विश्विद्यालयो या देश में भी नामी गिरामी कालेजो को भी विश्विद्यालाओ के समकक्ष डिग्री देने की स्वतंत्रता होगी. यानी शिक्षा में वर्ग चरित्र भी बढेगा क्योंकि दिल्ली के सेंट स्टीफेंस, लेडी श्री राम कालेज, श्रीराम कालेज ऑफ़ कॉमर्स और कई ऐसे कालेज है जिनके बारे में कहा जाता है के वे डीम्ड यूनिवर्सिटी होने के सपने देख रहे है और विदेशी विश्विद्यालयो के साथ मिलकर कार्य करना चाहते है. आज भी ऐसे विद्यालयों में आम छात्रो का एडमिशन मुश्किल होता है. क्या जब इनको क्वालिटी के नाम पर कुछ भी करने की आजदी होगी तो ये बहुजन समाज के छात्रो को कोई स्थान देंगे. हम तो ये मानते है देश में विविधता को अपने कैंपस में समेटने का थोडा बहुत काम जे एन यू ने किया है. चाहे जो है, वहा से दलित, ओ बी सी, मुस्लिम, आदिवासी छात्र छात्राए बड़ी संख्या में आये है और दिल्ली विश्विद्यालय में उनकी संख्या बढ़ी है. देश के अन्य विश्विद्यालयो में भी बहुजन छात्र भरी संख्या में आ रहे है.

प्रतियोगी परीक्षाओं में भी अब एस सी एसटी और ओ बी सी छात्र न केवल आरक्षण  से आ रहे है अपितु जनरल सीटो से भी टॉप कर रहे है लेकिन चालाकी से उनको भी आरक्षण में डाला जा रहा है. इस प्रकार से धूर्त अधिकारियों ने ‘जनरल’ या ‘सामान्य’ सीटो को सवर्णों की ‘घोषित कर दिया है जो संविधान के साथ मक्कारी है. जनरल या सामान्य का मतलब सवर्ण नहीं अनारक्षित है. जैसे रेलवे के अनारक्षित कोच में टिकेट लेकर कोई भी बैठ सकता है वैसे ही अनारक्षित सीट पर साधारण कम्पटीशन के जरिये आने वाले सफल प्रतियोगियों को आरक्षण की केटेगरी में डालना दरअसल दलित ओ बी सी , आदिवासी समुदायों के अधिकारों पर डाका डालने जैसे है.

वैसे न्यायपालिका में कही पर बहुजन समाज का प्रतिनिधित्व नहीं है. मीडिया उनकी पहुँच से बाहर है. एकेडेमिया में थोडा जगह थी वो भी हाथ से निकल चुकी है, सिविल सर्विसेज में नरेन्द्र मोदी की सरकार अब बाहर से ‘विशेषज्ञों’ के नाम पर नयी भर्ती करेगी जो सीधे सीधे आरक्षण पर हमला है. सारे काम चुप चाप या बेशर्मी से हो रहे है लेकिन दलित बहुजन समाज के राजनैतिक नेतृत्व इन प्रश्नों पर अपने साथियो के साथ में जो युवा है और समाज को वैचरिक नेत्रत्व देने के लिए आगे आयेंगे, चुप चाप है.

आज ७ जुलाय शाम तक यू जी सी को ख़त्म करने वाले ड्राफ्ट बिल पर जनता की राय देने की डेड लाइन है जो शिक्षा में सीधे सीधे निजीकरण को आगे करने और आरक्षण को ख़त्म करने की चाल है. हमारे नेता चुप है. क्यों ? शिक्षा का प्रश्न दलित बहुजन समाज के सम्मान सहित मरने जीने का प्रश्न है. राजनैतिक गणित छोड़कर अब इन प्रश्नों पर सवाल खड़े करने का प्रश्न है. शिक्षा का निजीकरण या व्यवसायीकरण सभी समाजो के गरीब और होनहार बच्चो के साथ धोखा और अन्याय है. क्या इन प्रश्नों पर अब बोलने और अनोद्लन का समय नहीं है.

७ अगस्त १९९० को विश्वनाथ प्रताप सिंह ने संसद के अन्दर पिछड़ी जातियों को आरक्षण की घोषणा की और देश में सवर्णों ने इसे अपने अधिकारों पर हमला मानते हुए उस सरकार के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ दिया था. हम लोगो उस समय एक एक पल याद् है. अखबारों की भद्दी गालिया याद है. उस समय के योध्या लोग आज मंत्री भी है और कुछ विपक्ष में भी. क्या हम जागेंगे या नहीं. सवाल उस राजनैतिक नेतृत्व का है जो अपने युवाओं की भावनाओ से खेल रहा है और उसके प्रश्नों को दमदार तरीके से नहीं उठा रहा. ये चुनाव का प्रश्न है. अभी इस बिल और हो रही धोकेबाजी को रोकना जरुरी है. क्या हमारी साल की महत्वपूर्ण लिस्ट में आज का दिन है या नहीं. यदि नहीं तो भविष्य में ये तारीख जरुर याद दिला देगी के हम अपने अधिकारों के लिए सतर्क नहीं थे और कारवा कैसे लुटा. उम्मीद है सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन में विश्वास करने वाले सभी लोग इस पर अपना विरोध जताएंगे और इस ड्राफ्ट बिल को वापस लेने के मजबूर करेंगे या इसमें बहुजन समाज के हितो को सुरक्षित करने के लिए व्यापक बहस की बात करेंगे. मात्र संसद में बहस से इस बिल को पास करना अन्याय होगा क्योंकि इस ड्राफ्ट पर सभी विश्विद्यालयो, और अन्य शोध संस्थानों, छात्रो और छात्र संगठनों के बीच भी चर्चा होना जरुरी है. क्या हमारे नेता थोडा समय निकालकर इन प्रश्नों पर कोई निर्णायक लड़ाई लड़ने को तैयार है या नहीं, यदि वे ऐसा नहीं करते तो भविष्य की पीढ़िया उन्हें कभी माफ़ नहीं करेंगी.




उत्पीडन की संस्कृति के विकल्प की जरुरत


   

विद्या भूषण रावत

पिछले दो हफ्तों में तीन बड़ी घटनाएं हुई है जिनपर जैसी चर्चा होनी चाहिए वैसे नहीं दिखाई दी क्योंकि गत चार वर्षो में हमारे देश के मीडिया ने मुद्दों से ध्यान भटकाने की ‘कला’ में जो महारत हासिल की है वो दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा होगी. पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश में भी मार्शल लॉ, या राजसत्ता के समय मीडिया ने विरोध दर्ज किया और सत्ता पर सवाल खड़े किये लेकिन भारत में ब्राह्मणवादी व्यवस्था के पोषक इस समय पूरी कोशिश कर रहे है के देश से विपक्ष और विरोध दोनों ही ख़त्म कर दिए जाएँ ताकि वे अपनी मर्जी का मनुवादी राज्य हमारे उपर थोप सके. जब मीडिया सार्थक बहस से बचता है तो हमारा कर्त्तव्य है उन प्रश्नों को उठाये जो भाड़े के तंत्र इन जानबूझकर छुपा दिए हैं. उन घटनाओं को समझने की कोशिश की जाए तो देश पर मंडराते खतरे दिखाई देते है जो किसी भी तथाकथित दुशमन सी ज्यादा खतरनाक और भयावह है. पहले घटनाक्रमों को देख ले और फिर उनसे अपने नतीजे निकाले.

सर्वप्रथम, भारत के राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद की दो प्रख्यात मंदिरों में हुई यात्राओ के दौरान उनके साथ हुई बदसलूकी पर देश के किसी भी नेता खासकर जो सरकार में है, एक भी बयान नहीं आया. देश के राष्ट्रपति को इन मंदिरों में उनकी जाति की याद दिलाई गयी और जब भारत का प्रथम नागरिक इन स्थानों में सुरक्षित नहीं है तो देश के लाखो गैर द्विज इनमे अपना सम्मान प्राप्त करेंगे. देश में समरसता की बात करने वाला संघ परिवार इस मामले में चुप है. देश के नामी गिरामी बाबा जो देश के संस्कृति का बखान करते रहते है अचानक से चुप है, आखिर क्यों ? जो कहते है के देश से जाति ख़त्म हो गयी है, छुआछूत मिट चुकी है वे सभी चुप है या मज़े ले रहे है.


दूसरी घटना उत्तराखंड की राजधानी में मुख्यमंत्री के जनता दरबार में हुई जहा एक महिला प्राध्यापक अपने स्थानांतरण के सिलसिले में उनसे मिलने आई थी. मुख्यमंत्री महोदय उस महिला के सवाल पूछने से इतने खफा हुए के उन्होंने महिला को तुरंत निलंबित करने और उसकी गिरफ़्तारी के आदेश दे दिये . मुख्यमंत्री का कहना था के उनके जनता दरबार में सरकारी लोगो के स्थानांतरण से सम्बंधित कोई बात नहीं होनी चाहिए और इसके सम्बन्ध में एक निति बनेगी. बिलकुल बात सही है इन कहानियो के पीछे की कहानी क्या है ये भी हमें नहीं पता हालाँकि ये भी विदित है के इन्ही महिला को एक और भाजपाई मुख्यमंत्री ने जो कुम्भ के मेले में खूब कमाई के लिए बिख्यात हुए, ने निलंबित किया था. दोनों मुख्यमंत्रियों की पत्निया भी अध्यापिकाएं है और वर्तमान मुख्यमंत्री की पत्नी देहरादून में पिछले १७ वर्षो से कार्यरत है और उनका कोई स्थानांतरण कभी नहीं हुआ. वैसे इतने पूरे वर्षो में तो भाजपा की सरकार नहीं थी लेकिन नेताओं की आपसी रिश्तेदारी तो सबको पता है उनके कोई काम नहीं रुकते. तकनीक तौर पर ट्रान्सफर क्यों नहीं हुआ या महिला पहले भी निलंबित हुई या मुख्यमंत्री या अन्य नेताओं की बीवियों के तबादले क्यों नहीं हुए इन पर तो अवश्य चर्चा होनी चाहिए और मीडिया को इनका पर्दाफाश भी करना चाहिए लेकिन जो एक बात मुख्यमंत्री के दरबार से दिखाई दिया वो है हमारा सामंती चरित्र. क्योंकि ऊँची आवाज में बोलना हमारे नेताओं को अखरता है और वह भी जब एक महिला आँख में आँख डाले सवाल पूछे तो अपने आप ही ‘चरित्रहीन’ हो जाती है. वैसे भी संघ की आदर्श महिला वो है जो नौकरी भी करे तो पहले पत्नी, बहु, बेटी की भूमिका ढंग से निभाये और महीने के आखिर में सैलरी घर पर थमा दे, रोज ऑफिस से आये तो सीधे किचन में घुसे और बिना ऊफ के काम शुरू कर दे ताकि ‘परिवार’ खुश रह सके.
अब तीसरी घटना को देखिये जहाँ आपको संघी मानसिकता के दर्शन मिलते है. सुषमा स्वराज जी संघ परिवार की डिक्शनरी की आदर्श महिला है. अभी भी परम्पराओं में ‘पूरी’ तरह से ढली हुई, सुष्माजी ने तो कर्वाचोथ के व्रत को रोमांटिक बनाकर बहुत पोपुलर बना दिया. तीज पर उनका झूला झूलना और देश भर में हो रहे महिलाओं के अत्याचारों पर बिलकुल चुप्पी साधकर बैठना ये संघ के अवसरवाद के उदहारण है. जब हिंदुत्व के संगठन जम्मू में कठुआ कांड के आरोपियों को बचाने के लिए सड़क पर आ रहे थे और एक मासूम लड़की के पक्ष में लड़ रही एक बहादुर महिला को बायकाट करने की धमकी दे रहे थे तब भी वह चुप थी लेकिन पाकिस्तान के कुछ बीमार बच्चो को और लखनऊ में एक हिन्दू मुस्लिम जोड़े को पासपोर्ट बनाने के मामले में जो त्वरित कार्यवाही उन्होंने की उस पर उनकी पार्टी के ऑनलाइन भक्तो ने उन्हें ही ट्रोल करना शुरू कर दिया. सुषमा जी जैसे महिला जिसने हिंदुत्व के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान किया हो आज उनके ऑनलाइन गुंडों की गालिया खा रही है. अगर उनके ट्विटर हैंडल पर गालिया देखे तो उनके पति स्वराज कौशल को लिखा जा रहा है कि अपनी पत्नी की जमकर पिटाई करें, लेकिन सिवाय राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी के एक भी मंत्री ने उनके बचाव में एक शब्द नहीं कहा है उसमे भी नितिन गडकरी ने केवल येही कहा के सुषमा जी तो भारत में थी ही नहीं जब ये निर्णय लिया गया. मतलब ये के इन्टरनेट के गुंडों को कुछ भी कहने से डर रहे भारत सरकार के मंत्री और भाजपा के नेता क्योंकि येही अब उसके काडर है और इन्ही की लगातार क्लास अमित शाह लेते है. अभी तक इतनी मोब लिंचिंग की घटनाएं हुई है जिसमे इतने मासूम मारे गए है महाराष्ट्र से लेकर त्रिपुरा, बिहार, बंगाल, तेलंगाना, आंध्र और ओडिशा तक, लेकिन भारत सरकार का मौन है. जब पिछले एक हफ्ते में करीब २१ लोग भीड़ ही हिंसा का शिकार हो गए जिसमे पांच लोग महाराष्ट्र के धुले में बच्चा उठाने के आरोप में मारे गए तो दुनिया भर में बदनामी से डरने के लिए सरकार के मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा के व्हात्सप्प को कुछ करना चाहिए. व्हात्सप्प या ट्विटर तो कोई भी काम करेंगे अगर सरकार चाहे तो और उससे ज्यादा जो लम्पट काडर है, जिसको सारे नेता आशीर्वाद दे रहे है क्योंकि भाजपा ये मान चुकी है के सोशल मीडिया का ये लम्पट काडर ही चुनावो में उसकी नैय्या पार लगाएगा.

राजनीती में मतभेद होते है लेकिन मन्भेद  नहीं होने चाहिए ये अटल जी के शब्द है परन्तु आज जिस तरीके से विरोधियो और आपसे मतभेद रखने वालो से निपटने के तरीके ढूंढें गए है वे निहायत निंदनीय और देश को खतरे में डालने वाले है. अगर इन घटिया हरकतों के लिए कोई पार्टी अपने कार्यकर्ताओ के खिलाफ कार्यवाही नहीं करती या उसके नेताओं के पास उसकी निंदा के शब्द नहीं है तो इसका साफ़ मतलब है के ये जानबूझकर प्रोत्साहित किये जा रहे है. अभी एक महारथी ने जिनके ट्विटर हैंडल पर मर्यादा पुरुषोत्तम राम की धनुर्धारी तस्वीर थी, उन्होंने कांग्रेस पार्टी की प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी की बेटी से बलात्कार कर डालने की धमकी खुले तौर उन्हें दे डाली. प्रियंका ने पुलिस में रिपोर्ट करवाई है लेकिन अभी तक कुछ हासिल नहीं हुआ है लेकिन अभी तक सरकारी और संस्कारी पार्टी के एक भी नेता ने इस पर कुछ नहीं बोला है. भारत में हिन्दुओ का नेतृत्व करने वाले संघ की चुप्पी तो हम सबको पता है के जिंदगी भर उन्होंने कभी भी जातिप्रथा के खिलाफ बात नहीं की और न ही कभी महिला हिंसा पर कुछ बोला . मुझे इन शब्दों को लिखने में भी अफ़सोस होता है लेकिन क्या करें यदि हम सब इस दौर में चुप रहे और अन्याय के खिलाफ नहीं बोले तो ये देश किसी का नहीं रहेगा.

देश भर में बलात्कार की बढती घटनाओं का भी भाजपा और संघ परिवार ने संप्रदायीकरण किया. कठुआ हुआ तो गुंडों के पक्ष में नारे लगवाए. मंदसौर में क्योंकि अपराधी मुसलमान है तो भाजपाई उसे तुरंत फांसी पर लटकाने के लिए कहते है और आरोप लगाते है के ‘सेक्युलर’ लोग अब कैंडल लाइट मार्च क्यों नहीं निकालते. मंदसौर की घटना को वे कठुआ की काट मानकर लगे हुए है लेकिन मै तो उनके नेताओं से सवाल करना चाहता हूँ के उन्नाव के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर अपनी ही राजपूत जाति की लड़की के साथ बलात्कार का आरोप लगा और एक भी नेता कुछ नहीं बोला. शर्मनाक बात तो ये के नेता के समर्थन में लोग सडको पे आये. राजपूतो को फर्जी विषयो में तो अपने समुदाय की इज्जत याद आती लेकिन अपने समाज की एक गरीब लड़की का विधायक द्वारा किया गया शोषण उनके समाज के लिए कोई सवाल नहीं बना. उन्नाव की घटना को इसलिए दबाया गया है क्योंकि ये हिंदुत्व के राष्ट्रवाद की पोल खोल सकती है. कठुआ और मंदसौर सेकुलरो और हिन्दुत्ववादियो के अपने अजेंडे में फिक्स होने वाली कहानिया है इसलिए शोर है. सवाल है के उन्नाव को लेकर क्यों है संघ को और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को कटघरे में खडा किया गया जिसने अपराधी को बचाने की पूरी कोशिश की.

मेरे एक मित्र ने बरसो पहले आर एस एस का मतलब रयुमर स्प्रेअडिंग सोसाइटी रख दिया लेकिन आज हम जो स्वरूप देख रहे है वो बेहद भयावह और डरावना है. व्हात्सप्प पर कोई भी कहानी बनाकर आप किसी के खिलाफ ही जो भीड़ तंत्र के न्याय को केवल अपनी राजनितिक रोटिया सेंकने के लिए जो आगे बढ़ा रहे हो वो देश के तानें बाने को नष्ट कर देगा जो आज़ादी के बाद बेहद मुश्किलों के बाद हमने बनाया था. इतने बड़े देश में व्यापक धार्मिक, भाषाई और जातीय विविधताओं को स्वीकारते हुए हमने सबके लिए एक कानून बनाया ताकि देश एक रहे. आजदी के वक़्त जवाहर लाल नेहरु का प्रदेश और जाति बिलकुल ऐसी थी के अगर वह चाहते तो भारत को हिन्दू राष्ट्र बना सकते थे लेकिन उन्हें पता था के इसके कितने खतरनाक नतीजे हो सकते है.

आज सत्ता में रहने वाले लोग पिछले चार वर्षो में उनकी सरकार के लगातार असफलताओं को छुपाने के लिए फिर से उन्होई मुद्दों को खडा कर रहे है जो केवल इमोशन पर आधारित है, धर्म और जाति या इतिहास से गड़े मुर्दों को खोद खोद कर निकलकर ये लोग अपने झूठे वादे और विकास की आड़ में मनुवादी संस्कृति थोपकर केवल दो चार गुजराती पूंजीपतियों के हाथ हमारे देश की सम्पति को सौंप देना चाहते है. देश की उर्जा, सम्पति, संशाथान जब इन व्यक्तिगत मुनाफाखोरो के पास जाता है, बैंक जब डूबने को तैयार बैठे हैं लेकिन ये बड़े बड़े चोर फोर्ड की लिस्ट में आते है, मीडिया उनके बच्चो की शादियों को दिखाकर मध्यवर्ग की लालसा को बढाता है लेकिन उनको सवाल करने को नहीं कहता . पत्रकार जब चारण होते है और मालिक का महिमामंडन कर जनता को भ्रमित करते है तो समझ लीजिये के देश पर संकट है.

इस देश में जो आग लगाने का आज षड़यंत्र चल रहा है उसका मुकाबला सभी लोगो को एकता से करना होगा. एक समाज को दुसरे के खिलाफ खड़ा करके, आत्म सम्मान के साथ खड़े लोगो विशेषकर महिलाओं के खिलाफ ऑनलाइन गुंडागर्दी को आगे बढाकर एक सन्देश दिया जा रहा है के या तो चुप रहिये या मार खाइए और यदि आप फिर भी नहीं डरते तो आपकी फिर तंत्र आपको डराएगा. आजकल उसके भी अनेको तरीके है. भाड़े का मीडिया है, खबरे पकाई जायेंगी, तड़का लगेगा और अन्य कई तरीको से आपकी मौत के इन्तेजाम हैं. ये सब भी झेल लिया तो बदनाम करने के तरीके बहुत से है. स्थिति बहुत गंभीर है और जो लोग आपातकाल चिल्ला रहे है वे आज के दौर को बहुत हलके में ले रहे है. आपातकाल में एक दूरदर्शन था और मीडिया का अशिकंश हिस्सा झुक चूका था लेकिन फिर भी वो इतने बदतमीज नहीं हुए थे जितना आज का मीडिया हो चूका है. हम लोग ऐसे पत्रकारिता को पीत पत्रकारिता कहते है जो चरित्र हनन और सेंसेशन पैदा करते है लेकिन आज के दौर की पत्रकारिता तो पूरी तरीके से गेरुआ हो चुकी है और आकाओ के आग्गे नतमस्तक है.

देश की संस्कृति के ‘रक्षक’ चुप है. वो अपने लोगो को हथियार देकर लड़ना सिखा रहे है. शायद भूल रहे है के बन्दुक से आप न तो कभी लक्ष्य तक पन्हुन्चेंगे और न ही कोई बदलाव कभी आया. दुनिया में हिंसा के कारण बदलाव लाने वाले मिट गए और मिटा दिए गए. बुद्ध, कबीर, नानक, रैदास, आंबेडकर, फुले,भगत सिंह, राहुल संकृत्यायन का देश और संस्कृति सवाल पूछेगी और वैचारिक क्रांति करेगी. देश में आने वाले बदलाव से जिनके तख़्त ताज हिलेंगे वो ही बन्दुक और हिंसा की बात करते है. देश की सत्ता पर काबिज  अल्पसंख्यक आज बहुजन समाज में आ रहे बदलाव और जागरण से घबराये हुए है क्योंकि बाबा साहेब आंबेडकर और तर्क के अन्य योद्धयो के विचारो की पैनी धार से बहुजन समाज आज राजनीतिक तौर अपनी लड़ाई लड़ रहा है और ब्राह्मणवाद का  वैकल्पिक सांस्कृतिक धरातल खड़ा कर रहा है. जिनके पास तर्क नहीं है और दिमाग पर अंधभक्ति का पर्दा पड चुका है वे न कोई बदलाव कर सकते और न ही उसको सहन कर सकते. इसलिए तर्क के योद्धाओं को यथास्थितिवादी, सामंतवादी, पूंजीवादी और पुरोहितवादी पित्र्सत्तातामक ताकतों का जमकर विरोध करना पड़ेगा तभी हम एक नए प्रगतिशील भारत का निर्माण कर पाएंगे.









Thursday, 7 June 2018

क्यों सुलग रहा है शिलांग ?




विद्या भूषण रावत


भारत के उत्तर पूर्व के राज्य न केवल सामरिक दृष्टि से अपितु सांस्कृतिक दृष्टि से भी बहुत महत्फ्पूर्ण है क्योंकि ये सभी भारत की जातिवादी सामाजिक व्यवस्था के अनुसार नहीं चलते और अभी जनजातीय, बुद्धिस्ट और क्रिस्चियन धर्मो का असर यहाँ पर है. क्षेत्र के दो राज्य त्रिपुरा और असाम में हिन्दुओ खासकर बंगालियों का अच्छा खासा दबदबा और उनके दबाव ने क्षेत्र में आदिवासियों और मूलनिवासियो को पुर्णतः सत्ता के तंत्र से बाहर कर दिया है. आपने त्रिपुरा को देख ही लिया होगा के कैसे आदिवासी बहुल राज्य में आज भी बंगाली भद्रलोक मुख्यमंत्री है.
मेघालय की स्थिति भिन्न है. ये पुर्णतः आज़ाद ख्याल राज्य है. ऐसा नहीं है के इन राज्यों में कोई सामाजिक समस्याए नहीं है लेकिन हमें याद रखना होगा के इन राज्यों की विशेष स्थिति को देखते है इन्हें संविधान की छटवी सूची में रखा गया था जिसका मतलब था के राज्य में राज्यपाल और राज्य सरकारों की कानून बनाने विशेषकर भूमि और वन से सम्बंधित मामलो में सीमित अधिकार होंगे और ज्यादा अधिक स्वायत्तता जिला और क्षेत्रीय समितियों को है जो जनता द्वारा चुन कर आती है.
शिल्लोंग अविभाजित असाम की राजधानी था. ब्रिटिश साम्राज्य का उत्तर पूर्व के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र और उससे भी ज्यादा एक बेहद खुबसूरत क्षेत्र जिसे प्रकृति ने बड़े प्यार से संवारा. सांस्कृतिक तौर पर भी खासी जनजाति के लोगो की जीवनशैली इसी प्रक्रति प्रेम पर केन्द्रित है. उस समय जब भी ब्रिटिश इधर उधर मूव करते थे तो उन्हें अपने साथ अपना ताम झाम लेकर चलना पड़ता था. दुसरे देश के विभिन्न इलाको में सफाई का कार्य करने के लिए वे अपने साथ पंजाब और उत्तर प्रदेश आदि से सफाई कर्मियों के ले गए जो मुख्यतः वाल्मीकि, मजहबी या ईसाई थे . इसका कारण यह था के कई स्थानों में खासकर जो पहाड़ी इलाके थे जहा लोगो की जीवन शैली बहुत अधिक यांत्रिक नहीं थी और शहरीकरण का असर नहीं था और सामाजिक तौर पर भी मनुवादी वर्णवादी व्यवस्था नहीं थी तो जातिविशेष का कार्यकरने वाली संस्था भी नहीं थी. दूसरे, ब्रिटिश साम्राज्य का विरोध करते हुए लोग उनके साथ काम करने को तैयार नहीं थे इसलिए उन्हें स्वयं ही अपने साथ अपने द्वारा प्रसाशित राज्यों के कर्मचारियों को ही साथ लाना पड़ता था. बताया जाता है के १८५० के आस पास ब्रिटिश पंजाब से इन सफाई कर्मियों को वहा लाये थे जो मुखतः मजहबी कहा जाता है. शिल्लोंग में इन्हें पंजाबी या सिख कहा जाता है जो स्वयं पंजाब के सांस्कृतिक माहौल से बेहतरीन है जहाँ आज भी मजहबी और चूड़ा के नामो से अपमानित होता है. शायद ये मेघालय की सांस्कृतिक विरासत ही होगी जिसमे इन्हें सम्मानित शब्दों से नवाजा गया है.
जैसे के सभी महत्वपूर्ण स्थानों की कहानी है वैसे ही यहाँ की भी के ये पंजाबी शहर के सबसे महत्वपूर्ण इलाको में रहते थे लेकिन ये भी हकीकत है के आज जब शहरों के हालत बदल गए है और सफाई के पुराने तरीके बदल गए हों तो सफाई पेशे वाले समुदाय भी अवांछित हो गए है. अब समाज को उनकी आवश्यकता नहीं रही और उनका दुसरे कार्य करना भी लोगो को मंजूर नहीं होता. कई बार ये भी होता है के कोई बड़ा नेता वहां कुछ और बिज़नस या माल खोलना चाहता है और इसलिए उनको हटाने के तरीके अपनाये जाते है. पाकिस्तान से लेकर जहा उन्हें ईसाई बोला जाता है और ईशनिंदा कानून आसानी से लगता है भारत के गाँवों तक, हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाइयों सभी ने वाल्मीकियो के साथ बेहद अपमान जनक व्यवहार किया है. और तो और, खुद दलित आन्दोलन ने भी साथ नहीं दिया है. अब आदिवासी इलाको में वे अलग थलग ही रहते है लेकिन ये भी हो सकता है के उत्तर पूर्व के सांस्कृतिक ढांचे में वे नहीं फिट हो पा रहे. ए क और क्रूर सच्चाई के समस्या शासक वर्ग द्वारा पैदा की गयी है. ब्रिटिश ने ये काम किया और उनका स्थाई बंदोबस्त करना चाहिए था लेकिन कही पर भी ये व्यवस्था नहीं है. इसका मतलब ये के ब्रिटिश शासन ने उनका पूरा इस्तेमाल किया लेकिन उन्हें सर ढकने के छत की व्यवस्था नहीं की और ये पूरे भारत की कहानी है. जहा भी वे रहे है लोगो की 'कृपा' पे रहे और इस कारण उनका कोई मज़बूत आत्मस्वाभिमान वाला आन्दोलन नहीं चल पाया.
उत्तर पूर्व की परिस्थितिया बिलकुल भिन्न है क्योंकि सफाई कर्मी समाज को अंग्रेज वहां लाये न के शिल्लोंग के लोग इसलिए सांस्कृतिक तौर पर मामला बिलकुल अलग है और इसीलिये मात्र पंजाब और इग्लैंड में हवा बनाकर काम नहीं कर सकते क्योंकि मामला भूमि के स्वामित्व का है. स्वीपर लेन में रहने वाले लोगो का कहना है के उनको १० दिसंबर १८५३ को वहा के राजा और ब्रिटिश शासन के मध्य हुए समझौते में ये जमीन प्रदान की गयी थी लेकिन सरकार और खासी जिला प्रशासकीय कौंसिल अभी इस बात से इंकार कर रहे है. ये समझना भी महत्वपूर्ण है के भूमि का पूरा प्रशासनिक नियंत्रण इस क्षेत्र में अनुच्छेद ६ के अंतर्गत खासी जिला प्रशासकीय कौंसिल के अंतर्गत आता है.
शिल्लोंग टाइम्स की खबर के मुताबिक कल सरकार द्वारा बनाई गई समिति की पहली बैठक हुइ है और जल्दी ही वे इस सन्दर्भ में किसी नतीजे पे पहुंचेंगे लेकिन कुछ सवाल महत्वपूर्ण है जिन पर हमें गंभीरता से सोचना होगा. पहले ये के जो भी सफाई कर्मी वह गए और मुनिसिपल कारपोरेशन में कार्य कर रहे है या रिटायर हो गए है उनके पुनर्वास की व्यवस्था की जाए. बाकि सभी लोगो की भी सम्मानजनक पुनर्वास की व्यवस्था की जाए. वैसे इस मामले में यदि देश में एक भी ऐसा मुनिसिपल कारपोरेशन है जिसने सफाई कर्मियों को इमानदारी से बसाया हो तो मैं उस नगर निगम या महापालिका को नतमस्तक हो जाऊंगा. ये प्रश्न देश के समक्ष है के उन्होंने सफाई पेशे में लिप्त समाज के साथ न्याय नहीं किया है.
एक दो दिन पूर्व एक मित्र ने एक विडियो भेजा और कहा के इसे खूब फॉरवर्ड करो. अमूमन मै इन्हें देखता भी नहीं हूँ लेकिन उस दिन मैंने देखा तो एक नौजवान इस घटनाक्रम को बिलकुल १९८४ के स्वर्ण मंदिर में सेना के हस्तक्षेप से जोड़कर देख रहा था. वो कह रहा के सिखों ने देश के लिए इतनी कुर्बानिया दी है और इसलिए हमें देखना पड़ेगा के देश विरोधी शक्तिया तो ऐसा नहीं कर रही और इनका मुकाबला करना पड़ेगा. बहुत से लोग कह रहे है के मुस्लिम, सिख और अन्य सभी को साथ मिलकर ऐसी शक्तियों का मुकाबला करना पड़ेगा. ये बहुत खतरनाक है और इस घटनाक्रम का अति साधारणीकरण है. हमें उत्तरपूर्व के पूरे ऐतिहासिक परिदृश्य को समझना होगा और आर्याव्रत के नजरिये से उनको देखने के नतीजे बेहद खतरनाक हो सकते है. भारतीय राष्ट्र-राज्य की सवर्णवादी उत्तर-भारतीय अवधारणा जो हमने कश्मीर में लगाने की कोशिश की और अब वही कोशिश हम उत्तर पूर्व में कर रहे है तो इसके परिणाम घातक होंगे.
सर्वप्रथम यह के उत्तर पूर्व में बहुत से राज्य भारत के आजाद होने के पहले तक अलग राज्य थे. उत्तर पूर्व में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में आदिवासियों की सांस्कृतिक विरासत छिपी है इसलिए उसको यदि हम उत्तर भारतीय हिंदी नज़रिए से देखेंगे तो कभी भी नहीं समझ पाएंगे. स्वीपर लेन का मसला सिखों और खासी समुदाय की लड़ाई नहीं अपितु भूमि के स्वामित्व का है. जैसे के मैंने कहा वहा की सरकार को सफाई कर्मचारियों को समस्यों को निपटाने के प्रयास करने चाहिए लेकिन वैसे ही प्रयास देश की हर जगह की नगर पालिकाओ को करने होंगे. मैंने तो कई गाँवों में देखा के जब वाल्मीकि समाज के लोग काम करने से इनकार करते है तो उन्हें गाँव से बेदखल करने की धमकी मिलती है तो क्या कभी कोई राजनैतिक दल उनके समर्थन में आया. पंजाब के अकाली और कांग्रेस दोनों जाटो की पार्टिया हैं जो मजहबी लोगो को आज भी इज्जत के साथ नहीं रख पाते और पंजाब के गाँवों में उनके जातीय बर्चस्व को सब जानते है. इसलिए शिल्लोंग में हुई घटना चिंतनीय जरुर है लेकिन ये कोई 'एथनिक क्लींजिंग' नहीं है क्योंकि न इसमें कोई मारा गया है, न ही किसी को कोई चोट आई है और न कुछ घटा है. हाँ जब ऐसी घटनाएं होती है तो लोगो अपनी रक्षा करने के लिए खड़े होते है लेकिन उसका विडियो बनाकर मसाला लगाकर टीवी चैनल न प्रस्तुत करे तो अच्छा है.
हम उम्मीद करते है के शिलोंग में स्थिति शीघ्र ही नार्मल होगी. मेघालय सरकार इस समस्या का तुरंत समाधान निकाले. जिन लोगो ने अपनी जिंदगी दूसरो की सेवा में लगाईं उनके बारे में तो ये देश सोचने को तैयार नहीं है लेकिन हम मेघालय में रहने वाले साथियो से अनुरोध करेंगे के वे कोशिश करें के इस समस्या का स्थाई हल निकले और जो भी लोग वहा रह रहे है वे रह पायें और दूसरो के लिए एक मिसाल खड़ी करे क्योंकि एक बार शिल्लोंग में सफाई कर्मियों के परिवारों का इमानदारी से पुनार्वाश होगा तो हम देश की दूसरी महापलिकाओ और सरकारों से कह सकते है के वे भी इमानदारी दिखाये और ऐसा करें. आखिर ऐसा क्यों के देश की सफाई करने वाला समाज खुद अनिश्चितता और गन्दगी के ढेर में पडा मिलता है.
उत्तर पूर्व की राजनैतिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक स्थितियों को बिना समझे किसी भी बात पर उसे उत्तर भारतीय हम और उन के बीच में लड़ाने और समझने की कोशिशे किसी काम की नहीं होंगी. ये समझ लीजिये के मेघालय की आबादी का ८५% जनजातीय है और इसलिए यह क्षेत्र उनकी सुरक्षा के लिए संविधान में प्रदत्त विशेष अधिकार कानून के दायरे में आता है. उत्तर पूर्व के सभी इलाको में हमारी एंट्री उनसे बिना पूछे है. आज भी वहा पर आज़ादी के बाद से ही भारतीय सेना का दबदबा है. सामरिक दृष्टि से ये क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है और इसीलिये इनके सांस्कृतिक वैभव को समझे बिना हम कभी उनकी भावनाओं को नहीं समझ पाएंगे. वहा पर समाज हमारे सड़े गले वर्णवादी समाज की तरह जातिवादी महिलाविरोधी नै है. वे सभी सामूहिकता में रहने के आदि है और एक समाज हम लोगो से बहुत आगे है हालाँकि हमारी सामजिक बुराइया भी उधर अब धीरे धीरे आ रहे है लेकिन फिर भी वे हमसे बेहतर है क्योंकि उन्होंने अपने को बचा के रखा है.
भारत में बहुत से ऐसे राज्य है जिनकी सांस्कृतिक विरासत, सामरिक स्थिति की महत्ता को देखते हुए अन्य राज्यों के लोग वहा पर आसानी से जमीन आदि की खरीदारी नहीं कर सकते और ये इसलिए जरुरी था ताकि उनकी सांस्कृतिक विरासत बच सके और व्यसाय के नाम पर उनका शोषण न हो सके. हमने उत्तराखंड और हिमाचल में दुकानदारी करने वालो को देख लिया है जो हमारे प्राकृतिक संशाधनो, नदी, नालो, गदेरो और पहाड़ो को चूस चूस कर, उसकी बोटी बोटी तक नोच लेना चाहते है. उत्तरखंड में धर्म के धन्देबाजो ने दुकानदारो के साथ मिलकर पर्यावरण का जो नाश पीटा है वो देश के लिए किसी दिन एक भयानक चुनौती पेश करेगा. एक पर्यावरण प्रेमी और उत्तर पूर्वे के सांस्कृतिक विरासत का समर्थक होने के नाते मैं चाहूँगा के उन क्षेत्रो के साथ ऐसा दोहन न हो लेकिन एक ही उम्मीद के जो लोग इतने वर्षो पूर्व वहा पर लाये गए उनके साथ न्याय हो और उन्हें सम्मान सहित पुनर्वासित किया जाए. उत्तर पूर्व से बाहर के क्रांतिकारियों से अनुरोध है के इसे सांप्रदायिक या जातीय रूप न दे तो देश के लिए अच्छा होगा.

Tuesday, 29 May 2018

भारत के पहली अम्बेडकरवादी संस्कृत शिक्षिका : कुमुद पावडे


अम्बेडकरी विचारधारा को समर्पित कुमुद पावडे

विद्या भूषण रावत

सर्व प्रथम मै इस आलेख के लिए अपने अम्बेडकरवादी मित्र रजनी तिलक जी का धन्यवाद करना चाहता हूँ के उन्होंने मुझे कुमुद पावडे जी के बारे में जानकारी दी जिसके फलस्वरूप मैंने उनका साक्षात्कार उनके निवास स्थान पर नागपुर में किया.

कुमुद जी का जन्म के फुलेवादी-अम्बेडकरवादी परिवार में नागपुर में १८ नवम्बर १९३८ को हुआ. उनके पिता ज्योति बा फुले के विचारो से बहुत प्रभावित थे और अक्टूबर १४, १९५६ को दीक्षा भूमि के कार्यक्रम में बाबा साहेब की अगुवाई में लाखो लोगो में कुमुद जी और उनके परिवार के सदस्य भी शामिल थे. वह कहती है : उस समय मै १८ वर्ष की थी और स्नातक द्वितीय वर्ष की छात्रा. हम लोग इस वारे में अत्यधिक प्रसान थे . हमें बाबा साहेब के हर आन्दोलन की जानकारी होती थी. ये जानकर हम सभी बहुत गौरवान्वित होते थे के दुनिया का सबसे अधिक पढ़ा लिखा व्यक्ति हमारे आन्दोलन का नेतृत्व कर रहा है. हमने बाबा साहेब को उनके लेखो से जो समता, बहिष्कृत भारत और जनता में छपते थे, के जरिये और अधिक जान लिया था.

कुमुद जी के मामा शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के विदर्भ इकाई के ट्रेजरार थे. उनके विचारों के कुमुद जी की माता जी पर बहुत असर था और अक्सर वह महिलाओं को पढ़ाने के लिए और गरीब बच्चो की मदद के लिए विभिन्न कार्यक्रमों में जाति थी. वह कहते है : हालाँकि मेरे पिता फुलेवादी थे लेकिन वही लोग अम्बेडकरवादी भी होते है. अम्बेडकरवादी लोगो ने ही फुलेवाद का दर्शन जिन्दा रखा है.

वह कहती है, ‘ मै ये मानती हूँ के दलितों में बाबा साहेब के प्रति असीम श्रद्धा है. महिलाओं उनकी आरती उतारती थी. महाड सत्याग्रह के समय से उन्होंने हर आन्दोलन में महिलाओं का एक विंग बनाना शुरू कर दिया था. नागपुर में एक कार्यक्रम में उनको सुनने लगभग पच्चीस हज़ार महिलाए आई. महिलाओं उनकी काल पर कहीं भी जाने को तैयार थी. ऐसा नहीं था के महिलाए केवल उनकी कार्यकर्त्ता थी अपितु महत्वपूर्ण पदों पर भी थी. नासिक की शांता बाई दाने ने शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बड़ा काम किया. महिलाये कार्यक्रमों में आई भी और उन्होंने दूसरो को भी प्रभावित किया.

श्रीमती कुमुद पावडे ने संस्कृत भाषा में स्नात्कोत्तर अध्ययन किया. मेरे लिए ये सवाल बहुत मजेदार था के एक अम्बेडकरवादी बुद्धिस्ट परिवार की महिला का संस्कृत के प्रति लगाव कैसे हुआ. कुमुद जी बताती है, “ हमारे घर के पास एक मंदिर था और उसी के पास एक लाइब्रेरी थी जिसमे बहुत से किताबे थी. वही ‘मैंने’ बाबा साहेब के बारे में बहुत से पुस्तके पढ़ी जिसमे एक में जिक्र था के वह संस्कृत से प्यार करते है लेकिन नहीं पढ़ पाए बस मैंने भी संस्कृत पढने का निर्णय ले लिया. स्कूल में तो कोई दिक्कत नहीं हुई लेकिन स्नातक और स्नात्तकोत्तर के समय उनके ब्राह्मण अध्यापक उन्हें पढ़ाने में कोई दिलचस्पी नहीं लेते थे. कुछ तो ये साफ़ मानते थे के महार लड़की को संस्कृत से क्या मतलब ये तो केवल ब्राह्मणों का काम है. ये सब वे आपस में बात करते थे लेकिन बावजूद इसके मुझे सबसे अधिक मार्क्स मिले. मैंने टॉप किया. एक ब्राह्मण अध्यापक ने मेरी मदद की और मुझे प्रोत्साहित किया. कुमुद जी बताती है के उनके संस्कृत पढने से केवल ब्राह्मणों में ही नहीं उनके अपने समाज में भी बहुत परेशानी थी. बहुत से बोले, इस मृत भाषा को सीखकर क्या करोगे.

श्रीमती कुमुद पावडे ने ३६ वर्ष तक संस्कृत पढ़ाई. मोरिस कालेज में आज भी लोग उनको याद रखते है. महत्वपूर्ण बात यह के कुमुद जी केवल संस्कृत की ही ज्ञाता नहीं थी उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में भी एम् ए किया.

मेरे लिए ये जानना महत्वपूर्ण था के संकृत भाषा जो ब्राह्मणों के लिए रिज़र्व है, उन्हें कैसे नौकरी मिली. क्या उनके साथ कभी भेदभाव हुआ. इस बात का उत्तर तो और भी मजेदार है. वह बताती है : ‘ मुझे बहुत सी परेशानियों का सामना हुआ. एम् ए करने के दो साल तक भी मुझे कही नौकरी नहीं मिली. समझ आ रहा था के जाति के कारण ऐसा हो रहा है. इसलिए मैंने बाबु जगजीवन राम को पत्र लिखा और बताया के आप तो कहते है के हमारे लिए आरक्षण है लेकिन एक मेरिट वाली छात्रा होने के बावजूद भी मुझे कोई नौकरी नहीं मिल रही. बाबु जगजीवन राम ने वह पत्र तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को फॉरवर्ड कर दिया. कुछ दिनों बात नेहरु जी का पत्र कुमुद जी को प्राप्त हुआ जिसमे उनसे कहा गया के वह डॉ शंकर दयाल शर्मा से बात करें और वह कोई न कोई इंतज़ाम कर देंगे. पत्र में कुमुद के लिए २५० रुपैय्या भी भेजा गया था ताके वह मध्य प्रदेश जाकर इंटरव्यू आदि दे दे. कुमुद जी ये संस्मरण सुनकर मै अवाक् रह गया क्योंकि एक प्रधानमंत्री अपना समय निकालकर आपको पत्र लिखे और उसमे सहयोग राशि भी भेजे. जवाहर लाल नेहरु की पॉपुलैरिटी का क्या राज, आज पता चल गया और शायद इसीलिये संघी मानसकिता के लोग उनसे आज भी डरते है. आज के दौर में तो एक कॉर्पोरटर भी छिट्ठी का जवाब नहीं देते.

कुमुद जी कुछ समय मध्य प्रदेश में कार्य करने के बाद महाराष्ट्र में आई जहा उन्हें अमरावती में कार्य मिला और बाद में उन्हें नागपुर में नौकरी मिली. लेकिन वह कहती है के महारास्ट्र में ये सब इसलिए हुआ के उनकी पति मोती राम पावडे कुनबी जाति से थे जिसके कारण उन्हें नौकरी मिली क्योंकि जब लोगो को उनके महार होने का पता चलता था तो वो फिर बाते बनाने लगते.

कुमुद जी और उनके पति मोती राम पावडे ने प्रेम विवाह किया. दोनों के बीच प्यार मोती राम जी के एक रात्रिकालीन स्कूल में कार्य करने से हुई. एक क्रिस्चियन मिशनरी की प्रेरणा से खोला गया यह स्कूल गरीब महिलाओं को शिक्षा देने के लिए खोला गया. मिशनरी चाहते थे के जो खुद व्यवस्था का शिकार है उन्हें ही इस स्कूल की शुरुआत करनी चाहिए. इनके पति एक फुलेवादी थे और बाबा साहेब से बहुत प्रभावित थे. अपने कालेज में उन्होंने उस दौर में बाबा साहेब आंबेडकर के फोटो लगाया था. वह एक छात्र नेता भी थे.

दोनों में प्रेम के बाद विवाह तक होने में बहुत कठिनाई आई. हालाँकि दो परिवार अम्बेडकरवादी फुलेवादी होने का दावा करते थे लेकिन महार और कुनबी जातियों का होने के कारण उनमे इस विवाह के प्रति बहुत परेशानी थी. कुमुद जी के पिता का उनके हर कार्य के प्रति सहयोग और समर्थन था लेकिन उनके जाति में लोगो में गुस्सा था. जगह जगह बैठके हो रही थी लेकिन उनके पिता ने सभी लोगो को समझा बुझा कर मामला शांत कर दिया लेकिन मोती राम पावडे के परिवार के सदस्य मानने को तैयार नहीं थे. उनके पिता ने इस विवाह को स्वीकार ही नहीं किया हालाँकि उनकी माँ ने अंततः अपने बेटे की खातिर इसे स्वीकार कर लिया.

उनका विवाह वैदिक रीती रिवाज के साथ हुआ क्योंकि बुद्धिस्ट तरीके से विवाह अभी मान्य नहीं हुए थे और कुमुद जी नहीं चाहती थी के इतनी परेशानियों के बाद उनकी शादी भी कोई कच्चे तरीके से हो. उन्होंने एक विवाह पहले भी देखा था जो परेशानी में रहा इसलिए वह हर बात पक्की कर देना चाहती थी. क्योंकि एक परिवार विरोध में था और लोगो ने भी खूब लाठिया और तलवार भांजी इसलिए कुमुद नहीं चाहती थी के विवाह के बाद भी परेशानिया बढे. विवाह अमरज्योति नामक मंदंप में हुई जिसके बुकिंग उनके पति ने की थी लेकिन जब वह के खाना बनाने वालो, काम काजी महिलाओं को पता चला के दुल्हन महार जाति के है तो सभी काम छोड़ कर चले गए. तब खाना बनाने और अन्य सम्बंधित कार्य कुमुद जी के परिवार के सदस्यों ने मिलकर किया.

विवाह तो संपन्न को गया लेकिन हकीकत ये है के उनकी परेशानिया कम नहीं हुइ क्योंकि उनके ससुर ने उनको स्वीकार नहीं किया. उनके बच्चे को हाथ तक नहीं लगाया और उनके हाथो से पानी तक नहीं पिया. उन्हें अपमानित करने का हर तरीका ढूँढा गया लेकिन धीरे धीरे उनकी सास उनके सास खड़ी हुई और अपने पति के खिलाफ भी केस करना चाहती थी लेकिन कुमुद जी बताती है के उन्होंने अपने घर के मामले को अन्दर तक ही सीमित रखा.

महत्वपूर्ण बात यह की बाद में जब कुमुद जी का बेटा डाक्टर बन गया और उसके दादा ने उसके उपलब्धियों के बारे में सुना तो फिर ख़ुशी ख़ुशी अपना लिया. यह बात साबित करती है के सफलता के साथ जुड़ने को हर एक तैयार रहता है.

कुमुद जी कहती है के ‘जाति अभी भी जिन्दा है. लोग आपको सफलताओं के बावजूद भी स्वीकार नहीं करते. आरक्षण तो जातिगत है. हमने धर्म तो बदल दिया लेकिन अपनी जाति को ढोते रहे. मुसलमानों और इस्साइयो में भी दलित है लेकिन बुद्धिज़्म में आने के बाद उपजाति के प्रश्न कम हुए हैं .

आज अम्बेडकरवादी आन्दोलन मज़बूत है और उसमे महिलाए हर जगह भागीदारी कर रही है, इसका उन्हें गर्व है.  वह कहती है , ‘ हमें बाबा साहेब के भाषण पढने चाहिए और उन पर अमल करना चाहिए. आज हम मनुवादियों को जातीय शोषण के लिए तो गाली देते है लेकिन जब महिलाओं का प्रश्न आता है तो हम स्वयं मनुवादी हो जाते है. महिलाये को स्थिति बहुत ही चिंतनीय है.”
वह आगे कहती है : ‘आज दलित महिलाओं को हिन्दू धर्म के खिलाफ लड़ने की आवश्यकता है . हमें पश्चिम के फेमिनिस्म से कुछ नहीं मिलेगा. जो लोग स्त्रीमुक्ति की बात करते है वे हमारे परिपेक्ष्य को नहीं सम्क्झते. अम्बेडकरवादी होने के नाते हमें मानवमुक्ति की बात करनी होगी जो मात्र स्त्रीमुक्ति से कही ज्यादा बड़ा है. मानवमुक्ति का आन्दोलन भगवान् गौतम बुद्धा और बाबा साहेब आंबेडकर ने चलाया था और आज अम्बेडकरवादी महिलाओं को मानवमुक्ति आन्दोलन का नेतृत्व करने की आवशयकता है.. अम्बेडकरवादी होने के कारण हमें सभी की मुक्ति का आन्दोलन करना है.”
कुमुद जी कहती है हमें महिलाओं को कमतर नहीं आंकना चाहिए. महिलाओं को ज्ञान और प्रज्ञा की देने की आवश्यकता है. हिन्दू धर्म उस कपडे की तरह जो पुर्णतः फट चुका है और जिसे पहना नहीं जा सकता और न ही इसे ठीक किया जा सकता है. बेहतर है के इसे उतारकर फैंककर हम नया मार्ग चुने जो धम्म का था और जिसे बाबा साहेब आंबेडकर ने हमें बताया.

कुमुद पावडे जी के आत्मकथा अन्त्स्फोट मराठी में आनंद प्रकाशन औरंगाबाद ने प्रकाशित की है.
वह कहती है के बाबा साहेब के विचार महिलाओं और पुरुषो में भेद नहीं करते. हमें सभी को सम्मान देना चाहिए और जाति उपजाति और लिंग भेद से दूर रहना चाहिए. बुद्धामय भारत के लिए आवश्यक है कम जातियों को ध्वस्त करें और महिलाओ को आगे बढाए.

जब मैंने उनसे पुछा के प्रबुद्ध भारत के लिए क्या बाते आवश्यक है तो कुमुद जी कहती है :
“भारत के प्रबुद्ध राष्ट्र बनने के लिए हमें सभी प्रकार के लोगो की जरुरत है. ये केवल दलितों के अकेले प्रबुद्ध बन्ने से नहीं होगा.  सभी को इसे स्वीकार करना होगा. ये ९७% गैर द्विज आबादी का प्रश्न है जिसमे ५०% महिलाए है. तीन प्रतिशत द्विज जो बदलने को तैयार नही है और जिन्होंने हमारे समाजो के साथ अपना रवैय्या नहीं बदला है और जो अपनी जाति के विशेषाधिकारो को छोड़ने को तैयार नहीं वे हमारे लोग नहीं हो सकते. बुद्ध ने कहा था बहुजन सुखाय बहुजन हिताय और येही हमारा मूल मन्त्र होना चाहिए.”  वह यह भी कहती है के हमें किसी को दुःख नहीं पहुचाना चाहिए और न ही किसी का शोषण करना चाहिए.

कुमुद पावडे जी अक्टूबर १९९६ में रिटायर हुई और नागपुर विश्विद्यालय की डाक्टरल कमिटी की सदस्य थी. वह आल इंडिया प्रगतिशील महिला संगठन की अध्यक्ष है. उन्होंने दुनिया भर की यात्रा की और सेमिनारो और सम्मेल्लानो में हिस्सा लिया है. १९९५ में उन्हें विश्व महिला सम्मेल्लन में बीजिंग में भागीदारी की और २००१ में नस्लभेद के विरुद्ध डरबन सम्मलेन में भी हिस्सा लिया.
कुमुद पावडे जी का जीवन एक उदहारण है के कैसे दलित महिलाए घर के अन्दर और बाहर दोनों तक शोषण झेलती है. उनका जीवन ये भी बताता है के पूर्वाग्रहों से युक्त होकर हम कभी आगे नहीं बढ़ सकते और आपको सामान विचारों के लोग हमेशा मिलेंगे. उन्होंने संस्कृत पढ़ी और पढ़ाई लेकिन अपनी अम्बेडकरवादी बुद्धिस्ट अस्मिता और पहचान से कोई समझौता नहीं किया. न्याय प्राप्ति के लिए उन्होंने बाबु जगजीवन राम से लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु तक को लिखा जो उनके व्यक्तित्व को दर्शाता है के जब आपका उद्देश्य साफ़ हो तो आपको हर वो जगह और दरवाजा खटखटाना पड़ता है जहाँ से न्याय और सहायता की उम्मीद होती है. वह जवाहर लाल नेहरु की प्रशंशक बनी लेकिन अम्बेडकरवादी मिशन को पुर्णतः समर्पित रही. उनके जीवन से यह भी पता चलता है के मात्र अम्बेडकरवादी या फुलेवाड़ी कह् देने मात्र से हमारे ख़यालात नहीं बदल जाते और ये की परिवार आज भी जाति के बन्धनों को तोड़ने ने बहुत दिक्कत महसूस करते है लेकिन फिर भी कुमुद जी जैसे लोगो ने तो जिन्दगो को अपनी शर्तो पर जिया और समाज के हर ‘नॉर्म’ को चुनौती दी और अपने लिए एक मुकाम बनाया. उनके संघर्षो से हम सभी को अपना जीवन आत्मसम्मान से जीने की प्रेरणा मिलती है.


Sunday, 13 May 2018

जातीय दंभ छोड़े बिना नहीं बढ़ सकता आगे समाज





विद्या भूषण रावत


सहारनपुर शहर में फिर से तनाव व्याप्त है. पिछले वर्ष शब्बिरपुर के में ठाकुरों के जातीय उत्पीडन के बाद हुए भीम आर्मी के विद्रोह से सहारनपुर शहर को दलितों की ताकत का अहसाश हुआ था. हालाँकि ऐसा नहीं है के उन्हें इसका पता नहीं था लेकिन जहाँ दलितों की राजनितिक शक्ति में उत्तर प्रदेश में पिछले २० वर्षो से लगातार इजाफा होता जा रहा है वही अधिकांश लोग ये भी मानते थे के राजनितिक सत्ता को तो शीर्ष नेतृत्व को विश्वास में लेकर या राजनितिक बैलेंसिंग को करने के लिए, आसानी से मैनिपुलेट किया जा सकता है लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर तो दलितों के विद्रोह का सीधे सीधे उदहारण फिलहाल उत्तर प्रदेश में नहीं था. इसका कारण यह भी था के बसपा की राजनीती के कारण दलितों के बहुत बड़े तबका का राजनीतिकरण हुआ और उसकी संवैधानिक मूल्यों में आशा बढ़ी और उसने हिंसा के रास्ते को कभी नहीं अपनाया लेकिन पिछले कुछ वर्षो में जब दलित में नए युवा अपनी बात रख रहे है, अपनी योग्यता का परिचय दे रहे है और इसलिए अब अपने अपमान को सहने के लिए तैयार नहीं है,

सहारनपुर में भीम आर्मी के प्रदर्शन से उत्तर प्रदेश में सत्ताधारियो और विपक्ष के नेताओं की राजनैतिक ‘असुरक्षा’ को बढ़ा दिया है क्योंकि जहाँ पर उन्हें अपनी परिपक्वता का परिचय देना चाहिए था उसका जवाब वे नए आरोपों और सधी  चुप्पी से दे रहे है जो बेहद दुखद है. इस सवाल के विभिन्न पक्षों को हम बारी बारी से विश्लेषित करने की कोशिश करेंगे.

सबसे पहले तो उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को हिसाब देना होगा जिसने सहारनपुर में शब्बिरपुर के लोगो को न्याय देने के बजाय धमकाने का काम किया और दलितों के लड़ रहे लोगो के उपर ही ऍफ़ आई आर कर डाली. भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद अभी भी जेल में हैं और इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो मामलो में उन्हें जमानत दिए जाने के बावजूद भी प्रदेश सरकार ने उन पर रास्ट्रीय सुरक्षा कानून की विभिन्न धाराओं में मुक़दमे ठोके है और उन्हें रिहा नहीं होने दिया. उनके अन्य साथी और भीम आर्मी के वर्तमान अध्यक्ष कमल वालिया भी जेल में हैं और दो दिन पूर्व ही उनके छोटे भाई सचिन वालिया की भी उनके घर के सामने गोली मार कर हत्या कर दी गयी. शब्बिरपुर के दलितों ने महाराणाप्रताप जयंती पर ठाकुरों के जलूस को निकालने के विरुद्ध प्रशासन से अनुमति मांगी थी लेकिन प्रशासन ने जानते हुए भी ऐसा किया और एक निर्दोष को उसके घर के सामने गोली मार दी गयी. प्रशासन का कहना है के मामला संदिग्थ है लेकिन प्रश्न इस बात का है के जिस तरीके के विडियो और सचिन की मौत पर अपने को ठाकुर कहने वालो ने विडियो बनाये है वे शर्मनाक है.

पिछले कुछ वर्षो में जब से भाजपा का हिंदुत्व का अजेंडा चला है उसका सबसे अधिक लाभ चाहे ठाकुर युवाओं को मिला हो या नहीं लेकिन उनके नेताओं की तो मानो चांदी हो गयी. उत्तर प्रदेश के अन्दर २०१४ के ‘देशभक्ति’ के अभियान ने ब्राह्मण ठाकुर नेताओं को पुनर्जीवित किया. मुजफ्फरनगर के परिक्षण से ठाकुरों ने इस क्षेत्र में जाटो और गुजरो की राजनीती को भी किनारे कर दिया और शायद उनके नेताओं को ये लग रहा है के आगे भी इसी प्रकार की ध्रुवीकरण की राजनीती करेंगे तो वो सत्ता की और ले जायेगी लेकिन आज के इस राजनैतिक युग में जब दूसरी जातीया भी अपने अधिकारों के प्रति सतर्क है तो वे भी देर सवेर सवाल करेंगी और अपनी हिस्सेदारी मांगेगी. लेकिन कुछ समय से पूरे देश में खासकर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि प्रदेशो में राजपूतो के युवाओं का अपनी ‘अस्मिताओ’ को लेकर प्रदर्शन दिखाई दिया. राजस्थान में महारानी पद्मावती को लेकर उन्होंने खूब तोड़फोड़ की और कुछ लोगो ने ये माना भी था के व्यावसायिक लाभ के लिए अक्सर बम्बई के निर्माता निर्देशक ऐसा खेल खेलते है लेकिन उन्नाव के बलात्कार के आरोपित विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को लेकर जैसे उनकी बिरादरी ने प्रदर्शन किया वो शर्मनाक था. इसलिए क्योंकि जो प्रताड़ित महिला थी वह भी राजपूत जाति की बताई जा रही थी तो फिर उसका सम्मान कहाँ है. क्यों नहीं राजपूत युवाओं का खून उस महिला की इज्जत के खौला जिसको आरोपित विधायक ने अपनी दबंगई के चलते तार तार किया. अब तो सी बी आई ने भी स्वीकारा है के विधायक ने महिला के साथ बलात्कार किया लेकिन उत्तर प्रदेश के सरकार या भारत के केंद्रीय मंत्री अथवा उनके संस्कारी समर्थको ने बजाये इसके के मंत्री ओर नेता से सवाल करें, उलटे उनके समर्थन में आना शुरू कर दिया.

राजपूत नेताओं के ये समर्थक आज सड़को पर उतर कर लठैती कर रहे है, भद्दी भद्दी गालिया दे रहे है और जय राजपुताना या भारत माता की जय के साथ अपनी मूंछो को मरोड़ रहे है. कोई भी प्रश्न पर राजपूत नेता अपने समाज की आन मान मर्यादा के प्रश्न खडा कर दे रहे है लेकिन ये प्रश्न भी समझ में आना चाहिए के आखिर राजपूतो के आर्थिक हालत कैसे हैं ? क्या किसी नेता ने सवाल किया के उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है, उनके बच्चे नौकरियों में है न नहीं, खेती के क्या हाल है आदि आदि. आज़ादी के बाद से ही राजपूतो को बड़े राजाओं और अपनी जाति पर गौरव करने के अलावा कुछ नहीं सिखाया. ज्यादातर जमीन जमींदारी उन्मूलन के समय चली गयी. बचे खुचे जमींदार पार्टियों के नेता बन गए. राजाओं की जमीनों पर तो कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन बाकि गरीबो के हालात ख़राब होते चले गए. नौकरी करने को तौहीन समझा गया इसलिए राजपूतो का भारत सरकार की नौकरियों में प्रतिशत बहुत कम है. अयोध्या के राम मंदिर आन्दोलन में में इतनी बड़ी संख्या में राजपूतो का संप्रदायीकरण नहीं हुआ जो आज है. बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश में ऐसे राजपूत नेता थे जो हमेशा से सामाजिक न्याय और समाजवादी आन्दोलनों से जुड़े रहे. ये तो नहीं कहा जा सकता के सबने जाति छोड़ दी लेकिन ये जरुर था के सभी आग उगलने वाले और गाली गलौज की राजनीती वाले नहीं थे. उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर जैसे लोग भी थी जिनकी भाषा और दोस्ती दबंगई वाले लोगो से थी लेकिन राजनीती में उन्होंने संवेदनशीलता से ही बात की. भाजपा में भैरों सिंह शेखावत, जसवंत सिंह जैसे नेता थे और उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह जो वर्तमान में ठाकुरों के नाम पर नेतागिरी कर रहे लोगो से न केवल कद में अपितु व्यवहार और विचार में भी बहुत बड़े थे.
सामाजिक न्याय की राजनीती में विश्वनाथ प्रताप सिंह का नाम बहुत अदब से लिया जाता है. अपने छोटे से कार्यकाल में जिस ईमानदारी के साथ उन्होंने सामाजिक न्याय का प्रश्न राजनीती की मुख्यधारा बना दिया वो इतिहास में मील का पत्थर है. हालाँकि मंडल कमीशन की रिपोर्ट को स्वीकार करने के बाद उनकी जाति और अन्य सवर्णों ने उन्हें सिर्फ गालिया ही दी लेकिन इसके बावजूद जब भी भारत के बहुजन समाज के हितो का प्रश्न आएगा, विश्वनाथ प्रताप सिंह की राजीनीतिक क़ुरबानी को भी याद किया जाएगा. मंडल दो को लागू करवाने में कांग्रेस सरकार में अर्जुन सिंह की भूमिका को भी हमेशा याद किया जाएगा. केंद्रीय मानव संशाधन विकास मंत्री के तौर पर शिक्षा को साम्प्रदायिकता से मुक्त करने के उनके प्रयास भी सराहनीय रहे है. मध्य प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह चाहे मीडिया में कितना ही बदनाम होते रहे हों लेकिन अपने मुख्यमंत्रित्व काल में उन्होंने मध्य प्रदेश में डाइवर्सिटी के अजेंडा को लागू करने की कोशिश की. कांग्रेस पार्टी के अन्दर सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ खुलकर बोलने वालो में दिग्विजय सिंह प्रमुख रहे है. बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख नेता रघुवंश प्रसाद सिंह भी सामाजिक न्याय और समाजवादी आन्दोलन के प्रमुख हिस्सा रहे है. इनमे से किसी भी नेता ने खुले तौर पर अपने जातीय वर्चस्व की बात नहीं कही. चुनावो में अपने क्षेत्रो में जरुर जातिगत खेल होते रहे हों लेकिन न तो गाली गलोज की भाषा और न ही अपने मूल समाजवादी सेक्युलर चरित्र को इन सभी लोगो ने नहीं छोड़ा. लेकिन २०१४ के चुनावो के बाद से ही  भाजपा ने राजपूतो में उस तबके को प्रश्रय दिया जो अपनी जातीय अस्मिता के अलावा और कुछ नहीं देखे. योगी आदित्यनाथ, संगीत सोम और उन जैसे आग उगलने वाले ठाकुर नेताओं को आगे करके भाजपा ने दरअसल ब्राह्मणवाद का बड़ा सुरक्षा कवच ढूँढा क्योंकि आज उत्तर प्रदेश में बाकी जातिया ठाकुरों की इस दबंगई के खिलाफ कड़ी होंगी.

चुनावो में वोट के लिए राजपूतो के अन्दर छद्म राष्ट्रवाद और फर्जी बड़प्पन की बात कर उनके असली सवालो को गौण कर दिया गया है . सवाल ये है के आज के २१वे सदी में बड़ी कौम कौन मानी जायेगी ? उसका उत्तर बहुत सिंपल है . कोई कौम इस सन्दर्भ में बड़ी कही जायेगी के उसका शिक्षा, स्वस्थ्य, विज्ञानं, कानून, राजनीती, सिनेमा, खेल और  साहित्य में क्या योगदान है. वंशवादी मनुवादी राजशाही के चलते अपनी मूछो पर ताव् रखने वाले अपनी कौम का सर्वे कराकर देखे के उसकी हालत क्या है. उसके कितने अधिकारी है, कितने जज है, कितने पत्रकार है और फिर अपने पे गर्व करे . इन सभी क्षेत्रो में राजपूत बहुत पीछे है और उनके युवा अपने बदलाव के लिए कोई आन्दोलन भी करने को तैयार नहीं है. भ्रष्ट नेता इन युवाओं को कोई भी नया भविष्य नहीं दे सकते है इसलिए उन्हें संघ परिवार का सिपाही बनाकर इस्तेमाल किया जा रहा है जिसके बहुत लाभ नहीं होने वाले. आज जब युवा नए क्षितिज की और जा रहे है, राजपूत युवा केवल नेताओं के लठैत की भूमिका निभाएंगे तो कही के नहीं रहेंगे.

राजा महांराजाओ, तिलिस्मो, मिथ आदि में गर्व करना तो बहुत आसान है क्योंकि जो लोग इनके सहारे ही हमें जीने के तरीके बता रहे है वे जानते है के अगर समाज का कोई ‘महान’ राजा नहीं भी है तो ‘खबर’ और ‘इतिहास’ बनाने की व्हात्सप फैक्ट्री में वे इसे आसानी से तैयार कर सकते है जिससे वो युवा जिसे अपने रोजगार और साधनों के लिए रोजगार मांगना चाहिए था वो हिंदुत्व, जय श्री राम, जय राजपुताना और ऐसे ही नारे लगाता फिरता है.

करीब चार वर्ष पहले मै बेहमई गाव गया था. वहा मै पहले भी गया था क्योंकि मै फूलन देवी के गाँव शेखुपुरा, कालपी भी गया था. बेह्मही ठाकुरों का वह गाँव है जहाँ ऐसा बताया जाता है के डकेतो ने जो ठाकुर थे ,फूलन का अपहरण करके यहाँ रखा था और फिर उनके साथ बलात्कार किया गया था और बताया जाता है के गाँव के एक भी व्यक्ति ने उन्हें बचाने की कोशिश नहीं की जिसके फलस्वरूप ही फूलन बहुत आक्रोशित हुई थ  और फिर यही १४  फरवरी १९८१ में उन्होंने और उनके साथियो ने अपने साथ हुए अत्याचार का बदला लेते हुए २० राजपूतो की हत्या कर दी थी.  देश भर में इन हत्याओं को लेकर बेहद शोर हुआ था. यहाँ की २० विधवाओं को लेकर अखबारों में कई कहानिया लिखी गयी लेकिन एक महिला के साथ बातकर मुझे इस समाज की दकियानूसी परम्परा पर बोलने की इच्छा हुई .

१४  फ़रवरी के हत्याकांड में लाल सिंह नामक युवक की मौत भी हुई थी जिसके उम्र करीब १२-१३ वर्ष की रही होगी उसकी सगाई पास के गाँव के मुन्नी से हुए थी जिसकी उम्र ९ वर्ष की थी. लाल सिंह की मौत के बाद, मुन्नी के भाइयो ने अपनी बहिन को विधवा बनाकर बेहमई गाँव भेजा. इतने वर्षो के बाद मुन्नी को देखकर मुझे इस समाज की दकियानुसी परम्परा पर इतना क्षोभ हुआ के व्यक्त नहीं कर सकता. बेहमई के आस पास के ८४ गाँव ठाकुरों के है और शादिया इन गाँवों में आपस में होती है. किसी ने विद्रोह किया तो उसे सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ेगा. मुन्नी अपनी पूरी उम्र विधवा बन कर रही. क्या करे ऐसे भाइयो का जिन्हें रीती रिवाज ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है लेकिन अपनी बहिन की ख़ुशी नहीं.

राजपूत समाज में अभी भी महिलाओं की स्थिति बहुत ख़राब है. जो भी समाज रिजिड होगा और केवल पुरानी परम्पराओं में ही अपने शान समझता होगा तो वह औरतो की स्थिति बहुत ख़राब होगी. शायद यही कारण है के उन्नाव के विधायक ने जिस राजपूत लड़की के साथ बलात्कार किया उस लड़की के समर्थन में एक भी राजपूत महासभा या उनका नेता खड़ा नहीं हुआ. इससे अधिक शर्मनाक बात कुछ नहीं हो सकती.

तलवार और लम्बे टीका लगाकर या गाली गलोज कर आप समुदाय के अंदरूनी हालातो को छुपा नहीं सकते हो. राजपूतो को चाहिए के ब्राह्मण, बनिया, कायस्थ, भूमिहार आदि से अपनी तुलना करें और देखे के विकास के इंडेक्स में वे कहाँ है.संघ के  चालाक  ‘इतिहासकार’ उनके बच्चो का ध्यान बटाने के लिए दलितों और पिछडो के आरक्षण को इसके लिए दोषी ठहरा देंगे लेकिन इससे बड़ा झूठ कुछ नहीं हो सकता. आज राजपूतो की पुरानी शान का मोहरा बनाकर संघ परिवार में उनके पिछलग्गू नेता मात्र ब्राह्मणवाद की सेवा में समर्पित है और समाज के ज्वलंत प्रश्नों का उन्हें पता भी नहीं है. किसी भी समाज के नायक वो होते है जिन्होंने समाज में गरीब से गरीब तबके को बराबरी पर लाने के लिए संघर्ष किया हो या समाज बदलाव में कोई योगदान किया हो. इतिहास से हम सबक सीख सकते है उसमे रहते नहीं है. याद रहे के जितने भी राजा महारजा थे वे अपनी लड़ाई लड़ रहे थे और अपने हितो के अनुसार ही मुगलों के दोस्त और दुश्मन बने. खानदान में एक उनके साथ रहा तो दूसरे मुगलो के साथ खड़ा रहा और सबके अपने हित थे इसलिए उस दौर के राजाओं के आपसी खींचतान को आप वर्त्तमान परिपेक्ष्य में हिन्दू मुसलमान की लड़ाई में बदलकर अपना राजनैतिक एजेंडा तो चला लोगे लेकिन ये बहुत समय तक चलने वाला नहीं है. जैसे अपना इतिहास आप बना रहे है वैसे ही और भी जातिया अपने अपने नायक गढ़ रही है और इन सबसे केवल कुछ लोगो का अजेंडा काम कर रहा है जिन्हें हम पुरोहितवादी पूंजीवादी शक्तिया कह सकते है क्योंकि इसकी आड़ में उन्होंने अपने परम्परागत और पुश्तैनी धंधो को मज़बूत कर दिया है. दलितों ने तो व्यवस्था से सवाल पूछना शुरू किया और ब्राह्मणवादी परम्पराओं को नकार कर अपना रास्ता अपना लिया. पिछड़े भी अब सीख रहे है और अपनी राजनीती स्वयं कर रहे है, तो आप क्यों नहीं इतिहास और मिथ को चुनौती देते. क्यों आज परशुराम जयंती मनाई जा रही है जिसने क्षत्रियो की २१ पीढियों को समूल नष्ट कर देने की बात कही ? आज सड़ी गली परम्पराओं को महिमामंडन किया जा रहा है क्योंकि बदलाव से डर लग रहा है.

नेताओं का क्या वे तो ऐसे खेल खेलेंगे. नौकरिया ख़त्म है लेकिन अपने समाज के हाथ में एक छुन्छूना पकड़ा देंगे के सरकारी नौकरिया देंगे और फिर वोट की खातिर समाज को सडको पे उतार देंगे. आज के बदलते युग में ये घिसी पिटी बाते हो चुकी है जिससे समाज का भला होने वाला नहीं. समय है के युवा लोग अपने में बदलाव लायें और सामाजिक न्याय की शक्तियों के साथ जुड़े. जनतंत्र की सफलता विभिन्न जातियों, धर्मो आदि में केवल राजनैतिक सहयोग की नहीं अपितु सामाजिक गठबंधन में भी निहित है. पुराने राजे महाराजे आधारित वंशीय और जातीय दंभ समुदाय के नेताओं को भी कुछ समय तक ही ताकत देगा, लम्बे दौर में ऐसे नेता बेकाम रहेंगे और समाज ने अगर अभी से ये दंभ छोड़ कर अन्य मुख्य प्रश्नों में दूसरे लोगो के साथ राफ्ता कायम नहीं किया तो एक समय आएगा जब सारी दूसरी जातीया आपके खिलाफ खड़ी दिखाई देंगी और वो सबसे भयावह स्थिति होगी. सत्ताधारियो की जातीय उदंडता के विरुद्ध उत्तर प्रदेश की जनता ने हमेशा विद्रोह किया है, इसलिए भलाई इसी में है के मानवीय मूल्यों के लेकर समाज में सामंजस्य बनाया जाए और स्थानीय स्तर पर राजनैतिक गठबंधन बने लेकिन वो किसी समुदाय के विरुद्ध न हो. राजनैतिक लड़ाई लड़ते वक़्त आपसी रिश्ते इतने न ख़त्म कर दो के मिलने में दिक्कत हो. आप अपने पडोसी को नहीं बदल सकते और उनके साथ अच्छे रिश्ते बनाकर ही आप सुरक्षित रह सकते है. ये सोच कर की अपनी ताकत दिखाकर पडोसी को झुकाकर या भागकर आप चैन से रह पायेंगे तो ये ग़लतफ़हमी में कोई समाज न रहे. इस देश में साथ रहने और एक जुट रहने की एक ही गारंटी है के संविधानिक मूल्यों का ईमानदारी से पालन हो और ईमानदारी बिना भागीदारी के नहीं आ सकती लेकिन कोई ये सोचे के एक समाज को समाप्त कर या अपमानित कर उनकी जिंदगी आसान हो जायेगी तो उस पर कोई भी समझदार व्यक्ति हंस ही सकता है.

सहारनपुर के घटनाक्रम ने जहाँ सत्ताधारी दल और सरकार की असफलता को उजागर किया है वही इसने सामाजिक न्याय और अम्बेडकरवाद का झंडा उठाने वालो को भी सोचने पर मजबूर किया है. आखिर ये पार्टिया इस प्रश्न पर सहारनपुर के दलितों के साथ क्यों खड़ी नहीं दिखाई देती. बहुत से लोग सोशल मीडिया पर कह रहे हैं के योगी आदित्यनाथ साल के आखिर में चंद्रशेखर आज़ाद को रिहा कर देंगे ताकि वह बहिनजी के खिलाफ चुनाव लडे या बसपा को नुक्सान पहुचाये. ये बहुत ही निराशाजनक बात है क्योंकि चुनाव लड़ने की बात तो बाद में आएगी आखिर चंद्रशेखर के खिलाफ जो आरोप लगे है वे तो पूरे फर्जी है और उसके साथ अन्याय हुआ है. भीम आर्मी के लोग जेल में भेजे जा रहे है इसलिए जो भी राजनितिक पार्टियाँ है उन्हें समझदारी दिखाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर दवाब डालना चाहिए के वे सारे मुकदमे वापस ले. 

समाजवादी पार्टी ओर कांग्रेस भी इस मामले में चुप रहे है शायद इसलिए के भाजपा का चालाकी का दांव में नहीं फंसे. लेकिन ये राजनितिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं की असफलता है यदि हम ऐसे प्रश्नों पर इमानदार बहस नहीं कर सकते. दलितों पर हो रहे अत्याचार का प्रश्न मात्र दलितों का सवाल नहीं है, ये मात्र राजन्तैतिक हिसाब किताब का सवाल भी नहीं है अपितु मानवाधिकारों और संविधान की सर्वोच्चता का प्रश्न भी है क्या इस देश में कानून का शासन चलेगा या मनुवाद चलेगा.

भाजपा और संघ परिवार ने इस देश के ताने बाने को और नकारात्मक किया है और राजनितिक दलों पर बहुत दवाब डाला है. उनकी लगातार कोशिश रही है एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ खड़ा करके विभाजन का राजनैतिक फायदा उठाया जाए. उनके पास ऐसे दबंगों के फौज है चाहे वह बिकाऊ मीडिया हो या तथाकथित बुद्धिजीवी. हम जानते है के दूसरी पार्टिया उनके इस विभाजनकारी सवालो का जवाब देने में असफल रहे है. सहारनपुर में पार्टियों को सवर्णों के वोट का खतरा है लेकिन हम उनसे ये कहना चाहते है अपनी पार्टियों के सभी जातियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को बैठाकर इन प्रश्नों पर चर्चा कीजिये. अगर भाजपा तोडती है तो आप जोडिये और सभी पक्षों को सामाजिक तौर पर साथ ला कर बात कीजिये लेकिन इसकी एक ही शर्त होगी के छुआछूत और जातीय सर्वोच्चता में यकीं करने वालो के साथ तो कोई बात नहीं हो सकती.


सहारनपुर के घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र में दबंगों की बढ़ती ताकत की कहानी भी है. ऐसी घटनाएं जानबूझकर फैलाकर पूरे प्रदेश में अराजक दबंको को राजनीती में घुसाने की तैय्यारी है और इसका दूसरा इलाज़ केवल सामाजिक न्याय की शक्तियों को आपस में साथ रहकर, अपनी लड़ाई मिलजुलकर लड़ने में ही है. विभाजनकारी ताकतों को आंबेडकर, फुले, पेरियार के सांस्कृतिक परिवर्तनवादी ताकते ही शिकस्त दे सकती है. उत्तर प्रदेश में राजनैतिक तौर पर तो इन ताकतों ने अपनी मौजूदगी का एहसास करवाया है लेकिन सांस्कृतिक और सामाजिक परिवर्तन में जब ऐसी शक्तिया सभी दबी कुचली जातियों को एक कर देंगी तो ब्राह्मणवादी बर्चास्व्वादी ताकते अपने आप ही नेस्तनाबूद हो जाएँगी और तभी उनसे प्रताड़ित सभी लोगो सामाजिक और सांस्कृतिक लोकतंत्र की खुली हवा में सांस ले पायेंगे. लड़ाई बहुत लम्बी है लेकिन असंभव नहीं है, केवल आवश्यकता बौधिक ईमानदारी की है. सहारनपुर में दलितों पर हुए अपराधो की जाँच हो और मुझे ये बात कहते हुए कोई गलत नहीं लगता के भीम सेना के सभी कार्यकर्ताओं को रिहा किया जाए और उनपर ठोके गए फर्जी मुकदमे सब वापस लिए जाएँ और ये बात की मांग करने में अगर राजनैतिक दलों को झिझक हो रही है तो फिर इससे बड़ी शर्मनाक बात कोई नहीं हो सकती.